मुखौटों के बिना मोहब्बत वाला मोहल्ला
♦ निधि सक्सेना

आजकल दोनों बड़ा साथ-साथ हो? चक्कर… हूं…?
अरे… हम बस अच्छे दोस्त हैं…
और फिर एक चर्चित टिप्पणी – एक लड़का और एक लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते…
ऐसे होता था न! अपने स्कूल, कॉलेज में? कम से कम मेरे में तो यही होता था। साथ या प्रेम के अधूरे, अपरिपक्व अंश ऐसे ही चारों ओर बिखराये और संभाले जाते थे… जैसे ब्लू फिल्म की सीडीज दिखायी और छिपायी जाती हैं, जैसे – अश्लील एसएमएस रहस्यमयी तरीकों से पढ़ाये जाते हैं।
सो, प्रेम या साथ बढ़ता-बनता भी इन्हीं चीजों की तरह था – भरपूर, रहस्यमयी… दबायी-ढंपायी चीजों की तरह। फिर मिलन भी ऐसे ही होता था – राज खुलने जैसा… अरे! ये क्या था राज जैसा? …जो स्कूल की अंडरग्राउंड पार्किंग में खुला करता था…
हालांकि कहते तो ये हैं कि फिल्मों में संदर्भ समाज से ही लिये जाते हैं… और जो कोई जमीन से ऊपर ख्वाबों के बादलों में उड़ने लगे तो कहा ये भी जाता है – बड़ा फिल्मी हो रहा है… जिंदगी फिल्म नहीं है! अब न जाने, फिल्मी दुनिया कैसी होती है। सुना है – वो भी फिल्मी ही होती है? हालांकि मुझे तो अपनी ये सोसायटी भी कुछ कम फिल्मी नहीं लगती… रियल भी शूट करेंगे, तब भी फिक्शन लगेगा… मैं एक महीना FTII में रही… जहां से कइयों का जमीनी सफर शुरू होके आसमानी में बदल गया और वो आदमी से सितारे हो गये… नसीर, ओम पुरी, जया, शबाना, मिथुन और कई…
पूना की एक पहाड़ी की तलहटी में बसा ऊंचे-नीचे रास्तों, विशालकाय पेड़ों वाले इस इंस्टीट्यूट के रास्तों पर कई सितारे चले हैं और जो चल रहे हैं, वो एक दिन सितारे बनेंगे। इंस्टीट्यूट के पाठ्यक्रम आदि के अलावा वो जगह, वहां के पेड़, इमारत, बैठने के अड्डे, कैंटीन… सब आपस में मिलकर एक माहौल बनाते हैं, जिसका पूरा असर वहां रह रहे लोगों पर पड़ता है और हमारे व्यक्तित्व का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ वो जगह बनाती है।
हर कैंपस एक खास विचार, दिशा, तरीके का प्रतिनिधित्व करता है – जैसे एएमयू, जेएनयू या जेजे में आप पाएंगे… मैं देश के खूब चर्चित महिला विद्यालय में रह चुकी हूं, तब तो इतना समझ नहीं आता था – ये क्या है, कैसी दुनिया है…? क्यों लड़कियों के समूह के समूह किसी दर्जी या धोबी के प्रेम में पड़े हैं और इकट्ठे हो तय करके उनसे कपड़े धुलवाने या सिलवाने जाती हैं… (यहां मैं ये बिलकुल नहीं कह रही कि दर्जी या धोबी से प्रेम नहीं हो सकता या नहीं किया जाना चाहिए)।
किसी का भाई हॉस्टल में आ जाए तो लडकियों के बीच ऐसे खलबली मच जाती, जैसे – मधुमक्खियों के छत्ते को किसी ने छेड़ दिया हो या घोड़ियों के अस्तबल में बम फटा हो। वो अपने खड़कते दिल के साथ, चोरी से या सामने से उसे देखने को दौड़ पड़तीं। आज मैं देखती हूं – वो कैसा तो टापू था लड़कियों का, जहां से खूब लड़कियां भागा भी करतीं। मैं पिछला एक महीना एफटीआईआई रही। पहाड़ी की तलहटी में बसा कैंपस… घने पेड़ों की छांव में… सब मिला के एक भीना-भीना रोमांटिक सा मौसम… ये भी एक रेजिडेंशियल इंस्टिट्यूट है… वहां लड़कियां हैं, लेकिन लड़के उनके लिए म्यूजियम पीस नहीं हैं। वहां लड़के भी हैं और लड़कियों को देख कर उनकी आंखे नहीं फैलतीं। एफटीआईआई में घुसते ही बायें हाथ पर एक विशाल पेड़ है। आप तो जानते ही हैं – भारत वंश के इतिहास में पेड़ों का कितना महत्त्व है। बेताल भी पेड़ पर ही रहता था… रावण हो या राम… सब तपस्या करने को पेड़ ही ढूंढते हैं। नये जमाने में आशिक भी पेड़ ढूंढ़ते हैं (दिल्ली का लोधी गार्डेन देखें… प्यार के इतिहास में वहां के पेड़ों को गोल्ड मेडल दिया जाएगा)… वर भी पेड़ों के मुहाने ही पाये जाते हैं। मेनका हों या गौतम बुद्ध… सब का काम पेड़ के ही नीचे बनता है, सो वहां उस विशालकाय पेड़ को कहा जाता है – विजडम ट्री। जहां ऋत्विक दा अपने विद्यार्थियों से बात किया करते थे। अब भी उसके नीचे दिन में तमाम ज्ञान की बातें होतीं… सभी चर्चाएं आदि और रात को भरपूर अज्ञान की भी।
शराब की नदी भी वहीं से बहना शुरू होती, लेकिन मैंने उस पेड़ को कभी प्रेमियों के घोंसले, बल्कि तंबू में तब्दील होते हुए नहीं पाया, जबकि अधिकतर यूनिवर्सिटीज में इस तरह के पेड़ प्रेमी रिजर्व करना शुरू कर देते हैं।
न, वहां से कभी कोई नहीं भागा, वहां टॉयलेट्स की दीवारें भी चकाचक थीं… कोई शील-अश्लील संदेश जानने वाले या अनजान के लिए नहीं… एक अलग बात थी – सेकेंड इयर में आते ही आपको अलग कमरा मिल जाता है, जहां आप चाहें तो किसी के साथ, चाहे जिसके भी साथ या अकेले रह रकते हैं। यूं, हमारे तो को-एड स्कूल में भी लड़कियों और लड़कों के बैठने की अलग-अलग पालियां थीं और दोनों के बीच खिंची लक्ष्मण रेखा पार करते ही वहां के संस्कारित समाज में आग लग जाती थी, लेकिन एफटीआईआई में गर्ल्स हॉस्टल और ब्वायज हॉस्टल जैसी सीमाएं इतनी कांटेदार… करंटदार नहीं हैं। आप एक ही हॉस्टल में, हॉस्टल के एक ही कमरे में भी रह सकते हैं। जिसको जिसका साथ चाहिए, वो बहुत सहज, बल्कि मामूली बात की तरह मिलता है, कोई मुद्दा नहीं बनता… तो जिसको दिल के गुब्बार जहां निकालने हैं, ठीक वहीं निकलते हैं… बेवजह दीवारें मैली नहीं होतीं, न कोई बेवजह शिकार बनता है।
वहां प्रेम की जगह नहीं तलाशनी पड़ती, प्रेम करना और पाना इतना आसान है कि प्रेम न तो किसी अजूबे की तरह जांचा जाता है और उससे भी बड़ी बात कि दोस्ती और प्रेम का फर्क बेहद साफ-साफ महसूस हो पाता है। अब एक उम्र होने पर प्रेम में तो पड़ना ही पड़ता है, जो पहले उपलब्ध है – वही प्रेम पात्र, लेकिन यहां सब उपलब्ध है। आप चुनिए, क्या चाहते हैं… आमतौर पर अनुपलब्धता का आकर्षण बहुत जल्दी से प्यार में डाल देता है। जो पहले मिल गया थोड़ा करीब आ गया, बातचीत हुई, थोडा हंस बोल लिये तो लो प्यार हो गया… और जल्दी से आई लव यू भी कह दिया, वाह वाह क्या बात है।
ये जो आई लव यू है, एक सहारे की तरह काम आता है या बहाने की तरह, जैसे मशीन खोलने का औजार पाना या पेचकस हो… और फिर जो एक बार इजहार इकरार हो गया तो मशीनें खुलती भी हैं। यहां मैं उन लोगो की बात ही नहीं कर रही, जो कुंठाओं के चलते कुछ भी कर सकते हैं। सवाल उन तथाकथित नैतिक या अतिनैतिक और भावुक लोगों का है, जिन्हें खुद नहीं पता कि वे प्यार के नाम पर दरअसल कहां जुड़े हैं और प्यार होता क्या है। प्रेम संबंधों में शक, अविश्वास, एक दूसरे को समझना नहीं, अपमानित करना ये सब तो अपने भारत में आम है… बल्कि दिल दिल की यही कहानी है। प्रेमी प्रेमिका अक्सर प्रेम से ज्यादा लड़ते हुए पाये जाते हैं – तुमने उसकी तरफ देखा क्यों? फलाना से बात क्यों की? मुस्कुरा कर क्यों की? इतनी देर क्या बात की? काम से काम क्यों नहीं रखते? किससे मिलने गयी थी, क्यों कोई काम था? ये किसलिए पहना?
- अरे ये क्या है भई?
- मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं या करती हूं इसलिए तुम्हें किसी और के साथ देख नहीं सकता / सकती…
आप दिल्ली, मुंबई को परे रख दें, हर जगह ऐसे सीन किसी न किसी पर गुजरते मिल जाएंगे। अरे भई, आपका प्रेमी या प्रेमिका शरीर से बढ़ कर शरीर के अलावा भी कुछ है। उसकी नजरों की, हंसी की, कपड़ों की इतनी फिक्र आपने की, उसके मन और मस्तिष्क का क्या किया? क्या ये अविश्वास दिल में कहीं अपमान की कालिख नहीं भरते होंगे? अंदर ही अंदर बंधन को कमजोर नहीं करते होंगे? और ऐसे रिश्ते में कौन दिल की सबसे संवेदनशील बातें बेझिजक बांट पाएगा? उलझनें समझ पाएगा? प्यार तो वो है, वहां है जहां दिल की हर बात बिन सोचे बिन तोले जबान पर लायी जा सके लेकिन वहीं सब से ज्यादा डर होता है, अरे उसे ये न पता लग जाए, उसे बता नहीं सकती या सकता। परस्पर साधारण सी समझ और सहानुभूति भी नहीं होती। ये प्यार होता है या कचहेरी जहां आरोप लगाये जाते हैं, सबूत मांगे जाते हैं, गुहार होती है। मान लीजिए जो गर आपके प्रेमी ने आपका दिल दुखाया तब आप क्या कर रहे हैं? आप तो उसकी परवाह कीजिए, प्रेम की खातिर। लेकिन ऐसा होता नहीं है… जिन वजहों पर ये प्रेम टिका है, जाहिर है सारी चिंता और शिकायत उन्हीं को लेकर होती है और उन्हीं की बिना पर लोग अलग होते हैं।
अविश्वास, शक लगातार बेइज्जती और घुटन का नाम यहां प्यार है। प्यार होता नहीं, जो सर्वाइव कर पाये और जो होता है उसका बोरिया बिस्तर जल्द गोल हो जाता है। और एक समझदार सरल साथ वही दूर की चीज रह जाती है। मुझे लगता है अब स्त्री पुरुष के किसी भी तरह के रिश्ते को सहज लिया जाये ताकि प्रेम कम से कम भौतिक चिंताओं से उठ कर या अलावा भी हो सके। शरीर की चाह, खोज और चिंता से आगे मानसिक विकास, समझ और दिल की उड़ान का भी साथी बन सके।
FTII जैसे माहौल में आप दोस्ती और प्रेम का फर्क या सीमाएं ठीक-ठीक जान सकते हैं। स्त्री-पुरुष की सहज मित्रों सी दोस्ती की जगह बनती है। उनके शरीर और व्यवहार को लेकर शारीरिक-मानसिक कुंठाएं नहीं रहतीं। आप किसी से मित्रता उसके लिंग से ऊपर बढ़कर कर सकते हैं, क्योंकि लिंग का वहां कोई सवाल बचा नहीं, जो हर किसी से पूछा जाए। शायद इसीलिए पचास साल में अब तक एफटीआईआई में एक भी बलात्कार नहीं हुआ। आप चाहे कैसे, चाहे किसके साथ घूमें, कोई परवाह नहीं करेगा। सुना है… एफटीआईआई में भी ये माहौल मशहूर मलयाली निर्देशक जॉन अब्राहम के पढ़ते वक्त शुरू हुआ… यूं भी फिल्म में हों या जिंदगी में वो बेहद अनार्की व्यक्ति माने जाते रहे।
हां! कोई कह सकता है कि वहां जाके युवा बिगड़ सकते हैं… अरे जो कहीं जाके बदलता है, वो दरअसल भीतर से होता वही है… बस मौके की तलाश में होता है। तो अच्छा है न, जो जैसा है, वैसे रह सके। क्या जरूरत है – आधा जमीन के अंदर रहने की… दस मुखौटे रखने की। क्या ये अच्छा नहीं कि दिल और शक्ल में रिश्ता बना रहे। क्या जरूरी है आंख की शर्म का बहाना किया जाए?
ये कैसी शालीनता है? नैतिकता एक पर्दा भर है… जिसके पीछे का खेल सामने के खेल से एकदम अलग है। परदे के पीछे की जो बात करता है, उसे दुनिया बदतमीज कहती है और खिलाड़ी खेलते रहते हैं… मोहरे बिछते रहते हैं। जहां हर ओर यौन हिंसा की स्थायी उपस्थिति है… वहां क्या छिपा है और क्या शर्म और बेशर्मी से परे छिपाना चाहिए?
जिन मुद्दों पर सहज बात होती है वे सरल हो जाते हैं। जरूरी है कि स्त्री पुरुष के बीच गिरा पर्दा उठाया जाए। इसे अब और रहस्य न रखा जाए। प्रेम, आकर्षण या साथ कोई बुरी बात नहीं, अजूबा नहीं। बाजार तक दोनों विषयों पर सोच रहा है या बेच रहा है… एक डेओ का विज्ञापन आकर्षण बेचता है और वो बिकता भी है, एक क्रीम प्रेम भुनाती है और वो भुनता भी है और खरीदार कौन है? वो भी हम ही और हम ही हैं जो हल्ला भी करते हैं। लेकिन अगर बाजार दोनों ही विषयों के इस्तेमाल में सफल है, तो जाहिर है मौजूद भी दोनों ही हैं। स्त्री-पुरुष संबंध प्राकृतिक हैं… अरे बाबा प्रेम ही नहीं, आकर्षण भी प्राकृतिक है। उसका भी अपना सम्मान और जगह है। और दोनों ही चीजें जब समाज में हैं, तो उन्हें उसी गरिमा से स्वीकार भी किया जाए। उनके अपने-अपने, अलग-अलग मूल्यों और स्थानों पर। हां, वहां एक स्त्री परेशान थी – इनके रिश्ते का भविष्य क्या है? पर भविष्य किस रिश्ते का, क्या होता है आप अपने आप से पूछिए?
मैं यहां बात FTII की या किसी खास जगह की नहीं करना चाहती, मुद्दा ये है कि स्त्री-पुरुष प्रजेंस को अब सहज लिया ही जाए। विक्टोरियन मोरैलटीज के मेकअप से ढंके अपने मन में जो झुर्रियां पड़ रही हैं, उनका सच में इलाज किया जाए।
(निधि सक्सेना। दिल्ली में जन्म। राजस्थान स्कूल ऑफ आट्र्स जयपुर, वनस्थली, भारतीय विद्या भवन, फ़िल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट पूना वगैरह से कला-पत्रकारिता-टीवी की पढ़ाई-लिखाई। फ़िलहाल, जयपुर में निवास। कम उम्र की समझदार और मौलिक रचनाकार हैं। स्कल्पचरिस्ट और पेंटर होने की वजह से कला की परख तो उन्हें है ही, वे दूरदर्शन-नेशनल के कला परिक्रमा कार्यक्रम से भी जुड़ी रही हैं। उनकी कलाकृतियों का बहु-बार प्रदर्शन हुआ है। नारी-विमर्श की पैरोकार निधि डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में बनाती हैं और फ़िलहाल जयपुर दूरदर्शन के लिए धारावाहिक राग रेगिस्तानी का स्वतंत्र निर्माण, लेखन और निर्देशन कर रही हैं। निधि हिंदी की महत्वपूर्ण ब्लॉगर भी हैं। उनके ब्लॉग हैं – इस मोड़ से और इंतिफादा)









वाह..। बस यही शब्द सहज रूप से निकला है मन से यह पोस्ट पढ़कर । .. एक लम्बे अरसे बाद.. बल्कि सच ये है कि पहली बार इतने सहज शब्दों में प्रेम और आकर्षण के भेद को पढ़ा । सौ आना सच बात… बस जरूरत है कि सब इसे इसी सहजता से स्वीकार करें…
बढ़िया पोस्ट…!
बेहतरीन..
Sundar……….
सटीक लिखा है…आपका प्रेमी या प्रेमिका शरीर से बढ़ कर शरीर के अलावा भी कुछ है। उसकी नजरों की, हंसी की, कपड़ों की इतनी फिक्र आपने की, उसके मन और मस्तिष्क का क्या किया?
khule dil aur dimag se ki gai bebak tipni lajwab hai.
यकीनन बेहतरीन पोस्ट।
बातें सही हैं लेकिन FTII जो उन्मुक्तता देता है, वह आज भारत के किसी भी आधुनिक महानगर के स्वस्थ कॉलेज में पाई जा सकती है. FTII न तो उसका अगुआ है और न ही उनमें सबसे अच्छा कहा जा सकता है. वहां शारीरिक कुंठाओं के लिए जगह नहीं है, लेकिन एक अति-अनिश्चित करियर और बाकी दुनिया से ऊपर की किसी दुनिया में रहने का अस्थायी भ्रम वहां अलग तरह की निराशाओं को जन्म देता है. आप नहीं कह सकती कि लड़के लड़की का साथ रहना या लड़कियों की लड़कों के समूह के बीच बिना अतिरिक्त ध्यान खींचे अनायास मां-बहन की गाली देने की आजादी सारी कुंठाओं को निकाल फेंकती है.
क्या वहां की कोई frustration भी एक वजह नहीं है कि आपको वहां ड्रग्स बहुत आसानी से मिल जाएगी?
कुंठाएं इसीलिये हैं हमारे समाज में क्योंकि नैसर्गिकता को अस्वाभाविक मान लिया जाता है. बहित अच्छा लेख है कुछ लाइनें तो बहुत सटीक लगीं…
…मुझे लगता है अब स्त्री पुरुष के किसी भी तरह के रिश्ते को सहज लिया जाये ताकि प्रेम कम से कम भौतिक चिंताओं से उठ कर या अलावा भी हो सके। शरीर की चाह, खोज और चिंता से आगे मानसिक विकास, समझ और दिल की उड़ान का भी साथी बन सके.
…अरे जो कहीं जाके बदलता है, वो दरअसल भीतर से होता वही है… बस मौके की तलाश में होता है। तो अच्छा है न, जो जैसा है, वैसे रह सके। क्या जरूरत है – आधा जमीन के अंदर रहने की… दस मुखौटे रखने की।
…इनके रिश्ते का भविष्य क्या है? पर भविष्य किस रिश्ते का, क्या होता है आप अपने आप से पूछिए?
निधि, बहुत सी बातें जो मैं सोचता था.. सोचता हूँ. तुमने कह दीं. हाँ मेरे लिए शायद वो नई दुनिया ’एफ़ टी आई आई’ नहीं कोई और रही. वो ’डी यू’ होगी.. वो ’जे एन यू’ होगी. मेरे लिए वो ’मेरे विश्वविद्यालय’ होंगे शायद. और जैसा गौरव ने कहा, “FTII जो उन्मुक्तता देता है, वह आज भारत के किसी भी आधुनिक महानगर के स्वस्थ कॉलेज में पाई जा सकती है.” और तुमने भी तो ऊपर वही लिखा है, “मैं यहां बात FTII की या किसी खास जगह की नहीं करना चाहती.” हाँ थोड़ा ’एफ़ टी आई आई’ मोह है, लेकिन उतना तो चलता है. असल चीज़ बात है जो तुमने कही और बिलकुल सही मौके, सही कही.
लेकिन हाँ, हम दोनों के लिए इस तमाम बहस का टेक ऑफ़ पॉइंट एक है. उसी “देश के चर्चित महिला विद्यालय” की वो नवीं क्लास. तुम दो महीना वहाँ रही हो, मैं सत्रह साल. वो आज भी मेरा ’घर’ है. और सच बात है कि सिर्फ़ दो महीने ही ये समझाने को काफ़ी होते हैं कि ये लड़कियों की अलग शिक्षा का ’उच्च विचार’ कितना भद्दा मज़ाक है खुद उनके साथ. हम नए शहरों में आकर, नए रिश्तों में अपनी ज़िन्दगियाँ तलाश रहे हैं. जैसे हम खाना खाते हैं, जैसे हम दोस्तियाँ बनाते हैं, वैसे ही हम प्यार करते हैं. अभी कल ही मैं ये लिख रहा था कहीं कि इम्तियाज़ हमारे दौर के फ़िल्मकार हैं जिनकी फ़िल्मों में मुझे अपना अक़्स दिखता है. उनका प्रेम सहज प्रेम है. जो कई बार तो पहचान में न आने लायक तक आम हो जाता है. शायद हम उस तरह से इसे बाँट भी न पाएँ.. दोस्तियाँ.. प्यार.. साथ..
बस एक ही बात है. कभी हम अपनी बहनों से भी उसी तरह का खुला दोस्ती का रिश्ता बना पाएं जैसा अब हम अपनी महिला मित्रों के साथ निभा पाए हैं. हम लड़कों के लिए अब यही अगली चुनौती है.
बहुत शुक्रिया. तुमने मेरी बातें कह दीं. वो भी इतने प्यारे तरीके से.
आपकी बात से सहमत हु . जिस बिना पर प्यार में वफा और धोके की बात होती है ,और वह ही व्यक्ति उस दोरान दिमाग और दिल जिस स्तर पर हरास कर रहा होता है.हमे जल्द समझ जाना चाहिए ये प्रेम नही सिर्फ शारीरिक आकर्षण है . यंहा बात शायद रिश्ते को ठीक ठीक पहचानने की करी गयी है
Yes you are right i have no word to show my feeling after read your blog.
Gorav bharat me kitne mahanagar hain or vnha kitne swasth colleges hain?
Mai yon sandesho se bhare toilets vale college me hi padhi or un colleges ki halat lgatar badtar hi ho rhi hai .
Drugs humare us co. me tb bhi the or ab badh rahe hain,tb chipe hue the ab khul rahe hain.lekin baat ye nhi hai ki aap peete hain,mudda hai ki peene ke bad aap kya karte hain?
Gaaliyon se jitni bhyank muthbhed aapki kisi sarkari daftar me hogi utni or khi bhi nhi hone vali ..vnha bina baat bhi hr shbd ke baad galiya di jaati hain .kher galiya to humare ynha shadi byah me gayi bhi jati hain.
Frustration or anishchitta knha pr nhi hai?
Humara college us vkt Jaipur ka ek matr co. college tha.hum tb or aaj tk vnha ke purush shpathiyo se dosti nhi kr paye.or kai ,kai trh ki cheese thi…bhades ek dm.
Main bs itna kh rahi hun ki jb aap ek sath rhte hain to dher sari vishesh upri cheeze mamuli ho jati hain or darasl kya hai asal kya hai pehchan pate hain.nhi to pahli uljhan milna or samvaad kr pane me hi bahut din beet chuke hote hain.
Ye sb sawal ab tk hain gorav ,”tum usse is vkt itni lambi hans hans kr baat kr kyu rahe the?,mujhe accha nhi lga”hr jgh hain .
Hello Mihir!hansi aati hai na yaad karke?
Ladkiyo ke liye bhi to yhi chunoti hai,bs maa se gupchup gupchup nhi mai papa or bhai se bhi sari bate krna chehati hun.agar bahut pahle …shuru se hum sb sath beth kr hanste hanste sari baate kiya karte to dher sari dikkete nhi hoti.
nidhi,maine hamesha tumhe padha h kyoki tumme kisi bhi bat ko aasan or saral sabdo se bayan krne ki kala h.
or tumne apne artical me trees ko jo vistaar diya h wo to mujhe bhut hi mazedaar laga.
i wish tum aise hi likhti rho….
bahut badhiya…
ur article is naked truth that society need to talk about & accept. i can see the world around me, the relationships around me in ur article.
its simple reality we all need to grow in this matter.
except all this the one thing that i observed there is very less respect for women here while we boast of our dignified past. People see women as flesh more than a complete creature.
उपदेश अच्छा है, मगर छोटा भी हो सकता था….इतना जस्टिफाई करने की क्या ज़रूरत थी….
ये प्रश्न साथियों गौरव मिहिर और निधि से है: उनमुक्क्ता की कोई हद जो आपसी रिश्ते को तार तार कर दे उसकी भी कोई हद होनी चाहिये या नही? नाम ना लेना एक मजबूरी माना जाये तो अभी कुछ दिनो पहले एक युवा को उसकी महिला मित्र ने फेसबुक पर दोस्त जो कि मेल फीमेल दोनो थे, बनाने केलिये बहुत डाँटा और इतना डॉटा कि उनमे बात चीत ही बन्द हो गई. वो साथी ने फेसबुक पर आना छोड़ दिया, दोस्तो को फोन करना छोड़ दिया और अब वही महिला अपने होने वाले बॉस को फेसबुक पर जोड़े तो क्या कहेंगे? यह उनमुक्त्ता बेवफाई और धोखेबाजी का आड़ भी बन रही है.
garima ji aap unmuktta ko kyu dosh de rhi hain?agar vyakti sahi hai to moka milne pr bhi galat nhi kerega.moka milna to ek pariksha jaisa hua na?kya humare samaj ki ghughat ke piche dhaki mahilay bahut paak pavitr hoti hain? or galat kya hai sahi kya is pr to lambi baat cheet hai.
अच्छा लगा। बहुत अच्छा। निधि ने जबरदस्त चित्र खींचा है। साथ में सवाल भी। आज आवश्यकता है कि धर्म से अलग नैतिकता के स्वरूप की पहचान करने और रचने की और शरीर से अलग प्रेम के स्वरूप को जानने और अनुभव करने की। फिलहाल तो शरीर पर ही प्रेम पलता है। प्रेम बावजूद इसके कितने लोग इसे सहजतापूर्वक स्वीकार करते हैं? इक्कीसवीं सदी में मनुष्य को गहरे प्रेम का अहसास होगा। इसकी पूरी-पूरी संभावना है।
bhaut badia congrats n keep it up
duniya ke asli chehre ko samne la diya aapne,bahut achcha…………….
दिल की उड़ान, वाह !! I like it , I like it
बेबाक, असल और सुन्दर..
being a part of society,,1०० तरह के लोग है मेरे आस-पास, unki 2०० आँखे, मै उनमे से 1 शायद..
किसी को कपडे का sense दिखता है , किसी को कपडे पर उभार, और किसी को उसके पीछे का मन,,thoughts and vision 2 c d scenario !! u made us 2 think..
- “हां कोई कह सकता है”
- ” ये कैसी शालीनता ”
- ” अरे ये क्या है भाई ” बहुत अच्छे लगे..
keep writing like a braveheart
मुझे यह कहने मे कोई गुरेज नही कि यह लेख असुन्तलित व बिखरे विचारों के अतरिक्त कुछ नही, लेखिका क्या कहना चाहती है शायद उन्हे खुद पता नही और अगर पता है तो वह आत्मा, मन, और शरीर में विभेद और समन्वय दोनों को नही देख पा रही है, प्रेम को इस तरह से परिभाषित करना या कहना …उन्मुक्त्ता और प्रगतिशील वाद की जो बात कही जा रही है वह यकीनन न तो प्रेम के पक्ष में है और न ही नारी के..यह यकीनन भटके हुए लोगों को तृप्ति पाने के लिए प्रदर्शित झुझलाहट है..जिसे समाज के सामने प्रदर्शित किया जा रहा है..परदा कहा जरूरी है, और उन्मुक्त्तता कहां…..इसे समझा जाय….एक बेतरतीब लेख…..
mein is lekh par comment nhi karna chahta tha. par dekha jab itne saare mahanubhavao ke comment aa rahe hain to majboran karna pada. iska ek karan aur bhi tha aakhir nidhi ke lekh par 24 comment aa gaye jabki om thanvi aur mihir pandya,ya phir rajsthan patrika ke patrakar ke lekh par in logo ke comment kyo dekhne ko nhi mile.
aisa nhi hai ki nidhi ne jo likha woh pahli baar kishi ne likha aur comment dene wale logo ne bhi pahli baar padha. Lekin hum sabbit kya karna chahte hain yeh kud ko bhi nhi maloom hota hain.
lekin mera matlab saaf hain ki kya aap khud ko dhoka nhi dete hain.
waah! nidhi tumne dil ki baat keh di. bahut hi umda
Navin Bhojpuria निधि जी सादर नमस्कार
मै अनिरुद्ध भईया को धन्यवाद देना चाहता हुँ कि इस सम सामयिक और यथार्थ से भरे लेख से हम लोगो का परिचय कराया ।
निधि जी हम आपके लेख के अंत मे पोस्ट एक पंक्ति से अपनी तुक्क्ष टिप्पणी की शुरुवात करता हुँ कि आप एक तरफ सहज स्त्री और पुरुष के साथ को सहज लेने की हिमाकत करती है लेकिन आप ने जिस हिसाब से इन दोनो के साथ को दिखाया है ( मै मानता हुँ कि ऐसा है या हो सकता है क्योंकि मै उस कालेज का छात्र नही रहा लेकिन ऐसा सम्भव है ) उसको कोई सहजता से नही ले सकता ।
आज के समय मे ( क्षमा किजिये आज के व्यस्त समय मे ) लोग क्षणिक खुशी की तरफ जाते है या क्षणिक खुशी के तरफ झुकाव ज्यादा हो रहा है जिसकी वजह से लगभग हर चीज मे पतन हो रहा है । एक लडके और एक लडकी की दोस्ती कभी भी अजीब नही है और ना थी ( कुछ तो हमेशा कहेंगे लेकिन ) लेकिन इस दोस्ती के नाम पे अगर कोई गुल खिलाता है ( जिसका वर्णन आपने किया है ) तो इसे दोस्ती की संज्ञा तो कदापि नही दी जा सकती ।
हम जब रिश्ते मे बाँध दिये जाते है तो हमारी सोच अपने आप उस रिश्ते को ग्रहण कर लेती है चाहे वो रिश्ता कैसा भी हो ( यहा कोई लडकी बहन भी हो सकती है , और जोडने पे और भी बहुत कुछ रिश्ते पनप सकते है क्योंकि हमारे यहा दुर दुर का गाँव गाँव का रिश्ता बनता है , इसमे दोस्त भी हो सकते है और प्रेमिका भी हो सकती है )
तो अहम बात यह है कि हम उस रिश्ते को किस नजरिये से देख रहे है ।
क्रमशः
क्रमशः से आगे
हम अनिरुद्ध जी से विनम्र निवेदन करेंगे की , महोदया निधि जी की दोस्ती और प्यार के बारे मे क्या सोच है , वो किस तरह से दोस्ती और प्यार के रिश्ते को परिभाषित करती है के बारे मे भी जानकारी दे । क्योंकि इस खुबसुरत लेख के पीछे हमे उनके सन्देश से भी अवगत होना चाहिये ( क्योंकि इस लेख मे दोस्ती कही न कही छुट सी गई है )
दोस्ती – ये रिश्ता कभी क्षणिक सुख के लिये नही होता है यह रिश्ता सुख दुख निभाने के लिये होता है ( ऐसा सभी कहते है ) और मेरा अनुभव है कि दोस्त वही जो एक दोस्त के गलती पे उसे समझाये , अगर कुछ सही है तो वहा पे उस सही का हिस्सेदार बने , दोस्त कभी और कदापि भी क्षणिक सुख के लिये नही होता है , दोस्त वो नही होता जो आपके इक्क्षावो को पुर्ण करे , दोस्त वो नही होता जो दोस्त से अपनी इक्क्षावो की पुर्ति के लिये बाध्य करे या पुर्ति मे लिप्त हो ।
जिन घटनावो का आपने जिक्र किया है वो एक क्षणिक सुख है और कुछ नही । वो कैसे ? तो हमे इसके लिये प्यार को भी परिभाषित करना पडेगा ।
प्यार – कई बार रिश्ता बनने के बाद प्यार होता है , कई बार रिश्ता बनने से पहले होता है , लेकिन इसको हम दोस्ती की तरह परिभाषित नही कर सकते । प्यार कभी शरीर ( केवल ) मिलन नही होता है , प्यार एक क्रिया है मेरी नजर मे जो पारिवारिक सौहार्द , सामाजिक सोच , आंतरिक मिलन और व्यवहारिक भावो को अपने आप मे समेटे है । आपने जिस टकरार की बात की है वो इन्ही वजहो से है और इसमे किसी एक की कमी कभी कभी बहुत महंगी पड जाती है । और इन सबका होना एक आम प्रक्रिया है इसमे किसी के लिये कोई योजना नही होती है बल्कि यह आती है परिपक्वता से ।
तो मेरी नजर मे जो प्यार और दोस्ती की परिभाषा है वो आपके बताये गये कालेज के घटनावो से नही मिल रही है ।
अब अगर नही मिल रही है तो वो है क्या ?
क्रमशः ..
Navin Bhojpuria क्रमशः से आगे
मै कोई वैज्ञानिक कारण न देते हुए सीधे सीधे मुद्दे पे आता हुँ
हर इंसान के जीवन मे जिसको अपनी इक्क्षावो पे नियत्रण नही है उन्हे क्षणिक सुख मे ज्यादा मजा आता है । क्षणिक सुख और कुछ नही बस एक मानसिक सुख है जो कुछ समय ( पल भर मिनट भर या फिर घण्टो तक के लिये रहता है और इसमे महीने तो बहुत कम और सालो सालो तक की बात तो शायद ही आती है ) के लिये रहता है और किसी एक कार्य को कर लेने के बाद यह अपने आप चला जाता है ।
कभी कभी यही मानसिक सुख की मांग दिमाग नही दिल करता है तब हमे प्यार के कुछ अंश देखने को मिलते है जो कभी कभी परवान भी चढ जाता है । लेकिन शुरुवात होती ही है क्षणिक सुख से ।
आप जरा सा अन्दाजा लगा लिजिये कि आज के समय मे अश्लील गीत बहुत जल्दी हिट होते है लेकिन समय के बढने के साथ साथ उनकी अपनी पहचान भी खत्म हो जाती है और इसका कारण यह है कि ऐसे गीत केवल मानसिक सुख देते है जो क्षणिक होता है ( Exception हर जगह है )
ये क्षणिक सुख एक रेव पार्टी से मिल जाते है , या फिर डांस बार या डिस्को मे जाने से मिल जाते है , कई बार गीत संगीत भी इस सुख को देने मे सहायक होते है ।
चुकि कालेज मे दोनो ( लडका और लडकी है ) साथ मे रहते है तो ऐसे क्षणिक सुख का होना लाजमी है , और मानसिक सुख के लिये उन्हे कोई भाग दौड नही करनी पडती है और बस यह हो जाता है ।
अब यह गलत है या सही मुझे पता नही क्योकि हर व्यक्ति की अपनी सोच है और उसकी नजर मे उसकी सोच ही सही है । इसलिये मै यह कहुँ कि कौन गलत है और कौन सही या क्या सही बहुत बडी गलती होगी ।
निधि जी आपने एक बेहतरीन लेख लिखा है , ऐसे लेख आजकल पढने को कम मिलते है और अगर कुछ मिलता है तो शायद पुर्ण नही होता है इसलिये हम , वाह वाह या बहुत खुब लिख के चले आते है लेकिन मुझे लगा की इसपे विस्तार से कमेंट लिखा जाय सो लिख दिया ।
क्षमा पहले मांग लेता हुँ मै आपसे , जो भी इस कमेंट को पढेगा उनसे कि मेरा किसी को भी किसी भी प्रकार से दुःख या कष्ट पहुंचाने का कोई इरादा नही है और ना था ।
धन्यवाद अनिरुद्ध भईया ।
आपका सभी का
नवीन भोजपुरिया
Nidhi ne samay aur samaj dono ko be parad kiya hai.Man ke gubbar ko nikalne ka rasta hi hamare samaj mai band para hai,isi se jahan tanha log kachara failate rahte hai. thanks for this post to nidhi.
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Type Comments in Indian languages (Press Ctrl+g to toggle between English and Hindi OR just Click on the letter)जनमत
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