आइए, अयोध्‍या पर इस अदालती फैसले का विरोध करें

शांति अपील करने से नहीं आती, न्याय करने से आती है।

♦ अरविंद शेष

मुसलमानों में थोड़ी नाराजगी

दिल्ली के जामा मस्जिद इलाके में मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को नाराजगी के साथ स्वीकार किया है। चप्पे-चप्पे पर अर्धसैनिक बलों के मौजूदगी के बीच लोगों ने हाईकोर्ट के फैसले को टेलीविजन पर देखा। पूरे इलाके में आम दिनों की तुलना में आमदोरफ्त बहुत कम है।

जामा मस्जिद के पास मटिया महल की गली में एक दुकान में टेलीविजन पर यह फैसला देख रहे नवेद ने कहा, “कोर्ट का फैसला वैसा ही आया है जैसी कि उम्मीद थी और सबको मालूम था कि ऐसा फैसला आएगा।” उनका कहना था कि वे इस फैसले को मंजूर करते हैं।

जबकि एक अन्य युवक फखरुद्दीन का कहना था, “ये फैसला गलत है, क्योंकि जिस स्थान पर मुसलमानों का कब्जा था वह किसी और को किस तरह से दिया जा सकता है। इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए।”

वहीं पास से गुजर रहे एक व्यक्ति ने गुस्से के साथ कहा, “अदालत उनकी, पार्लियामेंट उनकी, फौज उनकी, तो जाहिर है कि फैसला उनके पक्ष में ही आना था।” उनका कहना था कि किसी भी ऊंची अदालत में जाने का कोई अर्थ नहीं रहता क्योंकि मुसलमानों को वहां भी न्याय नहीं मिलेगा।

जबकि एक अन्य व्यक्ति इमरान का कहना था, “फैसला चाहे किसी के हक में आया हो, हम चाहते हैं कि हर ओर शांति बनी रहे और किसी तरह का कोई हंगामा न बरपा हो।”

इसी बीच वहां बहस चल पड़ी कि वहां तो बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद से ही मूर्ति रख दी गयी थी और उसे मंदिर बना दिया गया था। इस पर कुछ लोगों का कहना था कि क्या हमारे घर में कल कोई मूर्ति रख दी जाए तो उसे मंदिर मान लिया जाना चाहिए?

अदालत ने मामले की तह में जाने के लिए पहली बार पुरातत्व सर्वेक्षण से खुदाई करवाकर एक विशेषज्ञ रिपोर्ट भी प्राप्त कर ली, जिसमें कहा गया है कि जमीन के अंदर 11 वीं शताब्दी में उत्तर भारत में पाये जाने वाले मंदिरों जैसे विशिष्ट अवशेष मिले हैं।

बाल ठाकरे : उम्मीद है कि इस फैसले के बाद दशकों पुराने विवाद का अंत होगा।
आडवाणी : आज के निर्णय से राष्ट्रीय एकता का नया अध्याय शुरू होगा।
आडवाणी : यह राम जन्मभूमि के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
आडवाणी : कोर कमिटी की बैठक में अयोध्या फैसले पर चर्चा हुई।

प्रशांत भूषण : सुप्रीम कोर्ट में ये फैसला शायद ही ठहर पाएगा।
प्रशांत भूषण : ये अदालती फैसला नहीं है राजनीतिक फैसला है।
माकपा : इस मसले को सुलझाने के लिए लोकतंत्र में सुप्रीम कोर्ट का प्रावधान है और इसका सहारा लिया जाना चाहिए।

बीबीसी हिंदी पर प्रवीण तोगड़िया का यह बयान आया – इस फैसले से देश के सौ करोड़ हिंदुओं की श्रद्धा का सम्मान हुआ है। हम इसका स्वागत करते हैं। इसी साइट पर नरेंद्र मोदी ने कहा कि जहां तक अयोध्या रामजन्मभूमि विवाद का जजमेंट आया है, इस बात की खुशी है कि इस जजमेंट से भव्य राम मंदिर बनाने का रास्ता प्रशस्त हुआ है। इसी साइट पर विश्व हिंदू परिषद के एक अन्य नेता गिरिराज किशोर ने कहा है कि अब मुसलमानों को गुड-विल का परिचय देते हुए मथुरा और काशी को भी हिंदुओं को सौंप देना चाहिए।

और इसके बाद जामा मस्जिद इलाके के एक गुस्साए हुए व्यक्ति का बयान है, “अदालत उनकी, पार्लियामेंट उनकी, फौज उनकी, तो जाहिर है कि फैसला उनके पक्ष में ही आना था।”

बीबीसी पर शाया इन टुकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि अयोध्या मसले पर आया फैसला किनके हितों को साधता है और किनके लिए एक बार फिर संदेश सामने रखता है कि तुम्हारी जगह क्या है।

अदालत के फैसले ने इस बात की नजीर रखी है कि कल को हमारे घर में चुपके से आकर अगर कोई मूर्ति रख दे तो उसके बाद पैदा हुई लड़ाई का नतीजा यही होगा कि अदालत उस घर को मंदिर घोषित कर देगी।

लेकिन इस चोरी को सही ठहराने के अलावा अदालत ने क्या यह कहना चाहा है कि मथुरा और काशी की संघी मांग भी इसी अंजाम तक पहुंचेगी। और क्या अब इस देश की सभी प्राचीन इमारतों की जांच करायी जाएगी कि यहां पहले क्या था और अब क्या होना चाहिए। आप क्या सोचते हैं कि बाबरी मसजिद में मनमाफिक हिस्सा मिलने के बाद संघी जमात यों ही चुप बैठ जाएगी।

सबसे विचित्र तो यह है कि अदालत का यह फैसला तकनीकी पहलुओं पर आस्था की जीत के रूप में जाना जाएगा। यह कहना कि विवादित स्थल ही रामजन्मभूमि है, एक ऐसा मजाक है, जिसे सुनना दहशत से भर देता है। लेकिन इसी में छिपी एक बात पर गौर करना चाहिए कि किसी व्यक्ति की इस जिद को किसी व्यक्ति ने ही सही ठहराया, जिसे किसी बात को सही या गलत ठहराने का अधिकार मिला हुआ है। सवाल है कि क्या अब अदालत के फैसले आस्थाओं की बुनियाद पर हुआ करेंगे… और क्या उन आस्थाओं पर फैसला देते समय भी यह देखा जाएगा कि किसकी आस्था ज्यादा ताकतवर है या किस आस्था से फैसला देने वाले के तार जुड़ते हैं…?

जिन्हें यह फैसला सुहा रहा है, उन्‍हें इस तरह के फैसलों के बाद बनने वाली बेआवाज हवाओं का अंदाजा नहीं है। सामने दिखने वाले विरोध या विद्रोह से आप निपट सकते हैं, उसको संतुष्ट कर सकते हैं या उसका दमन कर दे सकते हैं। लेकिन चुपचाप पलने वाली आग भीतर-भीतर चुपचाप ही सब कुछ को राख कर देती है। इस बात से गाफिल इस फैसले पर खुश होने के बजाय सोचने की जरूरत है कि बेईमानी की बुनियाद पर इंसाफ की इमारत खड़ी नहीं की जा सकती।

arvind shesh(अरविंद शेष। युवा पीढ़ी के बेबाक विचारक। दलितों, अल्‍पसंख्‍यकों और स्त्रियों के पक्षधर पत्रकार। पिछले तीन सालों से जनसत्ता में। जनसत्ता से पहले झारखंड-बिहार से प्रकाशित होने वाले प्रभात ख़बर के संपादकीय पन्‍ने का संयोजन-संपादन। कई कहानियां भी लिखीं। उनसे arvindshesh@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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