माओवादी मुंबई के टपोरी गुंडों से अलग से नहीं हैं!

♦ आलोक तोमर

माओवाद के बहुत सारे आरामतलब प्रशंसक हैं, जिन्हें ये आपराधिक गिरोह एक नयी क्रांति की आहट देता नजर आ रहा है। लगातार लाशें गिर रही हैं, लगातार उस समाज के साथ माओवादी विश्वासघात कर रहे हैं, जिसे बदला हुआ और चमकता हुआ चेहरा देने का उन्होंने वादा किया है। जान पर खेलने वाले वैसे भी अपने आप नायक मान लिये जाते हैं इसलिए माओवादियों को भी नायक मानने वाले पेशेवर बुद्विजीवियों की अपने यहां कोई कमी नहीं है। इन लोगों को कश्मीर के जेहादियों को भी पूजना चाहिए क्योंकि वे भी एक तथाकथित पवित्र धारा के विचार के लिए लड़ रहे है।

एक फैशन सा हो गया है कि जो प्रतिष्ठान के खिलाफ बगावत करे उसे प्रतिष्ठा के मंच पर पहुंचा दो। अपने यहां माओवादियों के साथ भी यही हो रहा है। जैसे चंबल घाटी में कई डाकू गिरोहों को सिर्फ इसलिए आदर का पात्र मान लिया जाता है क्योंकि वे गरीबों को नहीं सताते और औरतों को हाथ नहीं लगाते, माओवादियों को भी एक आयातित विचार को ले कर मैदान में उतरने की वजह से काफी विमर्श का अवसर मिल रहा है।

यह बात अलग है कि जैसे भारत की पुलिस और सरकार और मंत्री और विधायक और सांसद और अफसर और पंच और ग्राम सभाएं पवित्र नहीं हैं और उन पर अनेक कारणों से अनेक संदेह किये जाते हैं, अपने आपको माओवादी कहने वाले अपराधी गिरोह भी चारित्रिक पतन और सिर्फ भारतीय दंड विधान के नहीं अनैतिकता के अपराध के भी दोषी हैं। आदिवासियों को साथ लेकर लड़ने वाले इन माओवादियों ने सबसे ज्यादा कत्ल आदिवासियों के ही किये हैं। भले ही मुखबिर कह कर किये हों या सरकार का एजेंट कह कर। उनकी समानांतर सरकार की अपनी अदालतें हैं, जिनका कोई दंड विधान नहीं है। रही भारत सरकार की बात तो वह भी कम कायर साबित नहीं हुई।

मनमोहन सिंह जब अचानक एक बाबू छाप नेता से प्रधानमंत्री बन गये थे, तो 2004 में उन्‍होंने पहला बयान यही दिया था कि माओवादी देश के सबसे बड़े दुश्मन हैं और देश की अखंडता को सबसे बड़ा खतरा उन्हीं से है। यही मनमोहन सिंह आज कल फरमाते हैं कि माओवादी भी हमारे भाई हैं और उनसे बातचीत की जा सकती है। माओवादियों के शुभचिंतक जेल में डाल दिये जाते हैं और उनके मुखबिर गोली से उड़ा दिये जाते हैं तो माओवादियों के इस सरदार भाई के साथ क्या किया जाना चाहिए? यह ऑपरेशन ग्रीन हंट चलाने वाले सोचें।

अपने देश में और खास तौर पर सिनेमा के जरिये बनायी गयी रूमानी धारणा के तहत वर्दी वालों से एक उद्देश्य ले कर लड़ने वालों को हीरो माना जाता है। माओवादियों के साथ भी समाज का एक वर्ग जिसमें बहुत सारी अरुंधतियां शामिल हैं, यही कर रहा है। किसी गलतफहमी में मत रहिए। रॉबिनहुड के वेश में अपने आपको प्रस्तुत कर रहे माओवादी मुंबई के टपोरी अंडरवर्ल्ड के शूटर्स और वसूलीबाजों से ज्यादा कुछ नहीं हैं। उनके पास सत्ता बदलने का एक फर्जी मुहावरा जरूर है, लेकिन बदली हुई सत्ता में और व्यवस्था में वे क्या तीर मारने वाले हैं इसका कोई विधान उनके पास हो तो भी आज तक सामने नहीं आया।

यहीं पर जरा विकास-विकास खेल लेते हैं। अचानक पिछले एक डेढ़ साल से माओवादी हिंसा को परिभाषा और तर्क देने वाले बुद्विजीवी सरकारी आंकड़ों के जरिये ही कहते हैं कि चूंकि भूमि का वितरण ठीक से नहीं हुआ, वनवासियों और आदिवासियों के अधिकार उन्हें नहीं मिले, उन्हें कोई विकास का अवसर नहीं मिला और जंगलों में जंगल राज चलता रहा इसलिए माओवादियों को परिवर्तन के लिए आना पड़ा। अब यह कौन पूछे कि जंगल राज के बदले माओवादी कौन सा मंगल राज चला रहे हैं? विकास की बात करते हैं और दो हजार स्कूल और ग्यारह सौ से ज्यादा डिस्पेंसरियां उन्होंने तोड़ डाली हैं। हथियार खरीदने से लूट की जो चिल्लर बचती है, उससे छोटी-मोटी गोलियां खरीद कर आदिवासियों में बांटते हैं और उन्हें चिकित्सा शिविर का नाम दे देते हैं। हमारी सरकार जहां आज तक डॉक्टर तो क्या, कंपाउडर तक नहीं पहुंचा पायी, वहां इनका मसीहा बनना लाजमी है।

गरीबी और पिछड़ापन हिंसा के मददगार हो सकते हैं, मगर तर्क नहीं। आधार भी नहीं। कारण तो कतई नहीं। अगर हिंसा से समाज बदलता, तो नक्सलवाद कब का सफल हो चुका होता और कानू सान्याल को अपने जीवन के अंतिम वर्षों में अपनी सैद्धांतिक असफलता से आहत हो कर और माओवादी गुंडागर्दी को धिक्कार कर फांसी नहीं लगानी पड़ती। माओवादियों ने अगर माओ को पढ़ा होता तो उन्हें पता होता कि माओ ने कानू सान्याल और चारू मजूमदार दोनों से बीजिंग बुला कर कहा था कि अपने देश की परिस्थितियों के हिसाब से समाज बदलने का संघर्ष करना चाहिए। मगर ज्यादातर माओवादी अनपढ़ हैं और जो पढ़े लिखे हैं, उन्हें माओवाद का असली वैचारिक आधार जानने तक नहीं दिया जाता। दलम की कुछ विचार बैठकों और शिविरों में जाने का अवसर मिला है और वहां सिर्फ यही सिखाया जाता है कि जो लाल झंडे के नीचे नहीं है और तिरंगे झंडे का सम्मान करता है, उसे दुश्मन मानो। माओवादी उन एनजीओ की तरह है जो विकास के नाम पर बदलाव के नाम पर देश परदेस से वसूली करते हैं और गिरोह चलाते हैं।

वामपंथी और खास तौर पर भारत की माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी के संविधान में लिखा है कि महिलाओं को बराबर का दर्जा और अधिकार दिये जाएंगे। महिलाएं माओवादी आंदोलन में कॉमरेड की भूमिका में हथियार ले कर लड़ रही है और उनमें से कई मारी भी गयी है। लेकिन जब इन महिलाओं में से कुछ अपने कमांडरों और साथियों पर यौन शोषण का आरोप लगाती हैं और वह अखबारों में टीवी पर आता है तो इसे फटाफट पूंजीवादी प्रचार कह कर खारिज कर दिया जाता है। सेवा में सविनय निवेदन यह है कि आदर प्रतिष्ठा और गरिमा का उतना ही हक माओवादी दलम में हथियार ले कर घूम रही महिलाओं को है, जितना पुलिस की महिला सिपाहियों को। इसलिए इस पर शील और सिद्धांत के कवच चढ़ा कर बहस नहीं करनी चाहिए।

जो भाई लोग और बहनजियां माओवाद को एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक घटना मान कर अपने आपको भी प्रगतिशील घोषित करना चाहते हैं, उन्हें उनकी गलतफहमियां मुबारक हो, मगर एक बार जंगल में सफल हुए तो आपकी दहलीज तक माओवादी हिंसा को बहुत बेशर्मी से पहुंचने से भी कोई नहीं रोक पाएगा और तब आप विचार और धारणाएं और इतिहास और सिद्धांत से नहीं बल्कि हिंसा के सामने घुटने टेकने से ही बचेंगे। वक्त है, अब भी अपराधियों को पहचानो। सरकार और सरकारें परम भ्रष्ट हैं, मगर वे चुनी ही इसलिए जाती हैं क्योंकि आप घर से वोट देने निकलते नहीं हैं और बाकी वोटों का मैनेजमेंट हो जाता है। माओवादियों से कहा जा रहा है कि वे चुनाव लड़ें। जब उनसे कहा जा रहा है तो भैया पप्पू यादव, शहाबुद्दीन, आनंद मोहन और अंसारी को क्यों रोका जा रहा है? माओवादी अपराधी हैं – संविधान और सरकार से ज्यादा आपके और अगर आपको यह मंजूर नहीं है, तो आपका भविष्य आपको मुबारक हो।

Alok Tomar(आलोक तोमर। युवा तेवर वाले वरिष्‍ठ जुझारू पत्रकार। जनसत्ता से पत्रकारीय फलक का विस्‍तार। राजनीति से लेकर अंडरवर्ल्‍ड तक पर उन्‍होंने कलम चलायी। अटल‍ बिहारी वाजपेयी के लिए उनके प्रधानमंत्रित्‍वकाल में भाषण लिखा। प्रभाष जोशी के बेहद अंतरंग रहे। उनसे aloktomar@hotmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *