एक बार फिर गरज उठो तुम गिरदा

♦ पलाश विश्‍वास

जनकवि और मृत्युपर्यंत आंदोलनकारी गिरदा का अंतरंग संसार भी बहुत सार्वजनिक था। जो उनके पास गया, वह गिरदा का हुआ, गिरदा उनके हुए। वरिष्ठ पत्रकार पलाश विश्वास ने यह ऑबिच्युरी ग्रुप मेल पर लिखी है। आप भी देखें। संभवत: कीबोर्ड की समस्या के कारण, कई शब्द उलझ गये लगते हैं, लेकिन यहां पलाश विश्वास की बात अविकल छापी जा रही है : मॉडरेटर

गिराबल्लभ, कल नैनीताल में तुम्हारी अंत्‍येष्टि हो जाएगी। पर तुम्हारे किस्से शायद ही खत्म हों। हमेशा से अराजक रहे हो। हुड़का धारण किया तो कुलीन बामहण बाप ने तज दिया। शांत तो कभी थे नहीं तुम। इतनी खामोशी क्या तुम्हें शोभा देती है? तुम तो हमेशा खामोशी के खिलाफ ठैरे। नैनीताल समाचार की वे तूफानी बहसें याद हैं? जब कर्नल सैब बंदूक उठा लेते थे? परेशान पवन राकेश और हरुआ दाढ़ी की गालियां भूल गये? हिमपात की वे गरजती रातें याद हैं? नैनीताल क्लब अग्निकांड याद है? पंतनगर नरसंहार वाली स्टोरी याद है? जब तराई के रुद्रपुर में तुम धन दिये गये थे? तुम्हारी, राजीव, शेखर वगैरह की नीलामी के खिलाफ गिरफ्तारी की वारदात याद है? जब 14 नवंबर 1978 को छात्रों ने विरोध में नैनीताल फूंक दिया था? हिंसा अहिंसा की तूफान बहसें याद हैं, जब तुम सारी दलीलें खारिज करते हुए कह दिया करते थे, जन आंदोलन की दिशा जनता तय करती है, तुम स्साले कौन होते हो? तुम्हारे सौंदर्यबोध से परेशान शेखर पाठक और चंद्रेश शास्त्री के परेशान चेहरे याद हैं? तुम्हारे नाटक नगाड़े खामोश या युगमंच की प्रस्तुतियां तो याद होंगी? या फिर बनारस में राजीव कटियार ने जो मजमा लगाया था… और जनार्दन जोशी… बतौर तुम्हारी जो हम सब टांग खींचा करते थे, भूल गये? हुड़के की थाप पर हिमालय और हिंदुस्तान उठा लेने वाले तुम्हें क्या इतनी खामोशी सुहाती है? हरेले के तिनड़ की कसम, बर्फानी रातों की कसम, जुनाली रातों की कसम. बारामासा बेड़े पाको, जागर, भूस्खलन, बाढ़ की कसम… कल अंत्येष्टि से पहले तमाम खबरों को खारिज करते हुए आपातकाल के खिलाफ बगावत, चिपको आंदोलन, नशा नहीं रोजगार दो की तरह गरज उठो तुम गिरदा।

कल चंडीगढ़ से कलकतिया पत्रकार आलोक वर्मा के फोन पर तुम्हारी बीमारी की खबर लगी। नैनीताल में सारे मोबाइल और टेलीफून खामोश। फिर हरुआ दाढ़ी ने अस्पलाल से खबर की, ऑपरेशन कामयाब है। फिर भी फिक्र थी, तुमने अपनी सेहत की हमेशा ऐसी की तैसी कर रखी थी। भला हो हीरा भाभी का कि इतने दिनों तक तुम्हें जिंदा रखा। मारे डर के सविता के तगादा के बावजूद नैनीताल फोन नहीं किया। पहले ही दौरा से बच कर निकले हो। तुम्‍हें तो हमेशा बीमारी पालने की आदत थी। इसीलिए डर गया था। फिर उम्मीद थी कि अबके जब फोन लगाऊं, तुम्हारी विख्यात हंसी की खनक सुनाई देगी। पर नेट पर मनहूस खबर आ ही गयी। सविता दिनभर दर्द के मारे परेशान थीं। परेशान कर दिया छैरा। उसे हीरा भाभी की फिक्र हो रही ठैरी। पर हम लोग भी तो तुम्हारे बिना कहीं के न ठैरे। सविता ने तो इस अक्तूबर को एलटीए पर नैनीताल जाने का प्लान भी बना लिया। अब पहाड़ जाकर क्या होगा?

कल ही हमने अमेरिका से सावधान पुनश्च लिखना शुरू किया और तुम ठहरे थोड़ा इंतजार भी न कर सके। इस बार छलड़ी के गीत कौन लिखेगा? जुलूस की अगुवाई में हुड़के की थाप कहां सुनाई देगी? भूस्खलन, भूकंप, बाढ़ और रोज रोज की आपदा पर कौन दौड़ेगा? कौन याद दिलाएगा कमिटमेंट, सरोकार और विचारधारा की? कौन फिर कहेगा, फार्म क्या होता है, कानटेंट ही सब कुछ है? कौन पूछेगा दृष्टि के बारे में… कौन लड़ेगा हर शब्द के लिए…

(पलाश विश्वास। पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, आंदोलनकर्मी। आजीवन संघर्षरत रहना और सबसे दुर्बल की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के पॉपुलर ब्लॉगर हैं। अमेरिका से सावधान उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठौर।)

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