बिगाड़ के डर से ईमान की चुप्पी को समझना जरूरी है

♦ राकेश बिहारी

इस आलेख का संपादित रूप रविवार के जनसत्ता में छपा है। यहां प्रस्‍तुत है इसका अविकल रूप : मॉडरेटर

नया ज्ञानोदय के सुपर बेवफाई विशेषांक 2 में विभूति नारायण राय की स्त्री लेखकों के बारे में की गयी अश्लील टिप्पणी के मद्देनजर उनकी और रवींद्र कालिया की बर्खास्तगी को ले कर आंदोलन का रूप ले चुके मुखर लेखकीय-पाठकीय प्रतिरोध के बीच कुछ लोगों के पर्दे के पीछे से उनके बचाव में आ खड़े होने की कोशिश ने हिंदी समाज की कई विशेषताओं और विसंगतियों दोनों को एक ही साथ प्रकट कर दिया है। एक तरफ जहां हिंदी साहित्य के इतिहास में शायद पहली बार अपने धड़ों और मठों की लक्ष्मण रेखाओं को लांघ कर बहुत सारे लेखक एक अहाते में खड़े नजर आ रहे हैं वहीं दूसरी तरफ एक तबका वह भी है जिसे समय और सच्चाई से ज्यादा संबंधों के समीकरण, और ईमान से ज्यादा बिगाड़ की चिंता खाये जा रही है।

प्रश्न उठता है कि वे कौन से लोग हैं, जो आज विभूति नारायण राय के तथाकथित माफीनामे से संतुष्ट हैं या उन्हें रवींद्र कालिया की मुंहजोर गलती और ढीठ अपराध के लिए ज्यादा से ज्यादा लापरवाही जैसा आसान सा शब्द सूझ रहा है? उत्तर बहुत आसान है, इस जमात मे तीन तरह के लोग हैं। एक वे जो इन दोनों संस्थानों में नौकरी करते हैं या किसी न किसी तरह इन दोनों लोगों से उपकृत हैं, दूसरे वे जो इन दोनों के पुराने मित्र हैं, या फिर तीसरे वे जिन्हें अब भी इन दोनों ‘महापुरुषों’ से किसी विशेष कृपा की उम्मीद है। गौरतलब है कि इन तीनों श्रेणी के लोगों के बीच एक समानता यह भी है कि इनमें से किसी ने विभूति नारायण राय के इन ‘महान’ विचारों के प्रकाशन और उसके बाद इलेक्ट्रानिक चैनलों पर उसके पक्ष में बेशर्मी से दलील देने पर भूल से भी कोई आपत्ति दर्ज नहीं करायी है।

एक तबका राजेंद्र यादव जैसे लोगों का भी है, जो हिंदी समाज में स्त्री अस्मिता संघर्ष के सबसे बड़े पक्षधर माने जाते रहे हैं। आज इस माफीनामे ने उन्हें भी पिघला दिया है। उनके दु:खों का कारण भी सहज ही समझा जा सकता है। या तो अतीत में ऐसी ही गलतियों के कारण हुई अपनी भर्त्सना की पीड़ादायक यादों ने उन्‍हें इन ‘विभूतियों’ के प्रति सदाशय बना दिया है या फिर उनके लेखक और उनके भीतर के पुरुष की लड़ाई में उनका पुरुष जीत गया है। मामला जो भी हो, लोकतंत्र और माफी के नाम पर उनकी चुप्पी हम जैसे उन सभी लोगों के लिए दु:खद है, जो ऐसे मसलों पर हमेशा से उनकी तरफ देखते रहे हैं।

आश्चर्य होता है जब निर्मला जैन जैसी वरिष्ठ स्त्री आलोचक को विभूति नारायण राय का यह साक्षात्कार स्त्रियों के पक्ष में नजर आता है और वे छिनाल जैसे आपत्तिजनक शब्द तक आते-आते इतनी नरम पड़ जाती हैं कि इस बात की जांच करवाना चाहती हैं कि आखिर यह राय की गलती है या ज्ञानपीठ की लापरवाही। अव्वल तो राय की ढीठ दलील के बाद इसमें जांच कराने जैसी किसी राजनीतिक पैंतरेबाजी की कोई जरूरत नहीं नजर आती और यदि गेंद ज्ञानपीठ के पाले में ही जाती है, तो यह लापरवाही नहीं आपराधिक साजिश का मामला बनता है। स्त्रीवादियों के पक्ष में खड़ा न हो पाने की उनकी कोई निजी या वैचारिक मजबूरियां हो सकती हैं लेकिन स्त्री और उस पर भी लेखक होने के नाते पितृसत्तात्मक शब्दावलियों के पीछे से झांकती मानसिकता को इस तरह नजरअंदाज करके ऐसे आपत्तिजनक और प्रायोजित बयान के पक्ष में खड़ा हो जाना सिर्फ निराशाजनक ही नहीं, आश्चर्यजनक भी है।

मैनेजर पांडे की बात भी समझ से परे है। वे इस तरह की बयानबाजी को अपराध तो मानते हैं लेकिन अपराध के लिए सजा की मांग नहीं करना चाहते। कारण कि उनका विश्वास है कि बर्खास्तगी और इस्तीफा दोनों का ही जन आंदोलनों से कोई रिश्ता नहीं होता। उन्हें नहीं पता है कि इस तरह का गोल-मोल बयान दे कर वे उन लाखों-करोड़ों लोगों के साथ नाइंसाफी ही नहीं कर रहे हैं, जो तमाम प्रतिकूलताओं के बीच भी लोकशाही में अटूट भरोसा रखते हैं बल्कि विभूति नारायण राय और रवींद्र कालिया जैसी मानसिकता वाले लोगों को आसानी से छूट जाने के लिए सुरक्षित स्पेस भी मुहैया करा रहे हैं। प्रेमचंद की दुहाई देते हुए वे कहते हैं कि प्रेमचंद स्त्री अस्मिता की रक्षा के लिए हत्या तक को जायज ठहरा जाते हैं लेकिन कमाल है कि वे स्त्री अस्मिता के पक्ष में एक कुलपति और संपादक की बर्खास्तगी की मांग तक नहीं कर सकते। दोनों तरफ की रोटी में हिस्सेदारी के इस सुनियोजित खेल को हिंदी समाज जितनी जल्दी समझ जाए, यह उसके हक में है।

हद तो तब हो जाती है, जब विभूति नारायण राय और रवींद्र कालिया के प्रतिरोध में की गयी टिप्पणियों को के विक्रम सिंह अशालीन और अशिष्ट बताते हुए इनके पक्ष में थोथी दलीलें देने से भी बाज नहीं आते। उन्हें याद है कि उनकी दादी उन लड़कियों को छिनाल कहा करती थीं जो बगैर इजाजत लिये या अकेली घर से बाहर चली जाती थीं। उनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या वे लड़कियां घर से अकेले मंदिर जाने के लिए निकलती थीं? कहने की जरूरत नहीं है कि इस शब्द का अर्थ तब भी यही था जो आज समझा जा रहा है, जिसे राय ने आगे की पंक्तियों में ‘कितनी बिस्तरों पर कितनी बार’ कह कर खुद ही साफ कर दिया है। कलुषित और चापलूस पक्षधरता की हद तो तब हो जाती है, जब के विक्रम सिंह इन दोनों के बचाव में इनके लेखक होने की दुहाई देते हैं। उक्त साक्षात्कार की व्याख्या करते हुए के विक्रम सिंह का ध्यान राय की इस पुरुषवादी मान्यता की तरफ भी नहीं जाता कि स्वयं की संपत्ति अर्जित करने के बाद स्त्रियों में लुत्फ लेने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। एक ऐसे समय में, जब स्त्रियों को संपत्ति में उनका अधिकार देने की बात की जा रही हो, इन स्त्रीविरोधी अवधारणाओं का बचाव लेखकों, बुद्धिजीवियों और सरकारी-गैरसरकारी संस्थानों के शीर्ष पर बैठे लोगों की मिलीभगत का नतीजा है। दुखद और खतरनाक है कि निजी हितों के खेल में लगे ये बुद्धिजीवी आज न सिर्फ शब्दों से उनके अर्थ छीन लेना चाहते हैं बल्कि उनकी पीठ पर मनमाना अर्थ भी टांकने की कोशिश कर रहे हैं।

कुछ लोग वैसे भी हैं, जो विभूति नारायण राय को उनके पद से हटाने के तो पक्ष में हैं लेकिन रवींद्र कालिया को हटाने की मांग को जायज नहीं मानते। उल्लेखनीय है कि विभूति नारायण राय का जो बयान छपा है, उसे रवींद्र कालिया अपने उसी अंक के संपादकीय में बेबाक करार दे चुके हैं। बेबाक एक सकारात्मक शब्द है। मतलब यह कि जिस बयान को ले कर नौकरी जाने के भय से राय तथाकथित रूप से माफी मांग चुके हैं, रवींद्र कालिया सोच-समझ कर उसे सही मानते हैं। दो हफ्ते के बाद इस प्रकरण पर आया रवींद्र कालिया का माफीनामा भी झूठ के आवरण में लिपट कर आया है, जिसमें बड़ी बेशर्मी से उन्होंने पूरी जिम्मेवारी ‘गर मैं होता तो ऐसा नहीं होता’ की तर्ज पर प्रत्यक्षत: अपनी अनुपस्थिति पर और परोक्षत: अपनी संपादकीय टीम पर डाल दी है। जबकि खबरें यह भी है कि रवींद्र कालिया गोवा जाने की पूर्वसंध्या में ही नया ज्ञानोदय का उक्त अंक छपने के बाद अपनी आंखों से देख चुके थे। नया ज्ञानोदय के उक्त संपादकीय और इस ढपोरशंखी माफीनामे का अंतर्विरोध उनकी बेहया हठधर्मिता को ही दिखाता है। वैसे भी रवींद्र कालिया के खाते में यह पहली गलती नहीं है। इसके पहले भी वे लगातार अपने लेखकों का न सिर्फ अपमान करते रहे हैं बल्कि ज्ञानपीठ जैसे संस्थान में बैठ कर लेखकों की जड़ काटने से ले कर ज्ञानपीठ की साख को बट्टा लगाने तक का काम भी कर चुके हैं, जिसके लिए ज्ञानपीठ के न्यासियों को बार-बार अपने लेखकों के आगे शर्मसार भी होना पड़ा है। चाहे वह युवा लेखकों के घोर आपत्तिजनक और अपमानजनक परिचयों का मामला हो, या कृष्णा सोबती और नासिरा शर्मा जैसी वरिष्ठ लेखिकाओं की अवमानना का, या फिर रॉयल्टी स्टेटमेंट से छेड़छाड़ कर अपने संपादकीय में ज्ञानपीठ को ही कठघरे में खड़ा कर देने की कुत्सित चालाकी, यह सब किन्‍हीं लापरवाहियों की नहीं बल्कि जानबूझ कर की गयी गलतियों की फेहरिस्त है, जिनमें से किसी के लिए आज तक उन्हें कोई पछ्तावा नहीं हुआ है। जब गलती और तथाकथित माफी किसी व्यक्ति के चाल-चरित्र का हिस्सा हो जाए, तो उसे माफ करना भी अपराध हो जाता है। भारतीय ज्ञानपीठ जो अपने लेखकों के सम्मान और उनके अधिकारों की रक्षा के मानक और प्रतीक के रूप में जाना जाता है, के लिए भी यह आत्ममंथन का मौका है, अन्यथा देर-सबेर यह प्रश्न भी उठने लगेगा कि वे कौन से कारण हैं कि ज्ञानपीठ जैसी धवल परंपरा वाली संस्था अपने निदेशक-संपादक की इतनी कारगुजारियों के बाद भी उससे मुक्त नहीं होना चाहती?

विभूति नारायण राय की कार्य प्रणाली पर भी समय-समय पर प्रश्नचिह्न लगते रहे हैं। जातिवादी और दलित विरोधी क्रिया कलापों का आरोप झेल रहा व्यक्ति स्त्रियों को अपमानित करने के बाद जब अपने बचाव में स्त्री संघर्ष को आइसोलेशन की बजाय संपूर्णता में देखने की बात करता है, तो बिल्ली के हज पर जाने वाली कहावत याद आती है। विभूति नारायण राय जो उक्त साक्षात्कार के बाद से अब तक न जाने कितने बयान देकर और उससे पलट भी चुके हैं, जब यह कहते हैं कि उन्हें जैसे ही यह महसूस हुआ कि उनके बयान से उनके लेखिका मित्रों को ठेस पहुंची है… पूछा जाना चाहिए कि उन्हें यह दिव्य ज्ञान माननीय मंत्री द्वारा तलब किये जाने के बाद ही क्यों हुआ? टेलीवीजन पर खुद को सही बताते वक्त उन्हें इसका इल्हाम क्यों नही हुआ? पूरे प्रकरण की घटना प्रक्रिया और माफीनामे की शब्दावली से यह स्पष्ट है कि यह माफी उन्होंने इसलिए नहीं मांगी है कि उन्हें अपनी गलती का एहसास है बल्कि यह तो नौकरी बचाने की एक तकनीक और तरकीब भर है।

पूरे प्रकरण में राकेश मिश्र, जिन्होंने विभूति नारायण राय का उक्त साक्षात्कर ‘नया ज्ञानोदय’ के लिए लिया था, की चुप्पी के भी गहरे निहितार्थ हैं। उल्लेखनीय है कि इस संदर्भ में इंडियन एक्सप्रेस में विभूति नारायण राय का यह बयान भी छप चुका है कि उक्त आपत्तिजनक शब्द उन्होंने नहीं कहे बल्कि साक्षात्कार लेने वाले ने जोड़ दिया है। जाहिर है राकेश मिश्र की चुप्पी के बीच रवींद्र कालिया और विभूति नारायण राय के बयानों के बहुपरतीय अंतर्विरोध माफीनामे की नीयत पर संदेह के प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं। ऐसे में इस तथाकथित माफी के बाद इस प्रकरण पर विराम लगा देने का तर्क गले नहीं उतरता है।

इस मामले का एक पक्ष मीडिया भी है, जिस पर बात करना बहुत जरूरी है। यूं तो वैसे भी हिंदी इलेक्ट्रानिक मीडिया और प्रिंट मीडिया (दो-एक अखबारों को छोड़ कर) दोनों हिंदी साहित्य-समाज को अपनी बिरादरी का नहीं मानते हैं। हिंदी साहित्य-समाज का सुख-दु:ख उनके सुख-दु:ख का हिस्सा कभी नहीं बन पाता। इस मुद्दे पर मुखर हुए आंदोलन में शायद वह शक्ति थी कि इस बार वह उन्हें अपनी तरफ देखने को मजबूर कर देता लेकिन तमाम एका के बावजूद सरोकारों को ताक पर रख कर मित्रता निभाने वाली आवाजों और चुप्पियों ने पूरे हिंदी साहित्य-समाज के हाथ से यह नायाब मौका भी छीन लिया है। नतीजा सबके सामने है, पहले दो दिनों तक तो कुछ चैनलों ने ‘छिनाल’ शब्द को भुना कर टीआरपी का खेल खेला लेकिन उसके बाद जैसे ही इस प्रकरण को ले कर गंभीर बहस की गुंजाइश बनी, उन्होंने इससे किनारा कर लिया। पूछा जाना चाहिए कि हिंदी साहित्य के इतिहास में पहली बार जब ज्ञानपीठ जैसे बड़े प्रकाशक के दफ़्तर पर लेखकों के धरना-प्रदर्शन के भय से छुट्टी का ताला लटक गया था, इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया का कोई भी नुमाइंदा वहां क्यों नहीं मौजूद था? हिंदी के मुद्दों की अनदेखी यदि हिंदी के अखबार और खबरिया चैनल यूं ही करते रहे तो किसी एक अंग्रेजी अखबार का साथ भी हमारे हिस्से से जाता रहेगा। और तब जब इसके कारणों का मूल्यांकन होगा इन्‍हीं प्रायोजित आवाजों या कि ओढ़ी हुई चुप्पियों की भूमिका बार-बार रेखांकित होगी और हम बेचारा बने कुछ भी न कर पाने को मजबूर होंगे।

ऐसा नहीं है कि महिलाओं को उनकी औकात बताने वाला किसी लेखक का यह पहला आपत्तिजनक बयान है। लेकिन किसी ऐसे अशोभन कृत्य का अब तक का यह सबसे बड़ा प्रतिरोध जरूर है। बेहतर होता कालिया और राय अपने किये का एहसास कर के अपने-अपने पदों से स्वयमेव स्तीफा दे देते लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। ऐसे में यदि अनेकानेक आंखें महामहिम राष्ट्रपति और ज्ञानपीठ के न्यासियों की तरफ देख रही हैं, तो यह समय उन सबके पीछे अपनी सहमति और समर्थन की नैतिक ताकत देने का है। बिगाड़ के डर से हम कब तक ईमान की बात नहीं कहेंगे? यदि अब भी हम वृहत्तर समाज और उसके मूल्यों की रक्षा के लिए आगे आ कर उदाहरण नहीं रखते तो इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा।

(राकेश बिहारी। युवा कथाकार और समीक्षक। कारपोरेट जगत के अंत:सत्यों को उदघाटित करने वाली कहानियों के लिए चर्चित। मेधा बुक्स से एक कहानी संग्रह ‘वह सपने बेचता था’ प्रकाशित। फिलहाल कहानियों की आलोचना की एक किताब पर काम जारी। उनसे biharirakesh@rediffmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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