जनगणना में जाति की गिनती के लिए दबाव बनाएं

♦ जनहित अभियान

इस समय देश में हाउस लिस्टिंग और हाउसिंग सेंसस का काम चल रहा है। जनगणना का दूसरा चरण शुरू होने में सिर्फ आठ महीने रह गये हैं। इस देश की लोकसभा ने, जो राष्ट्र के लोगों की राय को व्यक्त करने का सबसे बड़ा, प्रामाणिक और प्रतिनिधि मंच है, सर्वसहमति से जनगणना में जाति की गिनती करने के पक्ष में राय दी है।
 
यह खेद की बात है कि लोकसभा में बनी आम सहमति को मीडिया और कुछ बुद्धिजीवी एक अन्य किस्म की आम सहमति तैयार करने की कोशिश के द्वारा खंडित करने की कोशिश कर रहे हैं। जाति जनगणना के खिलाफ चलाये जा रहे इस अभियान के माध्यम से लगातार भ्रम की स्थिति बनायी जा रही है। हम यह मानते हैं कि लोकसभा में बनी सहमति को इस तरह कमतर करके दिखाना और आंकना लोकतंत्र के हित में नहीं हैं। इससे लोकतंत्र में बहुसंख्य आबादी की आस्था कमजोर हो सकती है।
 
हम इस बात को लेकर भी चिंतित हैं कि सरकार इस मसले पर टालमटोल करती दिख रही है। मंत्रियों का समूह बना कर पूरे मामले को प्रक्रियागत पेचीदगियों में उलझाया जा रहा है। 

हम सभी का मानना है कि दस साल में एक बार होने वाली जनगणना में धर्म,  भाषा,  लिंग, व्यवसाय आदि के साथ-साथ सभी जाति की भी गणना की जानी चाहिए। इससे भयभीत होने का कोई तर्कसंगत कारण नहीं है। भारतीय जनगणना में अनुसूचित जातियों-जनजतियों की गिनती हमेशा होती रही है। अब जरूरत इस बात की है कि सभी जातियों और उनसे जुड़े आंकड़े जुटाये जाएं।

देश को बेहतर तरीके से समझने के लिए जनगणना एक महत्वपूर्ण मौका है। जनगणना के दौरान समाज और उसकी विविधता के बारे में आंकड़े जुटाना विकास की योजनाओं के लिए जरूरी है। 2011 में यह मौका हाथ से निकल गया तो अगले दस साल तक देश में बहुत सारी नीतियां और नियम बनाते समय तथ्यों और आंकड़ों के नाम पर सिर्फ अनुमान और अंधेरा होगा। यह देश हित में नहीं है। इसलिए हमारी स्पष्ट राय है कि 2011 की जनगणना में सभी जातियों की गिनती की जाए। सरकार को इस बारे में सारे भ्रम जल्द से जल्द दूर करने चाहिए।

हस्ताक्षरकर्ता

मस्तराम कपूर, लेखक
प्रो तुलसीराम, जेएनयू
प्रो चमनलाल, जेएनयू
सुरेंद्र मोहन, समाजवादी चिंतक
प्रो दिनेश कुशवाह, रीवा विश्वविद्यालय
उदय प्रकाश, लेखक-फिल्मकार
जयशंकर गुप्त, कार्यकारी संपादक, लोकमत
प्रो वीर भारत तलवार, जेएनयू
प्रो केजे मुखर्जी, जेएनयू
वामन मेश्राम, अध्यक्ष, बामसेफ
गोबिंद प्रसाद, जेएनयू
डा बजरंग बिहारी तिवारी, डीयू
अफलातून, सामाजिक कार्यकर्ता
ग्लैडसन डुंगडुंग, मानवाधिकार कार्यकर्ता
उमराव सिंह जाटव, लेखक, सेवानिवृत आईपीएस अधिकारी
जॉन दयाल, दलित अधिकारों के लिए आंदोलनरत
यूसुफ अंसारी, संपादक, चैनल वन
जुगनू शारदेय, लेखक-पत्रकार
अश्विनी कुमार पंकज, आदिवासी भाषा आंदोलन
राजकिशोर, लेखक
अनिल चमड़िया, लेखर-पत्रकार
आनंद स्वरूप वर्मा, लेखक-फिल्मकार
गंगा सहाय मीणा, असिस्टेंट प्रोफेसर, जेएनयू
कौशलेद्र यादव, ऑल इंडिया बैकवर्ड एंप्लाइज फेडरेशन
उर्मिलेश, पत्रकार
शीबा असलम फहमी, लेखिका
जितेंद्र कुमार, पत्रकार
दिलीप मंडल, लेखक-पत्रकार

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