थोड़ा पानी, थोड़ा सोडा, थोड़ी बर्फ और बस बहसतलब!

सूरजकुंड में सिनेमावालों के साथ दो दिन

♦ रामकुमार सिंह

यह सिनेमा पर बहस से इतर बहसतलब के माहौल को बताने की कोशिश है। बौद्धिक विमर्श इस पोस्‍ट में मेहमान की तरह दिख जाए तो बात अलग है, वैसे मैंने उसे शामिल करने की कोशिश नहीं की है क्‍योंकि विनीत और दूसरी अन्‍य पोस्‍ट में ये सब आ ही चुका है : रामकुमार सिंह

समान से टिप टिप पानी बरस रहा था। मोहल्‍ला, यात्रा बुक्‍स और जनंतत्र का न्‍यौता था। मामला फिल्‍मी था, इसलिए अपना निजी लालच भी ज्‍यादा था कि सिनेमा देखते समाज के लोगों के बीच अपनी हाजिरी लगे। कितने ही लोगों ने चेतावनी दी थी कि आजकल जयपुर दिल्‍ली की सड़क ठीक नहीं है। हालांकि दस दिन बाद ही कॉमनवैल्‍थ शुरू होने थे इसलिए हमने मान लिया कि कुछ तो ठीक हुआ ही होगा। अपनी कार से रवाना हुए।

गुड़गांव से गंतव्‍य

मिड वे बहरोड पर मैं बार की तरफ झांक रहा था और कार चलाते हुए मित्र गजेंद्र श्रोत्रिय ने कायदे कानून, नैतिकता का हवाला देते हुए ड्राउट बीयर पीने से मुझे रोका। इडली खाकर संतोष किया। पहुंचना सूरजकुंड था। शॉर्टकट पकड़ना था। हालांकि अविनाश ने कहा था कि आप मंडी हाउस पहुंचें तो हम वहां से साथ हो लेंगे लेकिन हम तो गुड़गांव से गंतव्‍य की तरफ मुड़े। एक मोड़ पर कार्बाइन जैसी गन लिये खड़े पुलिसवाले से हमने फरीदाबाद का रास्‍ता पूछ लिया तो गुनाह हुआ, बोला, उधर जा रहे हो तो मुझे भी लिफ्ट दो। हम आदमी तीन थे और वो एक लेकिन उसके पास गन भी थी। इसके बावजूद हमने उसे कहा कि हम आपको लिफ्ट नहीं दे सकते। एक दोस्‍त सुमित भी साथ था, बोला, अभी यह पट्ठा लिफ्ट मांग रहा है, बैठने के बाद वोदका में भी हिस्‍सा मांगेगा। हिस्‍सा देने के लिए हम तैयार नहीं थे।

तीन पेट्रोल पंप छोड़ते हुए आगे बढ़ गये थे क्‍योंकि वहां कतार लगी थी। गलती यहीं हो गयी। पेट्रोल मीटर की सुई गर्दन गिरा रही थी और दिल्‍ली फरीदाबाद मार्ग पर जाम लग गया था। कोई दो घंटे वहीं अटके रहे। कार का एसी चला नहीं सकते थे, पता नहीं पेट्रोल पंप कहां जाके मिले। भोगने के बाद ही समझ में आया है कि जिस दिन पंप क्‍या धरती पर पेट्रोल ही खत्‍म होगा तो आदमी के दिमाग में कैसे खयाल आएंगे।

बारिश तेज शुरू हो गयी थी और दिल्‍ली के एफएम पर एक आरजे बार बार चिल्ला रहा था कि दिल्‍ली में लगभग हर जगह जाम लगा है, आप अपने वैक‍ल्पिक रास्‍ते चुनें। बात इतनी आसान नहीं थी। जिसको दिल्‍ली ही जाना हो, वो वैकल्पिक रास्‍ते कैसे चुन सकता है। साम दाम दंड भेद से वह दिल्‍ली ही जाना चाहेगा। तनाव यहीं से शुरू था कि जब दिल्‍ली जाने का वैकल्पिक रास्‍ता ही नहीं है तो क्‍या सिनेमा बनाने का भी कोई वैकल्पिक रास्‍ता हो सकता है।

फिर फरीदाबाद से ठीक पहले जिस रोड पर हम मुड़ गये थे, उसके नुक्‍कड़ पर अंतरराष्‍ट्रीय पेय का क्‍वार्टर खरीदते ट्रक वाले से हमने आगे के मार्ग के बारे में पूछा, तो उसने कहा कि इस रास्‍ते पर सूरजकुंड है तो सही लेकिन आप पहुंच नहीं पाओगे क्‍योंकि रोड खराब है। फिर उसने बताया कि ध्‍यान से जाओगे तो पहुंच भी सकते हो। हमने उसकी बात मानकर पता नहीं गलती की या नहीं लेकिन उस मार्ग पर ऐसे गड्ढे पाये गये जैसे चांद पर भी नहीं होंगे। एक जगह तो गाड़ी खड़ी करके इंतजार करने लगे कि कोई ट्रक गुजरे तो यह पता लगे कि सामने सड़क के बीचोबीच ठहरा पानी कितना गहरा है। एक-दो कंकड़ फेंककर भी अंदाजा लगाया। तय हो गया था पानी तो गहरा है लेकिन जो होगा सो देखा जाएगा (यह साहस एक पैग वोदका के बाद ही आया था) गजेंद्र ने अपनी कार पानी में उतारी और किसी रेसिंग चैंपियन की तरह हम सबको डूबने से बचाया। कार के निचले हिस्‍से से अजीब किस्‍म की ध्‍वनियां आयीं। बेचारी कार।

हम आगमन जंगल फॉल कैंप में थे

म तीन बजे जयपुर से चले थे, रात के बारह बजे थे। आयोजन स्‍थल को तलाशने के लिए अविनाश और‍ मिहिर को आठ-दस फोन कर डाले, तो पीछे से अजय ब्रह्मात्‍मज जी की आवाज आयी कि कुछ ऐसा कर डालिए कि पुलिस खुद ही आपको पकड़ कर यहां पहुंचाये। कुछ ही देर बाद हम जंगल फॉल कैंप में थे। पानी बरस रहा था। रिमझिम में भीगते हुए आयोजन वाले हॉल में पहुंचे तो पहले से सुधीर मिश्रा, डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी, जयदीप वर्मा, अजय ब्रहमात्‍मज, अतुल तिवारी मेज पर जमे थे। परिचय होते ही सुधीर जी ने कहा कि मेरे मित्र थे अशोक शास्‍त्री, जयपुर में। डॉ द्विवेदी ने भी अपने मित्रों का जिक्र किया और फिर तो चर्चा शुरू हुई। रात तीन बज गये होंगे जब जयदीप, गजेंद्र, सुमित, समरेंद्र सब लोग सुधीर मिश्रा से उनके और दुनिया के सिनेमा पर बात करते रहे। संजय झा भी दिखे, जिस पर मुझे अपनी मूर्खता का एहसास हुआ कि मुझे पसंद आयी जिस फिल्‍म को मैं महेश मांजरेकर की समझता रहा था, उसके निर्देशक संजय झा थे। वो फिल्‍म थी, प्राण जाए पर शान न जाए। अब संजय अपनी फिल्‍म मुंबई चकाचक की रिलीज के लिए लड़ रहे हैं।

मुझे अविनाश और अजय जी ले गये, आयोजन को लेकर चर्चा के लिए। कहना लाजिमी है कि एक जैसी सोच वाले अपने सब मित्रों के बीच उस रात के गुजरने का एहसास ही नहीं था कि हम जब सोने गये तो घड़ी में साढे़ चार बज रहे थे और सुबह आंख खुली तो हमारे टैंट में रोशनी थी। बाहर पक्षियों की आवाजें और झांककर देखा तो सुधीर मिश्रा मॉर्निंग वॉक पर थे। डॉ द्विवेदी और अतुल जी टहल रहे थे। लगा, हम ही देर से जागे हैं। नहा धोकर नाश्‍ते के लिए पहुंचे तो सब लोग पहले से चर्चा में मशगूल पाये गये। अनुराग कश्‍यप पहुंच चुके थे। रात भर बारिश होती रही थी और हमारे टैंट के कुछ हिस्‍सों में नमी दिख रही थी। सुबह जयदीप दिख गये बोले यार, नींद कम इसलिए भी आयी कि जब खेलगांव में कोबरा निकल सकता है तो यहां क्‍यों नहीं, लेकिन मजे की बात यह है कि हम तीन दिन वहां रहे, हमें कुछ नहीं दिखा। कोबरा भी पॉलिटिकल माइलेज लेना जानता है, उसे पता था कि फिल्‍मवालों को दिख भी जाए तो उतनी बड़ी खबर नहीं होगी जितनी बडी खबर कलमाडी के इलाके में दिखने से बनती है। बावजूद इसके कि खबर वाले कई चेहरे वहां दिन में दिखे थे। एनडीटीवी के रवीश कुमार, सुशील बहुगुणा, स्‍टार न्‍यूज के दिबांग… आइबीएन 7 के संदीप चौधरी तो खैर रात से वहां थे। ओम थानवी तो खैर आखिरी सत्र में पैनल में भी थे।

और जो दिन की बहस शुरू हुई, तो मजा आ गया। जो चर्चा हुई, उसे मोहल्‍ला लाइव के पाठक पहले से ही दूसरी पोस्‍ट में पढ़ चुके हैं, जो विनीत ने भेजी हैं। अनुषा रिजवी और महमूद फारुकी के थोड़ा विलंब होने का कारण मंच से यह बताया गया कि रात भर दिल्‍ली में बारिश थी और पानी उनके घर में भी आ गया।

दिन भर की बहस शाम को तलब में तब्‍दील हुई। आत्‍मीय माहौल में थोड़ा पानी, थोड़ा सोडा, थोड़ी बर्फ और देश की अलग अलग डिस्‍टलरीज में तैयार माल को मिलाकर एक जादुई दुनिया का निर्माण शुरू किया गया, जो एक बार फिर रात को तीन बजे तक आबाद रही। इस दौरान भाई वरुण ग्रोवर से अनुराग ने आग्रह किया कि वो गाना सुनाये, जो उसने अनुराग की अगली फिल्‍म के लिए लिखा है। वरुण ने गाना ‘मूरा’ सुनाया। (वरुण बिना पिये भी गा सकता है, मेरे लिए आश्‍चर्यजनक था, वरुण का न पीना नहीं बल्कि सादा रहते हुए भी गाना)। अनुराग एक रात पहले ही टोरंटो से लौटे थे, सुबह से ही जेटलैग से परेशान दिख रहे थे। दिनभर बहस में रहे। वे बार-बार सोने के लिए जाने का मन बना रहे थे लेकिन ज्‍योंही उठते, हम में से किसी की मनुहार हो जाती, वे पस्‍त हो जाते। सुधीर जी हमारी मेज पर ही डटे थे, उनके हाथ में तो जाम भी नहीं था लेकिन वे लगातार हरेक जिज्ञासा को शांत कर रहे थे।

फिर जो नींद आयी तो खुद को अगले दिन सुबह नाश्‍ते की टेबल पर पाया, जहां विनोद अनुपम बैठे थे। डॉ द्विवेदी और अतुल तिवारी जी दिख गये। रात को दोनों गायब हो गये थे, कहां गये थे, यह रहस्‍य उन्‍होंने ही खोला कि उन्‍हें किसी से मिलने जाना था। दूसरी बात डॉ द्विवेदी ने वे किस्‍से सुनाये मुंबई के, जब उन्‍होंने ही एक फाइव स्‍टार में पार्टी दी थी और उन्‍हें ही एक स्‍टार ने कह दिया कि आप यहां से निकल जाइए। बोले, मुझे लगता है कि दिन में इतने भले दिखने वाले लोग अचानक रात होते-होते ऐसे कैसे हो जाते हैं तो मैं बचता हूं। हालांकि हमें ऐसा कोई एहसास नहीं हुआ। हम खुशकिस्‍मत थे कि दिन में कम भले दिखने वाले लोग मुझे दिन ढलते ही ज्‍यादा भले दिखने लगे थे। यह शायद इसलिए भी था कि वहां मौजूद सब लोग आपके हमारे बीच के थे। उनमें स्‍टारडम की बड़ी फूंक नहीं थी।

बहसतलब उन लोगों का अब तक का बड़ा समागम था जो असली सिनेमा बनाने के लिए संघर्ष करते हुए कामयाब हुए हैं और उस संघर्ष का दायरा उन्‍होंने बढ़ा लिया है। जैसा कि सुधीर मिश्रा ने कह ही दिया था कि हर रोज आपको लड़ना होगा। जैसा कि अनुराग ने कहा कि नये माध्‍यमों के लिए काम करना होगा। जो बजट मिल रहा है, जो क्रेडिट मिल रहा है, उसी से सिनेमा खड़ा करना होगा। अगर मैं मेरे पूंजीगत फायदे देखने लगूंगा तो मेरा कलाकार मर जाएगा, मेरा सिनेमा मर जाएगा। जहां जयदीप वर्मा को निराश नहीं, पूरे तंत्र के खिलाफ सबसे ज्‍यादा गुस्‍से में देखा गया कि एक बेहतरीन फिल्‍म बनाने के बाद बाजार कैसे आपका इम्‍तहान लेता है, एक ऐसा बाजार जिसे आपने पहले कभी इतने क्रूर रूप में नहीं देखा था।

बहसतलब ने सिनेमा की सोच रखने वाले लोगों को एक मंच पर लाने का बड़ा काम किया। यह महज शुरुआत मानी जानी चाहिए। एक कामयाब शुरुआत। बाकी सिनेमा तो बनाने की चीज है। पूरे आयोजन के बाद ज्‍यादा सोचने से, ज्‍यादा दिमाग लगाने से इसलिए भी डरा हुआ था कि मंच से ही स्‍त्री-पुरुष संबंधों पर विचार करते हुए डॉ द्विवेदी ने वैज्ञानिक अनुसंधानों का हवाला देते हुए कहा कि ज्‍यों-ज्‍यों मनुष्‍य का दिमाग विकसित होता गया, वैसे वैसे लिंग का आकार कम होता गया है। मुमकिन है ज्‍यादा दिमाग विकसित होने से जैसे पूंछ लुप्‍त हो गयी, वैसे ही लिंग भी लुप्‍त हो जाए।

जाते जाते फिल्‍म वालों पर एसएमएस जोक

बेटी ने मां से कहा कि मां गांव में फिल्‍म वाले आये हुए हैं शूटिंग के लिए। मां ने कहा, तुरंत अंदर आ जाओ, ये सब बहुत गंदे लोग होते हैं। बदतमीज होते हैं। बेटी ने कहा, मां इनमें *** *** भी आया है। तो मां ने कहा, तब तो अपने भाई को भी अंदर बुला लो।

शुक्र है, सूरजकुंड में सिनेमावालों से इस तरह डरा हुआ कोई भी नहीं था।

(रामकुमार सिंह। युवा पत्रकार। फिल्‍म समीक्षक। राजस्‍थान पत्रिका, जयपुर से लंबे समय से जुड़े हैं। पटकथा और कहानियां भी लिखते हैं। कहानी शराबी उर्फ तुझे हम वली समझते पर फीचर फिल्‍म निर्माणाधीन। उनसे indiark@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता हैं।)

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