यह विचारों का लोकतंत्र नहीं, बौद्धिक तानाशाही है!
♦ राजेंद्र यादव
यह हंस के अगस्त अंक में छपे संपादकीय का एक हिस्सा है। इसमें राजेंद्र यादव ने 31 जुलाई की गोष्ठी में अरुंधती राय बनाम विश्व रंजन के संदर्भ में अपनी बात रखी है। इस विषय पर जनज्वार नाम के एक ब्लॉग पर दो युवा पत्रकारों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी और अरुंधती से ये कंसेंट ले लिया था कि वो किसी भी कीमत पर हंस की गोष्ठी में नहीं जाएंगी। मोहल्ला लाइव में हमने दो प्रतिक्रियाएं छापी थीं। पहली प्रतिक्रिया अविनाश की थी : हंस की गोष्ठी नहीं भी होगी तो क्या फर्क पड़ जाएगा और दूसरी प्रतिक्रिया समरेंद्र की थी : अरुंधती के इस फैसले से फर्क किसको पड़ेगा नीलाभ जी! इसी संदर्भ में एक परिवर्तनकामी टोली भी राजेंद्र यादव से सफाई लेने पहुंची थी, जिसको हमने रिजेक्ट माल से उड़ा कर मोहल्ला लाइव में छापा था : परिवर्तनकामी टोली ने सार्वजनिक किया राजेंद्र जी का पक्ष। अब राजेंद्र जी की खुद की बात भी देख लें : मॉडरेटर
31 जुलाई को होने वाली हंस की गोष्ठी का विषय निर्धारित किया गया था : वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति। यह सूत्र नर बलि इत्यादि को जायज ठहराने के लिए ब्राह्मणों ने खोजा था। अर्थ था, वेद यानी सत्ता (अथॉरिटी) द्वारा अनुमोदित हिंसा हिंसा नहीं कहलाती। यह सत्ता राज्य की भी हो सकती है और स्थापित राज्य के खिलाफ वैचारिक प्रतिबद्धता की। सरकारी दमन और नक्सली संघर्ष कुछ इसी प्रकार की हिंसाएं हैं।
हंस हमेशा एक लोकतांत्रिक विमर्श में विश्वास करता रहा है। हमारा मानना है कि एकतरफा बौद्धिक बहस का कोई अर्थ नहीं है। वह प्रवचन होता है। जब तक प्रतिपक्ष न हो, उसे बहस का नाम देना भी गलत है। हमने अपनी गोष्ठियों में प्रतिपक्ष को बराबरी की हिस्सेदारी दी है। जब भारतीयता की अवधारणा पर गोष्ठी हुई, तो हमने बीजेपी के सिद्धांतकार शेषाद्रिचारी को भी आमंत्रित किया था। अब इस बार सोचा था कि क्यों न प्रतिपक्ष के लिए छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्व रंजन को आमंत्रित किया जाए। पक्ष की ओर से अरुंधती और अन्य तो होंगे ही। हंस का दफ्तर सब तरह की बहसों, नाराजगियों, शिकायतों या अन्य भड़ासों का खुला मंच है। वक्ताओं के नाम पर विचार ही हो रहा था कि यार लोग ले उड़े और पंकज विष्ट ने अपने समयांतर में लगभग धिक्कारते हुए कि हम बस्तर क्षेत्र के हत्यारे पुलिस डीजी और अरुंधती को एक ही मंच पर लाने की हिमाकत करने जा रहे हैं।
ब्लॉग वालों को छद्म विवादों के लिए ऐसे ही मुद्दों की तलाश रहती है। दो पत्रकारों ने इस पर लंबी बहस छेड़ दी और विश्व रंजन जैसे काफिर के साथ अरुंधती जैसी निरीह को एक मंच पर लाने के लिए हमारी लानत-मलामत कर डाली। दिल्ली में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने को आतुर नीलाभ ने भी “वंदना के इन सुरों में एक सुरा मेरा मिला लो” के भाव से एक लेख पेल डाला। इसमें उन्होंने पूछा कि मैं किधर हूं, यह मैंने कभी साफ नहीं किया। जो कुछ पढ़ते-सुनते न हों, उन्हें क्या जवाब दिया जाए? चाहे तो वे इस बार जुलाई 2010 के संपादकीय पर नजर डाल लें। हमारी मंशा इस ज्वलंत मुद्दे के अनेक पक्षों पर खुल कर बात करने की ही रही है। अगर इसे सिर्फ “सहमतों का प्रस्ताव पारित” करने का संवाद ही बनाना है तो बात दूसरी है। मैं मित्रों से अनुरोध करता हूं कि वे कोई दूसरा विकल्प बताएं। लगता है अब यह विवाद और जगहों पर भी चलेगा।
सबसे पहले तो मैं स्पष्ट कर दूं कि वक्ताओं के नाम तब तक चुने जा रहे थे, फाइनल नहीं थे। दूसरे यह कि बुद्धिजीवियों का यह कौन सा आचरण है कि वे दूसरे पक्ष की बात सुनेंगे ही नहीं। यह विचारों का लोकतंत्र नहीं, बौद्धिक तानाशाही है। “मैं तुम्हारे विचारों को एक सिरे से खारिज करता हूं, मगर मरते दम तक तुम्हारे ऐसा कहने के अधिकार का समर्थन करूंगा।” यह कहा-बताया जाता है लोकतंत्र के पुरोधा वॉल्टेयर का। दूसरे को बोलने ही न दो, यह कैसा फासीवाद है? क्या हमारे तर्क इतने कमजोर हैं कि “दुश्मन” के सामने ठहर ही नहीं पाएंगे? इस वैचारिक तानाशाही का एक कुत्सित रूप कुतर्कों का पिंजड़ा खड़ा करना भी है। आप किसी भी विषय पर बात कीजिए, वे तर्क देंगे कि जब मुंबई-पंजाब में बाढ़ ने तबाही मचा रखी हो, बस्तर के आदिवासियों का कत्लेआम जारी हो, खाप पंचायतें चुन-चुनकर युवाओं को फांसी पर लटका रही हों, किसान हजारों की संख्या में आत्महत्याएं कर रहे हों, तब आप एसी कमरों में बैठकर एक फालतू मुद्दे पर मगजपच्ची कर रहे हैं – यह भयानक देशद्रोह है और भर्त्सनीय है।
इस बाजारू वाग्जाल के हिसाब से तो कोई भी बौद्धिक, साहित्यिक या सांस्कृतिक उपक्रम ऐय्याशी ही नहीं, मानव-द्रोह है। क्या यह हर बौद्धिक विचार-विमर्श को खारिज कर देने की साजिश नहीं है?
हमें इस माहौल में बैठकर सोचना है कि किसी भी विचार-विमर्श की उपयोगिता या जरूरत ही क्यों है? जब तक सारी दुनिया में अमन-चैन न हो जाए, तब तक क्या सारे वैचारिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक कार्यक्रम तालिबानी सख्ती से बंद कर दिये जाने चाहिए? वैसे शायद उन्हें याद दिलाना जरूरी है कि शास्त्रार्थ की परंपरा हमारे यहां बहुत पुरानी है, जहां विभिन्न विश्वासों और धर्मों के लोग खुलकर एक ही मंच पर अपने अपने पक्ष रखते थे। ईसाइयों और मुसलमानों से आर्य समाजियों के शास्त्रार्थ दूसरे महायुद्ध से पहले तक चलते रहे हैं।
बहरहाल, इन अफवाहों से अरुंधती राय जैसों को जो असमंजस हुआ, उसके लिए हमें खेद है।
(राजेंद्र यादव। हिंदी साहित्य की जीवित किंवदंती। युवा तेवर वाले वृद्ध साहित्यकार, संपादक। पिछले 25 सालों से हंस के कमांडर। अब तक सात नॉविल लिखे। छह कहानी संग्रहों में पचास से अधिक कहानियां संकलित। 1960 में ज्ञानपीठ से आवाज तेरी है नाम से कविता संग्रह। उनसे दरियागंज में अंसारी रोड की दो नंबर गली में रोज संपर्क किया जा सकता हैं।)










Thanks a ton, Avinash, for sharing this. This is quite an interesting tussle. I somehow find myself in total agreement with Rajendra Saheb, you rightly call him, commander of Hans for the past quarter century, over the childish controversy. Nevertheless, Hans thrives on Rajendra Saheb’s insatiable desire to provoke and propagate both myth and reality. He is a gamechanger in Indian literature, and whoever disagrees with him, has all the right to disagree.
राजेन्द्र जी, आपसे एक छोटी असहमति है. आपने शीर्षक रखा है: वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति। इससे यह कहाँ साबित होता है कि आप इस क्रूर वाक्य को कठघरे मे खड़ा कर रहे है? ना ही आपने शीर्षक में कोई विस्यमादिबोधक छोड़ा है और ना ही कोई प्रश्नवाची? इससे यह जरा भी साबित नही होता कि आप किस पक्ष में खड़े हैं. बहस जरूरी है पर सवाल यह है कि बहस करने से पहले ही आप अपना पक्ष तय नही करेगे? किसके पक्ष में फिर बात होगी? बहस का विषय स्पष्ट होना चाहिये.
“बुद्धिजीवियों का यह कौन सा आचरण है कि वे दूसरे पक्ष की बात सुनेंगे ही नहीं। यह विचारों का लोकतंत्र नहीं, बौद्धिक तानाशाही है।” इस बौद्धिक तानाशाही को पिछले 25 सालों से हंस में आप चला तो रहे हैं। अब जब आपकी इस बौद्धिक तानाशाही पर चोट हो रही है, तो आपको दर्द हो रहा है।
राजेंद्र जी, मैं हँस बहुत दिनों से पढ़ता रहा हूँ. आपके सम्पादकीय मुझे विचारों के तौर पर बहुत प्रभावित करते रहे हैं. मैं सहमत हूँ कि लोकतंत्र में बहस और विमर्श का रास्ता हमेशा खुला रहना चाहिए. अरुंधती जी को अब भी आना चाहिए. और बोलना चाहिए.
लोकतंत्र और शास्त्रार्थ की बात आपके मुख से बुरी तो नहीं लगती। पर सुनने में यह भी आ रहा है कि परिवर्तन की घनघोर कामना रखने वालों की नाक के ठीक नीचे उनके दफ्तर में लोकतंत्र कुछ इस तरह लहराने लगा है कि वहां निरंतर छपते रहने को परिवर्तन समझने वाले लोग अपने लेखों के विरोध में लिखे गए लेखों को अंदर-बाहर से गायब करवा देने और पक्ष में लिखे को स्थान दिलाने की हैसियत रखने लगे हैं। शास्त्रार्थ की यह अत्यंत महान विधा निकल कर आयी लगती है। ‘हंस’ में यह पहले भी होता रहा है या बिलकुल नया और मौलिक ‘विद्रोह’ है, यह तो जानकारियां रखने वाले जानते होंगे या आप जानते होंगे। अगर आपके पास वक्त नहीं है तो तहलका के मित्रों से कहकर छोटा-मोटा स्टिंग करा लें। उसके बाद आप अगर इसे अफ़वाह कहेंगे तो सबको मानना ही पड़ेगा कि अफ़वाह है। अन्यथा पत्रिका में शास्त्रार्थ से बचना और गोष्टी में उसके पक्ष में आवाज़ उठाना अजीब सा नहीं लगेगा ?
रामभरोसे
राजेंद्र जी दूसरे पक्ष का सुनना और उसके साथ संवाद बनाना चाहते हैं, यह स्वागतयोग्य है और हिसा को रोकने के लिए यह जरूरी भी है। इसके लिए वाल्टेयर का उद्धरण देने की जरूरत नहीं है। लेकिन राजेंद्र जी, कॉरपोरेट-सरकारी हिंसा बनाम नक्सली हिंसा के विवाद में विश्वरंजन का तो कोई पक्ष ही नहीं है। वे एक सरकारी कर्मचारी हैं और अपने काम के लिए हम महीने वेतन लेते हैं। इस नाते वे छत्तीसगढ़ सरकार के आदेशों का पालन कर रहे हैं, जो सरकारी पद पर रहते हुए उन्हें करना भी चाहिए।
कल को छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार आ जाए और आरएसएस को प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया जाए (जैसा इमरजेंसी में हुआ था) तो विश्वरंजन या कोई और डीजीपी रमन सिंह को गिरफ्तार करने के लिए ऑपरेशन चला रहा होगा। इस पूरे विवाद में डीजीपी विश्वरंजन या किसी और सिपाही का अपना कोई वैचारिक पक्ष नहीं है।
राजेंद्र जी सत्ता पक्ष के किसी राजनीतिक प्रतिनिधि या वैचारिक प्रतिनिधि को बहस के लिए बुलाते, तो शायद यह विवाद न होता। संवाद का विरोध कौन कर रहा है? लेकिन सवाल है कि संवाद किसके साथ?
तब तो और भी बढ़िया है दिलीप जी। फिर तो विश्व रंजन एक कवि हैं और फिराक गोरखपुरी के नाती भी हैं। इस नाते उन्हें बुलाया जाना चाहिए।
आपकी मूर्खता की हद है… आप डीजीपी के पद को सिर्फ नौकरी बजाने की हद में देख रहे हैं। मैं देख रहा हूं कि वो नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई की रणनीति का मास्टर माइंड भी है। उसके पास पर व्यवस्था के स्टैंड को सही ठहराने वाले आर्ग्युमेंट भी हैं। आपको यकीन न हो, तो रविवार का ये लिंक देखें : http://raviwar.com/baatcheet/B29_interview-cg-dgp-vishwaranjan-alokputul.shtml
आपकी बात ही मान लें, तब तो आलोक पुतुल को ये इंटरव्यू चिदंबरम से लेना चाहिए, विश्व रंजन से नहीं।
वैसे एक और आयडिया है। चाल्र्स शोभराज को किसी समाजसेवी या बुद्धिजीवी का मुखौटा लगाकर अरुंधति के सामने खड़ा कर दिया जाए। सुना है कई भाषाएं जानता है। और अपनी बात चाहे बिलकुल ग़लत हो पर अड़ा रहता है उसपर। अपनी ढिठाई को आत्मविश्वास और वाक्पटुता को तर्क कहता है।
अच्छा आयडिया है।
आदरणीय आकाश गंभीर जी,
यकीन मानिए, और आपके अपने अनुभव भी यही बताएंगे कि किसी और समय छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनती है और अगर वह संघ के खिलाफ कार्रवाई करती है, तो भी किसी और डीजीपी या विश्वरंजन के पास इसके लिए तर्क जरूर होंगे।
बंगाल में संभावित सत्ता परिवर्तन के बाद वहां का डीजीपी (हो सकता है कि भूपिंदर सिंह अपने पद पर बने रहें) तृणमूल की सरकार के कहने पर काम करेगा, उसकी नीतियों को सही ठहराएगा, जो उसे करना भी चाहिए। किसी हवलदार या सिपाही को भी यही करना चाहिए। भूपिंदर सिंह कविता नहीं लिखते, लेकिन तर्क तो उनके पास भी हैं।
सत्ता का पक्ष जरूर सामने आए, लेकिन यह पक्ष उसकी ओर से आए, जिसका कि वह पक्ष है। विश्वरंजन या भूपिंदर सिंह को तत्कालीन सरकार का वैचारिक प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता। वे खुद भी अपने लिए यह भूमिका स्वीकार नहीं करेंगे, क्योंकि लोकतंत्र में सरकार बदलने के साथ अफसरों से उम्मीद की जाती है कि वे अपने विचार बदल लें।
सच ….किसी भी विषय पर संवाद या बहस तभी संभव है जब दोनो पक्ष उपस्थित हों .लेकिन अब इस विवाद को हवा देने की ज़रूरत नहीं है….
सुना है, मिर्चपुर में दलित विकलांग लड़की सुमन को घर में बंद करके जला कर मारने वालों में से एक व्यक्ति का कविता संग्रह छपकर आने वाला है। ये निरंतर विरल होती मानवीय संवेदनाओं से ओत प्रोत कविताएं हैं जिनमें जीवन का अनछुआ यथार्थ दर्ज है। पवित्र अंत:करण से लिखी गई ये मार्मिक कविताएं भक्ति काल और रीति काल की गौरवशाली पंरपराओं का उत्तर आधुनिक पाठ हैं। दूसरी और तीसरी परंपरा की खोज में ये कविताएं मील का पत्थर साबित होंगी। नामवर सिंह चाहें तो कह सकते हैं कि वर्तमान समय की ये सबसे महत्वपूर्ण कविताएं हैं और कविता के नए प्रतिमान गढ़ती हैं।
दिलीप जी, आपको बताने का कोई तुक नहीं बनता कि जो कुछ दूसरे हमारे साथ करते हैं अंततः वे भी हमारे ही अनुभव बनते हैं और उनसे न सीखना शायद मूर्खता ही होती है। ठग का कोई पक्ष नहीं होता। वह निरपेक्ष भाव से सबको ठगता है। और स्वतंत्र और निष्पक्ष व्यक्ति का भी कोई पक्ष नहीं होता। मगर इनमें फ़र्क़ वही कर सकता है जो पक्षधरता में अंधा न हुआ जा रहा हो। बाक़ी आपके अनुभव हैं, आगे और भी होंगे। फ़िलहाल आपके पक्ष से तो मुझे कोई एतराज है भी नहीं। मुझे तो एतराज़ वहां होता है जहां तलवार घोंपने पर आमादा शख्स मौका निकल जाने या माहौल बदल जाने पर चाकू का विरोध शुरु कर देता है। मैं आपके पक्ष में यहां से हटता हूँ। अब भी कोई कमेंट आए तो यकीन मानिएगा कि कोई और ही खेल खेल रहा है।
बहुत बढ़िया जवाब राजेन्द्र जी! मोहल्ला पर हल्ला करने वाले कुछ सीख जाएँ तो ठीक है . मंडल जी सामने आकर बोलते भी हैं क्या? ख़ुशी हुई जान कर. हा हा हा.
माननीय राजेंद्र जी,
यह भी हो सकता है कि बुकर पुरस्कार अरुंधती राय (जो कि पूंजीवादी देश से मिला था, गांधीवादी विचारधारा का समर्थन किया था) को डीजीपी विश्व रंजन से अपनी पोट्टी खुलने का भय सता रहा हो. वह यह नहीं समझ पा रही हैं कि यदि उन्होंने कुछ कड़वी सच्चाई बता दी या कुछ इस तरह के तर्क प्रस्तुत कर दिये, जिनका जवाब उनके पास न हो तो उनकी दुकानदारी का क्या होगा. यदि उनके पास मजबूत तर्क व कारण होते तो वह जरूर आतीं और डीजीपी विश्व रंजन की करतूतों की पोल खोलती. उनका विरोध करतीं, पर उन्होंने ऎसा नहीं किया. दुखद बात है. जो लोग बार-बार राजेंद्र की दुकानदारी की बात करते रहते हैं, वे लोग अरुंधती राय की दुकानदारी के बारे में भी कुछ कहें. वह भी कौन सूखी समाज सेवा कर रही हैं. समाज सेवा भी बड़े-बड़े भाषण देने से नहीं होती, कुछ समाज उत्थान के कार्य की करने पड़ते हैं. आदिवासियों के उत्थान के वे कार्य करें तो ज्यादा अच्छा रहे, वह खूनी जंग को बढ़ावा ही दे रही हैं. जिसके सफल होने की गुंजाइश नहीं है-हां खून ज्यादा बह सकता है, लेकिन अरुंधती जी के किसी सगे संबंधी का नहीं.अरुंधती जी, बुद्धिजीवी कहलवाने में आपको गर्व महसूस होता है तो व्यवहारिक भी बनें.
-कैलाश चंद चौहान, रोहिणी, दिल्ली.
राजेंद्र जी दूसरों की सुनने के लिए तैयार हैं, जान कर अचरज पर खुशी हुई ।
सवाल और बहस के लिए इस समय एक ही मुद्दा नहीं है- नक्सल समस्या के साथ कुछ दूसरे प्रश्न भी बहुत मौजूं हैं । मोहल्ला पर इतनी हाय हाय हो रही है,किसिम किसिम के विषय आते हैं,कश्मीर पर कहीं कोई चर्चा नहीं है ।
अविनाशजी सुन रहे होंगे ! शायद !
कश्मीर पर आपके हस्तक्षेप आलेख की प्रतीक्षा करूंगा आशुतोष जी…
आप कैसी बात करते हैं मिस्टर दिलीप, क्या आपको इतना भी नहीं पता कि कोई भी सत्ता जब आती है, वह अपने डीजीपी लाती है। यहां आपके “कोई विश्व रंजन” का तर्क इतना खोखला है कि उससे हवा इधर से उधर हो जा रही है। जो आपने मिर्चपुर के मसले में बात लायी है, वह भी कुतर्क है। अपनी बात को जस्टीफाई करने के लिए आप जिंदा जलाने वाले हैवान को कवि बना देंगे तो कैसे काम चलेगा। विश्व रंजन हत्यारा नहीं है, वह हत्या के विचार का विचारक-प्रचारक है। उससे बात करो, तभी वो एक्सपोज होगा। नहीं बात करोगे, वो अपना काम करता रहेगा और जिस नेता को आप उसके ऊपर मान रहे हैं – वो काला चश्मा लगा कर आपसे बात करते हुए अंदर ही अंदर मुस्कराएगा।
खैर, आपके तर्क के आधार पर ही बात करें – तो विचारहीनता के इस दौर में राजनीतिक सत्ता आती जाती रहती है – जो प्रशासनिक सत्ता बरकरार रहती है – उससे बात करो, उसे एक्सपोज करो। उसको खारिज करो, तभी बात बनेगी।
कविता करने का तो सबको हक है। कोई हैवान होगा, तो क्या कवि नहीं हो सकता? हर कवि को मानवीय होना पड़ा तब तो हो गई कविताई। कविता एक क्राफ्ट है, हुनर है। कवि होना वैसा ही है जैसे बढ़ई या लोहार होना या कसाई होना या मेहतर होना।
कविता कोई भी लिख सकता है। सबको अधिकार है। नरेंद्र मोदी को, जगदीश टाइटलर को, सज्जन कुमार को, मुतालिक को, निठारी के पंढेर को, मिर्चपुर के बांके जवानों को, खैरलांजी के हत्यारों को, शाहबुद्दीन को, रणवीर सेना के वीर जवानों को…। साहित्त्य के लोकतंत्र में हर किसी को अपनी बात कहने का अधिकार है। और फिर कविता तो मनुष्य को उदात्त बनाती है। किसी से उदात्त होने का हक छीन लेना तो अमानवीय होगा? राजेंद्र यादव ने कह ही दिया है कि शास्त्रार्थ की हमारे यहां परंपरा पुरानी है और तालीबानी सख्ती से उसे नहीं दबाया जाना चाहिए। साहित्य के लोकतंत्र में तमाम कवियों का स्वागत है।
कवि को कविता के अलावा किसी भी और कसौटी पर कसना असाहित्यिक है। कविता अपने आप में साध्य भी है और साधन भी। यह आदि भी है और अंत भी। कविता परम पुरुष है। कोई किसी की हत्या करके या हत्या का षड्यंत्र रचकर घर आए और हाथ मुंह धोकर एक बेहद संवेदनशील, मानवीय कविता लिख डाले तो इसमें आश्चर्य क्यों होना चाहिए। कोई अपनी पत्नी की पिटाई करे और महिला मुक्ति पर एक बेहतरीन कविता लिखे, तो इसमें दिक्कत क्या है?
कानों में पिघला शीशा डालने और जीभ काट लेने वाले श्लोक जिन ऋषियों ने लिखे क्या वे “बेहतर इंसान और महात्मा” नहीं रहे होंगे? नरबलि को जायज ठहराने वाले जिन “ब्राह्मणों” की चर्चा राजेंद्र यादव ने अपने संपादकीय में की है, वे ऋषि, मुनि, महात्मा भी तो मंत्र रचते थे, श्लोक लिखते थे और गाते भी थे। नरबलि करके अगर कोई महात्मा बन सकता है तो हत्यारा या बलात्कारी कवि क्यो नहीं हो सकता। अगर कवि और कविता पर इस तरह की बाधाएं लगाई जाएंगी तो साहित्य का संसार बेहद सीमित और संकुचित हो जाएगा। गोली, पोस्टर, पेशाब, विमोचन, हरम, दारोगा विवाद में आप सबने देखा कि कविता और साहित्य को जीना जरूरी नहीं होता। कविता लिखना जरूरी हो सकता है, साहित्य रचना जरूरी हो सकता है।
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rajendra ji is a wonderful man, he is great writer of our time, above all he is democrat. but sometime he behaves like anarchist. i agree what he quuoted from legendry quote of voltaire. but how it is relevent in the case of so-called dialouge between a police officer like vishvranjan v/s a great writer of our time arundhati rao. if a debate is needed it should be between home minister & the people who are on the other side on the issue.
arundhati roy is just writing those thigs which are concerned with naxals only,really not with the people of chattisgarh.naxals stoped road cunstuction in remote areas ,school buildings are coalapsed by them,childs and their parants are in fear of (andar vala).adivasis are helpless,and bound to work for naxal because they have no choice.salvajudum was a grate janandolan against naxlites.but politics murdered that .people ofchattisgarh want development,democrasy,not naxals.villagers are sleepless due to naxals.
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