सिनेमा का असर ज्यादा, उसकी जिम्मेदारी भी ज्यादा
♦ डॉ योगेंद्र
सिनेमा और सरोकार की बहस में एक गैरमहानगर से हस्तक्षेप आया है। भागलपुर से प्रोफेसर योगेंद्र ने अनीश की प्रतिक्रिया पर अपनी टिप्पणी भेजी है। कृपया देखें : मॉडरेटर

अनीश ने सिनेमा से संबंधित जरूरी सवाल उठाये हैं। वे जब लिखते हैं – ‘क्रांति-बदलाव की दिशा क्या हो, उसका कंटेंट क्या हो, ये एक महत्वपूर्ण विषय है, मेरी समझ से सिनेमा का इस बहस से सीधा जुड़ा हुआ है’ – तो सिनेमा के उन सरोकारों की ओर इशारा कर रहे हैं जिन्हें सिनेमा बनानेवाले भूल चुके हैं। बावजूद इसके जो भी सिनेमा बन रहा है, उनका भी गहरा असर समाज पर पड़ रहा है। जिस सिनेमा को करोड़ों लोग हर दिन देखते हैं, लोगों की चेतना हीरो-हिरोइनें, खलनायक और उत्तेजक घटनाओं से बिंधी रहती हैं, उन पर सिनेमा का असर न पड़े, यह असंभव है। अगर कोई कहता है कि सिनेमा से सिर्फ हेयर स्टाइल बदलता है, तो भी यह बदलाव मामूली नहीं है।
मेरे पिता की शादी नौ वर्ष में हो गयी थी। मेरी मां की छह बहनें थी। जब एक अन्य बहन की शादी हो रही थी तो पिता को ससुराल से बुलावा आया। वर्षों से मां से मुलाकात नहीं हुई थी। अच्छा मौका था। पिता ससुराल जाने की तैयारी करने लगे। उन दिनों बाल कटवाने का अर्थ सिर्फ बाल मुड़वाना हुआ करता था। पिता ने गुस्ताखी की। उन्होंने बाल मुड़वाने की बजाय बाल छंटवाया। पिता को मालूम था कि यह उनके पिता यानी मेरे दादा को अच्छा नहीं लगेगा, इसलिए उन्होंने इसे छिपाने के लिए मुरेठा बांध लिया। जब घर पहुंचे तो दादा ने पूछा – माथे में क्या हुआ है? कुछ नहीं – पिता का उत्तर था। फिर मुरेठा क्यों बांध रखा है? खोलो इसे – दादा थोड़े गुस्से में थे। डर से पिता ने मुरेठा खोला। दादा जी न केवल गुस्साये, बल्कि नाई को बुलाकर बाल मुड़वा दिया।
पीढ़ियों के अंदर ‘हेयर स्टाइल की एक अवधारणा’ छुपी रहती है। हेयर स्टाइल में भी वक्त के रंग छुपे रहते हैं। आज उपभोक्तावादी समाज की हेयर स्टाइल देखिए, दंग रह जाना पड़ता है। कोई चाहे तो बदलती हुई हेयर स्टाइल की विवेचना कर इस युग के सत्य से रू-ब-रू करवा सकता है।
सच तो यह है कि सिनेमा ने साहित्य की किसी भी रचनात्मक विधा से ज्यादा असर समाज पर डाला है। हालात यह है कि उसके असर से समाज का रॉल मॉडल बदल गया। बहुसंख्यक युवाओं के रॉल मॉडल न मार्क्स हैं, न गांधी, न भगत सिंह, न बुद्ध। वे इन लोगों की कहानियां पाठ्यक्रमों में दवाब से पढ़ लेते हैं, लेकिन जब भी उन्हें फुर्सत होती है, तब हीरो-हिरोइनों की दुनिया में खो जाते हैं। वे अपनी समस्याओं का हल भी सिनेमाई अंदाज से करना चाहते हैं। कभी गांधी टोपी और जयप्रकाश कट कुरता हुआ करता था, मगर अब तो कहीं सलमान है तो कहीं शाहरूख। सिनेमा ने समाज के सोचने-समझने के तरीके बदल दिये हैं।
पर्व-त्योहार की रंगत बदल गयी है। विद्या की देवी श्वेतांबरा हुआ करती थी, वह अब इस्टमैनकलर हो चुकी है। दिवाली हो कि होली, दुर्गापूजा हो या कोई अन्य पर्व, किस पर सिनेमा ने असर नहीं डाला है? सिनेमा के सुंदर, आलीशान मकान को देखकर किसका जी नहीं ललचता! अब तो विभिन्न चैनलों की धारावाहिकों ने तो पारिवारिक मूल्य बदल डाले हैं। नेट की दुनिया ने किस कदर युवा पीढ़ी को घेरा है कि अच्छे-अच्छे उदार मां-बाप की उदारता भी चुक रही है। मुझे लगता है कि सवाल यह नहीं है कि सिनेमा समाज पर असर डालता है या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि कैसा असर डालता है? उसके साथ यह भी कि सिनेमा की दुनिया से जुड़े लोग इतने प्रभावशाली माध्यम का इस्तेमाल किसके लिए और कैसे कर रहे हैं?
निश्चित तौर से सिनेमा कोई व्यक्तिगत अभिक्रम नहीं है। समाज की तमाम शक्तियां जुड़ी हैं। पूंजीपति है, सृजनशील कलाकार हैं, मजदूर हैं, व्यापारी हैं और हैं जनता। ऐसे माध्यम के लिए जो व्यापक रूप से जनता को प्रभावित करता है, उसे ज्यादा जिम्मेदार होना चाहिए।
अनीश कहते हैं कि सामाजिक बदलाव का ठेका फिल्मकारों, पत्रकारों और विभिन्न कला से अपनी जीविका चलानेवालों ने नहीं ले रखी है तो मेरा विनम्र निवेदन है कि अगर आप सृजनशील माध्यम से जुड़े हैं और समाज पर व्यापक असर डाल रहे हैं तो जाने अनजाने आपके पास ‘ठेकेदारी’ तो आ ही गयी है। आज भी सिनेमा की दुनिया दृष्टिहीन नहीं है। उसकी एक दृष्टि तो है ही। वह एक खास तरह की संस्कृति तो जनमानस में परोस ही रही है। वह संस्कृति कैसे बदलाव को जन्म दे रही है, इसपर विचार करना चाहिए। वह मनुष्य को संवेदनशील, संकल्पी, उदार बनाती है और स्वातंत्र्य बोध सिखाती है या फिर क्रूर, डुलमुल, स्वार्थी और गुलाम बनाती है। सिनेमावालों को खास तौर से ऐसे प्रश्नों पर विचार करना चाहिए।
(डॉ योगेंद्र। अध्यापन और आंदोलन से जुड़ाव। भागलपुर के टीएनबी कॉलेज (तेजनारायण बनैली महाविद्यालय) में हिंदी के प्राध्यापक। अखबारों-पत्रिकाओं के लिए स्तंभ लेखन। शिक्षा पर दो महत्वपूर्ण पुस्तकें : गुरु कुम्हार शिष कुंभ और जस देखा तस लेखा। उनसे yogendratnb@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)









सिनेमा का मकसद पैसा कमाना है. जब उनका मकसद ही पैसा कमाना है तो इन सब बातों का कोई मतलब नहीं.
prsann ji ka vaktaya bihar me pichde samudai ki yatharth haqikat ko sprsh karta hai har bar ki tarah yahan bhi ve sandarbhit vishai ke bahane itihas ka sandarbh lete hain aur vartman sthiti ka nurupan karte hain.lekin pichdon ka sashktikaran ho gaya ye mucje nahin lagta.mehaj satta me hissedari se kisi community ka sashktikaran kaise ho jaiga. voh bhi mehaj dedh-do dashkon me.lambe samay tak aisi sthhitiyan rahengi tabhi us samudai me sablikaran ki koi thos pravriti ubhregi.
Aap ki soch bohat porani hai, aap ne oon logo ka naam likha hai, jo samaj mae jane mane naam hai, jin logo ko sab janta hai, kya khud bhi kise aise ko jante hai jisne enke jaisa kaam kiya ho, agar jante hai to oska naam likheye, es samaj ko oske baare mae bataeye, jisse logo ka wo ideal ban sake,
Maa baap bhi apne bachche ko acchi padai na karne pe padosi k bachche ka naam lekar kehte hai, k beta oski tarah bano na ki etihaas ban gaye logo ka naam lete hai,
hum apne aap ko aajad samaj ka niwasi mante hai, hum mante hai k hum or hamari soch aajad hai, to fir kyu humme bhaed chal chalne ko kaha jata hai, or aap se kisne kaha aaj kal k bachchon k ideal sirf film actors he hai, mere ideal mere papa hai, wo army mae hai, or eswaqt KARGIL mae posted hai, jaha 2 din pehle kuch aatank wadiyo se muthbhaed hoyi thi jisme 16 jawan mare gaye,
New generation actors ko ideal nahi manti, wo os kirdar ko ideal mante hai, jis kirdar ko wo parde per nibhate hai, Mere ek bohat pasandida film hai MUKHBIR, This film revolves around the life and events surrounding an Indian spy, es film ko dekhne k baad wo actor Sameer Dattani mera ideal nahi tha balki wo kirdar tha jisko Sameer Dattani ne play kiya tha………
kuch aachcha karne k liye likhe ya kise galat chij ko sudharne k liye likhe to jada aachcha hoga, tata tea ki ad TV per dekhiye, JAGO RE………….
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