जमशेदपुर से शेखर मल्लिक ने भेजी कहानी

विद्रोहबीज

♦ शेखर मल्लिक

सिनेमा के लिए कहानी तलाशने की कोशिश में एक और कहानी हमारे पास आयी थी, जमशेदपुर से। छापने में देरी हुई। कहानीकार से माफी। दोस्‍तो, देखें, क्‍यों इस कहानी में बॉलीवुड में रेखांकित भारत के अलावा बचे देश का दुख मौजूद है या नहीं : मॉडरेटर

“आप हमलोग का घर से ऐसे ही चले जाएंगे!” सुमिता इतने आग्रह, इतने अधिकार से बोलती कि कुछ कहने को फिर बाकी नहीं रह जाता… जिसे देख दुख भी शरमा जाये, वैसा विमल चेहरा और उस पर तुर्रा यह कि किसी को भी बिना मुंह जूठा कराये अपने द्वार से उठने नहीं देने का उसका कट्टर स्वभाव… श्रीमोहन को आश्चर्य की हद तक आश्चर्य होता था पहले-पहल, अब नहीं… अब तो वह सुमिता भाभी को पहचान गया है।

कुछ बोलने के लिए मुंह खोला नहीं कि सुमिता हंसते-हंसते एक खास लहजे में बोल देगी, “हां, हमलोग तो छोटा आदमी, हमारे यहां कहां खाएगा आप…”

“क्यों ऐसे शर्मिंदा कर रही हैं आप…”, श्रीमोहन के मुंह से घुटी-घुटी सी आवाज फूटती। यह नियमित और पुख्ता आतिथ्य उसे भावविभोर किये हुए थी।

“अभी कुछ नहीं, जब शादी हो जाएगा तो सब याद रखने लगेगा…”, सुमिता ने कैसे एक साथ मजाक, क्षोभ और लड़ाकूपन से कहा था, जब उसने सुमिता को आचार के लिए कच्चे आम तो दिये थे, पर जो श्रीमोहन के ही हाथों अधपके सड़ जाने से “हम दूसरा बना देंगे”, वह बोली थी, “आप बस एक जार ले आना”, तो उसके कहने पर भी वह संकोचवश जार नहीं लाता था। इसी बात पर सुमिता का स्नेहिल क्रोध उस पर उतरा।

“भाभी, लड़की तो आपको ढूंढनी है, बस एक अपनी तरह का ले आइए।”

सुमिता हंसती, “मेरा तो कोई बहिन भी नहीं बचा, सबका शादी हो गया, नहीं तो…”

सुमिता का घरवाला मुख्यमार्ग पर हनुमान मंदिर के सामने गोलगप्पे का ठेला लगाता, शादी-ब्याह में गोलगप्पों के ऑर्डर मिलते, दावत की सारी सामग्री बनाता। भोज कारीगर था। मगर सुमिता का हाथ लगे बिना भी कुछ भी हो ही नहीं सकता था। दिन-रात एक करके वह गोलगप्पे की पूड़ियां, पापड़ियां छांकती। उसके हाथों में तो तिलिस्म था। कोई चीज कभी बेस्वाद बन जाए, इतनी हिमाकत चीजों में कहां थी!

एक दफे जब श्रीमोहन कलाकंद ले आया था, तो उसे उम्मीद थी कि बच्चे के अलावा भाभी भी लेगी, तब वह बोली थी, “हम बाहर का नहीं खाता। जो अच्छा लगता है, घर में खुद बना लेते हैं।”

कहीं कोई दिक्कत नहीं। एकदम सीधी जिंदगी। पत्नी पति का आधा हिस्सा किस तरह होती है, श्रीमोहन को लगा यह बात अब समझ सका है। सुमिता का खुला बर्ताव उससे पहली बार जानने से ही खींचता था। और वह अपने बे-पलस्तरे मकान से कुछ ही फर्लांग पर बहती स्वर्णरेखा की कलकल सी चंचल लेकिन तटबंधों में सिमटी, लट्टू सी नाचती घरेलू कामों में मशगूल रहती। समझने वाले कुछ भी समझा करें, सबसे हंसी-मुसी, सबसे स्नेहापा, सबसे बोल-चाल…

बिना आहट के जो मन पर छा जाए, वही तो सुगंध है! कस्तुरी, गुलाब, बेली-जूही, रजनीगंधा, चंदन, प्रेमिका के ताजे धुले हुए बाल… कैसा-कैसा… या फिर उसकी हथेलियों जैसा, हल्दी और मसालों का हल्का पीलापन और गंध बसाये। उसकी सांवली हथेलियां। “आपका भैया कितना खटता है।” वह कहती। अनिरुद्ध सचमुच मेहनत करते हैं। नहीं करते तो? घर-गिरस्थी, खाना-कपड़ा मेहनत के इसी तने हुए तार पर टिके हैं, आलस की एक उबासी सब असंतुलित कर रसातल में गिरा देगी। श्रीमोहन हंसते-हंसते कहता, “आप बहुत अच्छी हो भाभी।” और भाभी भी हंसती। हंसी… बेदाग, उछाह भरी उसकी हंसी। कितना सुंदर रह जाता था सब कुछ; सुंदर भाषा की सुंदर लिपि की तरह वर्तुलाकार… तालाब के किनारे की उठान पर हरियाली मेंड़ें – गहरा नीला पानी और बांस के झुरमुटे – घरों की खिड़कियों – रौशनदानों से निकलती भात के गर्म भाप की गंध – रसोई से चटख सब्जी की, छौंक की महक…!

श्रीमोहन तो सुमिता के बेटे का ट्यूटर है। वह रोजगार की तलाश में राजस्थान, दिल्ली-गाजियाबाद, खड़गपुर कहां-कहां घूम आया था। लेकिन, जितनी आत्मीयता और अपनापा उसे अपनी इस मिट्टी से बिन-मांगे मिला, वह और कहां था! मई के दिन… और इस बार मानसून जल्दी धरने की संभावना, प्रायः रोज अच्छी मानसून-पूर्व वृष्टि हो जाती। यह तो घाटशिला के मौसम का स्वाभाव था। हांलाकि बीते बरस की गरमी ने जन-जानवरों की जान सुखा दी थी। सुमिता के यहां श्रीमोहन के दिन बीतने लगे थे। मन लगने लगा था। सुमिता उसी भरी मुस्कान से पूछती, “मास्टर जी, चाय लीजिए।” लेकिन सूखी चाय कहां होती थी! गोलगप्पे-पापड़ी, मकर संक्राति के अगड़े-पिछड़े दिनों में गुड़-पीठा और दूसरे पीठे (और साल में आम तौर पर चावल का नमकीन पीठा बनाती), मीठा-तीखा, बादाम की फलियां, कभी कुछ तो कभी कुछ, और कुछ नहीं तो बिस्कुट वह प्रायः रोज मंगवा लेती थी।

“हमारे घर (गांव) से आये हैं।” वह बताती।

गांव में बादाम की खेती थी। श्रीमोहन बहुत दिनों तक बादाम फांकता रहा।

“अच्छा मास्टर जी, हमलोग तो अनपढ़-मूरख। एक ठो बात पूछें?”

श्रीमोहन सिर उठाता।

“सरकार का काम क्या होता है?”

“शासन करना… ”, वह मुस्काया।

वह इशारा कर के कहती, “ये सामने वाला मकान बनता देख रहा है न, यह बीपीएल वाले, लाल कार्ड वाले को मिलने वाले पैसा से खड़ा हो रहा है और मिला है सेठ को। हमलोगों को भी घर बेचा। इसको भी बना के बेच देगा, बेसी दाम पर। सरकार देख रहा है?”

“भाभी, सब जगह एक ही बात है, भ्रष्टाचार को क्या देखें। लोग सब ठीक होगा, तब न। लोग का हाथ में सबसे बड़ा ताकत, लेकिन क्या पता सही दिशा में वह जा पाती है या जाने दिया जाता भी है या नहीं…”

“हां, सबसे बड़ा ताकत तो पैसा का, और उसका आगे…”

“छोड़िए भाभी, मन खट्टा करने से फायदा नहीं।”

“लेकिन बात छाती को लगता है। तभी तो… उस साल गांव में पोखर बनाने के लिए सरकारी पैसा लिया, मगर हरामी लोग उसको खा गया और फिर उस पोखर को खराब, काहे कि बकरी-बाछुरी (बछड़ा) उसका पानी पीने से खराब हो रहा है, बोलके बंद कराने के लिए भी फिर सरकार से पैसा ले कर खाया। जो पोखर कागज-पत्ता पर बना और कागज-पत्ता पर बंद हो गया! ऐसा ऐसा लोग है… तो उग्रवादी लोग मारेगा नहीं…”, सुमिता कहती जाती और श्रीमोहन को उसकी नाक पर, नाक के बगल में और गालों पर पसीना चुहचुहाता दिखाई पड़ता। उमस काफी रहती थी इन दिनों, बरसात पड़ जाती तो भी दिन भर भयंकर उमस। पसीना जिस्म के पोरों से बेसाख्ता निकलता रहता, कमीज गीली रहती हरदम।

पं बंगाल में वाम दलों का परचम लहराया था फिर एक बार। अमय दास। पिचहत्तर साल का सयाना बूढ़ा। बोलता, “असल जीत जनता की होती है।” तब सुमिता लड़ पड़ती ससुर से, “लोग क्या खा कर लड़ेगा, क्या जीतेगा?”

मास्टर बुदबुदाता था, “सारे प्रिंसिपल पेट के सामने लाचार, बेकार…”

एक शाम जब सुमिता इमरजेंसी बैटरी की रोशनी में श्रीमोहन को चाय दे रही थी, मास्टर उसके माथे पर चिपकी बड़ी सी लाल टहटह बिंदी को एकटक देख रहा था। “थोड़ा सा है, खा लीजिए…” वह मुस्कुराती बोली। मास्टर ने प्लेट में देखा। चाट से लबालब भरा। “इतना सारा! दो प्लेट भर के…! क्या करूंगा?”

“खाएगा और क्या करेगा?” वह हंसी। और हंसती रही। बाहर झींसा-झींसी शु डिग्री हो गयी थी। “आज रात बिजली नहीं आएगा”, वह कह रही थी। लेकिन मास्टर उसकी आवाज में मायूसी नहीं महसूस रहा था। डीवीसी लाइन का यहां यही चलता है… बिजली नहीं रहने से परेशानी तो होती है। उसे भी होती। वह भी कोसती; मगर आज?

“आपको गाना आता है भाभी?” वह जाने क्या करके पूछ बैठा था। वह हंसी… दीवार के पीछे से हंसी आयी उसकी।

“की… गान? हम क्या गान करेगा मास्टर जी!” वह शोखपन से बोला था बंगला में, “ना, गान करो न बऊदी…”

शाम के मुंहअंधेरे में… बारिश की सिहरी में सुमिता गायी। रवींद्र संगीत का एक बेहतरीन टुकड़ा… ‘पागला हवार बादल दिने… पागोल आमार मोन जेगे उठे…/ वृष्टि निशा भोरा संध्या बेला…’

रात गहरी होती गयी। नदी से सटा इलाका वर्षा की फुहार से भीगता, सन्नाटे में दादुर की टर्राहट और झींगुरों की चिर्राहट में कांपता-कांपता सो गया। श्रीमोहन खाट पर बैठा बड़ी ढिबरी की पीली रोशनी में सुमिता के सांवले कंधों को, जो इस समय और गहरे वर्ण के हो गये थे, देख रहा था।

“बऊदी, आप पता नहीं समझोगी या नहीं, लेकिन सबसे बड़ा लड़ाई आदमी का अपने आप से होता है। अपने आप से हार गया तो सब खतम।”

बऊदी ने उठ कर खिड़की के पल्ले बंद कर दिये। ठिठुरती हवा बाहर सिर मारती रह गयी। वह दरवाजे की ग्रिल के पास बैठ गयी।

“आपको डर लग रहा है?”

सुमिता हंसी, “किससे?”

फिर उसका चेहरा सख्त हो गया, “डर लगता है, आजकल समय ठीक नहीं… मारने वाला, बचाने वाला सब एक जैसा! पहचान वाला… सबसे डर लगता है। किसी का बिस्सास नहीं। इधर एका रहने में बहुत डर है। किंतु आपसे नहीं।” वह मुस्कायी।

“भईया कब तक आएंगे?”

“अब कल ही आएगा आपका भईया। आडर में गया है।”

“ठीक है, तो मैं निकलूं। आप भीतर से दरवाजा ठीक से बंद कर लीजिए।”

“मास्टर बाबू, आप भी डरता है?” सुमिता ने उसे देखा और हाथ की चूड़ियां हटा कर कलाई खुजलाने लगी।

“हां भाभी।”

“किससे?”

“…आपसे…”

“हमसे!”

“हां, आपसे… आप नहीं जानतीं… आप…”, बाकी शब्द उसके मुंह से निकलते-निकलते जबान में जज्ब हो गये। फिर वह एक अलग बात बगैर संदर्भ और भूमिका के बोला, “सबसे बड़ी लड़ाई सिद्धांतों की भी है…”

तभी खिड़की का पल्ला झटके से फिर खुल गया। श्रीमोहन ने भाभी को देखा। सुमिता फिर उठी थी और खिड़की बंद करने लगी… तेज फुहार ने हवा के झोंके से अंदर आ उसे भिगो दिया। चेहरे, बांहों, गर्दन, गले के नीचे सीने के उठानों से ऊपर और कमर पर बूंदें लालटेन की धीमी रोशनी में भी चमक उठीं। वह बंगला में बोली, “मास्टर बाबू, ऐई भावे की देख्छो? बुद्धि खाराब कोरबे ना…”

श्रीमोहन हंस पड़ा, “क्या भाभी, आपको मुझसे डर नहीं लगता तो ये बात कैसे बोल रहीं?”

“लगता है…” वह फुसफुसायी… खिड़की का पल्ला जोर से कांपा… श्रीमोहन के पंजों में उसने अपने पंजे उलझा दिये थे। और, श्रीमोहन तब से, पता नहीं कब से, श्रीमोहन कितने दिनों-महीनों से, ऐसी ही किसी नाजुक हालत की कल्पना करता आया था। आज भी कर रहा था, अभी तक भी उसके जेहन में था… मगर अभी एकदम से माजरा समझ कर हकबका गया।

“भाभी, आप तो…” अब उसे एकांत के असर का एहसास हुआ। बुबाई मामा के घर गया था और उसके दादा उसके साथ। घर पर कोई नहीं। सामने मानो फैंटेसी की दुनिया से सुमिता गूंज रही थी, “शादीशुदा हैं हम। आपको डर लगता है…? नियम उसूल का बात करता आप, आप में तो बहुत हिम्मत है…” नाड़ियों में लावा दौड़ने लगा, “हमारा शामी का हम, किंतु हमारा कौन! समझता है न आप? नियम से शादी किया। हमलोग से लोक-संसार जो मांगता है, वैसा इज्जत से रहता है। बाबा और शामी का इज्जत रखा। आप बोलो हमको तो जिसको पसंद नहीं एकदम भी, उसको भी सब देना पड़ता है। तो जो पसंद है उसको मर्जी से काहे नहीं देगा…?” सुमिता का चेहरा एकदम से पलट गया था। उसके चेहरे से सट गया था और श्रीमोहन को उसकी सांसों की भाप लगी। उस रात बिजली आयी ही नहीं। उस रात बारिश लगातार पड़ती रही। कभी धीमी तो कभी पगला कर। उस रात आदम और हव्वा की संततियां मीठे सुर में जीवन राग गाती रहीं। श्रीमोहन चला गया था, और सुमिता अपनी बांह पर सूजे हुए, उभरे कुछ निशान देख रही थी। एक पुलक थी उन्हें देखते हुए उसके भीतर कहीं।

उन दिनों की खबर थी कि नेपाल में राजशाही निर्मूल हो गयी। और आम जनता, माओवादियों ने लोकतंत्र का बिगुल फूंका है। श्रीमोहन प्रायः कहता रहता और पड़ोस में मनसा मंदिर के चबूतरे पर बैठे बूढ़े अमय दास को बताता, “नेपाल में तानाशाही खत्म… जनता का शासन होगा… कैपिटलिज्म, कम्‍युनिज्म या मार्क्सिज्म की बहस छोड़िए… सबसे बड़ी बात, जनता, दबी-कुचली जनता का, लड़ाई अपने हाथ में ले लेना है। लोकसंघर्ष कभी नाकाम नहीं होता… चाहे सफल होने में हजार बरस लग जाएं…”

सुमिता चाय की प्याली में छिलके वाले भुने बादाम रखके लाती और बोलती, “ओह-ओह, मास्टर जी तो बड़ा भाषण देता है… लोग लड़ेगा कैसे? गरीब आदमी को भात नहीं तो भाग भरोसा बैठेगा नहीं तो क्या करेगा… लोड़ाई क्या हवा में होता है।”

ऐसी कुछ टिप्पणियों की वजह से श्रीमोहन समझने को मजबूर हो जाता था कि सुमिता भले कलम-कागज नहीं उठा सकती है, पर दिमाग से बहुत आगे है। आम जनता में भी, जिसको “ले-मैन” कहा जाता है, गैर-प्रशिक्षित जनता में भी, भुक्तभोगी जनता में भी इसी तरह तर्क, विरोध और संघर्ष करने की सहजात प्रवृति और क्षमता होती है।

सुमिता हंसती, बोलती, ठिठोली करती… आसपास में लोग सोचने-बोलने लगे थे, अनिरुद्ध की घरवाली मास्टर से फंसी है क्या? जरूर… मास्टर खाली पढ़ाने आता है क्या…? लेकिन बहती नदी को क्या इससे अंतर पड़ता है कि उसमें लोगों ने अपनी कितनी गंदगियां छोड़ी…

नेपाल में तानाशाही खत्म हो चुकी थी। लोकतंत्र की ईंट डालने के लिए माओवादी हिंसा छोड़ मुख्यधारा में आने को तैयार थे। घोषणा कर चुके थे। विशाल आमसभा में, जो राजमहल से कुछ ही दूरी पर हुई थी, तानाशाही राजा को मृत्युदंड देने का आह्वान किया गया था… लगभग इन्हीं दिनों या इसके कुछ ही दिनों बाद झारखंड के किरीबु डिग्री में नक्सलियों ने सीआरपीएफ (केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल) के 12 जवानों को लैंड माइन में जीप उड़ा कर मार डाला था। उसके बाद हड़ियान में तीन लोगों, जिसमें एक ग्राम प्रधान भी था, जो गांव में कार्य करवाने के सरकारी ठेके लिया करता था, की आदिवासी पूजा स्थान – जाहेर थान में गला रेत कर हत्या कर दी थी। नक्सलियों ने इस आशय के पोस्टर चिपकाये थे कि लांगो में अपने साथी कामरेडों की हत्या का बदला लिया गया है। कुछ साल पहले पूर्वी सिंहभूम के डुमरिया के लांगो में नक्सलियों के सामूहिक संहार के बाद तय था कि वे बदला जरूर लेंगे। अमय दास मंदिर के चबूतरे पर बैठ के बांस की झुरमुट की तरफ ताक रहा था। श्रीमोहन ने उसके हाथ में थमे अखबार के कुछ फड़फड़ाते पन्नों को देखा। पहली हेडलाईन यही खबर थी।

“एक बहुत बड़े बदलाव की जरूरत है काका, समाज में, राजनीति के संदर्भ में एक भयानक विस्फोट होगा।”

“जानी (जानता हूं), किंतु क्रांति के लिए इतना खून और निर्दोष खून बहाना जरूरी है?”

“तो क्या क्रांति बैठ के चरचा करने से आएगी! दुनिया में हर क्रांति खून दे कर ही हुई है, खून मांगती है। हां मानता हूं, निर्दोष खून की पहचान रहे।”

“तो नीचे स्तर के बेचारे पुलिसवालों को मार के क्या यही नहीं कर रहे वे? हाई लेवल के लोग जो असल जिम्मेदार हैं, उनको टारगेट करना चाहिए।”

“लेकिन पुलिस को मार कर वे उनकी, पूंजीवाद की पोषक, निरंकुश सत्ता की शक्ति को छेद रहे हैं। उनके तंत्र को कमजोर करना उद्देश्य है इनका।” मास्टर (पहली बार और इस बात पर) उत्तेजित हो गया था।

सुमिता हंस पड़ी, “क्या बदलेगा मास्टर जी… न आप, न हम, न दुनिया…”

“आप समझेंगी नहीं भाभी… हालात से मन बुझाना ही नहीं है। जो है, वह बदलेगा। उसको हम बदलेंगे, ऐसा सोच के ही चलना होगा। नहीं तो सब पूंजीपतियों की जूतियों के पुराने कील भर बनके रह जाएंगे, जिसे जब चूभने-गड़ने लगे, निकाल के फेंक दिया जाता है! अब तो सच भी बाजार में बिकाऊ हो गया है काका”, उसकी आवाज जोशिया गयी, “देख नहीं रहे मीडिया बेच रहा है मनगढंत सच्चाइयां, बनाऊ-बिकाऊ, बनावटी खबरें… सच और खबर उत्पाद हो गयी। हर चीज का बाजार वैल्यू उसकी जगह और जरूरत तय करता है यहां।”

सुमिता गीले कपड़ों में ही नदी से नहा कर, तालाब से बरतन धो आदि कर के चली आती थी। उस बस्ती का ये आम चलन था। आम औरतें, लड़कियां ऐसा ही करती थीं। फिर भी कहीं कोई नैतिकता का उल्लघंन नहीं! श्रीमोहन सोचता, हर समाज, हर समुदाय अपने नैतिक नियम खुद कितना खूब गढ़ लेता है। यह तो बाहर वाले जबर्दस्ती उस पर चोट करके अतिरेक भरने की कोशिश करते हैं और सब विकृत हो जाता है, कर दिया जाता है… तिरस्कृत हो जाता है…

अभी दो दिनों की लगातार जोरदार बारिश के बाद उमस भरे दिन थे… पसीना चू-चुआती देह से लिपटे दोनों में से एक ने बाहर धुंधलाये चांद को देखा और बांहों में रह रहे साथी का माथा चूम लिया… “तुम कहीं चला तो नहीं जाएगा…?”

लालटेन की थरथराती रोशनी की तरह की ही कांपती जनानी आवाज।

“कहां?” श्रीमोहन उसके चेहरे को टुकुर देखने लगा, और फिर चूम लिया…

“बाहर कहीं, कहीं भी। तुम्हारा ठिकाना क्या?”

“तो आप क्या हमेशा ऐसी ही रहोगी भाभी…” एक मुस्कान उसके चेहरे पर आयी जिसको उसने बिना देखे भी भांप लिया।

“ऐ, ऐई… अभी भी हमको भाभी बोलेगा…?”

“नहीं… इस समय न आप, आप हैं, और न हम हम… हमलोग दो स्त्रोत हैं परस्पर आनंद के। हमलोग तो सिर्फ एक मर्द, सिर्फ एक औरत हैं इस समय। हमारे बीच एक सीधा रिश्ता है जो प्रकृति के नियम से बना है और उसी को मानता है… समाज लोक के बनाये नियमों को नहीं…”

“तुई ओनेक बोकी मास्टर… ज्यादा पढ़ा-लिखा है, यही दिखाता है क्या…” सुमिता उसकी नाक के बांई बगल में धड़कती शिरा पर ऊंगली फिराती हुई रख दी।

“खाली बोलता नहीं मैं, वक्त आने से कर के भी दिखाता हूं… दम है… कहे को करे में बदलने का। समझी आप…” मास्टर ने उचक कर उसके होंठों को चूमना चाहा तो उसने चिंहुक कर चेहरा खींचा। चुंबन उसके होंठ के बायीं कोर पर पड़ा… उस रात, उस उमस भरी रात जब हवा इतनी मंथर कि पत्तियां भी कसमसा जाएं, चांद इतना धुंधला – कैसे बादलों के झीने, गंदले पर्दे में छिपा… और वे दोनों इतने-इतने पास कि दोनों की रूह सरगोशियां कर सकें। इतने ही चमत्कारों से भरी वह रात आगे बढ़ी, बूढ़ी हुई और ढल गयी।

(पुराने और पारंपरिक कथावाचक यह कथा सुनाते तो कहते, ऐसी रात सुमिता के लिए आखिरी रात थी। श्रीमोहन तो मुंह अंधेरे चला गया था। उसका जाना हमेशा के लिए हुआ।)

श्रीमोहन गिरफ्तार हो चुका था।

ऐसे देश में जहां भगतसिंह और मार्क्स को पढ़ना अनपढ़ या अल्पपढ़ सत्ता की आंखों में अपराध है, खूंखार नक्सली साहित्य रखने और नक्सलियों को गुपचुप मदद करने जैसी संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त होने के पर्याप्त सबूत पुलिस उसके ठिकाने से उगाह चुकी थी। वह पुस्तिका भी, जिसके जलते हर्फे थे, “… की रात लांगो गांव मौत की काली चादर ओढ़े थी… बड़ी बेरहमी से कत्ल किया गया था जनता की वीर संतान … का। कुछ अक्षरों में उन वीर शहीदों की जीवन गाथा समाप्त नहीं हो सकती। सिद्दो-कान्हू-बिरसा-तिलका की परंपरा से अनुप्राणित ये योद्धा शोषणमुक्त समाज तैयार करने के लक्ष्य में अपनी जिंदगी के अंत तक काम करते रहे। लांगों कांड निश्चित रूप से क्रांतिकारी आंदोलन के लिए एक बड़ा आघात है। लेकिन इस इलाके के तमाम कामरेड दृढ़ता के साथ संग्राम में जुटे रहेंगे। साथियों को खोने के शोक को नफरत की आग में बदल कर नक्सलबाड़ी आंदोलन की धारा प्रवाह से भारतवर्ष के अन्य राज्यों की तरह यहां भी क्रांतिकारी आंदोलन का बीज अपने लहू से बोये हैं, उन अमर शहीदों के आत्म बलिदान की कहानी आने वाली पीढ़ी को और भी ज्यादा सशक्त बनाने का काम करेगी। साथियों की हत्या कर के शोषक वर्ग ने समझा होगा कि खेतिहर क्रांति की आग को बुझा दिया है तो वे यह बात भूल गये कि कॉमरेड चंद लोगों की शक्ति नहीं, मार्क्सवाद, लेलिनवाद-माओवाद के प्रतीक हैं…”

अमयदास रोज की तरह, मंदिर के चबूतरे पर बैठा अखबार देख कर पता नहीं किससे, शायद पास में थोड़ी दूर मसाले बांटती सुमिता से, अपने आप से या फिर हवा से, ऊंची आवाज में कह रह था, “हमको मालूम था। लड़का का बात से हमको डाउट लगता था… किंतु…”

सुमिता जानती थी या शायद नहीं जानती थी कि ऐसा कभी होगा? वह बसंत के मुरझाये फूलों के ढेर पर बैठी रह गयी हो जैसे! जाने कैसे उसूलों और प्रतिबद्धताओं के कारण प्रेम और जीवन में स्त्री से मिलने वाले सतत भरपूर प्रेम, निर्भय और समर्पित प्रेम, मांसल प्रेम को गौण बता गया था श्रीमोहन। सुमिता की सीमित अभिज्ञता उसमें भगत सिंह की परछाईं तो ढूंढ नहीं सकती थी… लेकिन श्रीमोहन कभी गलत नहीं हो सकता था। कारण हीन नहीं हो सकता था उसका काम, इतना भर जरूर जानती थी। क्या श्रीमोहन किसी दिन मुठभेड़ में मारा जाएगा… अखबार में उसकी खबर, जिसमें उसको, उस जैसों के साथ, समाज का नायक नहीं, अपनायक घोषित-साबित किया गया होगा और तस्वीर, या उसकी लाश की विरूपित तस्वीर छपेगी… क्या तब वह समाज के किसी वर्ग के मंतव्य में शहीद कहा या माना जाएगा…? इन सभी बड़ी-बड़ी और स्वभाविक मसलों को सोचने की परवाह उसके फटे कलेजे में नहीं है… दरअसल उसकी मेधा के बाहर की चीज भी है।

सुमिता फुसफुसाहट से गा रही है… आमार वेला जे जाय, सांझ वेला ते… रवींद्र संगीत वर्षा बूंदों की तरह उसके ओसारे पर टपक रहा है।

(शेखर मल्लिक। पेशे से इंजीनियर। कई पत्र पत्रिकाओं में कहानियां छपी हैं। हंस का प्रेमचंद कथा सम्‍मान मिला है और स्‍पेनिन सृजन सम्‍मान भी। प्रगतिशील लेखक संघ की जमशेदपुर ईकाई से जुड़े हैं। इनसे shekhar.mallick.18@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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