देहांत के बाद पहला जन्‍मदिन, बड़ा कार्यक्रम, भारी भीड़


♦ विवेक वाजपेयी

किसी को कभी भी याद किया जा सकता है। लेकिन हम बात खास उस जगह की कर रहे हैं, जहां पर प्रभाष जी को याद करने के लिए ही लोग एकत्रित हुए थे। जगह थी दिल्ली में बापू की समाधि राजघाट के ठीक सामने स्थित गांधी स्मृति के सत्याग्रह मंडप का। जहां पर प्रभाष परंपरा न्यास की ओर से स्वर्गीय प्रभाष जी के जन्मदिन के मौके पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम में लोगों का हुजूम उमड़ा हुआ था। हर वर्ग के लोग मौजूद थे। वयोवृद्ध गांधीवादी लोगों से लेकर आज की युवा पीढ़ी तक। मीडिया के सब नामी-नये चेहरे। साथ ही प्रबुद्ध साहित्यकार और प्रसिद्ध आलोचक भी, जिनमें अशोक वाजपेयी और नामवर सिंह को मैं भली-भांति जान सका।

पत्रकारिता में प्रभाष जी के योगदान की चर्चा लोगों ने अपने अपने ढंग से की। लोगों ने अपने-अपने संस्मरण सुनाये। बताते हैं कि प्रभाष जी को तीन चीजे जिंदगी भर बहुत पसंद रहीं। वो थी लोगों से बतियाना, खाना खिलाना और शास्त्रीय संगीत सुनना। इस कार्यक्रम में प्रभाष जी की तीनों पसंदों का ख्याल रखा गया था। तभी तो पंडित कुमार गंधर्व के पुत्र मुकुल शिवपुत्र के गायन और मालवा की दाल बाटी की भी व्यवस्था की गयी थी। कार्यक्रम में प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने प्रभाष का सही अर्थ समझाते हुए व्याख्या की। उन्होंने बताया कि प्रभाष का मतलब, शाब्दिक अर्थ डिस्क्लोज करना होता है, रिवील करना होता है। यही तो करते रहे प्रभाष जी जीवन भर। खुलासे करते रहे। उदघाटित करते रहे। नामवर की यह व्याख्या सबको भायी। लोक धुनों, लोक संगीत, लोक जीवन के प्रति प्रभाषजी के प्रेम को नामवर ने अच्छे तरीके से बताया-सुनाया। ये व्याख्यान मैं नहीं सुन सका क्योंकि मैं कार्यक्रम में थोड़ी देर से पहुंचा था लेकिन एक हमारे मित्र यशवंत भाई ने खाना खाते हुए ये व्‍याख्या सुनाई सो मैंने लिख दी।

इस मौके पर उनकी तीन पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। “आगे अंधी गली है” का लोकार्पण सांसद-पत्रकार एचके दुआ ने किया। “21वीं सदी का पहला दशक और मसि कागद” के नये संस्करण का विमोचन योगाचार्य स्‍वामी विद्यानंद ने किया। इसके साथ ही न्यास के प्रबंध न्यासी रामबहादुर राय जी ने संस्था के उद्देश्यों को बताया। साथ ही उन्होंने बताया कि पैसे के बदले खबर पर जोशी की मुहिम का नतीजा रहा कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने 72 पेज की रपट दी है। लेकिन बड़े मीडिया घरानों के दबाव में दूसरी 12 सदस्ययी टीम बनी, जिसने महज 12 पेज की रिपोर्ट तैयार की।

कार्यक्रम के अंत में मुकुल शिवपुत्र का गायन हुआ, जिसने लोगों को मंत्रमुग्ध किया। फिर नंबर आया प्रभाष जी की लोगों के प्रेम-पूर्वक आवभगत करने की शैली का। यानि प्‍यार से भोजन कराने का। कार्यक्रम स्थल की दायीं तरफ लजीज खाने की व्यवस्था थी। वहां लोग तरह-तरह के व्यंजन का स्वाद ले रहे थे। लेकिन लोगों को फुसफुसाते हुए मैंने सुना कि कुल्फी खायी कि नहीं – अरे भाई कुल्फी तो बड़ी मस्त है। जरूर खाना। कुल्फी के स्टाल पर कुछ अधिक ही भीड़ लगी थी। खाना खाकर जैसे ही प्लेट रखी, हमारे न्यूज हेड को शायद कुल्फी वाली बात किसी से पता चल गयी थी, सो उन्होंने कहा – विवेक सुना है कुल्फी बहुत बढ़िया है। मैंने कहा, ठीक है, आप रुकिये, मैं लाता हूं। और लाइन में लग गया। लाइन में लगे लगे मारे गर्मी के हालत खराब हो रही थी लेकिन कुल्फी ले जाना जरूरी था इसलिए गर्मी की परवाह किये बिना लाइन में लगा रहा और करीब 30 मिनट बाद एक कुल्फी मेरे हाथ आ गयी। वो कुल्फी सर के हवाले कर मैं दोबारा मुस्तैद हुआ और पहले की अपेक्षा जल्दी सफलता हाथ लग गयी। जब कुल्फी को मुंह से लगाया तो अहसास हुआ कि आखिर क्यों इतनी तगड़ी लाइन थी।

अब कार्यक्रम लगभग पूरा हो चुका था। लोग अपने-अपने घरों की ओर प्रस्थान करने लगे थे। रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। मैं भी राय साहब से अभिवादन कर घर लौटने के लिए तैयार हो गया। तभी राय साहब ने अपनापे से पूछा, वाजपेयी घर कैसे जाओगे। मैंने कहा, सर मैं अपने न्यूज हेड के साथ आया हूं – उन्हीं के साथ चला जाऊंगा। उन्होंने कहा तो ठीक है। लेकिन राय साहब के वो शब्द दिल को छू गये। जहां आज की मतलबी दुनिया में किसी को किसी से कोई मतलब नहीं होता है, वहां आज भी ऐसे लोग हैं, जो दूसरों के लिए इतना सोचते हैं। जबकि मेरी राय साहब से मुलाकात हुए करीब छह ही महीने हुए हैं।

(विवेक वाजपेयी युवा टीवी पत्रकार हैं। उनसे vivek.editor07@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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