“हिंदी सिनेमा का मुंबई तक सीमित रहना खतरनाक है”

फिल्मकार डॉ चंद्र प्रकाश द्विवेदी से अजय ब्रह्मात्मज की बातचीत

हमने पिछले दिनों इस मसले पर जम कर बात की कि हिंदी सिनेमा को किस तरह बाजार संचालित करता है और उससे बाहर निकलना आज कितना मुश्किल काम है। यह भी बात की कि वैकल्पिक सिनेमा के दरवाजे कहां कहां से खोजे-निकाले जा सकते हैं। कहीं पहुंचने की जगह बीच में ही हमने बात रोक दी थी। एक बार फिर चंद्र प्रकाश द्विवेदी के जरिये हम उन बातों को शुरू कर रहे हैं। चाणक्‍य (धारावाहिक) और पिंजर (सिनेमा) जैसी दृश्‍य कृतियों के सर्जक चंद्र प्रकाश का मानना है कि अच्‍छी कहानी से ही हिंदी सिनेमा की पहचान बनी है, बनती रहेगी। वे इन दिनों काशीनाथ सिंह के मशहूर कथा संकलन काशी का अस्‍सी पर फिल्‍म बना रहे हैं। चंद्र प्रकाश द्विवेदी का यह इंटरव्‍यू वरिष्‍ठ सिने समीक्षक अजय ब्रह्मात्‍मज ने लिया है : मॉडरेटर

हिंदी सिनेमा की वर्तमान स्थिति को आप किस रूप में देखते हैं?

हिंदी सिनेमा पर गंभीरता से विचार करें तो लंबे समय तक श्याम बेनेगल और गोविंत निहलानी सक्रिय रहे। उनके साथ के फिल्मकारों ने फिल्मों की समानांतर भाषा गढ़ने और खोजने की कोशिश की। उनमें से प्रकाश झा को मैं एक ऐसे फिल्मकार के तौर पर देख रहा हूं, जिन्होंने समानांतर और व्यावसायिक सिनेमा में संयोग और मेल कराने की अच्छी कोशिश की है। गौर करें तो फिलहाल हिंदी सिनेमा में सार्थक सिनेमा के लिए कम जगह रही है। उसके अपने व्‍यावसायिक कारण हैं। सच्चाई है कि हिंदी सिनेमा ने घोषणा कर दी है कि उसका साहित्य का सार्थकता से कोई संबंध नहीं है। सिनेमा का लक्ष्य और उद्देश्य मनोरंजन करने तक सीमित कर दिया गया है। उसमें लतीफेबाजी और चुटकुलेबाजी आ गयी है। फिर सार्थकता कहां से आएगी। अफसोस की बात है कि दर्शकों ने स्वीकार कर लिया है और फिल्मकारों पर मुनाफे का दबाव है। पहले माना जाता था कि सिनेमा कला और व्यवसाय का योग है। अब सिनेमा के कला कहने पर प्रश्नचिह्न लग गया है। अगर यह कला है, तो कला का उद्देश्य क्या है? कला का मापदंड क्या है? परखने चलेंगे तो कला वाली कोई बात ही नहीं दिखेगी। मैं संक्षेप में यही कह सकता हूं कि हिंदी सिनेमा का लक्ष्य धीरे-धीरे व्यवसाय ही हो रहा है। इस व्यवसाय के लिए हम धरातल तक पहुंच रहे हैं। हिंदी के मेनस्ट्रीम सिनेमा में कथा, विषय और प्रयोग के स्तर पर कोई विविधता लक्षित नहीं होती। दुर्भाग्य है कि हिंदी सिनेमा हमारे समाज का भी प्रतिनिधित्व नहीं करता। अतीत और वर्तमान की कोई झलक इसमें नहीं मिलती। न ही हिंदी सिनेमा भारतीय समाज के संघर्ष का प्रतिनिधित्व कर रहा है। कभी-कभार कुछ छिटपुट फिल्में मिल जाती हैं। कोई निर्देशक अपनी जिद में कुछ कर जाता है। कभी अनुराग कश्यप तो कभी प्रकाश झा ऐसी कोई फिल्म बना लेते हैं, जो अलग होकर भी प्रासंगिक हो जाती है। कभी श्याम बेनेगल ‘वेलकम टू सज्जनपुर’ बना लेते हैं। ध्यान दें तो श्याम बेनेगल नये सिरे से संघर्ष कर रहे हैं।

क्या हिंदी सिनेमा लिए इसे अच्छी स्थिति कहेंगे? व्‍यवसाय भले ही बढ़ जाए, कलात्‍मकता तो खत्‍म होगी।

निश्चित ही यह सकारात्मक स्थिति नहीं है। अभी तक हिंदी सिनेमा ऐसी स्थिति में नहीं आया है, जहां विषयों की विविधता पर ध्यान दिया जा रहा हो। हिंदी सिनेमा अपनी भारतीय पहचान भी खो रहा है। इन दिनों फिल्मों का निर्माण और व्यापार कुछ चेहरों की बदौलत हो रहा है। सफलतम कलाकार या सफलतम निर्देशक हो तभी बाजार के निवेशकों का विश्वास उत्पन्न होता है। उन्हें लगता है कि लोकप्रिय स्टार का आकर्षण दर्शकों को सिनेमाघर में ले आएगा। इस तरह हिंदी सिनेमा स्टारों के जादू तक सीमित हो गया है। भारत के निवेशक मान ही नहीं रहे हैं कि कहानी का भी अपना कोई जादू होता है। मैं कह सकता हूं कि देश की 99 प्रतिशत फिल्में किसी न किसी सिलेब्रिटी की वजह से बन रही हैं। यह दिख रहा है। यह गलत हो रहा है, मैं ऐसा भी नहीं कहूंगा। निश्चित ही निवेशक को अपनी राशि वापस मिलनी चाहिए। तभी वह दूसरी फिल्म बना पाएगा। सृजन के सभी माध्यमों में ऑडियो विजुअल सबसे महंगा और व्यापक है। इसमें सक्रिय अभिरुचियां भी बहुत अलग-अलग हैं। इसलिए जिस प्रकार का प्रयोग हमें पश्चिम के सिनेमा में, ईरान के सिनेमा में या चीन और कोरिया के सिनेमा में दिख रहा है, उनसे हम कोसों दूर हैं। फिल्मों के बनने या न बनने के निर्णय करने वाले सौभाग्य या दुर्भाग्य से डीवीडी देखकर समझदार हुए लोग हैं। अभी तक हमारी ज्यादातर फिल्में किसी और देश के सिनेमा पर आधारित है। कॉरपोरेट की बाढ़ आने से निर्देशकों को शुरू में यह विश्वास हुआ था कि फिल्मों के लिए नयी कहानियां चुनी जाएंगी, लेकिन वह एक भ्रम साबित हुआ। कॉरपोरेट हाउस किसी भी प्रकार के जोखिम के लिए तैयार नहीं है। वह फिल्म शुरू करने के पहले ही मुनाफे का आकलन करते हैं। वास्तव में कॉरपोरेट प्रोडक्शन हाउस में बाबू किस्म के लोग होते हैं। उन्हें साल के अंत में एक निश्चित लाभ दिखाना होता है। इसलिए वे बड़े कलाकार और बड़े निर्देशक पर जोर देते हैं। ताकि सफलता सुनिश्चित हो। फिर भी हम देख रहे हैं कि फिल्में नहीं पसंद की जा रही हैं। अपने देश में स्क्रिप्ट के मूल्यांकन की कोई व्यवस्था नहीं है। इसकी कोई ट्रेनिंग भी नहीं दी जाती है। योग्यता को सफलता का पर्याय माना जाता है। जो सफल है, वही योग्य है। बगैर कटु हुए मैं कहना चाहता हूं कि जिस देश में भाषा, कला और साहित्य के स्तर पर इतनी विविधता हो वहां हम हिंदी में ऐसी फिल्में नहीं बना पा रहे हैं, जिन्हें पुरस्कार योग्य समझा जा सके। ऑस्कर की बात छोड़ें, राष्ट्रीय स्तर पर भी हिंदी को पुरस्कार नहीं मिल रहे हैं। इंटरनेशनल सर्किट में चल रहे भारतीय सिनेमा में हिंदी की फिल्में कम है। मुझे तो हिंदी फिल्मों में कथा का घोर अभाव दिखता है। कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा जैसी स्थिति है। अभी सारा जोर मनोरंजक फिल्म बनाने पर है। कुछ लोग बना पाते हैं और कुछ नहीं बना पाते हैं। लेकिन मनोरंजन के दबाव में हमारी फिल्म साधारण और साधारण से नीचे की है। फिलहाल मुझे नहीं दिखता कि भविष्य में तुरंत कोई बदलाव होगा। अभी सिनेमा की शर्तें है, सफल निर्देशक, सफल कलाकार और सफलता की संभावना।

दर्शकों के रुचि में भी कोई बदलाव दिख रहा है क्या? ऐसा लगता है कि दर्शकों के पास विकल्प हैं।

निश्चित ही दर्शकों के पास चुनाव के विकल्प हैं। पहले एक वैक्यूम था। आठवें-नौवें दशक में समांतर सिनेमा का कोई पर्याय नहीं था। कलाबोध और अभिरुचि के दर्शक समांतर सिनेमा की सीमा में ही रहते थे। विदेशी फिल्में सहजता से उपलब्ध नहीं होती थी। आज दुनिया भर की अच्छी फिल्में डीवीडी और नेट पर मिल जाती हैं। दर्शक अपनी भूख मिटा लेता है। दर्शकों का एक समूह खुद को टीवी से रिझाये रखता है, उसे चलती-फिरती तस्वीरें देखनी है। उसके लिए फिल्में सार्थक या निरर्थक नहीं होती। हमने बीच के दौर में दर्शकों को भी खुद से अलग किया। सार्थक सिनेमा के नाम पर पॉलिटिकल खेमे या पर्सनल एजेंडा की फिल्में बनती रहीं। ऐसी फिल्मों में आम दर्शकों की रुचि को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया। एकांगी राजनीतिक दृष्टिकोण की फिल्मों से दर्शकों का जुड़ाव नहीं बन पाया। अब इसे दर्शकों का दबाव कहें या उनकी अभिरुचि में आये बदलाव का असर… हम देख रहे हैं कि समानांतर सिनेमा के फिल्मकार मेनस्ट्रीम सिनेमा में जगह बनाने और पांव टिकाने की कोशिश में लगे हैं। कुछ फिल्मकार इस कोशिश में मुंह के बल गिरे और कुछ भ्रष्ट होकर सफल हुए। आप गौर करें तो ऐसे फिल्मकारों की श्रेष्ठ फिल्में वही हैं, जो उन्होंने बीस साल पहले बनायी थी। मालूम नहीं लोग मेरी इस राय को कैसे लें लेकिन श्याम बाबू का नाम लेते ही मुझे ‘अंकुर’ और ‘निशांत’ की ही याद आती है। गोविंद निहलानी की चर्चा होने पर मैं ‘आक्रोश’ और ‘अर्द्धसत्य’ की बात करता हूं। हमें अपना कैनवास बड़ा करना चाहिए और ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए। लेकिन इस कोशिश में बाजार के दबाव का संतुलन आवश्यक हो जाता है। मुझे खुशी है कि प्रकाश झा उसमें सफल हो गये हैं। उन्होंने ‘दामुल’ से शुरुआत की थी और आज उनकी ‘राजनीति’ हर जगह देखी जा रही है। उन्होंने नयी भाषा गढ़ी है और स्टारों और कलाकारों का संतुलित चयन किया हैं।

कहते हैं दूसरी भारतीय भाषाओं में मनोरंजन का ऐसा दबाव नहीं है?

ठीक-ठीक बात कर पाना मेरे लिए मुश्किल होगा। लेकिन जब मैं गिरीश कासरवल्ली या अदूर गोपालकृष्णन या बंगाल के निर्देशकों की तारीफ सुनता हूं तो मुझे खुशी होती है कि वे आज भी अपनी पसंद की सार्थक फिल्में बना पा रहे हैं। हिंदी की अंतर्निहित समस्या है कि इसका दर्शक समूह बहुत व्यापक है और यह सुपरिभाषित समाज, जाति और संस्कृति तक सीमित नहीं है। एक साथ अनेक अभिरुचियां काम कर रही होती हैं। अन्य भारतीय भाषाओं में फिल्मों का बड़ा बजट नहीं होता। इसके अलावा मुझे यह भी दिखता है हिंदी के दर्शक साक्षरता कम होने की वजह से सिनेसाक्षर नहीं हैं। बंगाल, केरल आदि राज्यों में फिल्म सोसायटी सक्रिय रही है और दर्शकों में सिनेमा की अभिरुचि सुसंस्कृत हुई है। उन भाषाओं में चल रहे प्रयोग को सराहना मिलती है। हिंदी सिनेमा की कुछ अपनी मजबूरियां भी हैं।

क्या उसे कमर्शियल दबाव कह सकते हैं?

कमर्शियल सिनेमा शुरू से रहा है। दादा साहेब फालके की पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ भी एक कमर्शियल फिल्म थी। आज हम उसे कला से जोड़ देते हैं। विडंबना है कि लगभग सौ सालों के बाद अगर आज कोई ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाने निकले तो उसे निवेशक नहीं मिलेंगे। समाज में ही अतीत के प्रति कोई सम्मान नहीं है। उल्टा उन्हें दकियानूसी माना जाता है। देश में चल रहे आर्थिक विकास से सभी चीजों का व्‍यवसायीकरण हुआ है। व्‍यवसायीकरण का सीधा असर चिंतन और कला पर दिखता है। मुझे लगता है कि आपका व्यापक दर्शक और मनोरंजक फिल्में बनाने की होड़ में हम हिंदुस्तान की आत्मा को मार रहे हैं। विदेशों में जाकर शूट करना कहीं से भी गलत नहीं है। लेकिन अब तो फिल्मों की कहानी भी अभारतीय हो रही है। मैं भारत में शूट करने के पक्ष में हूं। अपनी आगामी फिल्म ‘काशी का अस्सी’ की शूटिंग मैं बनारस में करुंगा। काशी से जिस अस्सी को देखकर मैं लौटा हूं, वह दस सालों के बाद ऐसा नहीं रहेगा। तेजी से चल रहे परिवर्तन में सांस्कृतिक धरोहर और सांस्कृतिक अवधारणाएं तेजी से बदलेंगी। हमारे ऑडियो विजुअल मीडियम में देश की भाषा संस्कृति और इतिहास के लिए कोई जगह नहीं होगी। मुझे आश्चर्य नहीं होगा कि अगर दशाश्वमेघ घाट, हरिश्चंद्र घाट और अस्सी घाट पर मोबाइल फोन और पिज्जा की दुकानें दिखें। हमारे सांस्कृतिक अड्डे भी मॉल और दुकानों में परिवर्तित हो जाएंगे। मैंने तीन साल में ही अंतर देखा है। पहले किसी नाव पर कोई विज्ञापन नहीं होता था। अभी सारी नौकाओं पर किसी न किसी कंज्युमर प्रोडक्ट के विज्ञापन दिखने लगे हैं। गंगा नदी में विज्ञापन तैर रहा है। जहां तक हमारी नजरें देख सकती हैं, वहां तक वस्तुओं के विज्ञापन लगे होंगे। इसके पहले के बाजार पूरे समाज को, उसकी संस्कृति के साथ निगल ले – मैं एक फिल्मकार के तौर पर उसे सैल्यूलाइड पर सुरक्षित कर लेना चाहता हूं।

ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में भौगोलिक दूरियां मिटने के साथ अभिरुचियों में फर्क भी खत्म हो रहा है। सिनेमा के विकास के लिहाज से यह कितना फायदेमंद है?

भौगोलिक दूरियां अवश्य मिटे, पूरी दुनिया करीब आये। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का हमारा नारा रहा है। लेकिन ग्लोबलाइजेशन के साथ-साथ मैं चाहूंगा कि सांस्कृतिक विविधता बनी रहे। शांतिपूर्ण सांस्कृतिक सहअस्तित्व हो। मुझे खतरा दिख रहा है कि समृद्ध और संपन्न देश की संस्कृति हम सभी पर हावी हो रही है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम भारत के सिनेमा की पहचान बनाकर रख सकें। यह मेरी चाहत है। ऐसा होगा कि नहीं होगा यह कह पाना मुश्किल है।

आज के संदर्भ में ‘पिंजर’ के निर्देशन के अनुभवों को किस रूप में देखते हैं?

मुझे लगता है कि ‘पिंजर’ के निर्देशन के समय मैं बाजार को इतना नहीं समझ रहा था। वह फिल्म व्यवसाय से अधिक भावना से प्रेरित थी। उस समय मल्टीप्लेक्स की शुरुआत हुई थी, आज जैसी स्थिति नहीं थी। तब मैंने बड़े स्टारों का इंतजार नहीं किया था मगर आज फिल्म बनानी होगी तो मुझे इस पर ध्यान देना होगा। मेरी अपनी समस्या है कि मैं हमेशा बड़ा कैनवास खोजता हूं। उसमें एक्टर या कैरेक्टर जो भी हों लेकिन कैनवास छोटा करना मुश्किल होता है। ‘काशी का अस्सी’ में कैनवास तो बहुत बड़ा है लेकिन लागत कम है। लोगों को आश्चर्य हो सकता है कि ऐसा कैसे हो सकता है? दरअसल इस फिल्म में बनारस का कैनवास बहुत बड़ा है। अभिव्यक्ति के संदर्भ में मेरी आकांक्षा रहती है कि मेरे पास विशाल पृष्ठभूमि हो, जिसके सामने मैं अपने चरित्रों को दिखा सकूं। यहां मेरे पास गंगा है, गंगा के घाट हैं। मेरे पास वे दृश्य हैं, जो भारतीयों के लिए अनजान हैं। बनारस जाने के बाद ही मैं वहां गंगा की विशालता, उसके घाटों की विशालता और वहां के जीवन की गति को महसूस कर सका। वहां वर्तमान और प्राचीन एवं पुरातन और नवीन एक साथ है। बनारस में बदलता हुआ भारत दिखाई देता है। बनारस में 2010 का भी भारत है और सदियों पहले का अतीत भी जिंदा है। इस फिल्म की शूटिंग में मेरे सामने चुनौतियां रहेंगी। सारे पर्यटन स्थल और तीर्थ स्थलों पर बहुत भीड़ होती है। अगर मेरी फिल्म में स्टार आते हैं, तो उन्हें देखने की आकांक्षा में सैकड़ों लोग आ सकते हैं। भारत में कहीं भी आप शूटिंग करें तो स्टारों के प्रशंसकों और सामान्य दर्शकों का यह दबाव बना रहता है। मैं अपनी फिल्मों में पृथक पहचान के चरित्र ढूंढ रहा होता हूं। कथा ढूंढ रहा होता हूं। ऐसी कथा, जिसका सीधा संबंध भारत से है। ‘पिंजर’ का सीधा संबंध भारत से है। वह सामान्य चरित्रों की कहानी थी, जो परिस्थितियों के कारण असाधारण हो गया था। ‘काशी का अस्सी’ की कथा असाधारण है, लेकिन उसमें आज का भारत है। बीस-तीस साल के बाद उसे ‘पिंजर’ के तरह ही देखा जा सकेगा। ‘काशी का अस्सी’ में 1986 से 2000 तक का भारत दिखेगा। हम देख पाएंगे कि इस दौर में भारत का क्या संघर्ष था। काशीनाथ सिंह ने इस संघर्ष और मनीषा को रोचक तरीके से लिखा हैं। ‘पिंजर’ मूलतः गंभीर विषय पर बनी फिल्म है। ‘काशी का अस्सी’ का विषय भी गंभीर है। लेकिन काशीनाथ सिंह ने इसे रोचक तरीके से लिखा है। मेरे लिए यह नया जोन है। इसमें व्यंग्य है। यह कॉमेडी के पास है और कॉमेडी दूर भी है। सबसे बड़ी बात है कि विषय बहुत मौजूं और सार्थक है। मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूं कि काशीनाथ जी ने मुझे कॉपीराइट दिया। पिछले डेढ़ सालों से मैं इसकी स्क्रिप्ट लिख रहा हूं। ‘पिंजर’ से मैंने सीखा है कि हम जो रिस्क लेने जा रहे हैं, उसमें सृजन और लागत के बीच एक तालमेल हो। एक भी अतिरिक्त दृश्य न हो, एक दिन भी एक्सट्रा न हो। फिल्म की लंबाई जितनी कम होगी, उसे उतने ज्यादा दर्शक मिलेंगे। ‘पिंजर’ के रिलीज के समय तक मेरी समझ में आ गया था कि फिल्म की लंबाई ज्यादा है। ‘काशी का अस्सी’ लिखते समय मैंने स्क्रिप्ट में ही कटाई-छंटाई कर दी है।

‘काशी का अस्सी’ चुनने की क्या वजह रही? क्या इसे फिल्म में ढालना आसान होगा?

‘काशी का अस्सी’ वर्तमान की कहानी है। इस समय को मैं देख भी रहा हूं। यह एक ऐसे व्यक्ति द्वारा लिखी गयी है जो बनारस का ही रहने वाला है। वह बनारस की आत्मा और सभ्यता को समझता है। बनारस की संस्कृति से परिचित है। इन दिनों दबाव है कि फिल्में यूथ को कनेक्ट करें। आम दर्शकों की उम्र 15 से 35 मानी जा रही है। इसे लिखते समय मैंने ध्यान में रखा है कि दर्शकों को थिएटर तक लाने के सारे आकर्षण हों। ‘पिंजर’ के अनुभवों से यह बात समझ में आयी कि सिनेमा एक लोकधर्मी माध्यम है। यह लोकभोग्या माध्यम है। अपने क्रिएटिव एक्सप्रेशन के साथ-साथ आपको दर्शकों की आकांक्षाओं और उनकी टिकट की लागत के बदले में मनोरंजन देना होगा। मेरे एक भतीजे ने अमेरिका में ‘पिंजर’ देखी और उसका पहला सवाल था कि इसमें मनोरंजन कहां है? हालांकि साहित्य में दुख और अवसाद भी एक रस है। लेकिन सिनेमा का दर्शक अभी सिर्फ आनंद और मनोरंजन चाहता है। यदि साथ में कुछ सार्थक बातें हो जाए तो यह संयोग होगा। उनको ध्यान में रखते हुए मैंने इस फिल्म का नाम ‘अस्सी / काशी’ रखा है। मालूम नहीं कि मैं अपनी सोच का निर्वाह कर पाऊंगा या नहीं।

आपका अधिकांश काम साहित्य केंद्रित या साहित्य पर आधारित रहा है? साहित्य पर बार-बार लौटने की क्या वजह है?

साहित्य पर मैं बार-बार इसलिए लौटता हूं कि वहां पुख्ता विषय मिल जाता है। कई ऐसे फिल्मकार हैं जो सिर्फ व्यवसाय के लिए फिल्म नहीं बनाते हैं। हम लोगों ने फिल्म को अभी गंभीर व्यवसाय नहीं माना है। मुझ जैसे व्यक्ति को साहित्य से सहारा मिल जाता है। हम जब तक किसी बात, कथा या विचार से अभिभूत नहीं हो जाते, तब तक फिल्म बनाने का यत्न नहीं करते। मैंने ऐसी सफल फिल्में देखी हैं, जिन्हें देखकर थिएटर में हंसा हूं। मेरा अच्छा मनोरंजन भी हुआ है, मैं उन्हें बार-बार देखता हूं। लेकिन अगर पूछें कि क्या मैं वैसी फिल्में बनाना चाहूंगा तो मेरा उत्तर होगा नहीं। मैं वही फिल्म बनाना चाहूंगा, जिसके विषय से मैं स्वयं अभिभूत हूं। वह फिल्म ऐसी हो जो मेरे समय में और मेरे बाद भी कुछ वर्षों तक सराही जाए। यह मेरी रचनात्मक भूख है। साहित्य चुनने का एक बड़ा लाभ है कि लेखक ने अपने अनुभवों से उस विषय का ताना-बाना बुना होगा। दूसरे अगर वह प्रसिद्ध लेखक है तो इसका मतलब है कि वो पाठकों की अभिरुचि का है। दुर्भाग्य से हम लोग बहुत नहीं पढ़ते हैं इसलिए हमारे हाथ बहुत सारी कहानियां नहीं आती है। किसी अच्छे निर्देशक के हाथ साहित्यिक कहानी लगे तो वह उस पर फिल्म बनाना चाहेगा। कुछ निर्देशक अपनी फिल्म को साहित्यिक स्तर पर ले जाना चाहते हैं। जिन्हें लगता है कि फिल्में भी सौंदर्य की अनुभूति देती है। हिंदी सिनेमा में यह प्रवृत्ति कम है। दक्षिण और बंगाल में ऐसी चेतना सक्रिय है और वहां के दर्शक उन्हें पसंद करते हैं। मेरा मानना है कि हर फिल्म का एक दर्शक होता है। फिल्म की लागत और उसके व्यवसाय का संतुलन तो रखना ही पड़ेगा। ‘हरिश्चंद्राची फैक्ट्री’ के निर्देशक को कोई निर्माता नहीं मिल रहा था तो उसने अपना घर गिरवी रख दिया। वह अपनी फिल्म से अभिभूत था। अंत में उन्हें दर्शक, पुरस्कार, वितरक सब मिले। मराठी में होने के बावजूद वह फिल्म बड़े दर्शक समूह तक पहुंची। देश-विदेश की ज्यादातर सफल फिल्में साहित्य से प्रेरित या उन पर आधारित रही हैं।

अपने यहां सिनेमा और साहित्य का संबंध सहज नहीं रहा है। अधिकांश साहित्यकारों की शिकायत है कि फिल्में बनाते समय निर्देशक उनकी कृति की हत्या कर देते हैं। विवादों से बचने के लिए फिल्मकार भी किसी साहित्यिक कृति पर फिल्म बनाने से बचते हैं।

सामान्य तौर पर संदेह और अविश्वास बना हुआ है। गौर करें तो हमारे यहां ऐसा साहित्य लिखा भी नहीं जा रहा है, जिसे आसानी से सिनेमा में ढाला जा सके। मेरे एक मित्र विश्वास पाटिल हैं, उनका अनुभव है कि वृहद उपन्यासों को फिल्म में ढालना मुश्किल होता है। जबकि कहानियों और नाटकों पर फिल्में बन जाती हैं। नाटक संवाद प्रधान होते हैं इसलिए निर्देशक को सुविधा मिलती है। कहानी के मामले में निर्देशक अपनी कल्पना से उसका विस्तार कर सकता है। अभी हर निर्देशक एक अच्छी कहानी की तलाश में है। ये कहानियां कहीं से भी मिल सकती हैं।

कहते हैं कि दर्शकों का प्रोफाइल बदल रहा है। मल्टीप्लेक्स संस्कृति ने सिनेमा के विषयों को प्रभावित किया है। आप क्या मानते हैं?

मल्टीप्लेक्स के दर्शक सिर्फ शहरों में हैं। बांदा, बलिया जैसे छोटे शहरों में अभी मल्टीप्लेक्स की कल्पना नहीं कर सकते हैं। विकास के साधन पहले शहरों में आते हैं, फिर वे छोटे शहरों और देहातों की तरफ जाते हैं। टीवी का उदाहरण बहुत अच्छा होगा, सैटेलाइट चैनल आने के बाद ज्यादातर टीवी सीरियल शहरों तक सीमित रहे। अभी सैटेलाइट और डीटीएच कस्बों और गांव में पहुंच चुका है। नतीजा साफ दिख रहा है। टीवी पर गंवई सीरियलों की बाढ़ आ गयी है। उनकी प्रामाणिकता और वास्तविकता अलग शोध का विषय है लेकिन शहरी निर्माताओं की रुचि देहातों में बढ़ी है। उसका साफ कारण है व्यवसाय। मेरा मानना है कि मल्टीप्लेक्स के दर्शक सिर्फ मनोरंजन के लिए फिल्में देखते हैं। इसके अलावा मल्टीप्लेक्स जिस आनंद का अनुभव देता है, वह नया है। मल्टीप्लेक्स के दर्शकों को मैंने फिल्म देखते समय भी एसएमएस करते और मोबाइल पर बातें करते देखा है। उनके लिए फिल्म अलग तरह का टाइम पास है। छोटे शहरों में फिल्म देखने का उद्देश्य कस्बों और शहरों के दर्शकों के लिए फिल्म देखना एक समारोह की तरह होता है। मुझे लगता है जल्दी ही दर्शकों का यह भेद मिटेगा और फिल्मों के विषयों में विस्तार आएगा। पहले नयी फिल्मों को गांव पहुंचने में दो-तीन महीने लग जाते थे। अभी हर जगह के लोग एक साथ फिल्में देख रहे हैं। दर्शकों के पास बेहतर सिनेमा का भी विकल्प आ गया है। हम अच्छी फिल्में नहीं बनाएंगे तो वे हिंदी फिल्में देखना बंद भी कर देंगे। टीवी के जरिये वे दुनिया भर का सिनेमा देख सकते हैं और अब तो विदेशी फिल्में डब होकर हिंदी में आ रही हैं। उन्होंने भारतीय दर्शकों की रुचि, ताकत और पसंद को समझा है। वे धीरे-धीरे अपनी पैठ बना रहे हैं। आप देखें कि ‘2012′ और ‘अवतार’ जैसी फिल्में भारत में खूब चली। भाषा अवरोध नहीं रही। मैं तो कहूंगा कि गांव में बैठे दर्शकों का भी प्रोफाइल बदल रहा है।

अपने यहां अभी तक बॉक्स ऑफिस कलेक्शन ही फिल्मों के हिट या फ्लॉप होने का लक्षण लाता है। ऐसा लग रहा है कि जल्दी ही फिल्मों की आय के और जरिये विकसित होंगे। जैसे कि डीवीडी, टीवी प्रसारण आदि।

सही कह रहे हैं। विदेशों में डीवीडी, होम वीडियो और टीवी से फिल्मों की अच्छी आमदनी हो जाती है। दर्शक बार-बार देखते हैं। अपने यहां भी डीवीडी सस्ते हो रहे हैं और इसकी संभावना बढ़ती जा रही है। हो सकता है कि कस्बों और छोटे शहरों में थोड़ी देर से मल्टीप्लेक्स बने लेकिन डीवी और सैटेलाइट के जरिये वहां के भी दर्शक नयी फिल्मों का आनंद ले सकेंगे। अब इस प्रसार को रोक पाना मुश्किल है।

क्या आपको नहीं लगता कि हिंदी फिल्मों के निर्माण का विकेंद्रीकरण होना चाहिए। अभी तक सब कुछ मुंबई में केंद्रित है। जबकि नयी तकनीकी सुविधाओं से कहीं भी फिल्म बनाना आसान हो गया है।

यह जरूरी है। हिंदी सिनेमा का मुंबई तक सीमित रहना उसके भविष्य के लिए सही नहीं है। यहां के निर्माता-निर्देशक मुनाफे और व्यवसाय की लीक पर चलते हैं। वे स्टारों पर आश्रित रहते हैं। अगर हिंदी प्रदेशों में सिनेमा विकसित होगा तो मुंबई का एकाधिकार टूटेगा और एकरसता भी खतम होगी। मुझे लगता है, तब भी हमारे समाज की कहानियां फिल्मों में आ पाएंगी। मुंबई के निर्माता-निर्देशकों ने अपने ऊपर यह बोझ ले लिया है कि उन्हें ज्यादा से ज्यादा दर्शकों को संतुष्ट करना है। उसकी वजह से ही स्टार सिस्टम बढ़ा है। अभी भोजपुरी सिनेमा का विकास दिख रहा है लेकिन वह भटकाव का शिकार है। अधिकांश भोजपुरी फिल्में हिंदी फिल्मों की भोंडी नकल हैं।

(इस इंटरव्‍यू को आप लमही पत्रिका के ताजा अंक में भी पढ़ सकते हैं।)

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