देखते जाइए : बदलेगा बाजार, सिनेमा बदलेगा

♦ रवीश कुमार
हिंदी सिनेमा का विकल्प तो मुख्यधारा सिनेमा में भी है। पीपली लाइव एक वैकल्पिक सिनेमा है, जिसने विकल्प को अलग तरीके से पारिभाषित किया है। देव डी से लेकर ओमकारा जैसी कई फिल्में बनी हैं, जो विकल्प को मुख्यधारा की पटरी पर लाती हैं। हिंदी सिनेमा के बाहर विकल्प की संभावना पर बात क्यों कर रहे हैं? जो चीज हमारे सामने मौजूद है, उसे देखने की कोशिश क्यों नहीं कर रहे हैं? आज हिंदी सिनेमा मनोरंजन का एकमात्र सिनेमा नहीं है। इसे समझने के लिए हमें हिंदी सिनेमा के पैन इंडियन होने के सवाल से भी दो चार होना चाहिए। क्या हिंदी सिनेमा कम से कम उत्तर भारत में पैन इंडियन सिनेमा है? वो अपना बाजार ग्लोबल मार्केट में ढूंढ रहा है या हिंदी प्रदेशों के कस्बे के भीतर। जब से हिंदी सिनेमा ने मल्टीप्लेक्स की गली पकड़ी, उस दौरान एक बदलाव आ रहा था। नकली सीडी का। लोगों तक सिनेमा इस मार्केट के जरिये पहुंचा। हुआ ये कि वो जो तबका, जो बड़े पर्दे पर सिनेमा झूम के देखता था, वो उस सिनेमा को अपनी झुग्गी में देखने लगा। छोटे पर्दे की आदत लगी, तो एक बाजार अपने आप बन गया, जो हिंदी सिनेमा के बाहर का था। मेरठ में अलग से बालीवुड बन गया। गांव-गांव में भोजपुरी के अपने अलबम बनने लगे। सिनेमा से लेकर फूहड़ गानों तक। इनके सिनेमा को आप अश्लील और फूहड़ कह सकते हैं – बस जरा ध्यान रखना होगा कि मुन्नी बदनाम हो गयी और लौंडा बदनाम हो गया में क्या फर्क है।
लाखों लोगों के घर में चाइनीज और लोकल डीवीडी ने हिंदी सिनेमा के स्वरूप को बदल दिया। आप किसी भी कस्बे, गांव या फिर महानगरों की उन बस्तियों में जाइए, जहां सीडी की दुकानें सजी हैं। वहां देखिए, क्या बिक रहा है। हिंदी सिनेमा के नकली सीडी भी बिक रहे हैं लेकिन ज्यादातर पंजाबी, भोजपुरी, हरियाणवी, राजस्थानी, छोटानागपुरी, मैथिली के वीडियो अलबम और फिल्में बिक रही हैं। मेरठ, लुधियाना, मालेगांव, बक्सर… ये सब सिनेमा के नये केंद्र हैं। हर दिन गांव-गांव में क्रेन लगाकर शूटिंग हो रही है। रिजेक्टेड कलाकार गुरुद्वारे में रुकते हैं। उनके लंगर का खाना खाते हैं और शूटिंग होती है। ऐसी ही एक शूटिंग मैंने भी देखी है। हिरोइन चूल्हे पर रोटी बना रही थी और हीरो विलेन के साथ चौकी पर सो रहा था। डायरेक्टर ट्रैक्टर चलाकर जमीन समतल कर रहा था। दस-बीस दिनों में सीडी तैयार। फिल्म का नाम रख दिया गया – गाने सुपरहिट।
बीस से पचीस रुपये की इन सीडी के टाइटल आपको अच्छे न लगें, लेकिन करोड़ों घरों में मौजूद हैं। रेट बोल जवानी के, किस देबू का हो से लेकर धाकड़ छोरा। हरियाणा में लड़के अपने मोबाइल में रागिनी अपलोड कर सुन रहे हैं। दिल्ली के कापसहेड़ा में काम करने वाले प्रवासी मजदूर के मोबाइल में किसी भोजपुरी फिल्म का वीडियो क्लिप अपलोड था। हर शादी-ब्याह में अब लोकल सिनेमा के गाने बजने लगे हैं। इनके कलाकारों के पास पैसा भले इफरात में न आया हो, लेकिन शोहरत आ गयी है, जो बता रहा है कि हिंदी सिनेमा के बाहर दर्शकों का एक समाज तो बन ही गया है। हरियाणवी, भोजपुरी और राजस्थानी, मैथिली, ब्रृज भाषा और कुमाऊंनी में फिल्में कौन बना रहा है। बिना सेंसर बोर्ड के नखरे के ये फिल्में खूब बन रही हैं और चल रही हैं। ये और बात है कि इनके कंटेक्ट हिंदी सिनेमा की ही तरह हैं लेकिन इनमें से कई फिल्में बिल्कुल ओरिजनल और फ्रैश हैं।
हाल ही में दिल्ली में एक लौंडा मिला। पूर्वांचल का लौंडा डांस आप जानते होंगे। बोला कि दिल्ली में हमारा खूब मार्केट है। मेरी कई सीडी निकल गयी है। फिल्म भी और वीडियो अलबम भी। अभी बक्सर गयी थी शूटिंग के लिए। पटना जा रही हूं सीडी लांच के लिए। भोजपुरी और मैथिली के सीरीयल बनने लगे। उसके पास टाइम नहीं है। सैकड़ों लोग गैर हिंदी बोलियों में गाने लिख रहे हैं, फिल्में बना रहे हैं। मेरठ की एक हिरोइन ने मेरे साथ शहर में निकलने से मना कर दिया। कहा कि लोगों की भीड़ हो जाती है और पुलिस नाराज हो जाती है। आप अनुमति ले आइए। उसकी ठसक किसी माधुरी दीक्षित से कम नहीं थी। जिस कमरे में वो अपने नखरे दिखा रही थी, उसमें एक पंखा था। फोल्डिंग कॉट और छोटा सा टीवी। हिंदी सिनेमा के स्टार अब सबके स्टार नहीं हैं। सलमान खान को छोड़ दें, तो कम हीरो हैं जो सर्वव्यापी हैं।
लोनी के एक सिनेमा हॉल के मालिक ने बताया कि सलमान की दबंग आएगी, तो आइएगा। तब पता चलेगा कि सिनेमा की भूख क्या होती है। लोग एक महीना पहले से हॉल में आकर पूछ गये हैं कि कब आएगी फिल्म। गाजियाबाद और सीलमपुर में सस्ते मल्टीप्लेक्स बने हैं, जिनके टिकट तीस से पचास रुपये के हैं। हिंदी सिनेमा को इस बाजार में आना ही होगा, वरना फिल्में अब रिव्यू करने वाले ही देखा करेंगे। हमें यह भी ध्यान रखना है कि सिनेमा मनोरंजन का एकमात्र साधन नहीं है। टीवी से उसकी प्रतियोगिता है। सीरीयलों की नायिकाएं बिपाशा और रानी मुखर्जी से ज्यादा लोकप्रिय हैं। आप गांधीनगर जाइए – रानी और करीना की स्टाइल के कपड़े कम, रिश्ता क्या कहलाता है की हिरोइन की स्टाइल के कपड़े ज्यादा चल रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि पहले पंजाबी गाने या फिल्में नहीं बनती थीं। बनती थीं। लेकिन वो मुख्यधारा के बराबर की नहीं थीं। अब आप कह सकते हैं कि इसे सिनेमा मानें या न मानें। मत मानिए। आपकी मर्जी। आप क्या मानते हैं, उससे फर्क नहीं पड़ता। स्थानीय स्तर पर प्लॉट रचे जा रहे हैं, उन्हें हैंडीकैम से फिल्माया जा रहा है। एडिटिंग मसला नहीं रहा। सिनेमा के ग्रामर पर आम लोगों का हैमर चल रहा है। सबके हाथ में कैमरा है।
अब सिर्फ गुलजार लोकप्रिय नहीं रहे हैं। राजीव अलबेला भी स्टार है। भरत शर्मा व्यास को भी लोग जानते हैं। यही वजह है कि सीरीयलों के बैकड्राप बदल रहे हैं। लापतागंज और इलाहाबाद फिर से आ रहा है। सिनेमा और सीरियल दोनों को अपनी पुरानी जमीन तलाशनी होगी। फिल्में हिट और फ्लॉप के पैमाने से चलती हैं। अ-मुंबइया फिल्मों के बाहर की फिल्मों ने भी सीडी में ढल कर पैसा कमा कर दिखाया है। मराठी पंजाबी भोजपुरी ये सब हिंदी सिनेमा के बाजार से अपना हिस्सा ले रही हैं।
अब सवाल फिर से सामने है कि क्या ये विकल्प हैं। हैं। विकल्प का मतलब सिर्फ नयी कहानी नहीं होता। नया बाजार भी होता है। नया दर्शक वर्ग भी होता है। कई भाषा बोलियों के सिनेमा का बाजार अब हिंदी सिनेमा के बाजार के समानांतर है। देश में करोड़ों लोग सिनेमा हाल नहीं जा रहे हैं। उनके लिए बड़े पर्दे के रोमांस की यादें धुंधली होती जा रही हैं। वो अब छोटे पर्दे पर बैटरी चार्ज कर फिल्में देख रहे हैं। गाजियाबाद में मेरे घर के सामने एक बड़ा सा मॉल खुला है। उसके पीछे झुग्गियों में मजदूर रहते हैं। एक दिन गोधूलि बेला में पहुंचा, तो देखा कि दरी बिछा कर आठ-दस बच्चे और इतनी ही संख्या में मर्द बाहर बैठे हैं। अंदर औरतें बैठी हैं। छोटे टीवी पर डीवीडी प्लेयर रखा हुआ है। कोई भोजपुरी फिल्म शुरू होने वाली थी। माहौल ठीक वैसा जैसा सिनेमा का होता है। बस हिंदी सिनेमा नहीं था।
(रवीश कुमार। टीवी का एक सजग चेहरा। एनडीटीवी इंडिया के फीचर एडिटर। नामी ब्लॉगर। कस्बा नाम से मशहूर ब्लॉग। दैनिक हिंदुस्तान में ब्लॉगिंग पर एक साप्ताहिक कॉलम। इतिहास के छात्र रहे। कविताएं और कहानियां भी लिखते हैं। उनसे ravish@ndtv.com पर संपर्क किया जा सकता है।)










ravish ji aapne sahi likha hai. bazar ko apna mal bachne ke liye dehat main jana hoga.aisa ho b raha hai. 25 se 30 ke beech ke yuva pedi apni traha ke cinema ko banane main lagi hai.thoda time lagega lakin jo aap ne likha hai vaisa hi hoga. ab film mumbia cinema se bahar nikal rahi hain.
आमीन…
पिछले कुछ सालों में मुख्यधारा की सीमारेखा में भी कुछ सकारात्मक बदलाव जरूर लक्षित किय़ा गया है… संकीर्णताएँ कम हुई है. अच्छे विषय सामने आए है…आशा है ऐसे प्रयास जारी रहेंगे. शुक्रिया.
Raveeshji,
Yahaan “mahangayee” se jyada chinta logon ko (or should it be read as channels sponsered by political parties???) “Mahangayee dayan khaye jaat hai…” ki hai . Fir koi ashcharya nahi ki within weeks ” mahangayee” gayab aur “Dabang” shuru….
Kya hoga is desh ka?
मनोरंजन के इस अर्थशास्त्र में बदलाव का एक पुख्ता सबूत मेरे हाथ भी लगा है। मेरे धंधे(मोबाइल पर संगीत की बिक्री)में भी राजस्व का लगभग एक तिहाई हिस्सा इस तरह से सृजित हो रहे संगीत से ही आ रहा है।
ravish ji jisee app वैकल्पिक सिनेमा keh rahe hain kya who sach much hee वैकल्पिक सिनेमा hai…..??????
aap jo kahate hai .
hum bhi jante hai
par
kahna kahan jante hai
isliye
boss aapko mante hai,
ek din talchhat ki kavita
gayi jayegi
jo daur aa rahi hai
wo jarur aayegi
kala ke kshetr ka dalit
nayak banega
apne tole ka bhima gayak bnega.
आप का पंजाब के दलित गीतों का प्रोग्राम अद्भुत था
हैरानी है की मध्य भारत और झारखण्ड के आदिबासी…. गीतों और सिनेमा में वह नहीं कर पा रहे है जो देश के बाकि भागो में हो रहा है
कारण शायद यहा का माध्यम वर्ग बाकि छोटी पहचानो के जैसा नहीं है
पर वैश्विक पूजीवाद के कारण उपलब्ध हुवा यह डिजिटल माध्यम छोटी और दबाइए गयोई पह्छानो के लिये अभिब्यक्ति का मुख्य साधन बने गा
कार्यक्रम के लिये धन्यवाद
shriprakash
बाजार को केवल मुनाफा चाहिए .इसे रंगीला [उर्मिला ] से पैसा मिलता है या गुड्डू रंगीला से, क्या फर्क पड़ता है .गाँव को बाज़ार में जगह नहीं मिल रही है . अब गाँव ही बाज़ार में तब्दील हो रहा है .गाँव के मूल्य और मायने बदल रहे है . मनोरंजन के आधार भी बदल रहे हैं .बाज़ार अब गाँव की ओर … बाज़ार से सृजन की उम्मीद ठीक नहीं .मनोरंजन उद्योग का गाँव एक बड़ा बाज़ार बन रहा है . इस माल में न तो वह मूल्य है न ही मज़ा …………….इसे विकल्प के तौर पर नहीं देखा जाय
मुन्नी अवश्य ही बदनाम होगी मुनाफा के लिए .लोंडा का नाच देख कर ही बड़ा हुआ हूँ .आलपिन में दो टके का नोट खोंस कर खूब शुक्रिया अदा करवाता था .द्विअर्थी क्या ,हम सीधे गाली ही देते थे .हमारी गाली भी सुंदर थी ,एक गीत थी , संगीत थी .सांस्कृतिक आक्रमण का आरोप कभी नहीं लगा हम पर ..तमाम कथित भदेसपन के बाबजूद हम जिन्दा थे ,हमारे मनोरंजन के आधार जीवंत थे .मेरठ में moolliwood ? हम बजरूआ लड़का से बियाह नहीं करबै कहने वाली बबुनी अब स्वयः बाज़ार जाने के लिए बेचैन है .एक ही चुम्मा के लिए हम यूपी और बिहार दे रहे थे .आज बाज़ार चूमने के लिए खड़ा है ,यह खतरे की घंटी है .वैकल्पिक सिनेमा तो कतई नहीं . यह वैकल्पिक बाजारवाद है , बाज़ार नहीं
”गाजियाबाद में मेरे घर के सामने एक बड़ा सा मॉल खुला है। उसके पीछे झुग्गियों में मजदूर रहते हैं। एक दिन गोधूलि बेला में पहुंचा, तो देखा कि दरी बिछा कर आठ-दस बच्चे और इतनी ही संख्या में मर्द बाहर बैठे हैं। अंदर औरतें बैठी हैं। छोटे टीवी पर डीवीडी प्लेयर रखा हुआ है। कोई भोजपुरी फिल्म शुरू होने वाली थी। माहौल ठीक वैसा जैसा सिनेमा का होता है। बस हिंदी सिनेमा नहीं था। ”
रवीशजी, बिल्कुल ऐसा ही नहीं पर मिलता-जुलता एक तजुर्बा मुझे एक बार यमुना पुश्ता पर हुआ. मैं बेघर लोगों की कहानियां ढूंढने यमुना पुश्ता पर निकला था. यमुना किनारे रात के ढाई बजे, लगभग 50-60 बेघर कंबल, और प्लास्टिक की चादर ओढे टीवी और सीडी प्लेयर की मदद से कोई फिल्म देख रहे थे. पूछने पर पता चला कि ये लोग सो कर सर्दी नहीं काट सकते इसलिए इसी तरह जग कर सर्दी काट लेते हैं सिनेमा देखते हुए. बगल में कोई अपना चाय का धंधा भी रात भर चलाता है. चाय की गर्मी के सहारे छोटे पर्दे पर अपना अक्श ढूंढते रात काट देता है शहर का एक तबका …
रवीश जी,
मल्टीप्लेक्स तो केवल पैसों वालों का नया खेल है.. भारत में दो ही तरह के लोग हैं.. बहुत अमीर और बहुत गरीब…
जो बहुत अमीर हैं, वो मल्टीप्लेक्स जाते हैं और पॉपकॉर्न खाते हैं..
जो बहुत गरीब हैं, वो झुग्गी में बैठकर मूंगफली खाते हैं.. बस यही फर्क है..
पर यह बात सही है कि आम लोगों के लिए छोटे परदे वाली बातें ही ज्यादा अनुकूल हैं..
वैसे बहुत ही अच्छा लेख लगा मुझे..
आभार
इसमें कुछ भी नया नहीं है। आंचलिक कलाकार पहले भी मशहूर रहे हैं। हम राजधानीवासियों को ये हैरतअंगेज लगता है क्योंकि हमारा माइंडसैट इस तरह का होता है मानो जो अब तक देखा वही सही है। जो ना देखा उसे एक्सक्लूज़िव बता दो। पहले कैसेट निकालने की होड़ हुआ करती थी। समय बीतने के साथ कैमरा यूनिट वगैरह सब सस्ता हो गया। उपकरणों की गिरती लागत से लोगों ने फिल्म या गाने शूट का घरेलू उद्योग खोल लिया। जैसे कभी लोकल कैसेट कंपनियां किया करती थी। तब भी घर-घर कैसेट बिका करते थे। दस पंद्रह रुपए में। आकाशवाणी सुनने-सुनाने वाले जानते हैं कि लोक कलाकारों का क्या जलवा होता था। आज भी होता है। वे भी अब वीडियो बना रहे हैं।
किंतु अपमार्केट सिनेमा पर इसका कोई असर नहीं होगा क्योंकि उसका अपना वर्ग है। हाईक्लास, मिडिल क्लास शहरी और वह ग़रीब भी जो इसे इस चाह में देखता है कि वो ग्लोबल होने का भ्रम बनाए रख सके।
नया क्या है। नया उनके लिए है जो मुख्यधारा के चैनल जिसे अपमार्केट चैनल कहा जाता है। वही दर्शक या पत्रकार इसे नया मानते हैं।
आत्ममुग्ध रिपोर्टिंग के लिए आभार।
रवीश जी मुझे तो यह नौटंकी का विकल्प सा लगता है । मेरे बचपन मे नौटंकी के कलाकारों का क्रेज कम नही होता था । हम छोटे थे तो उनसे हाथ मिला कर या मिल कर बहुत खुश हो लेते थे ।
रही बात शीर्षक की तो बिकने के लिए आकर्षित भी तो करना पड़ता है ।
ravish ji,
ek baar phir se ek badhiya post padh kar accha laga. aapne sahi likha, jaisa hum advertising waale log bolte hain, market to wahi hai, target audience bhi vahi hai, but competition ‘hot’ ho gaya hai Hindi cinema ke liye!
nayi vastviktaon ke sath badla to theek, nahi to sirf kuch multiplex aur sirf kuch hi dekhne waale reh jayenge mainstream Hindi cinema ke.
Leave your response!
पुराने पन्ने
Categories
Tag Cloud
abraham hindiwala anil chamadia anna hazare anurag kashyap arundhati rai arundhati roy Bahastalab bihar dalit dilip mandal gorakhpur hindi hindi cinema Hindi language Hindi Literature hindi media jansatta jawaharlal nehru university JNU Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi Vishwavidyalaya mahatma gandhi international hindi university maoism maoist MGIHU mihir pandya namwar singh naxal naxalism naya gyanodaya Nirupama Pathak om thanvi prabhash joshi prabhat khabar Prakash K Ray rajendra yadav ravindra kaliya ravish kumar uday prakash vibha rani Vibhuti Narayan Rai Vice Chancellor vineet kumar vn rai women मीडिया मंडीRecent Posts
Most Commented
Recent Comments