कोई भी जनांदोलन बिना जनकवि के चल ही नहीं सकता
आंदोलनों के कवि गिरदा के बारे में शेखर पाठक, चंडी प्रसाद भट्ट, आनंद स्वरूप वर्मा, पंकज बिष्ट, मंगलेश डबराल, राजेंद्र धस्माना को सुना। रोहित जोशी की फिल्म देखी। आयोजन जन संस्कृति मंच ने किया और संचालन भूपेन का था। गिरदा के साथ पिछले साल हुई मुलाकात की याद एक बार फिर ताजा हो गयी। अफसोस कि उत्तराखंड के बाहर के लोगों को इस शानदार इनसान के बारे में कम जानकारी है। हमारे समय के महानायक हैं गिरदा।
♦ बज्ज पर दिलीप मंडल

गिरदा कौन थे?
हिमालय के इनसाइक्लोपीडिया और पहाड़ को पैदल चल कर समझने वाले शेखर पाठक ने गिरदा का जीवन वृत्तांत बताया। भावुक होते हुए जानकारी दी कि उनकी शवयात्रा जैसे कोई ऐतिहासिक यात्रा हो। लोग अपनी रुंदली आवाज में ही सही उनके गीत गा रहे थे और परंपरा के विपरीत इस यात्रा में महिलाएं भी मौजूद थीं। भारत छोड़ो आंदोलन के दौर में जन्मे गिरदा एक फक्कड़ ग्रामीण गवैया थे। अल्मोड़ा शहर में आने के बावजूद उनके भीतर का ग्रामीण नहीं मरा। वो जय जगदीश हरे के संस्कारों को लेकर पैदा तो हुए पर जीया जन की परंपरा का जीवन। गिरदा को गीतों की प्रेरणा मोहन सिंह रीठागाड़ी, केशव अनुरागी और गोपीदास सरीखे लोकगायकों से मिली। गिरदा एक बार घर से भागे पर ऐसी जगह जहां पहाड़ का कोई आदमी भागकर नहीं जाता। वो पीलीभीत गये और वहां अपनी जीविका के लिये रिक्शा चलाया। वो कहते थे कि रिक्शा चलाना हल चलाने जैसा ही तो हुआ। गिरदा को जीवन भर एक रोग लगा रहा। संपत्ति न जोड़ने का रोग। उसकी आवश्यकताएं हमेशा न्यूनतम रही। एक कुर्ता पहना, झोला लटकाया और निकल पड़ा। कुछ समय पीडब्ल्यूडी में नौकरी करने के बाद सन 67 में वो संगीत एवं नाटक प्रभाग से जुड़े। उस दौर में उसने मोहिल माटी जैसे नाटकों का लालकिले में मंचन किया। विजेंद्र लाल शाह, पंचानन पाठक, कर्नल गुप्ते और लेनिन पंत जैसे संस्कृतिकर्मियों का साथ उन्हें मिला। सन 77 के दौर तक गिरदा के सांस्कृतिक जीवन का रूपांतरण हो चुका था। वहीं से वो विकसित रंगकर्मी के रूप में उभरे और अब तक की पूरी सांस्कृतिक प्रक्रिया में वो एक मिथक बन गये। उन्होंने नैनीताल की निर्ममता को इस तरह बदला कि पूरा नैनीताल सड़क पर आने को विवश हो गया। उन्हें केवल हिमालयी अंचल का मानना उन्हें छोटा करके देखना होगा। उन्होंने अपनी बाहर की खिड़कियां हमेशा खुली रखी। युगमंच, नैनीताल समाचार, उत्तरा जैसी कई शुरुआतें उनके बिना न हुई होती। गिरदा एक छुपे हुए पत्रकार भी थे। भागीरथी में आयी बाढ़ के दौर में उनका वो पत्रकार बाहर आया। बाबा नागार्जुन और उनके बीच एक फक्कड़ दोस्ती हुआ करती थी। वो दोनों एक ही बीड़ी को चूस चूस कर पीते। जहां एक ओर चंडीप्रसाद भट्ट, राधाबहन और शमशेर सिंह बिष्ट जैसे राजनीतिक कार्यकर्ता उनके मित्र थे, वही दूसरी ओर गीतकार नीरज और फैज जैसी शख्सीयतों से उनकी दोस्ती थी। झूसिया दमाई पर किया गया काम उनकी बहुगुणित रचनात्मकता का एक छोटा सा नमूना है। घोर अव्यवस्थित और अनियमित जीवनशैली के बीच भी अपने काम के लिए उनमें गजब का अनुशासन था। वो अपने आसपास के समाज को लेकर हमेशा चिंतित रहे और ये चिंताएं मुख्यत: तीन बिंदुओं पर केंद्रित रहीं। उत्तराखंड बनने की प्रक्रिया की दृष्टिहीनता एवं लक्ष्यहीनता, वामपंथी एवं जनपक्षधर ताकतों में उभरा विखंडन और जनांदोलनों के साथियों के बीच पनपी संवादहीनता। किसी काम की शुरुआत के बाद स्वयं पृष्ठभूमि में चले जाना उनकी आदत थी। ऐसे में उन्होंने समाज के बीच हमेशा खाद की तरह काम किया।

जैता एक दिन तो आलो!
नदी बचाओ अभियान की मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता राधा भट्ट ने बताया कि नदी बचाओ अभियान की शु्रुआत से लगभग 6 वर्ष पहले वो गिरदा से मिलीं। उनके गीत इतने लोकप्रिय थे कि लक्ष्मी आश्रम में पढ़ने आने वाली लड़कियां भावविभोर होकर उन्हें गाती। गिरदा जब आश्रम में आये, तो उन्होंने जाना गिरदा अन्य लोकगायकों की तरह धुन और लय के लिए नहीं बल्कि उनकी भावनाओं के लिए गाते थे। यह भावुक गायन ही था कि लोग इन गीतों से भावनात्मक जुड़ाव महसूस करने लगते। उनका गाया गीत जैता एक दिन तो आलो… कुमाऊंनी लोगों का वी शैल ओवरकम था। कोई भी जनांदोलन बिना जनकवि के चल ही नहीं सकता। आंदोलनों और उनकी पदयात्राओं में गिरदा के गीत महज कुछ पंक्तियों में वो सब कह जाते जो एक लंबे भाषण में भी नहीं कहा जा सकता। कोई भी प्रतिरोध शुष्क हृदय लेकर नहीं जन्म ले सकता, उसके लिए एक भावपूर्ण हृदय चाहिए। गिरदा जैसा हृदय।

जहां न अक्षर कान उखाड़ें
समकालीन तीसरी दुनिया के संपादक आनंद स्वरूप वर्मा ने बताया कि गिरदा के साथ वक्त बिताना एक आकर्षण की तरह था। उनके बिना नैनीताल की कल्पना करना भी बेमानी था। गिरदा के जाने से जो शून्य सांस्कृतिक जगत में पैदा हुआ है, उसे भरना लगभग असंभव है। उनकी लिखी एक कविता से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनकी संवेदना कितने आयामों के साथ अभिव्यक्त रही है…
कैसा हो स्कूल हमारा
कैसा हो स्कूल हमारा
जहां न बस्ता कंधा तोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहां न पटरी माथा फोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहां न अक्षर कान उखाड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहां न भाषा जख़्म उघाड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा
कैसा हो स्कूल हमारा
जहां अंक सच-सच बतलाएं, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहां प्रश्न हल तक पहुंचाएं, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहां न हो झूठ का दिखव्वा, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहां न सूट-बूट का हव्वा, ऐसा हो स्कूल हमारा
कैसा हो स्कूल हमारा
जहां किताबें निर्भय बोलें, ऐसा हो स्कूल हमारा
मन के पन्ने-पन्ने खोलें, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहां न कोई बात छुपाये, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहां न कोई दर्द दुखाये, ऐसा हो स्कूल हमारा
कैसा हो स्कूल हमारा
जहां न मन में मन-मुटाव हो, जहां न चेहरों में तनाव हो
जहां न आंखों में दुराव हो, जहां न कोई भेद-भाव हो
जहां फूल स्वाभाविक महके, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहां बालपन जी भर चहके, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहां न अक्षर कान उखाड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहां न भाषा जख्म उघाड़ें, ऐसा हो स्कूल हमारा
ऐसा हो स्कूल हमारा
गिरदा की रचनात्मकता को किसी एक शाखा में नहीं बांटा जा सकता। उन्होंने फैज और साहिर का कुमाऊंनी में अनुवाद किया तो नगाड़े खामोश हैं, अंधायुग और अंधेर नगरी जैसे नाटकों को मंचन और निर्देशन भी किया।

युवा चित्रकार और फिल्मकार रोहित जोशी
गिरदा पर शनिवार की शाम जनसंस्कृति मंच की ओर से राजेंद्र भवन (दीन दयाल उपाध्याय मार्ग) में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में कवि मंगलेश डबराल, कथाकार पंकज बिष्ट, आलोचक आशुतोष, मानवाधिकार कार्यकर्ता राजेंद्र धस्माना, सामाजिक कार्यकर्ता चंडीप्रसाद भट्ट ने भी गिरदा से जुड़े संस्मरण सुनाये। युवा कवि रोहित प्रकाश ने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति और साहित्यकार विभूति नारायण की छात्रविरोधी, महिलाविरोधी गतिविधियों के खिलाफ एक प्रस्ताव पढ़ा। आखिर में गिरदा पर एक फिल्म दिखायी गयी, जिसका संकलन-संपादन दिलीप मंडल और अभिषेक श्रीवास्तव के सहयोग से रोहित जोशी और उमेश पंत ने किया था। संचालन पत्रकार भूपेन ने किया।
♦ रिपोर्ट सौजन्य : नयी सोच ब्लॉग










बहुत अच्छी रिपोर्ट है भूपेन। मैं अब तक उनकी स्मृति में आयोजित किसी भी बैठक में शामिल नहीं हो सकी। बहरहाल, आपकी रिपोर्ट ने काफी कुछ वहां उपस्थित होने का अहसास दिलाया। धन्यवाद।
गिरदा के जीते जी मंडल साहब को उनके बारे में लिखने बोलने की ज़रुरत नहीं महसूस हुई… मंडल साहब को अब लग रहा है कि ‘हमारे समय के महानायक हैं गिरदा’… क्या बात है???
नाम न लेना कासिद भाई @ दिलीप मंडल का रिश्ता तो फिर भी साहित्य से कभी नहीं रहा (उन्होंने कभी किसी डेलहाइट साहित्यकार भी लिखा हो, ऐसा याद नहीं आता)। लेकिन मंगलेश डबराल और पंकज विष्ट जैसों की जबान पर ताला क्यों लगा रहा? क्या कभी रविवारी जनसत्ता का संपादन करते हुए मंगलू ने गिरदा को छापा था – या समयांतर के दर्जनों अंक निकल गये – कभी पंकज विष्ट ने इस जनकवि पर कोई लेख छापा?
मंगलेश डबराल… पंकज विष्ट… भाषा सिंह… आदि-आदि…
संस्कृति के दर्पण में ये जो शक्लें हैं मुस्कातीं
इनकी असल समझना साथी
अपनी समझ बदलना साथी
@समर शेष है
अरे गुरु गिरदा की पहचान लोककवि के साथ-साथ जन-आन्दोलनकारी की है…. फिर ये किसने कहा कि मंगलेश डबराल… पंकज विष्ट… भाषा सिंह… आदि-आदि… ने कुछ नहीं लिखा बोला तो ऐसा मंडल साहब भी न करें… अख़बारों के पृष्ठ तो वो भी कारे करते ही हैं
नैनीताल में कुछ दिनों पहले ही तो मिला था … दो दिनों की मुलाकात सालों की आत्मीयता … वो प्यार से बाबा कहना … मैं पांव छूने में यकीन नहीं रखता … लेकिन गिरदा से मिलते ही लगा सालों से इनसे बहुत कुछ सीखा-सुना है … मॉनसून एक्सप्रेस का मेरा सफर … गिरदा की कविताओं से ही पूरा हुआ …
फिर आई वर्षा ऋतु लाई … नव जीवन जलधार …
फिर बातों का सिलसिला … फोन पर हर दूसरे या तीसरे दिन … उनकी दो रचनाएं मेरे पास वीडियो में हैं … अगली बार किसी आयोजन में ज़रूर भेजूंगा …
साथियों एक गुजारिश है … ये फोरम गिरदा की याद में है … इसमें एक दूसरे की छीछालेदर ना करें … दुख होता है …
@ nam na lena kasid, गिर्दा के बारे में बात करने की न्यूनतम योग्यता फिक्श मत कीजिए। गिर्दा ने बहुत लोगों के जीवन को अपने अपने तरीके से छुआ है। वे आज उन्हें याद कर रहे हैं तो आप कह रहे हैं कि जिशने पहले लिखा है वही अब उन्हें याद करे। यह तो कोई बात नहीं हुई। गिर्दा हमे प्रिय हैं हम उन्हें याद करेंगे। मृत्यु के बाद गिर्दा किशी को कुछ बांट नहीं रहे हैं। इसलिए उन्हें याद करने वालों को शंदेह की नजर से क्यों देख रहे हैं। गिर्दा के बारे में बात करने का अधिकार हर किशी को है।
इसलिए को छोड़कर सभी स का श हो गया है। सुधारकर पढ़ें। फोंट का कुछ गलत हो गया मालूम पड़ता है।
गिर्दा पर अब तक कितना काम हुआ, नहीं हुआ ये कहानी अब पीछे छोड़ी जा सकती है और उसे मुददा बनाकर ‘ये शहर मीर का है यहां पगड़ी उछाली जाती है’ वाली धारणा को सच न किया जाये तो बेहतर। ये कोई सलाह नहीं महज इच्छा है उसकी जिसने बड़े भाव के साथ एक एक चीज गिर्दा पर आयोजित उस सभा के बीच से आप तक पहुंचाने की कोशिश की है। गिर्दा पर अब तक जो काम हुआ है और खुद उन्होंने जो विरासत हमारे लिये रख छोड़ी है क्यों न उसे सहेजा जाय ताकि उससे हम आप लाभान्वित हो सकें।
अनुराग आपकी वो रिपोर्ट देखी थी अगर आपके पास कोई भी सामाग्री उनके बारे में हो तो उपलब्ध करायें। हम चाहेंगे कि उसे उन पर संकलित वीडियो फुटेज कम डौक्यूमेंटी का हिस्सा बनाया जाये ताकि और कार्यक्रमों में भी गिर्दा की क्रान्तिकारी शालीन रचनात्मकता को दिखाया जा सके। कम से इतना तो हम उनके लिये कर ही सकते हैं उनके जाने के बाद ही सही।
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