वेब कुंठा को सार्वजनिक करने का साहस देता है

4 September 2010 at 17:49

प्रिय अविनाश जी,

मोहल्ला को नियमित पढता हूं। लेकिन कई बार यह देखने में आता है कि मोहल्ला पर कई खबरें बेहद असभ्य और अश्लील भाषा का प्रयोग करते हुए लिखी जाती है। जिसका उदाहरण इस लिंक में साफ दिखाई दे रहा है। एक वेबपोर्टल का संचालक होने के नाते आपसे यह आशा की जाती है कि आप प्रस्तुत की जाने वाली सामग्री की भाषा पर अंकुश रखें। क्योंकि एक पत्रकार होने के नाते आपसे पत्रकारिता के कर्तव्यों और आदर्शों के निर्वाहन की आशा की जाती है। कृपया इस ओर ध्यान दें।

अमृत पाल सिंह

5 September 2010 at 17:20

प्रिय अविनाश,

मोहल्ला पर प्रस्तुत सामग्री की भाषा के संबंध में कल आपको एक मेल भेजा था। आशा की थी कि आप जवाब देंगे। हो सकता है कि व्यस्तता के चलते आप मेल का जवाब ना दे पाये हों, लेकिन मुझे नहीं लगता कि एक वेबपोर्टल संचालक के पास ईमेल का जवाब देने में समय की कमी आड़े आती होगी। दुबारा आशा करता हूं कि आप इस मेल का जवाब देंगे।

अमृत पाल सिंह

4 September 2010 at 12:14 am

अविनाश जी, कुछ बातें मन में आ रही हैं। ये बातें तब भी आयी थी जब आप खुद ब्लॉगजगत में नये-नये आये थे। तब भी तकरीबन ऐसे ही मुद्दों को लेकर आपसे मेरी और कई अन्य लोगों की बहस हुई थी। आपके मोहल्ला ब्लॉग पर। आप अब एक वेब पोर्टल के माडरेटर हैं। एक बात बताइएगा जरा, संपादक की भूमिका तो आप अखबार में निभा ही चुके हैं पहले भी – क्या बतौर एक माडरेटर आपने जो हेडिंग दी है, क्या वही हेडिंग आप बतौर एक संपादक अपने अखबार में देने की हिम्मत है आप में? क्या कहते हैं आप? चूंकि तब अखबार में आपका प्रिंटलाइन में आपका नाम जाता – इसलिए ऐसा नहीं होता न, तो फिर यहां पोर्टल पर ऐसा क्यूं?

जवाब दे सकेंगे आप बंधु?

बाकी मुद्दे आप जिलाये रखें, जो मुद्दा मुझे पहले चुभा उस पर अपनी बात रख दी मैंने। आशा है, मेरा कमेंट प्रकाशित होगा।

संजीत त्रिपाठी

4 September 2010 at 12:19 am

इस तरह के शीर्षक साफ समझ में आते हैं अविनाश भाई कि सिर्फ TRP के चक्कर में ही दिये जाते हैं। कितने आश्चर्य की बात है न कि जो लोग टीवी चैनलों की खिल्‍ली TRP के मुद्दे पर उड़ाते रहे हैं, वे खुद अपने वेब पोर्टल पर इसी TRP के चक्कर में ऐसे शीर्षक लगाते हैं… इसे क्या कहा जाए, क्या आप बता सकते हैं?

संजीत त्रिपाठी


और भी कई सारी क्‍वेरीज थी, कई मित्रों की। मेरा शुरू से मानना रहा है कि वेब माध्‍यम वर्जित दुनिया का एक सार्वजनिक दृश्‍य इसलिए भी है, क्‍योंकि इसका कम्‍युनिकेशन अपने यूजर्स से व्‍यक्तिगत स्‍तर पर होता है। सवाल ये किया गया कि क्‍या आप अखबार में होते, तो क्‍या ऐसी भाषा, ऐसे शब्‍द के प्रयोग कर सकते थे? कतई नहीं कर सकता था। मुझे मालूम है, पारंपरिक मीडिया के साथ हमें किस किस्‍म से पेश आना है या वहां पर किस तरह से अपनी भूमिका निभानी है।

एक अखबार किसी घर में आता है और हाथ हाथ होते हुए सारे सदस्‍यों के पास जाता है। अखबार के पन्‍ने और कंटेंट एक होते हैं – पाठक अलग अलग। यानी पिता ने अखबार के जिस हिस्‍से को पढ़ा, थोड़ी देर बाद वही हिस्‍सा बेटे के सामने भी हो सकता है। वैसे ही टेलीविजन एक घर में एक या दो सेट हो सकता है और घर के तमाम सदस्‍य एक साथ उसके उपभोक्‍ता/दर्शक हो सकते हैं। इसलिए अखबार या टेलीविजन की पत्रकारिता करते हुए हम इस बात के लिए सजग रहते हैं कि हम एक ऐसे समूह को एड्रेस कर रहे हैं, जो व्‍यक्तियों में बंटा हुआ नहीं है। लेकिन वेब के साथ ऐसी बात नहीं है।

एक घर में एक कंप्‍यूटर है, तो उस घर के जितने भी सदस्‍य उसके यूजर होंगे, उनके सामने उनकी रुचियों/दिलचस्पियों के हिसाब से कंटेंट आएगा। यानी अगर संजीत त्रिपाठी अपने पीसी पर मोहल्‍ला लाइव डॉट कॉम देखते हैं, तो जरूरी नहीं कि उसी पीसी पर उनके परिवार का कोई दूसरा सदस्‍य भी यही साइट देखेगा।

ये तो रही माध्‍यम की उपभोक्‍ता के साथ रिश्‍तों को समझने की तकनीकी बात। अब इस बात पर आते हैं कि कोई मॉडरेटर अपनी साइट पर कैसी भाषा बरतता है। मैं शुरू से ये मानता रहा हूं कि वेब एक ऐसा मीडियम है, जिस पर आप अपनी आदिम जिद के साथ पत्रकारिता कर सकते हैं। अगर एक वीसी ने अपशब्‍द कहा है कि तो टेलीविजन में उसको दिखाते हुए हम उसकी आवाज को पिंग कर सकते हैं, अखबार में उसे रिमूव कर सकते हैं या उस वीसी की किसी भी किस्‍म की प्रदर्शित अश्‍लीलता को दोनों ही माध्‍यमों में मोजैक कर सकते हैं – लेकिन वेब हमें उस आदमी की कुंठा को वैसे ही सार्वजनिक कर देने का साहस देता है।

एक बात और जो मैं जहां मौका लगता है, कहता हूं – वेब का उपयोग हम अपनी छिपी हुई भावनाओं के साथ कर सकते हैं। मसलन हमारी प्रकृति मूलत: अफवाह फैलाने की है और तो वेब का इस्‍तेमाल ऐसे ही करेंगे। अगर पोर्नोग्राफी हमारे व्‍यक्तित्‍व का हिस्‍सा है, तो आप देखिए कि हजारों ऐसी साइट है – जिस पर खुलेआम पोर्नकथाएं बांची जाती हैं। इसलिए वेब में किसी की भी गतिविधियों से हम या आप सहमत-असहमत जरूर हो सकते हैं लेकिन उसको दूसरे माध्‍यमों से जोड़ कर किसी भी एथिक्‍स या नियम में नहीं बांध सकते।

बात जारी रही, तो मैं आगे भी अपनी बात रखूंगा। शुक्रिया।

अविनाश

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *