मोहल्ला लाइव में झगड़े बढ़ रहे हैं, इसे रोकिए!
♦ कैलाश चंद चौहान
मोहल्ला लाइव को चलाने वाले सभी साथियों को सादर नमस्कार!
मुझे एक साथी ने बताया कि मोहल्ला लाइव पर अच्छी सामग्री आती है। जब मैंने इसे देखना शुरू किया किया तो मैं भी इसका प्रशंसक हो गया। लेकिन कुछ दिनों से इसका कुछ अलग रंग देख रहा हूं। आप सभी से निवेदन है कि बुद्धिजीवियों की छोटी छोटी बातों पर लड़ाई के अलावा भी बहुत कुछ है।
अरुंधती राय को नीलाभ ने भड़का दिया। वह हंस की वार्षिक विचार गोष्ठी में नहीं आएंगी। फिर आपने ही एक लंबी सी रिपोर्ट दे दी की अरुंधती राय ने सुनी सुनायी बात पर विश्वास कर लिया। राजेंद्र यादव जी ने तो विश्व रंजन को बुलाने का फाइनल ही नहीं किया था। यह रिपोर्ट रिजेक्टमाल ब्लॉग पर थी।
प्रभाष परंपरा न्यास के मुद्दे पर भी बुद्धिजीवी भिड़े हुए हैं। एक दूसरे की छुपी हुई परतें खोलने पर लगे हुए हैं और कोस रहे हैं। इनमें से एक के विचार दूसरे बुद्धिजीवी से नहीं मिलते तो उसे सत्ता का दलाल भी घोषित कर देते हैं। दूसरी गालियां भी देते हैं।
खुद को बुद्धिजीवी घोषित किये बैठे ये लोग छोटी छोटी बात पर एक दूसरे की खाल नौंचने पर उतारू हो जाते हैं, जब बस नहीं चलता तो सत्ता का दलाल कहने से लेकर दूसरी भद्दी गालियां तक देने पर उतारू हो जाते हैं। तो प्यारे बुद्धिजीवियो, आपमें और आम आदमी में क्या अंतर रहा? अपने किसी के लोकतांत्रिक, मौलिक विचार नहीं हो सकते क्या?
हालांकि इन बुद्धिजीवियों से आम आदमी बहुत दूर है। यह बात अलग है कि उन्हीं की बात कर-करके यह यहां तक पहुंचे हैं। जब एक आम, सहज भाषा में कहानी या कविता हो एवं एक बार में समझ आ जाए तो उसे यह लोग साहित्य ही नहीं मानते। बातें करेंगे आम आदमी में बदलाव की। उनका दुखड़ा रोएंगे भी।
कहेंगे साहित्य तो इसी तरह का होता है। आम आदमी के लिए बाजारू साहित्य, गाने, फिल्में बहुत है। खाइए इनकी बुद्धिजीविता पर तरस। फिर आप किसमें बदलाव की बात कर रहे हैं। आपमें और नेता में क्या फर्क रहा। वो कुर्सी हासिल करते ही आम जनता को भूल जाता है, आप भी बुद्धिजीवी की कुर्सी पाते ही भूल गये। हिंदी साहित्य की किताबें बिकती नहीं हैं। कोई नहीं पूछता आदि आदि। सामयिक प्रकाशक, समय प्रकाशक व अन्य प्रकाशक कहने लगे हैं कहानी व उपन्यास बिकते नहीं, उन्हें छापकर क्या करें? मुंशी प्रेमचंद जैसे लेखकों की किताबें फिर भी खूब छप व बिक रही हैं।
आप क्यों नहीं सहज, सरल भाषा में उनसे बातें करते ताकि उनमें भी साहित्य पढ़ा जाए। बीए, एमए पास व्यक्ति को भी आपका साहित्य पढ़ने में बोरियत होने लगे तो आपको क्या हर्ज है कि आप पुन: उस पर विचार करें। मुंशी प्रेमचंद आज भी क्यों पढ़े जाते हैं।
आप कैसे उनको साहित्य मान लेते हैं, जिनकी जीवनी में अश्लील वर्णन है (सूरज पाल चौहान, डा धर्मवीर की जीवनी पढ़ लीजिए)। इस्मत चुगतई की भी कुछ कहानी इस तरह की है। उनमें अश्लील वर्णन है। एक किशोर बड़ी उम्र की औरत के स्तनों से खेलता है, दोनों आनंद का अनुभव करते हैं। सूरज पाल चौहान ने तो चाची, ताई को भी नहीं बख्शा। अश्लील तरीके से वर्णन कर दिया जो उनसे अश्लील हरकत करातीं थीं। डा धर्मवीर की 1500 रुपये में जीवनी खरीदकर पढ़ने पर मालूम पड़ता है कि अरे यह तो पारिवारिक गाथा है। फिर वो साहित्य है।
तो मोहल्ला लाइव के साथियो, बुद्धिजीवियों की लड़ाई पर ज्यादा ध्यान न देकर अन्य सामयिक, ज्वलंत मुद्दों पर ज्यादा ध्यान दो ताकि वो सामग्री मैं ज्यादा मात्रा में देख सकूं, जिसके लिए मैं मोहल्ला लाइव से जुड़ा व रोज खोलकर देखता हूं। बाकी आपकी मर्जी। इन झगड़ों में आपको भी मजा आता होगा। षडयंत्र, झगड़े के कारण ही महिलाएं रोज टीवी सीरियल देखती हैं। उनको भी यह सब देखने में मजा आता है – टीवी की TRP बढ़ती है। आपकी भी बढ़ती होगी।
गलती के लिए क्षमा याचना। हो सकता है कि आपको मेरी बातें बेकार लगे, क्योंकि मैं नामी गिरामी लेखक नहीं हूं। बुद्धिजीवी की गिनती से कोसों दूर हूं।









देखिए,ऐसे ही लोग वर्चुअल स्पेस की राइटिंग को लेकर उलजुलूल राय बनाते हैं। पाठक बनकर पढ़ते हैं और गार्जियम बनकर कमेंट करते हैं। बुद्धिजीवियों की समझ घास चरने गयी है जो मोहल्ला की वजह से लड़ते हैं,ये तो नाक खोदकर नकटी खाने वाले बच्चे से भी गए गुजरे हैं।…और ये आपने किस नीयत से कमेंट किया और स्त्री विरोध बयान दे दिया-षडयंत्र, झगड़े के कारण ही महिलाएं रोज टीवी सीरियल देखती हैं। क्या आपके हिसाब से स्त्रियां इसी प्रवृत्ति की होती है। पुरुष अगर ऐसे सीरियल नहीं देखता तो क्या झगड़ालू शक्की,कमीना(गुलजार साहब वाला नहीं वही आदिम अर्थवाला) नहीं है। आप जो लिख रहे हैं,उसे पहले तो समझें कि क्या कह रहे हैं।
जनता यदि विचार के साथ अन्याय करती हैं तो उसका परिणाम भी भोगती हैं किंतु बुद्दिजीवी आलोचक वर्ग का कर्त्तव्य भी यहाँ संदेहात्मक और हास्यप्रद हैं। इनका काम केवल आलोचना करना हैं, सुधार हेतु विकल्प देना नही रहा है । जब एक छोटे कद का आदमी जब सही सोच के साथ विचार के रण में उतरता हैं तो आलोचकों की तलवार से पैनी आलोचना उसको लड़ने से पहले ही पस्त कर देती हैं और यदि आलोचना समाज में सुधार ला पाती तो आज ऐसे हालत न होते?
भुमंदालिकरण के दौर में होते व्यवसायीकरण से आलोचना और आलोचक भी अछूते नही हैं । निज लाभ की प्रत्याशा में अपने वास्तविक कर्तव्य से विमुख हुए हैं।
जब सारे विकल्प ख़त्म हो जाते हैं तो एक ही विकल्प बचता हैं। हाँ, एक दम सही समझा हैं कि हाथ में कलम उठाने का । उससे पहले व्यक्ति प्रयास करता हैं । लोगो से बात कर उन्हें समझाता हैं और छोटी मोटी लडाई भी लड़ता हैं। असफल होने के बाद कलम ले कर अपनी भड़ास निकलता हैं। भड़ास निकलते निकलते पता नही कब वो ध्येय बदल जाता हैं जिसपर वो चला था? और अब बस दुनिया चंद प्रकाशनों और परिश्रमिक के साथ साथ सरकार से चंद पुरुस्कार तक सीमित हो जाती हैं।
कैलाश जी आपका ये आइना दिखाने का प्रयास सार्थक हैं मुझे पसंद आया!!!!
साधुवाद !!!!!!!
good going kailash. ye vineet kumar nihayat hi moorkh lagta hai.
bahut khoob likha hai, sahee baat hai yeh phir asli buddhijeev nahin hain
कैलाश, मुझे भी मोहल्ला को लेकर एक शिकायत है कि, यहाँ गाली-गलौच बहुत ज्यादा हो जाता है. लोकतांत्रिक बहस का मंच होना चाहिए इसे. और जैसा अविनाश जी ने कहा कि, इसके माध्यम से कॉफी हाउस की तर्ज पर लायेंगे,तो क्या वहाँ ऐसी भाषिक अमर्यादता हो सकती थी ? मोहल्ला लाइव को एक जिम्मेंदार मंच बनाना होगा, जो शायद इसके मूल उद्देश्य के अनुरूप होगा.
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