महिलाओ, पहले राजकिशोर-आलोकधन्वा का सत्कार करो!

बस एक विभूति काफी है राजकिशोर-आलोकधन्वा को नंगा करने को


पत्रकार राजकिशोर


कवि आलोकधन्‍वा

♦ राजीव कुमार सुमन

दैनिक नवभारत में खबर छपी थी कि बाहर वर्धा के महिला संगठन विभूति का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। उन दिनों विभूति बड़ी बेहयाई से अपनी अश्लील मनोवृत्ति के पक्ष में चैनलों पर दलीलें देकर पलट चुके थे और मानव संसाधन विकास मंत्री से दुत्कारे जाने के बाद सार्वजनिक माफी मांग चुके थे। तब से विभूति विश्वविद्यालय के बाहर सार्वजनिक मंचों से परहेज कर रहे हैं। महिला नेताओं को मिलने का समय नहीं दे रहे हैं। लेकिन, मेरी राय है कि महिलाओं को विभूति के साथ जो करना है वह तो करें ही, लेकिन थोक के भाव के लिक्‍खाड़ राजकिशोर और मनोरोग से ग्रस्त आलोकधन्वा को भी अपने सत्कार की लिस्ट में शामिल कर लेना चाहिए।

खबर है कि राजकिशोर विश्वविद्यालय की छात्राओं से विभूति के पक्ष में हस्ताक्षर करवा रहे हैं। क्या कोई व्यक्ति 25 हजार रुपये के दबाव में इतना गिर सकता है। यह तो बाद में पता चलेगा कि विश्वविद्यालय में विभूति और उसके कारिंदों तथा महिला छात्रावास की वार्डेन से त्रस्त छात्राएं इस हस्ताक्षर अभियान में कितना साथ देती हैं। हां, डर कर, एक छोटे विश्वविद्यालय में अत्यल्प संख्या में छात्राओं के बीच अपनी विभूति विरोधी छवि उजागर न हो जाने के भय से भले ही उन्हें हस्ताक्षर के लिए विवश होना पड़े।

वैसे राजकिशोर की कुंठाओं से भी लड़कियों को वाकिफ हो लेना चाहिए – उनके मस्तराम स्टाइल में लिखे उपन्यास “उसका सुख” से, जिसमें हर चौथे पेज पर कोकशास्त्रनुमा लेखन है।

एक कवि भी विश्वविद्यालय में कुछ ऐसा ही माहौल तैयार कर रहे हैं। आलोकधन्वा का इस विश्वविद्यालय में बस दो ही काम है। विभूति के द्वारा बनवाये गये भवनों की खूबसूरती का माहौल बनाना, और लड़के-लड़कियों को पकड़ कर उनसे अपने निजी जीवन प्रसंगों की बात करना। उन्हें देखकर समझदार लोग दूर भागते हैं। उन्हें विभूति के बनाये गये नये भवनों से, जो बमुश्किल महीने दो महीने पुराने हैं, पानी टपकना नहीं दीखता। दुखद है कि क्रांतिकारी कविताओं से जनप्रियता हासिल करने वाला रचनाकार एक सामंत की बेशर्म चापलूसी में लगा है और प्रलोभनों के द्वारा अथवा डरा धमकाकर विद्यार्थियों को विभूति की पक्षधरता के लिए मना रहा है। इन्होंने कृपाशंकर चौबे से भी नहीं सीखा कि कैसे उन्होंने विभूति की हरसंभव चापलूसी करने के बावजूद इस प्रसंग में चुप्पी बना रखी है। यह शातिर दिमाग संभवतः महाश्वेता देवी के इस प्रसंग में लिये स्टैंड के बाद चुप रहने का चुनाव कर चुका है, लेकिन राजकिशोर और आलोकधन्वा के घृणित प्रयासों से तो यह बेहतर चुनाव है ही।

खैर, विभूति को तलाशती महिलाओं से मेरी अपील है कि वे अपनी सूची में राजकिशोर और आलोकधन्वा को भी जोड़ लें। ये वर्धा, दिल्ली से लेकर पटना तक के मंचों पर कहीं न कहीं नजर आ ही जाएंगे।

((राजीव कुमार सुमन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से फेलो हैं। आरटीआई कार्यकर्ता हैं तथा हिंदी विश्वविद्यालय में भ्रष्‍टाचार के खिलाफ संघर्षरत हैं।))

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