यह कौन बोल रहा है? तोगड़िया या ठाकुर नामवर सिंह?

♦ दिलीप मंडल

प्रवीण तोगड़िया, विश्व हिंदू परिषद : जाति आधारित जनगणना से जातियों में मतभेद व दुर्भावना बढ़ेगी।

मोहन भागवत, राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के सरसंघचालक : जाति के आधार पर जनगणना करना गलत है। संघ इसका कड़ा विरोध करेगा। जनगणना एवं नागरिकता को एक साथ जोड़ना गलत है। संघ इसकी आलोचना करता है। एक तरफ जहां हम जातिविहीन समाज की बात करते हैं वहीं दूसरी तरफ जाति आधारित जनगणना का समर्थन किया जाता है। यह सरासर गलत है।

नामवर सिंह, प्रख्‍यात वामपंथी आलोचक, हिंदी साहित्‍य : जातिगत जनगणना से देश का सामाजिक ढांचा छिन्न-भिन्न हो जाएगा। यह साहित्य की नहीं बल्कि राजनीति की समस्या है। राजनीतिक पार्टियां अपने व्यक्तिगत हित के लिए जाति आधारित जनगणना कराना चाहती हैं ताकि चुनावों के वक्‍त जातियों के आंकड़े को वो प्रयोग कर सकें और इसी आधार पर उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारें। अफसोस की बात है कि कांग्रेस इसका समर्थन कर रही है। पहले से जाति के दुष्चक्र में फंसे समाज को वोट बैंक की राजनीति के कारण पार्टियां इसमें ढकेल रही हैं। सबसे अहम बात है कि पिछड़े और दलित की राजनीति करने वाली पार्टियां इसकी सबसे अधिक मांग कर रही हैं। किसी भी प्रकार के दुष्चक्र को तोड़ने का कार्य संत व साहित्यकार करते हैं और इस बार भी साहित्यकारों को ही आम जनता के सामने जातिगत जनगणना के दूरगामी दुष्परिणामों से सचेत करना होगा।

मुरली मनोहर जोशी, वरिष्‍ठ भाजपा नेता : इससे भारतीय समाज का बंटवारा हो जाएगा। जाति आधारित जनगणना उचित नहीं है। देश पहले से बंटा हुआ है और अब जाति आधारित जनगणना समाज को भी बांट देगी।

हरि एस भरतिया, नवनियुक्‍त अध्‍यक्ष, भारतीय उद्योग महासंघ (सीआईआई) : क्यों मरते हुए मुद्दे को फिर से जिंदा किया जा रहा है? कंपनियां जाति से हटकर नीतियां अपनाना चाहती हैं। हमारी कंपनियां जाति आधारित बातों के लिए तैयार नहीं हैं। चैंबर का विचार है कि जाति आधारित जनगणना से एक बार फिर से पुराना सामाजिक मुद्दा खड़ा हो जाएगा, जो बीतते समय के साथ ही दफन हो चुका है।

इन तमाम बयानों के बीच ही हमने नामवर सिंह, माफ कीजिएगा ठाकुर नामवर सिंह के बयान भी देखे। ठाकुर नामवर सिंह इन दिनों शानदार संगत में हैं। वे एक ऐसे आंदोलन से जुड़ गये हैं, जहां उनके साथ मंच पर प्रवीण तोगड़िया, मोहन भागवत, मुरलीमनोहर जोशी, सीआईआई से जुड़े उद्योगपति और सबड़े बड़े पूंजीपति खड़े हैं। सोमनाथ चट्टोपाध्याय का समर्थन भी उन्हें मिल गया है।

इस मंच से ठाकुर नामवर सिंह हिंदुस्तान के साहित्यकारों को उनकी ऐतिहासिक भूमिका की याद दिला रहे हैं। तो योद्धाओ, तैयार हो जाओ। रणभूमि पुकार रही है। राजेंद्र यादव, ओम प्रकाश वाल्मीकि, उदय प्रकाश, संजीव, श्यौराज सिंह बेचैन, मोहनदास नैमिशराय, अब्दुल बिसमिल्लाह आदि आदि सभी आगे आएं और “संतों के साथ” मिलकर जाति गणना के “दुष्चक्र को तोड़ें” और ठाकुर नामवर के सपनों को पूरा करें।

ठाकुर नामवर सिंह राजधानी में सबल भारत संगठन द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन मेरी जाति हिंदुस्तानी के समर्थन में आयोजित एक संगोष्ठी में पहुंचे थे। इस अवसर पर संगठन के राष्ट्रीय संयोजक वेदप्रताप वैदिक और आलोचक कृष्ण दत्त पालीवाल भी मौजूद थे।

ठाकुर नामवर सिंह समसामयिक मुद्दों पर कम बोलते हैं। मिसाल के तौर पर उन्होंने खापों के अत्याचार, ऑनर किलिंग, मिर्चपुर के हत्याकांड, बढ़ती महंगाई, विस्थापन, सेज, ग्रीन हंट, वामपंथी उग्रवाद, कश्मीर समस्या, नेपाल में बदलते राजनीतिक हालात, फिलस्तीन समस्या आदि पर शायद ही कुछ बोला है। गुजरात के दंगों पर भी उन्होंने कुछ नहीं कहा था। लेकिन जाति के प्रश्न पर वे मुखर हैं। इससे पहले राजस्थान के एक समारोह में भी वे जाति जनगणना का विरोध कर चुके हैं।

मुश्किल सिर्फ यह है कि जाति पर जब वे बोलते हैं, तो पता ही नहीं चलता कि आवाज तोगड़िया के मुंह से निकल रही है, अशोक सिंघल, मुरली मनोहर जाशी के मुंह से या फिर ठाकुर नामवर सिंह के मुंह से। आप ऊपर दिये गये उद्धरणों में नामों की अदलाबदली करके देख लें। क्या आपको मोहन भागवत और ठाकुर नामवर सिंह की बातों में कोई फर्क नजर आ रहा है?

dilip mandal(दिलीप मंडल। सीनियर टीवी जर्नलिस्‍ट। कई टीवी चैनलों में जिम्‍मेदार पदों पर रहे। अख़बारों में नियमित स्‍तंभ लेखन। दलित मसलों पर लगातार सक्रिय। यात्रा प्रिय शगल। इन दिनों अध्‍यापन कार्य से जुड़े हैं। उनसे dilipcmandal@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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