बहुत हुआ, अब वीएन राय को गरियाना बंद करें

♦ सलीम अख्तर सिद्दीक़ी

सलीम साहब मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं और मानते हैं कि विभूति नारायण राय के खिलाफ उमड़ा हिंदी साहित्‍य का जन-सैलाब बेकार है। ये वे लोग हैं, जो विभूति को कायदे से नहीं जानते। हिंदुस्‍तान से जुड़े पत्रकार नासिरुद्दीन ने भी निजी बातचीत में इसका जिक्र किया है कि जो लोग विभूति का विरोध कर रहे हैं, वे विभूति के दस फीसदी काम को भी नहीं जानते। जिन्‍हें विभूति को जानना है, वे उनके गांव जाएं – देखें कि उन्‍होंने दलितों के लिए क्‍या किया है। खैर, छिनाल प्रसंग में सलीम साहब की राय पर आप गौर फरमाएं, जो कह रहे हैं कि हिंदी की लेखिकाओं को तसलीमा नसरीन का खून लग गया है। वे विभूति प्रेम में इतने डूबे हुए हैं कि उनके वाक्‍य को भी गलत कोट कर रहे हैं। विभूति की पंक्ति है : लेखिकाओं में होड़ लगी है यह साबित करने के लिए कि उनसे बड़ी छिनाल कोई नहीं है। सलीम साहब इस पंक्ति में लेखिकाओं की जगह लेखिकाओं के एक वर्ग पढ़ रहे हैं। मुझे लगता है, उन्‍हें नया चश्‍मा खरीदना चाहिए और विभूति के पुराने कामों का हवाला देकर उनके इस कुकृत्‍य को जायज नहीं ठहराना चाहिए : मॉडरेटर


विभूति का वक्‍तव्‍य साफ पढ़ने के लिए इमेज पर क्लिक करें।

वीएन राय के माफी मांगने के बाद उन पर कीचड़ उछालना बंद होना चाहिए। पिछले कुछ दिनों से देखा जा रहा है कि किसी न किसी बहाने वीएन राय पर कीचड़ उछाली जा रही है। वीएन राय ने सभी लेखिकाओं को छिनाल नहीं कहा था। जरा उनके शब्दों पर ध्यान दीजिए – ‘हिंदी में लेखिकाओं का एक वर्ग ऐसा है, जो अपने आप को बड़ा छिनाल साबित करने में लगा है’। उनके इस वक्तव्य के बाद यह पता लगाना बेहद मुश्किल है कि उनका इशारा किस ओर था। कुछ लेखिकाओं ने उनके बयान पर तल्ख टिप्पणियां की हैं। मैत्रेयी पुष्पा ने तो उन्हें सीधे-सीधे ‘लफंगा’ ही कह दिया है। वीएन राय ने तो किसी का नाम लेकर कुछ नहीं कहा था, लेकिन मैत्रेयी पुष्पा ने उन्हें लफंगा कहकर यह साबित कर दिया है कि साहित्यकारों में कहीं न कहीं संयम खोने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। वीएन राय ने लेखिकाओं के एक वर्ग को छिनाल कहा तो कयामत आ गयी, लेकिन किसी को लफंगा कहना कहां तक सही है।

मैत्रेयी पुष्पा ने ही नहीं, बल्कि हर वह आदमी, जो प्रगतिशील और स्त्रियों का पैरोकार होने का दम भरता है, वीएन राय को गरियाने में लगा है। बात यहीं खत्म नहीं होती। आलोक तोमर जैसे वरिष्ठ पत्रकार, जिनकी मैं बहुत इज्जत करता हूं, ने भी बहती गंगा में हाथ धो लिये। उन्होंने तो वीएन राय लिखित उपन्यास “शहर में कर्फ्यू” पर ही सवालिया निशान लगा दिया। आलोक तोमर ने यह कह कर कि ‘वीएन राय हिंदी साहित्य के आईएस जौहर साबित हुए हैं, इधर दंगा खत्म हुआ, उधर उपन्यास बाजार में आ गया’ यह साबित करने की कोशिश की है कि वीएन राय का उपन्यास ‘शहर में कर्फ्यू’ मौलिक नहीं था। इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि वीएन राय ने ‘शहर में कर्फ्यू’ लिख कर उस मिथक को तोड़ने का काम किया था, जिसमें यह कहा जाता रहा है कि हर दंगे के लिए मुसलमान ही जिम्मेदार होते हैं। आलोक तोमर की नजर में ‘वीएन राय धर्म विरोधी होने की हद तक धर्मनिरपेक्ष हैं’। मेरा मानना है कि धर्म आदमी का निजी मामला होता है। वह किसी धर्म को माने या नहीं इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए।

याद कीजिए 1987 का मेरठ का हाशिमपुरा कांड। यह वह दौर था, जब मेरठ में मुसलमानों का कत्लेआम किया जा रहा था। मुसलमानों की सुनने वाला कोई नहीं था। यहां तक की मेरठ का तथाकथित मुस्लिम नेतृत्व भी बेहद खौफजदा था। इसी दौर में पीएसी कुछ ट्रकों में मुस्लिम युवकों को भरकर ले गयी थी। पीएसी ने उन मुस्लिम युवकों को गोली मारकर मुरादनगर (गाजियाबाद) की गंग नहर में बहा दिया था। उस वक्त वीएन राय गाजियाबाद के एसएसपी थे। उन्होंने ही पूरे केस को मीडिया को बताया था। पीएसी के खिलाफ मामला दर्ज हुआ था। ‘छिनाल’ प्रकरण से कुछ दिन पहले ही वीएन राय ने दिल्ली की अदालत में चल रहे हाशिमपुरा कांड केस में गवाही दी है। मेरा मानना है कि किसी इंसान के अच्छे कामों को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

इसमें दो राय नहीं, इधर जब से बंगलादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने अपने जीवन के कुछ अंतरंग क्षणों को कागज पर उतारा है और उन्हें शोहरत हासिल हुई है, तब से हमारी हिंदी की कुछ लेखिकाएं भी तस्लीमा नसरीन के रास्ते पर चलती नजर आ रही हैं। उपन्यासों, कहानियों अथवा आत्मकथाओं में लेखिकाएं किसी न किसी बहाने यौन संबंधों का जमकर उल्लेख कर रही हैं। लेखिकाओं में यह प्रवृत्ति नयी नहीं है। तस्लीमा नसरीन की देखा-देखी और ज्यादा बढ़ी है।

इस प्रकरण में वीएन राय से ज्यादा दोषी ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादक रवींद्र कालिया हैं। उन्होंने एक संपादक का सही ढंग से या तो निर्वहन नहीं किया अथवा उन्होंने जाबूझकर ‘छिनाल’ शब्द को छपने दिया। शायद वह साक्षात्कार को विवादस्पद बनाकर ‘नया ज्ञानोदय’ के अंक को चर्चा में लाना चाहते हों। इधर हमारे नेताओं ने भी अपना संयम खोया है। लेकिन प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने कहे गये शब्दों को संपादित करके अपनी जिम्मेदार का सही निर्वहन किया है। रवींद्र कालिया भी ऐसा कर सकते थे।

Saleem Akhtar Siddiqui(सलीम अख़्तर सिद्दीक़ी। सामाजिक सरोकारों वाले पत्रकार। मेरठ में रहते हैं। मानवाधिकारों कार्यकर्ता। करेंट अफेयर पर विभिन्न समाचार पत्रों में लेखन। तकनीकी पुस्तकों का लेखन। हक़ बात नाम का ब्‍लॉग संचालित करते हैं। सलीम साहब से saleem_iect@yahoo.co.in पर संपर्क किया जा सकता है।)

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