बिक जाने के आरोप पर राजकिशोर ने दिया बयान

प्रिय अविनाश जी,
मोहल्लालाइव से पता चला कि मैं बिक गया हूं। तो सोचा कि इस बारे में अपना बयान दे दूं। जनसत्ता को भेजा था। आपको भी भेज रहा हूं। शायद आपके पाठकों को रुचिकर लगे।
शुभकामनाओं के साथ

♦ राजकिशोर

सुना है, मैं बिक गया हूं। यह पहली बार सुनने को मिला है, इसलिए कुछ विचित्र-सा अनुभव हो रहा है। आरोप मेरे लिए नये नहीं हैं। कई बार सुनने को मिल चुका है कि मैं बेहद कनफ्यूज्ड हूं। यह जान कर हर बार मुझे अच्छा लगा है। जीवन और जगत के बारे में जिनके विचार निश्चित और अडिग हैं, उनका हश्र सभी देख रहे हैं। फिर भी ये निश्चयवादी अपने बारे में पुनर्विचार करने के लिए तैयार नहीं हैं। इन्हें लगता है, ये नहीं भटके हैं, जनता ही भटक गयी है। सिद्धांतों के बजाय मूल्यों में मेरी ज्यादा आस्था है। जब सिद्धांत और मूल्य के बीच टकराव होता है, तो मैं मूल्य को चुनता हूं। मेरा विचार है, सिद्धांत मूल्यों पर आधारित होना चाहिए। इसलिए तर्क की मांग पर अपना मत बदलने में मुझे कभी दुविधा नहीं हुई। इसे ही मेरा ढुलपनपन बताया जाता है। यह आरोप मुझे हृदय से स्वीकार है।

एक बार, बहुत पहले, जब मैं कोलकाता में रहता था, सीपीएम के एक नेता-कम-विचारक ने मुझे सीआइए का एजेंट बताया था। इसलिए नहीं कि मेरे रहन-सहन के स्तर में अचानक उछाल आ गया था या मैं कुछ लोगों से गुपचुप मिलने लगा था, बल्कि इसलिए कि मैं आनंद बाजार पत्रिका में काम करता था और मेरी राय यह थी कि गोरखालैंड के लोग अगर पश्चिम बंगाल में नहीं रहना चाहते, तो उनके साथ जबरदस्ती कैसे की जा सकती है? आज भी मेरा यह मत बदला नहीं है। बाद में जब सुना कि अज्ञेय जी पर भी यही इलजाम लगाया गया था, तो यह देख कर मैं खुशी से उछल पड़ा कि मैं गलत सोहबत में नहीं हूं। हालांकि कहां अज्ञेय, कहां मैं। एक और आरोप मैं अभी तक झेल रहा हूं और वह है समाजवादी होने का। लेकिन इसे मैं निंदा नहीं, प्रशंसा मानता हूं। समाजवादी होने की वजह से ही मैं कभी बदले हुए जॉर्ज फर्नांडिस या मुलायम सिंह का पक्षधर नहीं रहा।

बिक जाने का आरोप बिलकुल ताजा है। इसके पहले कभी किसी ने इस बारे में संदेह तक नहीं किया था। बिक जाने के अवसर कोलकाता में भी थे। दिल्ली में तो इसके लिए अवसर ही अवसर हैं। मैं दिल्ली में 1990 से हूं। बिकना होता, तो मैं इन बीस वर्षों में कई बार बिक चुका होता। बिकने के फायदे मैंने भी देखे हैं। पर मेरे मन में कभी यह लालच नहीं आया। जब मैं स्कूल में पढ़ता था, हमारे अंग्रेजी के अध्यापक अकसर दुहराया करते थे कि स्वर्ग में नौकर होने से नरक में राजा होना बेहतर है। स्वतंत्रता तब भी मुझे प्रिय थी, इसके बाद वह मेरी जीवन संगिनी हो गयी। इसके नतीजे भी मैंने भुगते हैं। पीड़ा के साथ नहीं, सहर्ष।

इसलिए जब मैंने सुना कि मैं बिक गया हूं, तो मेरा सिर चकराने लगा। वैसे, जो अधिकतर बिक जाने पर ही मिलता है, वह किसी को बैठे-बिठाये मिल गया, यह बात आज के वातावरण में सहज ही हजम होने वाली नहीं है। इसलिए मान लिया गया है कि मुझे कोई सुविधा मिली है, तो इसके बदले मेरा ईमान जरूर गिरवी रख लिया होगा। सुविधा का व्याकरण यही है। बिके हुए लोगों का अपना अनुभव भी उन्हें इस निष्कर्ष के लिए प्रेरित करता होगा। पर अभी तक मैंने जब भी अपने को जांचा है, मुझे अपने जमीर में कोई फर्क नजर नहीं आया है। अगर मैं लुच्चा या कमीना नहीं हूं, तो जब यह सुविधा खत्म हो जाएगी, तब भी मेरे जमीर में जख्म नहीं मिलेंगे, यह उम्मीद है। मित्रों से प्रार्थना है कि अगर कभी मुझे कुमार्ग पर चलते हुए देखा जाए, तो मुझे जरूर टोकें।

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में रह कर पढ़ने-लिखने की जो सुविधा मुझे मिली है, यह मेरे जीवन की पहली ऐसी घटना है। जब से होश संभाला है, जीवित रहने के लिए श्रम करता रहा हूं। कभी आराम से, अवकाश में रह कर काम करने का मौका नहीं मिला। जो कुछ पढ़ा या लिखा, वह लगभग दौड़ते हुए या दूसरी जिम्मेदारियों से समय और ऊर्जा चुरा कर। मुफ्त का खाना मेरे स्वभाव में नहीं है। इसलिए जब यह मौका मिला, तो मैंने इसका स्वागत किया। शायद इस सकून भरे माहौल में कुछ नया कर सकूं। मेरे लिए यह ‘और अंत में प्रार्थना’ या ’हारे को हरि राम’ की तरह नहीं, बल्कि एक थके-मांदे पथिक के लिए बरगद की छांव की तरह है।

rajkishore(राजकिशोर। वरिष्‍ठ पत्रकार। महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के राइटर इन रेजीडेंस। नवभारत टाइम्‍स और रविवार में लंबे समय तक रहे। इन दिनों विभिन्‍न अखबारों में कॉलम लिखते हैं। उनकी कई किताबें आ चुकी हैं। उनसे raajkishore@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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