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देहांत के बाद पहला जन्‍मदिन, बड़ा कार्यक्रम, भारी भीड़

17 July 2010 10 Comments

♦ विवेक वाजपेयी

किसी को कभी भी याद किया जा सकता है। लेकिन हम बात खास उस जगह की कर रहे हैं, जहां पर प्रभाष जी को याद करने के लिए ही लोग एकत्रित हुए थे। जगह थी दिल्ली में बापू की समाधि राजघाट के ठीक सामने स्थित गांधी स्मृति के सत्याग्रह मंडप का। जहां पर प्रभाष परंपरा न्यास की ओर से स्वर्गीय प्रभाष जी के जन्मदिन के मौके पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम में लोगों का हुजूम उमड़ा हुआ था। हर वर्ग के लोग मौजूद थे। वयोवृद्ध गांधीवादी लोगों से लेकर आज की युवा पीढ़ी तक। मीडिया के सब नामी-नये चेहरे। साथ ही प्रबुद्ध साहित्यकार और प्रसिद्ध आलोचक भी, जिनमें अशोक वाजपेयी और नामवर सिंह को मैं भली-भांति जान सका।

पत्रकारिता में प्रभाष जी के योगदान की चर्चा लोगों ने अपने अपने ढंग से की। लोगों ने अपने-अपने संस्मरण सुनाये। बताते हैं कि प्रभाष जी को तीन चीजे जिंदगी भर बहुत पसंद रहीं। वो थी लोगों से बतियाना, खाना खिलाना और शास्त्रीय संगीत सुनना। इस कार्यक्रम में प्रभाष जी की तीनों पसंदों का ख्याल रखा गया था। तभी तो पंडित कुमार गंधर्व के पुत्र मुकुल शिवपुत्र के गायन और मालवा की दाल बाटी की भी व्यवस्था की गयी थी। कार्यक्रम में प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने प्रभाष का सही अर्थ समझाते हुए व्याख्या की। उन्होंने बताया कि प्रभाष का मतलब, शाब्दिक अर्थ डिस्क्लोज करना होता है, रिवील करना होता है। यही तो करते रहे प्रभाष जी जीवन भर। खुलासे करते रहे। उदघाटित करते रहे। नामवर की यह व्याख्या सबको भायी। लोक धुनों, लोक संगीत, लोक जीवन के प्रति प्रभाषजी के प्रेम को नामवर ने अच्छे तरीके से बताया-सुनाया। ये व्याख्यान मैं नहीं सुन सका क्योंकि मैं कार्यक्रम में थोड़ी देर से पहुंचा था लेकिन एक हमारे मित्र यशवंत भाई ने खाना खाते हुए ये व्‍याख्या सुनाई सो मैंने लिख दी।

इस मौके पर उनकी तीन पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। “आगे अंधी गली है” का लोकार्पण सांसद-पत्रकार एचके दुआ ने किया। “21वीं सदी का पहला दशक और मसि कागद” के नये संस्करण का विमोचन योगाचार्य स्‍वामी विद्यानंद ने किया। इसके साथ ही न्यास के प्रबंध न्यासी रामबहादुर राय जी ने संस्था के उद्देश्यों को बताया। साथ ही उन्होंने बताया कि पैसे के बदले खबर पर जोशी की मुहिम का नतीजा रहा कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने 72 पेज की रपट दी है। लेकिन बड़े मीडिया घरानों के दबाव में दूसरी 12 सदस्ययी टीम बनी, जिसने महज 12 पेज की रिपोर्ट तैयार की।

कार्यक्रम के अंत में मुकुल शिवपुत्र का गायन हुआ, जिसने लोगों को मंत्रमुग्ध किया। फिर नंबर आया प्रभाष जी की लोगों के प्रेम-पूर्वक आवभगत करने की शैली का। यानि प्‍यार से भोजन कराने का। कार्यक्रम स्थल की दायीं तरफ लजीज खाने की व्यवस्था थी। वहां लोग तरह-तरह के व्यंजन का स्वाद ले रहे थे। लेकिन लोगों को फुसफुसाते हुए मैंने सुना कि कुल्फी खायी कि नहीं – अरे भाई कुल्फी तो बड़ी मस्त है। जरूर खाना। कुल्फी के स्टाल पर कुछ अधिक ही भीड़ लगी थी। खाना खाकर जैसे ही प्लेट रखी, हमारे न्यूज हेड को शायद कुल्फी वाली बात किसी से पता चल गयी थी, सो उन्होंने कहा – विवेक सुना है कुल्फी बहुत बढ़िया है। मैंने कहा, ठीक है, आप रुकिये, मैं लाता हूं। और लाइन में लग गया। लाइन में लगे लगे मारे गर्मी के हालत खराब हो रही थी लेकिन कुल्फी ले जाना जरूरी था इसलिए गर्मी की परवाह किये बिना लाइन में लगा रहा और करीब 30 मिनट बाद एक कुल्फी मेरे हाथ आ गयी। वो कुल्फी सर के हवाले कर मैं दोबारा मुस्तैद हुआ और पहले की अपेक्षा जल्दी सफलता हाथ लग गयी। जब कुल्फी को मुंह से लगाया तो अहसास हुआ कि आखिर क्यों इतनी तगड़ी लाइन थी।

अब कार्यक्रम लगभग पूरा हो चुका था। लोग अपने-अपने घरों की ओर प्रस्थान करने लगे थे। रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। मैं भी राय साहब से अभिवादन कर घर लौटने के लिए तैयार हो गया। तभी राय साहब ने अपनापे से पूछा, वाजपेयी घर कैसे जाओगे। मैंने कहा, सर मैं अपने न्यूज हेड के साथ आया हूं – उन्हीं के साथ चला जाऊंगा। उन्होंने कहा तो ठीक है। लेकिन राय साहब के वो शब्द दिल को छू गये। जहां आज की मतलबी दुनिया में किसी को किसी से कोई मतलब नहीं होता है, वहां आज भी ऐसे लोग हैं, जो दूसरों के लिए इतना सोचते हैं। जबकि मेरी राय साहब से मुलाकात हुए करीब छह ही महीने हुए हैं।

(विवेक वाजपेयी युवा टीवी पत्रकार हैं। उनसे vivek.editor07@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

10 Comments »

  • विनीत कुमार said:

    ये प्रभाषजी का याद करने के नाम पर नए किस्म की लॉबीइंग हैं। प्रभाष परंपरा के नाम पर भूले-बिसरे गीत की तरह कई लोग नक्शे पर आने की फिराक में हैं। कार्यक्रम में एक जो जानदार बात थी वो ये कि सबों को एक पर्ची दी जा रही थी जिसमें नाम,पता,फोन नंबर के साथ-साथ प्रभाष परंपरा को और कैसे बेहतर बनाए जाएं,सुझाव देने थे। सबों ने सुझाव दिए,मैंने किसी का पढ़ा नहीं लेकिन कुछ लोगों से जिस तरह की बातचीत हुई उस आधार पर कह सकता हूं कि अगर उन सुझावों पर अमल किए जाएं तो अगले साल कार्यक्रम का वो नजारा नहीं होगा जो कि इस बार दिखा। यकीनी तौर पर युवा पत्रकार,रिसर्चर और स्त्रियों की संख्या में इजाफा होगा।
    इस देश की कितनी भारी बिडंबना है कि जो शख्स जितना ही लामबंदी के खिलाफ,संस्थान के खिलाफ काम करता है,उसके नाम पर उतनी ही लामबंदी होती है,सांस्थानिक ढांचे खड़े किए जाते हैं। ऐसे में प्रभाषजी तो शायद इस कोशिश से हमेशा याद किए जाएंगे लेकिन उनके एफर्ट और प्रैक्टिस नहीं।.

  • राकेश सिंह said:

    ऊपर की प्रतिक्रिया को देखने से लगता है कि कार्यक्रम मे विनीत जी मौजूद थे। अब मुझे लगता है कि इस कार्यक्रम से वही लोग घबराए और दुखी है जो पैसे लेकर खबरे लिखत रहे है। या फिर लिख रहे है। इस कार्यक्रम में पेड न्यूज के कारोबारियों के चेहरे से नकाब उतारने की बात कही गई। क्या ये पहल विनीत जी को नही दिखाई दी। उन्हे सिर्फ पर्ची दिखाई दी। लांबिंग करने वाले मोर्चा नही खोलते। मोर्चा बहादुर लोग खोलते है। और यहां पेडन्यूज के कारोबारियों के खिलाफ प्रभाष परंपरा न्यास ने मोर्चा खोला है। विनीत जी कहीं आप तो इन कारोबारियों नेटवर्क में तो नहीं शामिल।

  • prakash k ray said:

    vineet bhai ke comment ko dekh ke pata chala ki unhen bhi kabhi kabhi “Ilhaam”hota hai…

  • विनीत कुमार said:

    पेडन्यूज के कारोबारियों के खिलाफ प्रभाष परंपरा न्यास ने मोर्चा खोला है।..राकेशजी,अभी से ही क्रेडिट गिनानी शुरु कर दी न। ऐसे ही किसी अच्छे काम को लेकर पहले संस्था और फिर धीरे-धीरे मठ बनते हैं। इसी मानसिकता पर तो लिखा है मैंने,न तो प्रभाषजी के खिलाफ,न ही पेड न्यूज के खिलाफ मोर्चा खोलने के विरोध में और न सरोकारी पत्रकारिता को नजरअंदाज करते हुए।..यही तो कहना चाह रहा हूं कि कोई भी परंपरा आयोजनों से नहीं उसकी प्रैक्टिस से जिंदा रहती है,माफ कीजिएगा राकेशजी,प्रकाश भाई वहां जो नजारा मैंने देखा उसमें से कई बातों के खिलाफ स्वयं प्रभाषजी थे। गलती मेरी है कि मैंने पर्ची के दूसरे साइड पर पलटकर कुछ न लिख सका।.

  • Prem Kumar said:

    @Vinit Kumar

    Uff thooo Vinit Kumar.

    Jab thook sae kar le to please bataiyegaa. Main ek baar phir aapke munh par nishaanaa lagaakar thookoonga.

    :)

  • vivek vajpayee said:

    अरे भाइयों प्रभाष जी खबर पर जो आप लोग प्रतिक्रिया कर इस खबर को राजनैतिक अड्डा बना रहें हैं इससे मुझे काफी दुख हो रहा है। क्यों आप लोग अनाप-सनाप बातें कर उनकी आत्मा को दुख पहुंचा रहे हैं। कृपया क्रिया प्रतिक्रिया बंद करे तो बेहतर रहेगा।आप दोनों पत्रकार हैं।

  • Mohalla Live » Blog Archive » कौन है प्रभाष परंपरा का असली वाहक? ये या वो! said:

    [...] मोहल्‍ला लाइव पर इस आयोजन के बारे में एक मुग्‍ध रिपोर्टर की रपट भी हमने छापी थी। इसी बीच एक मित्र ने [...]

  • digvijay chaturvedi said:

    koi kuch bhi comment kare lekin prabhasji ki spast wadita, aur sachhai par koi ungli nahi utha sakta hai.main unse unke jane se kuch din pehle unse ”FOUNDATION FOR MEDIA PROFESSONALS” ke ek programme may mila aur suna tha ,jaha aaj ke patrakar aur sampadak kisi ruling party ke vyakti ke aginst may kuch kahna pade to wo us vyakti ki pahchaan chhupane ki kosis may rahtay hain. wahi prabhas ji nidar hoke une naam lekar danke ki thap pe batate they.
    ye vyaktitwa atulniye tha.

  • piyush said:

    गजब संपादक जी, जब आप विवेक वाजपेयी की रपट छाप रहे थे तब उनकी मुग्धता आपको दिखाई नही दी। ये आपको अंबरीष जी से संपर्क स्थापित करने के बाद ही पता चला। अगर रिपोर्ट में मुग्धता थी तो आप क्या कर रहे थे। दरअसल आप जैसे संपादकों को संपादकीय दायित्व से ज्यादा दूसरे मामलों में रूचि रहती है। और मेरी सलाह है कि अगर संपादकीय दायित्व नही निभा पा रहे है तो, कुछ और धंधा देखिए, अच्छा रहेगा।

  • Amit sharma said:

    मोहल्लालाइव के संपादक महोदय आप अपने ही लेखक को मुग्ध रिपोर्टर बता रहे है। संपादक जी रिपोर्टर रिपोर्टर होता है, जो मुग्ध हो गया वो रिपोर्टर नही हो सकता। अगर कोई संपादक रिपोर्टर की रिपोर्ट में मुग्धता की गंध नही सूंघ पा रहा तो उसे संपादकीय दायित्व छोड किसी किराने की दुकान खोल लेनी चाहिए।

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