उड़ान : एक स्‍त्रीवादी फिल्‍म, जिसमें स्‍त्री नहीं है!

The Ugliness of The Indian Male : Udaan

♦ मिहिर पंड्या

अगर आप भी मेरी तरह ‘तहलका’ के नियमित पाठक हैं तो आपने पिछले दिनों में ‘स्पैसीमैन हंटिंग : ए सीरीज ऑन इंडियन मैन’ नाम की उस सीरीज पर जरूर गौर किया होगा जो हर दो-तीन हफ्ते के अंतर से आती है और किसी खास इलाके/संस्कृति से जुड़े हिंदुस्तानी मर्द का एक रफ सा, थोड़ा मजाकिया खाका हमारे सामने खींचती है। वो बाहरी पहचानों से मिलाकर एक स्कैच तैयार करती है, मैं भीतर की बात करता हूं… ‘हिंदुस्तानी मर्द’। आखिर क्या अर्थ होते हैं एक ‘हिंदुस्तानी मर्द’ होने के? क्या अर्थ होते हैं अपनी याददाश्त की शुरुआत से उस मानसिकता, उस सोच को जीने के जिसे एक हिंदुस्तानी मर्द इस समाज से विरासत में पाता है। सोचिए तो, हमने इस पर कितनी कम बात की है।

सही है, इस पुरुषसत्तात्मक समाज में स्त्री होना एक सतत चलती लड़ाई है, एक असमाप्त संघर्ष। और हमने इस निहायत जरूरी संघर्ष पर काफी बातें भी की हैं। लेकिन क्या हमने कभी इस पर बात की है कि इस पुरुषसत्तात्मक समाज में एक पुरुष होना कैसा अनुभव है? और खास तौर पर तब जब वक्त के एक खास पड़ाव पर आकर वो पुरुष महसूस करे कि इस निहायत ही एकतरफा व्यवस्था के परिणाम उसे भी भीतर से खोखला कर रहे हैं, उसे भी इस असमानता की दीवार के उस तरफ होना चाहिए। इंसानी गुणों का लिंग के आधार पर बंटवारा करती इस व्यवस्था ने उससे भी बहुत सारे विकल्प छीन लिये हैं। क्या कोई कहेगा कि जैसे बचपन में एक लड़की के हाथ में गुड़िया दिया जाना उसके मूल चुनाव के अधिकार का हनन है, ठीक वैसे ही लड़के के हाथ में दी गयी बंदूक भी अंतत: उसे अधूरा ही करती है।

और फिर ‘उड़ान’ आती है।

जैसी ‘आम राय’ बनायी जा रही है, मैं उसे नकारता हूं। ‘उड़ान’ पीढ़ियों के अंतर (जैनरेशन गैप) के बारे में नहीं है। यह एक जालिम, कायदे के पक्के, परंपरावादी पिता और अपने मन की उड़ान भरने को तैयार बैठे उसके लड़के के बीच पनपे स्वाभाविक तनाव की कहानी नहीं है। जैसा नयी तकनीकें अपनाता इसका प्रचार संकेत करता रहा। किसी भी महिला की सक्रिय उपस्थिति से रहित यह फिल्म मेरे लिए एक नकार है, नकार लड़कपन की दहलीज पर खड़े एक लड़के का उस मर्दवादी अवधारणा को, जिसे हमारा समाज एक नायकीय आवरण पहनाकर सदियों से तमाम लोकप्रिय अभिव्यक्ति माध्यमों में बेचता आया है। नकार उस खंडित विरासत का, जिसे लेकर उत्तर भारत का हर औसत लड़का पैदा होता है। विरासत जो कहती है कि वीरता पुरुषों की जागीर है और सदा पवित्र बने रहना स्त्रियों का गहना। पैसा कमाकर लाना पुरुषों का काम है और घर संभालना स्त्रियों की जिम्मेवारी।

उड़ान एक सफर है। निर्देशक विक्रमादित्य मोटवाने के रचे किरदार, एक सत्रह साल के लड़के ‘रोहन’ का सफर। जिसे त्रिआयामी बनाते हैं फिल्म में मौजूद दो और पुरुष किरदार। ‘भैरव सिंह’ और ‘अर्जुन’। शुरुआत से नोटिस कीजिए। जैसे भैरव सिंह रोहन पर अपना दबदबा स्थापित करते हैं ठीक वैसे ही रोहन सिंह अर्जुन पर अपना दबदबा स्थापित करता है। अर्जुन के घर की सीढ़ियों पर बार-बार ऊपर नीचे होने के वो दृश्य कौन भूल सकता है। वो अभी छोटा है, दो ‘मर्दों’ के बीच अपनी मर्दानगी दिखाने का जरिया, एक शटल-कॉक। बेटा सीढ़ियों पर बैठा अपने पिता को इंतजार करवाता है और पिता अपने हिस्से की मर्दानगी भरा गुस्सा दिखाता उन्हें पीछे छोड़ अकेला ही गाड़ी ले जाता है। नतीजा, बेचारा बीमार अर्जुन पैदल स्कूल जाता है।

रास्ते में वो रोहन का हाथ थामने की कोशिश करता है. वो अकेला बच्चा सिर्फ एक नर्म-मुलायम एहसास की तलाश में है। लेकिन रोहन कोई उसकी ‘मां’ तो नहीं, वो उसे झिड़क देता है।

लेकिन फिर धीरे से किरदार का ग्राफ घूमने लगता है। जहां एक ओर भैरव सिंह अब एक खेली हुई बाजी हैं, तमाम संभावनाओं से चुके, वहीं रोहन में अभी अपार संभावनाएं बाकी हैं। इस लड़के की ‘एड़ी अभी कच्ची है’। बदलाव का पहिया घूमने लगता है। हम एक मुखर मौन दृश्य में रोहन और अर्जुन के किरदारों को ठीक एक सी परिस्थिति में खड़ा पाते हैं। शायद फिल्म पहली बार वहीं हमें यह एहसास करवाती है। अर्जुन का किरदार अनजाने में ही रोहन के भीतर छिपे उस जरा से ‘भैरव सिंह’ को हमारे सामने ले आता है जिसे एक भरा-पूरा भैरव सिंह बनने में ज्यादा वक्त नहीं लगने वाला। लेकिन शायद तभी… किसी अदृश्य कोने में छिपा रोहन भी ये दृश्य देख लेता है।

चक्का घूम रहा है। रोहन लगातार तीन दिन तक अर्जुन की तीमारदारी करता है। उसे कविताएं सुनाता है। उसके लिए नयी-नयी कहानियां गढ़ता है। उसे अपना प्यारा खिलौना देता है और खूब सारी किताबें भी। उससे दोस्तों के किस्से सुनता है, उसे दोस्तों के किस्से सुनाता है। उसके बदन पर जब चमड़े की मार के निशान देखता है तो पलटकर बच्चे से कोई सवाल नहीं करता। सवाल मारनेवाले से करता है और तनकर-डटकर करता है। पहचानिए, यह वही रोहन है जो ‘कोई उसकी मां तो नहीं’ था।

मध्यांतर के ठीक पहले एक लंबे और महत्वपूर्ण दृश्य में भैरव सिंह रोहन को धिक्कारता है, धिक्कारता है बार-बार ‘लड़की-लड़की’ कहकर। धिक्कारता है ये कहकर कि ‘थू है, एक बार सेक्स भी नहीं किया’। यह भैरव सिंह के शब्दकोश की गालियां हैं। एक ‘मर्द’ की दूसरे ‘मर्द’ को दी गयी गालियां। लेकिन हिंदी के व्यावसायिक सिनेमा की उम्मीदों से उलट, फिल्म का अंत दो और दो जोड़कर चार नहीं बनाता। रोहन इन गालियों का जवाब क्लाइमैक्स में कोई ‘मर्दों’ वाला काम कर नहीं देता। या शायद यह कहना ज्यादा अच्छा हो कि उसके काम को ‘असली मर्दों’ वाला काम कहना उसके आयाम को कहीं छोटा करना होगा।

एक विशुद्ध काव्यात्मक अंत की तलाश में भटकती फिल्मों वाली इंडस्ट्री से होने के नाते तो उड़ान को वहीं खत्म हो जाना चाहिए था जहां अंतत: रोहन के सब्र का बांध टूट जाता है। वो पलटकर अपने पिता को उन्हीं की भाषा में जवाब देता है। और फिर एक अत्यंत नाटकीय घटनाक्रम में उन्हें उस ‘जैसे-सदियों-से-चली-आती-खानदानी-दौड़’ में हराता हुआ उनकी पकड़ से बचकर दूर निकल जाता है।

लेकिन नहीं, ऐसा नहीं होता। फिल्म का अंत यह नहीं है, हो भी नहीं सकता। रोहन वापस लौटता है। ठीक अंत से पहले, पहली बार फिल्म में एक स्त्री के होने की आहट है। वो स्त्री जिसका अक्स पूरी फिल्म में मौजूद रहा। पहली बार उस स्त्री का चेहरा दिखाई देता है। वो स्त्री जो रोहन के भीतर मौजूद है। अंत जो हमें याद दिलाता है कि हर हिंदुस्तानी मर्द के DNA का आधा हिस्सा उसे एक स्त्री से मिलता है। और ‘मर्दानगी’ की हर अवधारणा उस भीतर बसी स्त्री की हत्या पर निर्मित होती है। यह अंत उस स्त्री की उपस्थिति का स्वीकार है। न केवल स्वीकार है बल्कि एक उत्सवगान है। क्या आपको याद है फिल्म का वो प्रसंग जहां अर्जुन और रोहन अपनी मांओं के बारे में बात करते हैं। रोहन उसे बताता है कि मम्मी के पास से बहुत अच्छी खुशबू आती थी, बिलकुल मम्मी वाली। अर्जुन उस एहसास से महरूम है। उसने अपनी मां को नहीं देखा।

हमें पता नहीं कि रोहन ने उन तसवीरों में क्या देखा। लेकिन अब हम जानते हैं कि रोहन वापस आता है और अर्जुन को अपने साथ ले जाता है। उस रौबीली शुरुआत से जहां रोहन ने अर्जुन से बात ही ‘सुन बे छछूंदर’ कहकर की थी, इस ‘मां’ की भूमिका में हुई तार्किक परिणिति तक, रोहन के लिए चक्का पूरा घूम गया है। एक लड़के ने अपने भीतर छिपी उस ‘स्त्री’ को पहचान लिया जिसके बिना हर मर्द का ‘मर्द’ होना कोरा है, अधूरा है। फिल्म के अंतिम दृश्य में रास्ता पार करते हुए रोहन अर्जुन का हाथ थाम लेता है। गौर कीजिए, इस स्पर्श में दोस्ती का साथ है, बराबरी है। बड़प्पन का रौब और दबदबा नहीं।

अंत में रोहन की भैरव सिंह को लिखी वो चिठ्ठी बहुत महत्वपूर्ण है। आपने गौर किया – वो अर्जुन को अपने साथ ले जाने की वजह ये नहीं लिखता कि “नहीं तो आप उसे मार डालेंगे”, जैसा स्वाभाविक तौर पर उसे लिखना चाहिए। वो लिखता है कि “नहीं तो आप उसे भी अपने जैसा ही बना देंगे। और इस दुनिया में एक ही भैरव सिंह काफी हैं, दूसरा बहुत हो जाएगा।” क्या आपने सोचा कि वो ऐसा क्यों लिखता है? दरअसल खुद उसने अभी-अभी, शायद सिर्फ एक ही रात पहले वो लड़ाई जीती है। ‘वो लड़ाई’… ‘भैरव सिंह’ न होने की लड़ाई। अब वो फैंस के दूसरी तरफ खड़ा होकर अपने ‘पिता रूपी’ उस किरदार को बहुत अच्छी तरह समझ पा रहा है जो शायद कल को वो खुद भी हो सकता था, लेकिन जिसे उसने नकार दिया। वो अर्जुन को एक भरपूर बचपन देगा। जैसा शायद उसे मिलना चाहिए था। और बीते कल में शायद कहीं भैरव सिंह को भी।

रोहन उस चिठ्ठी के साथ वो खानदानी घड़ी भी भैरव सिंह को लौटा जाता है। परिवार के एक मुखिया पुरुष से दूसरे मुखिया पुरुष के पास पीढ़ी दर पीढ़ी पहुंचती ऐसी अमानतों का वो वारिस नहीं होना चाहता। यह उसकी परंपरा नहीं। होनी भी नहीं चाहिए। यह उसका अंदाज है इस पुरुषवर्चस्व वाली व्यवस्था को नकारने का। वो और उसकी पीढ़ी अपने लिए रिश्तों की नयी परिभाषा गढ़ेगी। ऐसे रिश्ते जिनमें संबंधों का धरातल बराबरी का होगा।

किसी भी महिला किरदार की सचेत उपस्थिति से रहित फ़िल्म ‘उड़ान’ हमारे समय की सबसे फिमिनिस्ट फिल्म है। अनुराग की पिछ्ली फिल्म ‘देव डी’ के बारे में लिखते हुए मैंने कहा था – दरअसल मेरे जैसे (उत्तर भारत के भी किसी शहर, गांव कस्बे के ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास से निकलकर आया) हर लड़के की असल लड़ाई तो अपने ही भीतर कहीं छिपे ‘देवदास’ से है। अगर हम इस दुनिया की बाकी आधी आबादी से बराबरी का रिश्ता चाहते हैं तो पहले हमें अपने भीतर के उस ‘देवदास’ को हराना होगा जिसे अपनी बेख्याली में यह अहसास नहीं कि पुरुष सत्तात्मक समाज व्यवस्था कहीं और से नहीं, उसकी सोच से शुरू होती है। ‘उड़ान’ के रोहन के साथ हम इस पूरे सफर को जीते हैं। यह एक त्रिआयामी सफर है जिसके एक सिरे पर भैरव सिंह खड़े हैं और दूसरे पर एक मासूम सा बच्चा। रोहन के ‘भैरव सिंह’ होने से इनकार में दरअसल एक स्वीकार छिपा है। स्वीकार उस आधी आबादी के साथ समानता के रिश्ते की शुरुआत का जिससे रोहन भविष्य के किसी मोड़ पर टकराएगा।

और सिर्फ रोहन ही क्यों। जैसा मैंने पहले लिखा था, “उड़ान हमारे वक्तों की फिल्म है। आज जब हम अपने-अपने चरागाहों की तलाश में निकलने को तैयार खड़े हैं, ‘उड़ान’ वो तावीज है जिसे हमें अपने बाजू पर बांधकर ले जाना होगा। याद रखना होगा।” ठीक, याद रखना कि हम सबके भीतर कहीं एक ‘स्त्री’ है, और उसे कभी मिटने नहीं देना है।

mihir pandya(मिहिर पंड्या। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में रिसर्च फेलो। सिनेमा के शौक़ीन। हिंदी सिनेमा में शहर दिल्‍ली की बदलती संरचना पर एमफिल। आवारा हूं नाम से मशहूर ब्‍लॉग। मोहल्‍ला लाइव के लिए सिनेमा और क्रिकेट पर लगातार लिखते रहे हैं। उनसे miyaamihir@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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