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हंस की गोष्‍ठी नहीं भी होगी तो क्‍या फर्क पड़ जाएगा

15 July 2010 21 Comments

♦ अविनाश

कल हंस के दफ्तर गया था, बहसतलब तीन का आमंत्रण देने, तो राजेंद्र यादव के चेहरे पर कभी न तैरने वाली उदासी थी। हमने वजह पूछी, तो जबर्दस्‍ती हंसने लगे और कहने लगे ऐसी कोई बात नहीं है। बात थी, है। तीन चार दिनों से एक क्रांतिकारी ब्‍लॉग पर हंस की सालाना गोष्‍ठी के बहिष्‍कार के लिए माहौल बनाया जा रहा है।

प्रेमचंद जयंती के मौके पर हंस की सालाना गोष्‍ठी होती है। इस बार भी है, 31 जुलाई को। विषय है : वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति। इस‍का अर्थ यह लिया जा सकता है कि जिस हिंसा के साथ ज्ञान, विचार या सत्ता जुड़ी होती है, वह हिंसा हिंसा नहीं होती। दरअसल कहीं से चर्चा उड़ी या संभव है, दरियागंज में राजेंद्र जी के कमरे में इस आइडिया का शोर शराबा हुआ हो कि अरुंधती और विश्‍वरंजन इस मसले पर अपनी अपनी राय रखें। एक मंच से। उनके साथ कई और नामों की भी फेहरिस्‍त के बारे में चर्चा चली हो सकती है।

इस चर्चा के आधार पर गोष्‍ठी के बहिष्‍कार की मांग की गयी और कई लोगों ने इस मांग को अपना समर्थन भी दे दिया। मुझे लगता है कि ये गलत स्‍ट्रैटेजी है। सिर्फ इतना सोचिए कि दिल्‍ली में एक मंच पर अरुंधति और जनआंदोलन की माओवादी धारा से सहानुभूति रखने वाले दो तीन और बुद्धिजीवी छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्‍वरंजन को घेरते, उन पर सवालों के गोले दागते और सभागार में या सभागार से बाहर पांच सौ की तादाद में परिवर्तनकामी युवा तख्‍ती लेकर विश्‍वरंजन के खिलाफ नारे लगाते – तो माजरा क्‍या होता। म‍ीडिया इस मसले को कैसे देखता और पूरे देश में इस संवाद और इस प्रतिरोध के क्‍या संदेश जाते।

हमने एक मौका खो दिया।

कल रात नीलाभ जी का फोन आया और उससे एक दिन पहले प्रेस क्‍लब में दिलीप मंडल मिले, तो हमने यही बात कही। कहीं जाकर या नहीं जाकर, किसी को सुन कर या नहीं सुन कर हम अपनी प्रतिबद्धताएं, अपने आचरण की शुद्धता साबित कर सकते हैं – लेकिन इस सबूत से कुछ फर्क नहीं पड़ता। मैं अभी भी इस बात पर कायम हूं कि अरुंधती मान जाएं और विश्‍वरंजन छत्तीसगढ़ से चल कर हंस की गोष्‍ठी में आ जाएं तो पूरे आंदोलनी हिलोर का एक नया संदेश प्रसारित किया जा सकता है। विश्‍वरंजन को घेर कर, उनको सामने खड़ा करके हत्‍यारा बता कर, उनके सामने उनका पुतला जला कर, उन्‍हें जूतों की माला पहना कर। और ऐसा करते हुए अगर उस वक्‍त तमाम बुद्धिजीवियों की गिरफ्तारी हो जाती है – तो इस भारतीय स्‍टेट को एक्‍सपोज करने का कितना आसान अवसर आपके पास है, ये आप ही तय कीजिए।

वैसे तो, हंस की गोष्‍ठी नहीं भी होगी, तो इससे क्‍या फर्क पड़ जाएगा?

(अविनाश। मोहल्‍ला लाइव के मॉडरेटर। प्रभात खबर, एनडीटीवी और दैनिक भास्‍कर से जुड़े रहे हैं। एक नॉ‍वेल और चंद कविताएं लिखी हैं। दिल्‍ली दरभंगा छोटी लाइन पर ब्‍लॉगिंग करते रहे हैं, लेकिन लंबे समय से निष्क्रिय। उनसे avinashonly@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

21 Comments »

  • पंकज झा. said:

    अविनास जी…बड़े शर्म की बात है कि आप अपनी कुंठा का इस तरह से प्रदर्शन कर रहे हैं. वैचारिक बातों को विचार तक ही रहने दें, उसे ‘व्यभिचार’ बनाने का कुकर्म क्यू करते हैं? पता नहीं किस सस्ती लोकप्रियता के फिराक में हैं आप और इस तरह से अपना परिचय देकर क्या हासिल कर लेंगे? असहमति व्यक्त करने का अपना एक सभ्य तरीका है. इस टिप्पणीकार की भी विश्वरंजन से ढेरों असहमतियां रही है और सीना ठोंक कर असहमतियां विभिन्न मंचों पर व्यक्त भी की जाती रही है. लेकिन जूतों का माला पहनाने की परिपाटी मत शुरू कीजिये. इस बार शायद जूतों की बिक्री बढ़ाकर आप लोग पुनः बाजारवाद को पहले की तरह ही पालित-पोषित करने का ठेका ले लेना चाहते हैं शायद. क्युकी आपको बेहतर मालूम है कि दुसरे पक्ष के पास भी ‘जूता’ खरीदने का संसाधन तो है ही. अगर वे लोग अरुंधती के लिए टमाटर खरीद सकते हैं तो आप जैसे लोगों के लिए भी दिल्ली के किसी शो रूम में जाकर थोक में जूते खरीदने में कोई परेशानी नहीं होगी उनको. और तब उसे कोई गलत भी नहीं कहेगा क्युकी इस अभाद्रदा की शुरुआत आपने ही की होगी…सादर.

  • बेदिल बनारसी said:

    कोई फर्क नहीं पड़ेगा जी. अरुंधती के नहीं आने कोई फर्क नहीं पड़ेगा और हंस का कार्यक्रम नहीं होगा तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

  • dk said:

    avinash jaise chirkut se aur kya ummid kar sakate hai. tab to ab na jaane kitni baar avinash ko unke kukarmo ke liye jute ka mala pahna diya jana chaiye tha.
    avinsah jee, vicharon ki baat par vichar he likhiye. waise yah sab jaante hai ki aap koun se wampanthi hai. babulal marandi ka yashogaan aap he karate hai, 2 bottle sharaab kya mili hogi…sanghi babulal ke sath ho liye. jharkhand me yah koun nahi janta ki baublal kya hai.

  • Kamalkant Pallav said:

    avinashji ke vicharon se main apne ko sahmat pata hun. vicharon ki takrahat ke bavzud ek manch par bahas loktaantrik hone ki nishani hai. apne hi samandharma logon sr ghire rahkar samvad se vanchit hi raha ja sakta hai. sarakar to atankvadiyon tak ke saath varta ke liye baithne ko taiyar hai. jab band dimag wale itne udar ho jate hain to vaicharik log band kamron ki vakalat kyon karen? avinash theek kahte hain ki is mauke ka laabh hi milta.

  • Rajni Kant Mudgal said:

    Vichaar to badhhiya hai, Arundhati aur DGP aamne saamne…Ek BACKDROP bhi lage to behtar….Arundhati Ghoonsa hawa mein lehrate huye aur DGP Bandook tane…background mein Chidambaram..chirparichit muskaan bikherte huye…aamjan aur maovadi..donon ki lash ke dhher par khade hain….ya phir neeru bansuri bajata hua…chidambaram..mujhe to maja ayega is bahas mein…aap donon ko nimantran de deejiye..agar donon maan jayein to balle-balle. Ramlila maidan book karana padega…

  • शेखर मल्लिक said:

    मैं अविनाश जी से मूल बात पर सहमत हूँ, कि संवाद और प्रतिसंवाद होना चाहिए. अगर बार उठेगी नहीं तो आगे बढ़ेगी भी नहीं. यदि अपना स्टैंड रखने का मंच तैयार है तो फिर उसे छोडना नहीं चाहिए. अरुंधती जी का गोष्ठी में नहीं जाना उनका अपना निर्णय है, मगर इससे बहुत सी जरूरी बातों पर से नकाब उठने से रह जायेगा.

  • Nayan Jyoti said:

    दलाली के मोहल्ले से बाहर निकाल आइए. आइए जनज्वार में.

    जब जनता के चले पलटनिया हिल्ले रे झकझोर दुनिया..

    कोई रोक सके तो रोक ले…

    शीर्षक है : पहले वो गोली दागते थे, अब पेशाब करते हैं
    लिंक है : http://www.janjwar.com/

  • दिलीप मंडल said:

    नामवर सिंह विश्वरंजन से अपनापा पटना पुस्तक मेंला में जता चुके हैं। नामवर के बारे में ख्याति है कि वे कुछ भी कर सकते हैं, कुछ भी बोल सकते हैं। अगंभीर किस्म के बुजुर्ग में उनका रूपांतरण हो चुका है। जाति जनगणना के प्रश्न पर वेद प्रताप जैसे शख्स के साथ खड़े होने में वे शर्म महसूस नहीं करते और तोगड़िया और मोहन भागवत की भाषा में बात करते हैं।

    लेकिन राजेंद्र जी की छवि जनता के सवालों पर साफ है और उन पर ज्यादा से ज्यादा आरोप यही लग सकता है कि वे उन सवालों पर खमोश रहे, जिन पर उन्हें बोलना चाहिए। विश्वरंजन हमारे समय के अपराधी है। सलवा जुडुम के नाम पर आदिवासियों के हाथों आदिवासियों का खून बहाने को वैचारिक तौर पर सही ठहराने वाले और व्यावहारिक रूप से इस पर अमल करने वाले शख्स को राजेंद्र जी मंच नहीं देंगे, ऐसी उम्मीद है। विश्वरंजन अपना कर्तव्य पूरा कर रहे हैं। उन्हें वही काम करने दीजिए।

    आज विश्वरंजन होंगे तो कल नरेंद्र मोदी क्यों नहीं होंगे और परसो राजपक्षे क्यों नहीं और आगे चलकर जॉर्ज डब्ल्यू बुश क्यों नहीं। किसी से भी संवाद करने में परहेज कैसा? दाऊद इब्राहिम से भी संवाद कर लें और रणबीर सेना के मुखिया से भी। बात करने से ही तो बात आगे बढ़ती है। क्या बुश का कोई पक्ष नहीं है या रणवीर सेना की कोई विचारधारा नहीं हैं। हंस उन्हें क्यों नहीं बुलाता? निठारी का पंढेर गेस्ट के तौर पर कैसा रहेगा?

  • shahroz शहरोज़ said:

    DILIP MANDAL SE SAHMAT !

  • सच्ची बात said:

    ham bhi DILIP MANDAL SE SAHMAT !

  • ALOK TOMAR said:

    This is amazing. Arundhati Roy is an intellectual hoax of our times and even Vishwaranjan is nor a holy figure. But my point is simple and straight. Why Arundhati and a DGP should fight it on a projected and almost sponsored audience.If Arundhati is so clear about her pro-Maoist thoughts, she must join the Maoist moment and fight it out in in Dandakaranya/Kanker/ Bastar or Dantewada. If Vishwaranjan has that illusionary courage, He may stage an encounter and deal with comrade Arundhati.
    The fight is about the human rights, not of Maoists killers, but of their killers. I hope Arundhati must stop the terror tourism and write. Rhat is the talent, she has in abundance.She may ask Vishwaranjan tha hoe just before months of retirement she became five yrars younger, without loosing his seniority and became the DGP. But can one fak auestion another fake?

    Avinash do not indulge in this drama. We must touch the core issue. I agree to disagree with Dilip Mandal who is comparing bloody Maoists to innocent and butchered public of Gujrat and just to put a flash chose to mention Pandher’s name. Dilip ji bad logic is no logic.

  • समरेंद्र said:

    दिलीप जी,

    शायद आप यह कहना चाहते हैं कि गुजरात हो या फिर छत्तीसगढ़ और केंद्र सरकार – सभी जगह विश्वरंजन जैसे अपराधी बैठे हुए हैं और उनसे संवाद नहीं होना चाहिए। तब तो सिर्फ़ युद्ध ही होना चाहिए और वो चल भी रहा है। तब खुल कर कहिए न कि यह युद्ध सही है और आप इस युद्ध में माओवादियों के साथ हैं। तब खुल कर ये भी कहिए कि दुश्मन राज्य सत्ता की दमनात्मक कार्रवाई में जो भी मारा जा रहा है वो शहीद है।

    तब फिर क्यों अरुंधती से लेकर तमाम लोग कहते हैं कि सरकार को माओवादियों से बात करनी चाहिए। क्योंकि आपकी दलीलों के मुताबिक हत्यारी सरकार और तंत्र से कोई बातचीत नहीं होनी चाहिए। उनके साथ कोई मंच साझा नहीं किया जाना चाहिए!

    फिर आप लोग नाम भी गिनाते हैं कि कौन-कौन शोक सभा में नहीं आया? क्यों गिनाते हैं नाम? क्या राजेंद्र यादव ने कभी आ कर आप लोगों से कहा था कि वो नक्सलियों के हिमायती हैं और उम्र ज्यादा हो गई है वरना वो भी हथियार उठा लेते?

    आपने दूसरा तर्क दिया है कि …

    “आज विश्वरंजन होंगे तो कल नरेंद्र मोदी क्यों नहीं होंगे और परसो राजपक्षे क्यों नहीं और आगे चलकर जॉर्ज डब्ल्यू बुश क्यों नहीं। किसी से भी संवाद करने में परहेज कैसा? दाऊद इब्राहिम से भी संवाद कर लें और रणबीर सेना के मुखिया से भी। बात करने से ही तो बात आगे बढ़ती है। क्या बुश का कोई पक्ष नहीं है या रणवीर सेना की कोई विचारधारा नहीं हैं। हंस उन्हें क्यों नहीं बुलाता? निठारी का पंढेर गेस्ट के तौर पर कैसा रहेगा?”

    देश की व्यवस्था कैसी हो? सिस्टम को चलाने की पद्धति कैसी हो? मौजूदा व्यवस्था सही है या फिर उसे बदलने की जरूरत है? बदलने की जरूरत है तो क्या हमें माओवादियों का मॉडल चाहिए या नहीं चाहिए? किसी भी राज्य सत्ता को अपने ही लोगों का लहू बहाने का अधिकार किसने और कैसे दिया? ऐसे मुद्दों पर होने वाली बहस को आपने निठारी के पंढेर तक उतार दिया। खुद को सही ठहराने की कोशिश में इससे बेतुके तर्क का और अच्छा उदाहरण कोई नहीं हो सकता।

  • अविनाश (author) said:

    दिलीप जी, सवाल संवाद का नहीं था – खेल का था। एक मौके का था, जब हम हत्‍यारे को घेर कर पूरे देश को और देश के बुद्धिजीवियों को एक संदेश दे सकते थे। और हत्‍यारा भी क्‍या, सत्ता का शुतुरमुर्ग। वह सरकार के कहे के हिसाब से जनता के लिए मौत और जिंदगी का ब्‍लूप्रिंट तैयार करता है। इस तरह तो हमें (विश्वरंजन, नरेंद्र मोदी, राजपक्षे, जॉर्ज डब्ल्यू बुश, दाऊद इब्राहिम, ब्रह्मेश्‍वर सिंह (रणबीर सेना का मुखिया), पंढेर की बात छोड़ ही दीजिए) सरकार से संवाद पूरी तरह से बंद कर देने चाहिए!

    मैं तो सिर्फ एक मौके की बात कर रहा था और आपलोगों की हड़बड़ प्रतिबद्धताओं के चलते सब गड़बड़ हो गया।

    2007 के संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ के महाधिवेशन में एक दिन पहले जिस मंच से जॉर्ज डब्‍ल्‍यू बुश भाषण दे चुका था, वहीं दूसरे दिन जाकर शावेज ने नहीं कहा था कि “एक दिन पहले एक शैतान (बुश) ने इसी मंच से भाषण दिया था। उस शैतान (बुश) की बू अभी तक फिजा में फैली हुई है”?

    सवाल ये है कि विश्‍वरंजन की चर्चा चली और अरुंधती-गौतम नवलखा के साथ उन्‍हें घेरने की बात हुई और कुछ लोगों के उकसावे पर अरुंधती ने मना कर दिया – इस पूरे मसले को कितने लोगों ने जाना। क्‍या जगदलपुर या कोडरमा का कोई सामान्‍य पढ़ा-लिखा आदमी इस पूरे मामले से कैसे वाकिफ होगा। अगर वह हुआ होता, जिसकी कल्‍पना मैंने की तो सोचिए पूरे देश के मीडिया में किस किस्‍म का हाइप क्रिएट होता और अंतत: बात कहां से कहां पहुंचती…

  • sarvnaash Swami said:

    अविनाश, आपने बताया कि बहसतलब तीन का आमंत्रण देने के बहाने आप हंस के दफ्तर गए थे. क्योंकि चेहरा पढ़ने की आपको पुरानी लत पढ़ी हुई है, सो जैसा कि आपने दावा किया है कि राजेंद्र यादव के चेहरे पर कभी न तैरने वाली उदासी आप फ़ौरन भांप गए थे. शाबाश !! फिर आदत के मुताबिक आपने इसकी वजह भी जाननी चाही थी. तो वह हंसने लगे. क्योंकि आपको हंसी-हंसी में फर्क करने की भी पुरानी लत पड़ी हुई है, सो जैसा कि आपका दावा है कि वह हंसी जबर्दस्‍ती की थी.

    अब साहेब सवाल यह उठता है कि उनके कुछ कहे बगैर आप कैसे जान गए कि वह तीन चार दिनों से एक क्रांतिकारी ब्‍लॉग पर हंस की सालाना गोष्‍ठी के बहिष्‍कार के लिए माहौल बनाए जाने से उदास हैं. यानी आपको पहले से ही सब पता था और शानदार मौके को भुनाते हुए आपकी दिलचस्पी मामला जानने की ही थी. मगर जैसा कि आपका दावा है कि वह जबर्दस्‍ती हंसने लगे और कहने लगे ऐसी कोई बात नहीं है. तब भी आप उसके बाद का विश्लेषण चेहरा देखने और हंसी समझने की आपकी पुरानी लत के मुताबिक करते गए. हे प्रभु धन्य है आपकी पत्रकारिता, जो पूर्वाग्रहों और शरीर के हाव-भाव के मन-मुताबिक पत्रकारिता करते हैं. {यहाँ ज्य़ादा नहीं तो कम से कम विनीत कुमार से ही कुछ सीखिए, जिसे आपने टीवी के सामने बैठकर खबरों को देखकर लिखने की लत लगा दी है.}

    ख़ैर मगर यह क्या तीसरा पैरा तो यह बता रहा है कि आप पत्रकारिता में झूठ के इस्तेमाल से भी नहीं कतराते हैं. आप कहते है यह सब “चर्चा के आधार” पर हुआ- तो क्या ‘समयांतर’ की पुष्टि झूठी थी. अगर हां तो कैसे और अगर नहीं तो आप सच्चे कैसे हो गए ?

    इससे आगे कि बात आपने सुझावों के रूप में की है- चलिए उसी सुझावों के आधार पर क्या हम आपसे उम्मीद कर सकते हैं कि दिल्‍ली में बहसतलब 4 के मंच पर आप नरेन्द्र मोदी को बुलाएं. सिर्फ इतना सोचिए कि इशरतजहां और धर्मनिरपेक्षता की धारा से सहानुभूति रखने वाले दो तीन और बुद्धिजीवी गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी घेरेंगे, उन पर सवालों के गोले दागेंगे और सभागार में या सभागार से बाहर पांच सौ की तादाद में परिवर्तनकामी युवा तख्‍ती लेकर नरेन्द्र मोदी के खिलाफ नारे लगायेंगे – तो माजरा क्‍या होगा। धन्य है आपकी पत्रकारिता और महान है आप जैसे पत्रकार जो हर चीज़ को माजरे से ज्य़ादा कुछ समझती ही नहीं है.

    उसके बाद की बातों का मैं कोई जवाब नहीं दूंगा. उसके बात तो आपने भाषा सहित तमाम मर्यादाएं लांघ दी हैं. कौन कहेगा कि आप भडासी से आगे पत्रकार भी हैं और यह शब्द किसी पत्रकार के भी हैं.

  • स्वामी सत्यानाश said:

    सर्वनाश स्वामी जी,

    प्रभो आपकी जय हो!

    आपने एकदम दिव्यदृष्टि दे दी है। आप तो एक पॉलीटिकल कैडर की तरह बात कर रहे हैं। आपके हिसाब से लोगों को लिखते वक़्त, बहस कराते वक़्त या फिर कोई सेमीनार कराते वक़्त एक ही पार्टी का झंडा उठा लेना चाहिए। अब आपसे पूछा जाए कि अगर कोई ऐसा सेमीनार हो रहा हो जहां पर दक्षिणपंथियों को अपना पक्ष रखने की छूट भी दी जाए तो क्या आप बीजेपी या संघ के किसी व्यक्ति को नहीं बुलाएंगे? तब क्या वहां भी दक्षिणपंथी पक्ष रखने के लिए प्रकाश करात से काम चला लिया जाए?

    वैसे इन दिनों बहुतेरे चमन पार्टी कार्यकर्ता बन कर पत्रकारिता कर रहे हैं। लगता है कि स्वामी सर्वनाश जी, आप भी उन्हीं कुछ फ्रस्ट्रेटेड पॉलीटिकल वर्कर्स में से एक हैं जो सियासत नहीं कर सका तो पत्रकार बन गया और ख़बरों को सियासी अंदाज में लिखने लगा।

    एक बात और बताइए सर्वनाश स्वामी जी, क्या आप नित्श के महामानव हैं जो आप किसी को खारिज कर देंगे तो वो खारिज हो जाएगा? आप मोदी को खारिज कर देंगे तो क्या उसकी मौजूदगी पर सवालिया निशान लग जाएगा?? क्या आपके खारिज करने के बाद उसे मुख्यधारा की मीडिया में कोई जगह नहीं मिलेगी???

    फिर मोदी ही क्यों सोनिया गांधी को क्यों नहीं खारिज कर देते? सिख दंगों के लिए तो कांग्रेस ही जिम्मेदार है न?? या फिर आप जैसे स्वामियों ने उन्हें क्लीनचिट दे दी है??

    बात हंस के सेमीनार की हो रही है… राजेंद्र यादव की हो रही है… आप लोग मोदी को बीच में घसीट ले आते हैं। कुछ ज़्यादा ही ऑब्सेस्ड हैं मोदी से आप लोग? इसी वजह से उसका ग्राफ गिरने की जगह बढ़ता जा रहा है।

    आखिरी बात और, आप लोग ऐसे घोंचू हैं कि आप लोगों को सियासत का ए…बी… सी… कुछ नहीं आता। लेकिन दंभ इतना कि सियासत करेंगे ही। दिल्ली और मुंबई में नौकरी करेंगे, माल-मलाई चाटेंगे और आदिवासियों की बात करेंगे।

    जय हो स्वामी सर्वनाश की ! वो आदिवासियों का सर्वनाश करा कर ही दम लेंगे!

  • कृष्ण मिश्र said:

    अरूधंति रॉय जरूरी हैं, क्योंकि ये संस्थायें, या पत्रिकायें या वेबसाइटें यही तो तलाशती है, कुछ सेलेब्रेटी चेहरे ताकि वह लूट सके उस बात को जो उनके लिए गरीब की रोटी से भी जरूरी है! और प्यास-भूख से तड़पते हुए जानवर और इन्सान से भी, हाँ मैं बात कर रहा हूं नव-महात्वाकांक्षा नामक बीमारी की जो सिर्फ़ छपास और चर्चा के माध्यम खोजती है, नाकि धरातल पर बीज बोती है और ना ही उन्हे पानी सींचती है, वह सिर्फ़ बातों की और चर्चा की भूखी है….इतनी भूखी के एक बार हमारा गरीब भारतीय उसे सह सकता है…लेकिन हमारा ये कथित बुद्धिजीवी (इस शब्द के स्थान पर आप सब अपने मुताबिक महान से महान शब्द का इस्तेमाल करने के लिए फ़्री हैं) इस नव-महात्वाकांक्षा के बिना नही रह सकता…दौरे भी पड़ सकते है…गश खा के गिर भी सकता हैं…..तो बताओं भाई अरूधंति जी की जरूरत क्यों नही वह आ जाती तो आप सब के अवसाद ग्रस्त कोपभवन का यह कार्यक्रम हिट नही हो जाता…अब कैसे करोगे बल्ले…बल्ले…!!

  • राजा-के-शोर said:

    प्रश्न: हंस की वार्षिक संगोष्ठी में अरुधंती के आने, न आने का विवाद किन लोगों का मिला-जुला खेल है ?
    उत्तर:
    1.राजेंद्र यादव और अरुधंती का
    2.अरुधंती और नीलाभ का
    3.नीलाभ और विश्वरंजन का
    4.विश्वरंजन और राजेंद्र यादव का
    5.राजेंद्र यादव और नीलाभ का
    6.सब तसलीमा का किया-धरा है
    7.यहां किसी का कुछ पता नहीं
    8.सर क्यों न फोड़ लें अपना
    9.कोई और काम नहीं के हमारे पास
    10.अपना उत्तर भी ठोंक सकते हो

  • दास अविनाशी said:

    यह अविनाश “दास” तो देखते ही देखते बहुत बड़ा दल्ला बन चुका है. दास महाराज अब तक दूसरे के भरोसे ही काम चलाते रहे हैं. मगर अब जल्दी जल्दी मुँह खोलकर अपनी औकात बता रहे हैं. दरअसल यह जब मुँह खोलते हैं, पहले से बड़े चूतिया साबितहोते हैं. ना तो इसकी अपनी कोई समझ है. ना भाषा है. यह भी कल्पित ही है. अंतर यह है कि वह sms करके परेशान करता है. और यह net से.

    ओह्ह जा थू अविनाश दास

  • poonam tushamad said:

    AVINASH ji logon ke chehere padhne ka dave jis tarhe aap kr rahai hain usse to ek hi baat samne aati he ki aap ko patrakar nahi jyotishi hona chahiye.Agar aap itni achchi face riding kr lete hai to aap ko jarur ek baar vishve ranjan or arundhati dono ke samaksh jana chahiye or tazza-taza face riding karni chahiye ki ab mohalla pr Apki ye be buniad be sar per ki kapol kalpana dekh pad ker unki kya pratikriya h.phir use bhi shamil kijiaga.Such h hans ki goshthi ho na ho aapko koi khas fark padega bhi kyo.APKA Mohalla bazar to garam hi rahega.chahe vishveranjan aai chahe na aaye.Arundhati aae chahe n aae. aap apna kaam kerte jai.

  • नीलाम्बुज सिंह said:

    poonam tushamad ji se sahmat, avinaash aur dilip ji se asahmat.

  • राजेंद्र यादव, कौन मिटायेगा निर्दोषों की हत्या में छुपी क्रूरता? | जनतंत्र said:

    [...] भीष्म पितामह राजेंद्र यादव को। अपने प्रिय साथी अविनाश को और राजेंद्र यादव के बगलबच्चे [...]

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