यह विचारों का लोकतंत्र नहीं, बौद्धिक तानाशाही है!

♦ राजेंद्र यादव

यह हंस के अगस्‍त अंक में छपे संपादकीय का एक हिस्‍सा है। इसमें राजेंद्र यादव ने 31 जुलाई की गोष्‍ठी में अरुंधती राय बनाम विश्‍व रंजन के संदर्भ में अपनी बात रखी है। इस विषय पर जनज्‍वार नाम के एक ब्‍लॉग पर दो युवा पत्रकारों ने तीखी प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त की थी और अरुंधती से ये कंसेंट ले लिया था कि वो किसी भी कीमत पर हंस की गोष्‍ठी में नहीं जाएंगी। मोहल्‍ला लाइव में हमने दो प्रतिक्रियाएं छापी थीं। पहली प्रतिक्रिया अविनाश की थी : हंस की गोष्‍ठी नहीं भी होगी तो क्‍या फर्क पड़ जाएगा और दूसरी प्रतिक्रिया समरेंद्र की थी : अरुंधती के इस फैसले से फर्क किसको पड़ेगा नीलाभ जी! इसी संदर्भ में एक परिवर्तनकामी टोली भी राजेंद्र यादव से सफाई लेने पहुंची थी, जिसको हमने रिजेक्‍ट माल से उड़ा कर मोहल्‍ला लाइव में छापा था : परिवर्तनकामी टोली ने सार्वजनिक किया राजेंद्र जी का पक्ष। अब राजेंद्र जी की खुद की बात भी देख लें : मॉडरेटर

31 जुलाई को होने वाली हंस की गोष्‍ठी का विषय निर्धारित किया गया था : वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति। यह सूत्र नर बलि इत्‍यादि को जायज ठहराने के लिए ब्राह्मणों ने खोजा था। अर्थ था, वेद यानी सत्ता (अथॉरिटी) द्वारा अनुमोदित हिंसा हिंसा नहीं कहलाती। यह सत्ता राज्‍य की भी हो सकती है और स्‍थापित राज्‍य के खिलाफ वैचारिक प्रतिबद्धता की। सरकारी दमन और नक्‍सली संघर्ष कुछ इसी प्रकार की हिंसाएं हैं।

हंस हमेशा एक लोकतांत्रिक विमर्श में विश्‍वास करता रहा है। हमारा मानना है कि एकतरफा बौद्धिक बहस का कोई अर्थ नहीं है। वह प्रवचन होता है। जब तक प्रतिपक्ष न हो, उसे बहस का नाम देना भी गलत है। हमने अपनी गोष्ठियों में प्रतिपक्ष को बराबरी की हिस्‍सेदारी दी है। जब भारतीयता की अवधारणा पर गोष्‍ठी हुई, तो हमने बीजेपी के सिद्धांतकार शेषाद्रिचारी को भी आमंत्रित किया था। अब इस बार सोचा था कि क्‍यों न प्रतिपक्ष के लिए छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्‍व रंजन को आमंत्रित किया जाए। पक्ष की ओर से अरुंधती और अन्‍य तो होंगे ही। हंस का दफ्तर सब तरह की बहसों, नाराजगियों, शिकायतों या अन्‍य भड़ासों का खुला मंच है। वक्‍ताओं के नाम पर विचार ही हो रहा था कि यार लोग ले उड़े और पंकज विष्‍ट ने अपने समयांतर में लगभग धिक्‍कारते हुए कि हम बस्‍तर क्षेत्र के हत्‍यारे पुलिस डीजी और अरुंधती को एक ही मंच पर लाने की हिमाकत करने जा रहे हैं।

ब्‍लॉग वालों को छद्म विवादों के लिए ऐसे ही मुद्दों की तलाश रहती है। दो पत्रकारों ने इस पर लंबी बहस छेड़ दी और विश्‍व रंजन जैसे काफिर के साथ अरुंधती जैसी निरीह को एक मंच पर लाने के लिए हमारी लानत-मलामत कर डाली। दिल्‍ली में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने को आतुर नीलाभ ने भी “वंदना के इन सुरों में एक सुरा मेरा मिला लो” के भाव से एक लेख पेल डाला। इसमें उन्‍होंने पूछा कि मैं किधर हूं, यह मैंने कभी साफ नहीं किया। जो कुछ पढ़ते-सुनते न हों, उन्‍हें क्‍या जवाब दिया जाए? चाहे तो वे इस बार जुलाई 2010 के संपादकीय पर नजर डाल लें। हमारी मंशा इस ज्‍वलंत मुद्दे के अनेक पक्षों पर खुल कर बात करने की ही रही है। अगर इसे सिर्फ “सहमतों का प्रस्‍ताव पारित” करने का संवाद ही बनाना है तो बात दूसरी है। मैं मित्रों से अनुरोध करता हूं कि वे कोई दूसरा विकल्‍प बताएं। लगता है अब यह विवाद और जगहों पर भी चलेगा।

सबसे पहले तो मैं स्‍पष्‍ट कर दूं कि वक्‍ताओं के नाम तब तक चुने जा रहे थे, फाइनल नहीं थे। दूसरे यह कि बुद्धिजीवियों का यह कौन सा आचरण है कि वे दूसरे पक्ष की बात सुनेंगे ही नहीं। यह विचारों का लोकतंत्र नहीं, बौद्धिक तानाशाही है। “मैं तुम्‍हारे विचारों को एक सिरे से खारिज करता हूं, मगर मरते दम तक तुम्‍हारे ऐसा कहने के अधिकार का समर्थन करूंगा।” यह कहा-बताया जाता है लोकतंत्र के पुरोधा वॉल्‍टेयर का। दूसरे को बोलने ही न दो, यह कैसा फासीवाद है? क्‍या हमारे तर्क इतने कमजोर हैं कि “दुश्‍मन” के सामने ठहर ही नहीं पाएंगे? इस वैचारिक तानाशाही का एक कुत्सित रूप कुतर्कों का पिंजड़ा खड़ा करना भी है। आप किसी भी विषय पर बात कीजिए, वे तर्क देंगे कि जब मुंबई-पंजाब में बाढ़ ने तबाही मचा रखी हो, बस्‍तर के आदिवासियों का कत्‍लेआम जारी हो, खाप पंचायतें चुन-चुनकर युवाओं को फांसी पर लटका रही हों, किसान हजारों की संख्‍या में आत्‍महत्‍याएं कर रहे हों, तब आप एसी कमरों में बैठकर एक फालतू मुद्दे पर मगजपच्‍ची कर रहे हैं – यह भयानक देशद्रोह है और भर्त्‍सनीय है।

इस बाजारू वाग्‍जाल के हिसाब से तो कोई भी बौद्धिक, साहित्यिक या सांस्‍कृतिक उपक्रम ऐय्याशी ही नहीं, मानव-द्रोह है। क्‍या यह हर बौद्धिक विचार-विमर्श को खारिज कर देने की साजिश नहीं है?

हमें इस माहौल में बैठकर सोचना है कि किसी भी विचार-विमर्श की उपयोगिता या जरूरत ही क्‍यों है? जब तक सारी दुनिया में अमन-चैन न हो जाए, तब तक क्‍या सारे वैचारिक, सांस्‍कृतिक, साहित्यिक कार्यक्रम तालिबानी सख्‍ती से बंद कर दिये जाने चाहिए? वैसे शायद उन्‍हें याद दिलाना जरूरी है कि शास्‍त्रार्थ की परंपरा हमारे यहां बहुत पुरानी है, जहां विभिन्‍न विश्‍वासों और धर्मों के लोग खुलकर एक ही मंच पर अपने अपने पक्ष रखते थे। ईसाइयों और मुसलमानों से आर्य समाजियों के शास्‍त्रार्थ दूसरे महायुद्ध से पहले तक चलते रहे हैं।

बहरहाल, इन अफवाहों से अरुंधती राय जैसों को जो असमंजस हुआ, उसके लिए हमें खेद है।

(राजेंद्र यादव। हिंदी साहित्‍य की जीवित किंवदंती। युवा तेवर वाले वृद्ध साहित्‍यकार, संपादक। पिछले 25 सालों से हंस के कमांडर। अब तक सात नॉविल लिखे। छह कहानी संग्रहों में पचास से अधिक कहानियां संकलित। 1960 में ज्ञानपीठ से आवाज तेरी है नाम से कविता संग्रह। उनसे दर‍ियागंज में अंसारी रोड की दो नंबर गली में रोज संपर्क किया जा सकता हैं।)

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