क्‍या हमारे फिल्‍मकार हमारे सवाल सुनेंगे, जवाब देंगे?

♦ मिहिर पंड्या

मिहिर ने अपनी यह टिप्‍पणी हमें बहसतलब शुरू होने से पहले छापने के लिए भेजी थी, लेकिन आयोजन की व्‍यस्‍तताओं के चलते हम इसे आज प्रकाशित कर रहे हैं। पाठकों और मिहिर से माफी : मॉडरेटर

मुझे सटीक प्रतीकों की तलाश में कदम पीछे ले जाने की बुरी आदत है। इसलिए आज मेरे सवाल भी अपने नाप की पोशाक अपने पुरखों के घर से तलाशने निकले हैं। यह इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि यह हिंदी सिनेमा की वो आदिम कहानी है, जिसे सुनाकर सिनेमा पर होने वाली किसी भी ’बहसतलब’ का श्रीगणेश होना चाहिए। मैंने यह कहानी सुनी हिंदुस्तान के पहले फिल्मकार और भारतीय सिनेमा के भीष्म पितामह कहे जाने वाले धुंडीराज गोविंद फालके (मशहूर शब्दों में ’दादा साहब फालके’) पर बनी प्रामाणिक बायोपिक ’हरिश्चंद्राची फैक्टरी’ में। वो उन्नीस सौ बारह का साल था, जब फाल्के ने पहली बार कोई फिल्म देखी थी, ’लाइफ ऑफ क्राइस्ट’। फिल्म में वो प्रसंग बड़े मजेदार किस्से के रूप में आया है। फाल्के पहली बार ’चलती-फिरती’ फिल्म देखकर चमत्कृत थे। जैसे कोई जादू हो। एक दिन देखी… दूसरे दिन देखी… शायद तीसरे दिन फिर से देखी। जादू!

लेकिन यहां एक चीज है, जो फाल्के को और तमाम भीड़ से जुदा करती है। फाल्के पहली बार तो चमत्कृत थे, लेकिन दूसरी बार फिल्म देखते हुए उन्होंने एक ऐसा काम किया, जो आगे जाकर हिंदुस्तानी फिल्म उद्योग के जन्म का कारण बना। फाल्के फिल्म के परदे को देखने के बजाय उसकी उल्टी तरफ देखने लगे। यानी प्रोजेक्टर रूम की तरफ। उन्हें समझ आ गया था कि जो चमत्कार परदे पर फिल्म के रूप में दिखाया जा रहा है, उसकी चाबी उस छोटे से प्रोजेक्टर में छिपी है।

मैं भी आज यही करना चाहता हूं। मेरी रुचि आज सिनेमा के परदे पर तमाम स्वांग करते नायक के बारे में जानने से ज्यादा उस दर्शक के बारे में जानने में है, जो परदे के सामने बैठा उसे देख रहा है। कौन है वो? कहां से आया है? कहां जाएगा इस फिल्म के खत्म होने पर निकलकर? क्या खाता है? क्या पहनता है? क्या देखता है? आखिर कितना कमाता है? ऐसा इसलिए, क्योंकि मुझे लगता है कि सिनेमा के परदे पर चलने वाली फिल्म को समझने की असल चाबी उस फिल्म में नहीं, यहां सामने बैठे इस दर्शक की पहचान में छुपी है।

अभी पिछली पोस्ट में रवीश ने बताया कि एक बड़ा वर्ग है हिंदुस्तान के शहर, गांव, देहातों में फैला, जो अब मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा से पूरी तरह कट चुका है। भले ही वो अब भोजपुरी सिनेमा देख रहा है, लोकल लेवल पर बनाये गये म्यूजिक वीडियो देख रहा है, टी वी देख रहा है, ’मालेगांव का शोले’ और ’मालेगांव की शान’ देख रहा है, लेकिन नया बनता हिंदी सिनेमा नहीं देख रहा है।

सही बात है। लेकिन क्या अब तक हमारे फिल्मकार ये बात जान नहीं गये हैं? और ऐसे में क्या हमारे फिल्मकार उस आदमी को ध्यान में रखकर फिल्म बनाएंगे, जो अब उनका संभावित दर्शक होना ही नहीं है? मुझे लगता है नहीं, और इसका असर हमारे समकालीन सिनेमा पर दिखने भी लगा है। नब्बे के दशक में सिनेमा ने इस वर्ग से पल्ला झाड़ा था लेकिन अब इस नयी शताब्दी में इस ’लो-क्लास’ दर्शक ने अपने विकल्प खोज लिये हैं। मल्टीप्लैक्स के आने के बाद जब सिनेमा देखने की न्यूनतम कीमत ही डेढ़ सौ से दो सौ रुपये है, अपने ’दर्शक वर्ग’ की पहचान (आर्थिक पहचान) तो सिनेमा ने खुद तय कर ली है। और जब पहचान तय है, तो क्यों न उसी को दृष्टि में रख सिनेमा बनाया जाए।

मेरे पिता की पीढ़ी के लोग भले ही शहरों में रहने वाले थे लेकिन उनकी पैदाइश-बचपन में हमेशा गांव होता था। यानी उनकी यादों में होता था। सिनेमा का दर्शक उस दौर में भी शहरी ही था लेकिन इसी वजह से पचास और साठ के दशक में गांव का बैकड्राप सिनेमा में पुख्ता तरीके से मौजूद रहा। लेकिन आज मेरी पीढ़ी के कितने लोग हैं, जिनका बचपन गांव में बीता है? आज हमारे मुख्यधारा के सिनेमा को देखनेवाला एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जिसके लिए गांव ’प्राथमिक स्रोत’ नहीं, ’द्वितीयक सामग्री’ है।

मैं फिर ऊपर कही बात पर लौटकर आता हूं। यह देखना महत्वपूर्ण नहीं कि एक ’पीपली लाइव’ जैसी फिल्म आती है, जो बरसों से सिनेमा के परदे से गायब ’गांव’ की कथा है, बल्कि ज्यादा महत्वपूर्ण यह देखना है कि किसी दक्षिण मुंबई या नोएडा-गुड़गांव के किसी आलीशान से मॉल में उस फिल्म को देखने वाला दर्शक वर्ग उसके क्या और कैसे अर्थ निकाल रहा है? मेरे या आपके लिए ’पीपली लाइव’ के जो अर्थ हो सकते हैं, बहुत संभव है कि दक्षिण दिल्ली की जो जनता उस हाल में बैठी है, उसके लिए ’पीपली लाइव’ के कुछ नितांत भिन्न अर्थ हों। और यह तब है, जब ’पीपली लाइव’ का एक बड़ा कैरेक्टर खुद ’मीडिया’ है, जो पूरी तरह से एक शहरी फिनोमिना है।

पिछले दिनों आयी फिल्म ’आयशा’ में नायिका का पिता फिल्म के अंत में उसे बताता है कि इसमें कोई शक नहीं कि नायक उसे ही चाहता है। वजह – उसके पास पैसा है, क्लास है, वो खूबसूरत है आदि आदि… जबकि फिल्म शुरू से हमें नायक और नायिका की समझदारी और सोच का अंतर दिखाती चल रही है। दिक्कत यह नहीं कि हमारे नायक-नायिकाओं की पसंदगियां अब ’क्लास’ से तय होने लगी हैं, दिक्कत यह है कि सामने बैठी ऑडिएंस को अब इससे कोई परेशानी नहीं। वजह – सामने बैठी ऑडियंस भी अब ’आम जनता’ नहीं। उसका रंग-बिरंगापन अब खत्म हो रहा है। उसका भी एक खास क्लास है। और उसके मुताबिक ही हमारा सिनेमा अपना रंग बदल रहा है।

इसी शहर में तकरीबन तीन साल पहले मैंने अमरीकी सिनेमा के ’गुरु घंटाल’ पॉल श्रेडर का भाषण सुना था। पॉल चिंता में थे कि सिनेमा देखने का वो अनुभव जो किसी थिएटर के अंधेरे कोने में बैठकर सत्तर एमएम के परदे पर फिल्म देखने से मिलता है, अब नष्ट हो रहा है। सिनेमा लोगों के टीवी में, कंप्‍यूटर में, मोबाइल में, विभिन्न शक्लों में कुछ अधिकृत तरीकों से और बहुत कुछ पाइरेसी से पहुंच रहा है। अगर ऐसा ही होता रहा, तो सिनेमा देखने का वो लाजवाब अनुभव (जहां आप होते हैं और फिल्म होती है, बस और कोई नहीं) नष्ट हो जाएगा। मैंने इस चिंता पर अपनी टिप्पणी में लिखा था कि शायद यह इतना नकारात्मक भी नहीं जितना पॉल इसे देख रहे हैं। और शायद यह एक सकारात्मक दिशा की तरफ बदलाव है।

आज मैं देख पा रहा हूं कि अगर इन तमाम ’गैर-अधिकृत’ तरीकों से हम हमारे सिनेमा को फिर से उस वर्ग तक पहुंचा सकते हैं, जो इससे कट गया है, तो इसमें हर्ज ही क्या है? मैं इस पर हमारे फिल्मकारों की राय जानना चाहता हूं। क्या वे भी पॉल श्रेडर की तरह इसे एक नकारात्मक रुझान मानते हैं? क्या उन्हें नहीं लगता कि सिनेमा का कुछ खास किस्म के दर्शकों तक सिमट जाना अंतत: सिनेमा की भी हानि है? और क्या वे ये मानते हैं कि सिनेमा का कंटेट उसके दर्शक की ’किस्म’ से भी तय होता है, जो आज बड़ी तेजी से देश के (देश के बाहर के भी) उच्चवर्ग तक सिमटती जा रही है?

सवाल सीधा यह है कि अगर हमने अनुराग कश्यप की फिल्म ’पांच’ लीक्ड और पाइरेटेड कॉपी से देखी, तो इस पर अनुराग की क्या राय है?

mihir pandya(मिहिर पंड्या। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में रिसर्च फेलो। सिनेमा के शौक़ीन। हिंदी सिनेमा में शहर दिल्‍ली की बदलती संरचना पर एमफिल। आवारा हूं नाम से मशहूर ब्‍लॉग। मोहल्‍ला लाइव के लिए सिनेमा और क्रिकेट पर लगातार लिखते रहे हैं। उनसे miyaamihir@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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