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आते दृश्‍य जाते दृश्‍य

28 July 2010 No Comment
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भाषाई विविधता और वैचारिक असहमतियों का सम्‍मान करने वाले विलक्षण पत्रकार। पहले रंगकर्मी। राजस्‍थान पत्रिका से पत्रकारीय करियर की शुरुआत। वहां से प्रभाष जी उन्‍हें जनसत्ता, चंडीगढ़ संस्‍करण में स्‍थानीय संपादक बना कर ले गये। फिलहाल जनसत्ता समूह के कार्यकारी संपादक। उनसे om.thanvi@ expressindia.com पर संपर्क किया जा सकता है।

♦ ओम थानवी

अज्ञेय ने कमोबेश हर विधा में लिखा और ऐसा कि अलग-अलग कोण से चर्चा में बने रहे। कवि, कथाकार, यात्रा-लेखक, नाटककार, डायरी-लेखक, आलोचक, निबंधकार, व्यंग्यकार, स्तंभकार, संपादक! इसके अलावा जब उन्होंने अपनी रुचियों में चित्रकारी, मूर्तिकारी, छायाकारी के साथ चर्म-कर्म, बढ़ईगीरी, सिलाई और बागवानी आदि ‘बहुत-सी दस्तकारियों में थोड़ी-बहुत कुशलता’ का जिक्र भी कर डाला तो बकौल मनोहर श्याम जोशी हिंदी में एक फिकरा मुकम्मल हो गया कि एक कुरुक्षेत्र चूक गये, वरना अज्ञेय किस क्षेत्र में नहीं कूदे।

मगर एक क्षेत्र शायद छूट रहा था! आयोजन का। थोड़ा बहुत आयोजन तो काव्य सप्तकों, दिनमान आदि के संपादन और छिटपुट गतिविधियों में भी रहा होगा। लेकिन जीवन के आखिरी दशक में उन्होंने बाकायदा एक संस्था बनायी – वत्सल निधि। हालांकि संस्था में कोई स्टाफ नहीं था, न जरूरत के दूसरे साधन। दो पहियों पर निधि की गाड़ी खड़ी हुई : एक अज्ञेय खुद थे, दूसरी थी संगिनी इला डालमिया, जो अज्ञेय को घर में वत्सल कहकर पुकारती थीं।

आपको खयाल होगा, ज्ञानपीठ पुरस्कार में मिली बड़ी धनराशि को अज्ञेय ने ‘अनुपार्जित’ धन मानते हुए एक संकल्प के साथ स्वीकार किया था कि उतनी ही राशि अपनी जेब से मिलाएंगे और लेखकीय आयोजनों के लिए एक न्यास बना देंगे। हालांकि उनकी जेब उतनी भारी न थी, जितनी लोग कार-बंगले या दूर देशों की यात्राओं को देखकर कयास लगाते थे।

वत्सल निधि की स्थापना 1980 में हुई। शुरू में तीन मोटे कार्यक्रम तय किये गये – लेखक शिविरों, व्याख्यानमालाओं और यात्राओं का आयोजन। वत्सल निधि के लेखक शिविरों का स्वरूप यह होता था कि नामवर लेखकों और नवतर लेखकों को एक साथ रहने, खाने, बोलने, घूमने का मौका दिया जाए। ऐसा पहला शिविर मार्च 1981 में लखनऊ में आयोजित हुआ। साक्षरता निकेतन में। शिविर के निदेशक अज्ञेय खुद थे। छह रोज मुझे भी लखनऊ में अनेक बड़े लेखकों की छाया में रहने का मौका मिला।

सचाई तो यह है कि उस तादाद में नये लेखकों के साथ पाये के लोग एक साथ मैंने न पहले देखे, न बाद में। कुछ नाम बरबस याद आते हैं : अमृतलाल नागर, डॉ देवराज, कुंवर नारायण, निर्मल वर्मा, रघुवीर सहाय, श्रीलाल शुक्ल, विजयदेव नारायण साही, विद्यानिवास मिश्र, विपिन कुमार अग्रवाल, शिवानी, रमेशचंद्र शाह, गिरिराज किशोर, नंदकिशोर आचार्य, शीन काफ निजाम, भूदेव मिश्र…

आयोजन कर्म भी अपने आप में मामूली कौशल नहीं है। उसमें समय और उद्यम का पूरा अनुशासन चाहिए। तब और, जब पीछे शासन या किसी प्रतिष्ठान का जोर न हो। आयोजनों के निमंत्रण वात्स्यायनजी और इला डालमिया मिलकर तैयार करते थे। लिफाफों पर पते इलाजी हाथ से लिखती थीं। एक कापी में आयोजन के खर्च का हिसाब अज्ञेय दर्ज करते थे। लखनऊ के बाद हुए एक शिविर में स्टेशन रवानगी से पहले मैं कैवेंटर्स ईस्ट में था। मैंने देखा कि अज्ञेय नौकर के साथ बैठकर रुपहली पन्नी के छोटे-छोटे बक्सों में अल्पाहार की चीजें खुद सजा रहे थे। चीजें जो रेल में लेखकों को प्रस्तुत की जानी थीं। आजकल ऐसे बक्से या डिब्बे चलती रेल में ही मिल जाते हैं।

लखनऊ शिविर के लिए सब लेखक गोमती एक्सप्रेस से रवाना हुए। निर्मलजी और रघुवीर सहाय आदि से लेकर नयों में (स्व) संजीव मिश्र और मुझ नाचीज जैसे पचास से ऊपर संभागी उसमें सवार थे। लंदन से आये ओंकारनाथ श्रीवास्तव भी, जिन्होंने बीबीसी के लिए अज्ञेय से रेल-पटरियों की खटरखट के बीच गुफ्तगू रेकार्ड की। हिंदी की दुनिया में बीबीसी का उस वक्त बड़ा जलवा था।

खादी का कुरता-पाजामा और बंडी तब तक अज्ञेय की आम वेश-भूषा बन चुके थे। टाई-सूट में कम से कम मैंने उन्हें नहीं देखा। लेकिन उस रोज गोमती एक्सप्रेस के कुर्सीयान में वे कादरे की जीन्स-मार्का पतलून पर फौजी जैकेट-सी पहने थे। सिर पर एक तरफ झुकी हुई गोल टोपी थी। यानी पूरी तरह सफरी और खुली रंगत।

जब थोड़े सफर, थोड़े नाश्ते और कुछ गंभीर बातों से लोग सुस्त-से दीखने लगे, वात्स्यायनजी ने ताली बजाकर सबका ध्यान खींचा। फिर सबसे आगे, दरवाजे तक चले गये। मुड़े तो एक बाजीगर की-सी चंचलता और फुर्ती उनके चेहरे पर चढ़ चुकी थी। बोले, हमारे दौर के अनेक कवियों को सुनने का आपको मौका न पड़ा होगा। आपको उनकी कुछ झलक दिखलाये देते हैं। और वे दरवाजे के साथ दीवार से निकले मेज-नुमा फट्टे पर चढ़ बैठे। ये मेजें कुर्सीयान में सबसे आगे की पंक्ति के मुसाफिरों की सुविधा के लिए बनी होती हैं। एक-एक कर उन्होंने कुछ कवियों के पाठ की ‘सस्वर’ नकल उतारी।

सबसे मजेदार, सही शब्दों में हंसा-हंसा कर लोटपोट कर देने वाली नकल भगवतीचरण वर्मा के गीत की थी। उसे पेश करने से पहले उन्होंने अपने दांत दिखाये, फिर ऊपर-नीचे के होंठ जाने किस मशक्कत से मसूढ़ों की तरफ उमठे। शायद कवि की गोल मुख-मुद्रा का साक्षात स्मरण करते हुए। फिर ये पंक्तियां चेहरे की लचक और शरीर की मटक के साथ कुछ ऊंचे स्वर में :

हम दीवानों की क्या हस्ती
हैं आज यहां, कल वहां चले
मस्ती का आलम साथ चला
हम धूल उड़ाते जिधर चले …

गुरु-गंभीर से लेकर घुन्ने-मनहूस जैसे दर्जनों दुर्विशेषणों से ‘शोभित’ अज्ञेय की हस्ती को इतनी सहज, प्रांजल और ललित मुद्रा में देखना एक जीवन-भर का अनुभव साबित हुआ। उसके बाद उनके साथ बहुत यात्राएं भी कीं। लेकिन वह मस्ती हूबहू दुबारा देखने को नहीं मिली। हमेशा वैसा माहौल दोनों तरफ से एक साथ नहीं मिलता। पर उनकी इस प्रतिभा की झलक जब-तब जरूर मिल जाती थी।

रेल के उस सफर में लेखक बतियाते, सोते-जागते रहे। आचार्यजी ने मेरे प्रेत-संपादन में निकलने वाले साप्ताहिक ‘इतवारी’ के लिए अपना उस हफ्ते का स्तंभ लिख डाला। मैं वात्स्यायनजी की गतिविधियों, भंगिमाओं पर गौर किये रहता था। या खिड़की के बाहर सुंदर-असुंदर दृश्यावली निहारने लगता था। ऐसे ही किसी घड़ी पास की सीट पर वात्स्यायनजी आ बैठे। मुझे इसका भान तब हुआ जब कान में उनकी धीमी, लय-बद्ध आवाज पड़ी – अपने से छूटते हुए से दृश्यों को देखने का अपना ही सुख है!

इतनी सन्निकट उपस्थिति से मैं उनके कथन का मर्म फिसला गया। मेरा असमंजस ताड़ उन्होंने साफ किया कि आम तौर पर कुर्सीयान की सारी कुर्सियां इंजिन की दिशा में, यानी सीधी, होती हैं। यही डिब्बा उलटा लगा है। सीधा होता तो हम आते दृश्यों को पकड़ रहे होते। उलटी दिशा में दृश्य हमसे भागते हैं। उनका कोई रूप बने उससे पहले वे रपट कर दूर हो जाते हैं! पर उन्हें इस तरह आते और जाते देखने का अपना अनुभव है। जाहिर है, अज्ञेय ने कुर्सीयान की दोनों दशाओं में लुत्फ का सबब ढूंढ़ लिया था!

बाद में जैनेंद्र कुमार का एक संस्मरण प्रेमचंद के बारे में पढ़ा। 1929 का, जब लखनऊ में जैनेंद्र प्रेमचंद से पहली बार मिले। घर से दफ्तर के लिए प्रेमचंद तांगे की जगह इक्का ही किराये पर करते थे। वजह? जैनेंद्रजी को उन्होंने बताया था – तांगे में सीट उलटी होती है। यानी हम आने वाली दुनिया और खुद तांगे वाले की तरफ पीठ करके बैठते हैं। इक्के में दुनिया दृश्य दर दृश्य सामने रहती है!

लखनऊ शिविर के दौरान ही वात्स्यायनजी ने सत्तर वर्ष पूरे किये। सबने बधाई दी। मुझे उस रोज उन्होंने अपनी (तब) नयी पुस्तक ‘अपरोक्ष’ हस्ताक्षर कर स्नेहस्वरूप दी। उसी शाम अपने काव्य-नाटक ‘उत्तर प्रियदर्शी’ का पूरा पाठ स्वर में किया। पाठ के दौरान मैंने लक्ष्य किया कि उनकी सदा तनी रहने वाली गर्दन थकान के बाद कुछ छोटी हो जाती है; झुक जाती है। गर्दन और हाथ पर नसों का उभार भी शायद बढ़ने लगा था। नाटक का लंबा पाठ पूरा होने के बाद – पहले नहीं – उन्हें कुछ लेखकों ने सलाह दी कि दिन भर के काम के बाद अब कुछ आराम के बारे में सोचना चाहिए! बहरहाल, ‘उत्तर प्रियदर्शी’ के सर्जक का अपना वाचन मैंने उस दिन रेकार्ड कर लिया था। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने इस नाटक की नायाब प्रस्तुति रतन थियम के निर्देशन में की है।

सोचता हूं, वह रेकार्डिंग विद्यालय को दे दूं अगर वे उसे सुरक्षित रखना चाहें!

यहां वत्सल निधि के आयोजनों के ब्योरे देना मेरा मकसद नहीं है। मैं सिर्फ निजी छाप के कुछ प्रसंग याद करने की कोशिश कर रहा हूं।

जिन्होंने ‘नदी के द्वीप’ पढ़ा है, उन्हें खूब याद होगा कि लखनऊ के कॉफी हाउस की उपस्थिति उपन्यास में एक पात्र की सी ही है। सो सहृदय पाठक-लेखकों की फरमाइश पर सदय अज्ञेय समूह को हजरतगंज कॉफी पिलाने ले गये। कॉफी हाउस का नक्शा वही रहा होगा – ऊंची छत, बड़े दरवाजे, कुछ कोटर। लेकिन बाहर की चिल्ल-पों सभ्यता के साथ ही दाखिल हुई होगी। प्रवेश द्वार के दायीं तरफ एक अखबार विक्रेता की दुकान थी। वात्स्यायनजी बोले, यह तब से है। बाकी ज्यादातर कारोबार तो बदल ही गया है।

कॉफी हाउस में एक दिलचस्प बात हुई। उम्रदराज बेयरे से वात्स्यायनजी ने कुशलक्षेम पूछा। अदब से जवाब दे वह जाने लगा तो आचार्यजी ने उसे पूछ लिया, आप भी पहचानते हैं ये (अज्ञेय) कौन हैं! बेयरे ने विनय से कहा, अच्छी तरह हुजूर। पहले डॉक्टर साहब (राममनोहर लोहिया) के साथ इसी टेबल पर तो बैठा करते थे।

बाद में अज्ञेय बोले, इसको ठीक याद है। आपने तो परीक्षा ले ली!

लखनऊ प्रसंग में एक वाकया और याद आ जाता है। शिविर के किसी सत्र में एक पहाड़ी युवा कवि आये। गोस्वामी तुलसीदास पर चल रही चर्चा के दौरान उन्होंने दखल करते कहा – लेकिन तुलसीदास के मन में जो बात थी, उसे लेकर आप… वात्स्यायनजी ने वहीं सिर्फ एक वाक्य कहा और युवा कवि ने बात आगे नहीं बढ़ायी। अज्ञेय ने कहा था – मैं आपको बधाई देना चाहता हूं कि आपको मालूम है तुलसीदास के मन में क्या था!

(ओम थानवी का पाक्षिक स्‍तंभ अनंतरजनसत्ता, 6 जून 2010 से साभार)

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