न्‍यायाधीशो आओ, अदालत में आस्‍था-आस्‍था खेलें!

जेएनयू से एक बार फिर अनहद गरजै ने हमें एक परचा भेजा है। इस सूचना के साथ कि इसे छात्रावासों के मैस में बांटा गया है। यह परचा आयोध्‍या पर अदालत के बेतुके-बेहूदे फैसले के विरोध में लिखा गया है : मॉडरेटर

‘कुछ तो रिश्ते खराब रहने दे’

प्रति प्रातः लातः स्मरणीय पी चिदंबरम ने अयोध्‍या मामले पर एक बयान दिया है – ‘फैसला लिखने वाले जजों के हवाले से यह कहना ठीक नहीं होगा कि उन्होंने बाबरी मस्जिद को गिराये जाने को न्यायोचित ठहराया है … इस फैसले का उस घटना से कोई लेना देना नहीं है, जो 6 दिसंबर ’92 को घटी थी।’

साथियो! इस बयान को गौर से देखिए। यह देश के गृहमंत्री का वक्तव्य है। कांग्रेस के कई मुस्लिम सांसदों ने सामूहिक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताया है कि ‘इट इज ए वेरी फेयर जजमेंट’। फैसले का क्या अर्थ है? ‘आस्था’ की राजनीति क्या है? उसके पीछे कांग्रेस की क्या भूमिका है? कांग्रेस का ‘लीपापोती डिपार्टमेंट’ अचानक इतना सक्रिय क्यों हो गया? इन सवालों के जवाब चिदंबरम के बयान में छिपे हैं। इस बयान का संबंध 1992 से ही नहीं, 22/23 दिसंबर रात 1949 से भी है।

(एबीवीपी ने कल के अपने पर्चे में नाम लिये बगैर आदरणीय प्रो रोमिला थापर को ‘अकादमिक वेश्या’ लिखा है। देख लीजिए, ये स्तर है इन लोगों की ‘ज्ञान शील एकता’ का। इससे इतिहासकारों या अपने विषय के विशेषज्ञों के बारे में इनके बोध का पता तो चलता ही है, महिलाओं के प्रति एबीवीपी के लोग आज भी मध्‍यकालीन संस्कार धारण करते हैं – यह भी प्रकट हो जाता है। ‘जिन्हें तमीज नहीं, उनसे तकाजा कैसा’।)

आप जानते हैं कि मुकदमे में ‘रामलला विराजमान’ खुद एक पार्टी हैं। जजों के मुताबिक, अभी बालक हैं। जमीन का एक तिहाई हिस्सा सीधे उन्हीं को (दरअसल आरएसएस को) मिला है। न्यायमूर्ति अग्रवाल ने स्पष्ट कर दिया है कि जहां मस्जिद का बीच वाला गुंबद था, उसी के ठीक नीचे उनकी जचगी हुई थी। रिटायर होने के बाद र्धमवीर शर्मा ने कहा है कि ‘जहां विवादित ढांचा था, वहीं दशरथ का भव्य भवन था’। आपके दिमाग में प्रश्न उठ सकता है कि यह सब कैसे पता चला? अभी तक तो यही साफ नहीं हो सका है कि दशरथ की अयोध्‍या वहीं है या कहीं और थी। जज ‘मेरिटोरियस’ होते हैं, यूथ फॉर इक्वलिटी के सौजन्य से यह आपको ज्ञात है। मगर ये तीनों तो बिपिन चंद्र और आदित्य मुखर्जी से भी बड़े भारी हिस्टोरियन मालूम पड़ते हैं। आर्कियोजॉली वाले जिस सत्य को महीनों श्रम करके भी नहीं खोद सके, उस ‘सत्य’ को इन तीनों ने बहुत पहले, बल्कि कहना चाहिए कि आदिकाल में ही ‘खोद’ डाला। 2003 में ही इनसे पूछ लेना था। बेवजह हजारों रुपये फूंके गये। एएसआई की रिपोर्ट पर तब भी, और आज भी बहुत से ‘किंतु’ ‘परंतु’ हैं। कई इतिहासकारों के अलावा, सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़ा ने रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर उसी समय संदेह व्यक्त किया था।

अदालत को विवादित भूमि के मालिकाना हक का फैसला करना था, जबकि हाईकोर्ट के माननीयों ने किया क्या – उसे रामजन्मभूमि घोषित कर डाला। आर्कियोलॉजिकल सर्वे की संदिग्ध रिपोर्ट के बावजूद इस निष्कर्ष तक भी गनीमत हो सकती थी कि मंदिर (या ‘रिहायशी जगह’ – सर्वे रिपोर्ट में यही कहा गया है) तोड़कर मस्जिद बनायी गयी; लेकिन इस कपोल कल्पना को कैसे समझा जाए कि मस्जिद के बीच वाले गुंबद के ठीक नीचे ही राम जन्मे थे (हैं)। बौद्धों के दावे का भी ख्याल कीजिए तो संदेह और जटिल हो जाता है। इतने घालमेल के बावजूद, ‘हिंदुओं की आस्था-विश्वास’ के आधार पर जज ‘आस्था’ के गर्भगृह में पहुंच गये। हैरत इसी न्यायिक तर्कपद्धति पर है। बिलकुल संभव है कि दोनों फरीक सुलह के ऐसे ही किसी बिंदु पर सहमत हो जाएं / जाएंगे लेकिन उस जगह को ‘जन्मस्थान’ घोषित करते ही और साफ-साफ यह स्वीकार करते ही कि यकीनन मंदिर तोड़कर ही मस्जिद निर्मित की गयी है – क्या 6 दिसंबर ’92 के आपराधिक कृत्य को कानूनी औचित्य और अदालती स्वीकृति नहीं मिल जाती? फैसले से यह भी साबित होता है कि 1949 में फैजाबाद से चुरायी गयी मूर्तियों को साजिशन मस्जिद में रखना भी कानूनन सही है! (चाणक्य ने ‘अर्थशास्त्र’ में बहुत पहले ही लिख दिया है कि मंदिर में भक्तों की भीड़ जुटाने के लिए चुपके से मूर्ति रख दी जा सकती है या दूध वगैरह भी पिलाया जा सकता है।)

कुछ लोग कह रहे हैं कि चलो अच्छा हुआ, झगड़ा निपट गया; कि कहीं कोई दंगा नहीं हुआ; कि दोनों समुदायों ने निर्णय को स्वीकार कर लिया है; कि आप कानून नहीं मान रहे, आप अदालत नहीं मानते; कि आप नहीं चाहते कि शांति बनी रहे और एक भाईचारा विकसित हो; कि आप मुद्दे को भाजपा के हक में जिंदा करना चाहते हैंऋ कि कम्युनिस्टों की तो ‘आदत’ है हर मामले में फच्चर फंसाने की। जबकि यह ‘राष्ट्रीय एकता के नये अध्‍याय की शुरुआत’ (आडवानी) है या जैसा मोदी ने कहा कि निर्णय से ‘बापू के सपनों का रामराज्य’ स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। यही लोस्‍स साल से लगातार कहते रहे हैं कि आस्था का प्रश्न, कानून से ऊपर है; कि रामजन्मभूमि, अदालत का विषय है ही नहीं; कि पांच किमी के दायरे में कोई मस्जिद नहीं रहने दी जाएगी। वे जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में ‘बीच वाले गुंबद के ठीक नीचे’ की कपोल कल्पना बे-पर्दा हो सकती है इसलिए ‘आस्था’ के नाम पर विध्‍वंसक संघी राजनीति को जो अदालती स्वीकृति मिली है, उसे शीघ्र भुना लेना चाहिए।

ऊपर की सारी बातचीत संघी राजनीति को सामाजिक स्वीकृति दिलाने के लिए ही की जा रही है। ये सब बोल रहे सभी लोग संघी नहीं हैं। कुछ तो अपने कहे के अर्थ से भी नावाकिफ हैं। लेकिन इसमें एक बड़ा तबका संघियों का है। गौरतलब है कि ये वही लोग हैं जो जाति जनगणना के विरोधी हैं; जो आरक्षण का विरोध करते रहे हैं; जो ‘आपरेशन ग्रीन हंट’ के नाम पर सरकारी बर्बरियत के समर्थक हैं; जो लिंगदोह के समर्थक हैं; जो नयी आर्थिक नीतियों के लाभार्थी हैं।

ज्ञात हो कि ‘संघी’ और ‘हिंदू’ – ये दो अलग-अलग कोटि हैं। यह साफ समझ लेना चाहिए कि हिंदुओं की आस्था और विश्वास से संघियों का कोई वास्ता नहीं है। कहते हैं कि हिंदुओं के राम घट-घट व्यापी हैं, उनकी इजाजत के बगैर तिनका तक नहीं हिलता; जबकि संघियों के राम 17 साल से कनात में पड़े हैं। वे न्यायमूर्ति र्धमवीर शर्मा जैसों के आदरणीय या फादरणीय होंगे। आडवानी-मोदी के ‘कनातवासी’ राम से धर्मिक हिंदुओं का कोई वास्ता नहीं। पृथु और पुष्यमित्र शुंग से लेकर बुद्धदेव भट्टाचार्य तक – ब्राह्मणवादियों की पाशविकता का लंबा सिलसिला है। कांग्रेस के तालमेल से स्थापित आरएसएस, ब्राह्मणवाद का आपराधिक अड्डा है – नयी आर्थिक नीतियों से सामंजस्य, बम विस्फोट, दंगे, झूठ, दुष्प्रचार, एबीवीपी से निकलीं साध्वियां, फाइव स्टार कल्चर, वास्तविक सामाजिक मुद्दों से बेरुखी…

आइए, फैसले के हास्यास्पद पक्ष को देखें : फर्ज कीजिए – बाबरी मस्जिद आज वहीं होती तो इस फैसले का क्या स्वरूप होता? जिस ‘आस्था’ और ‘विश्वास’ से तीनों जजों ने फैसला लिखा है, उसका ख्याल रखते हुए विचार करें। क्या उस सूरत में, तीनों न्यायाधीश सीधे रामलला को ही यह आदेश देते कि ‘जाओ, गुलामी और अपमान की प्रतीक उस मस्जिद को ढहा दो’! फैसले में यह अंतर्निहित है कि उस मस्जिद को जिन लोगों ने ध्‍वस्त किया, उन्‍होंने एकदम सही काम किया। यही करना चाहिए था। यही न्यायोचित है। फैसले के इसी अर्थ को चिदंबरम अपने बयान में ढंक रहे हैं। यह फैसला, एक तरफ ध्‍वंस की ‘आपराधिक’ करतूत को ‘धर्मिक’ सिद्ध करता है, दूसरी तरफ भाजपा की ‘मंदिर’ राजनीति को हिंदुओं की हिताकांक्षी साबित करता है। जबकि भाजपा के ‘मंदिर’ आंदोलन का, वास्तव में मंदिर निर्माण से या राम के माहात्म्य से कोई संबंध नहीं है – यह आप जानते हैं। ‘मंदिर आंदोलन’ संघी राजनीति का धर्मिक हथकंडा है – खुद सत्ता में येन केन बने रहो और बाकी सबको लिफाफेबाजी में फंसाये रखो।

महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि अदालत ने किन ‘हिंदुओं’ की ‘आस्था व विश्वास’ का ख्याल रख फैसला दिया? जिन शूद्रों-अछूतों को आज भी देश के तमाम मंदिरों में घुसने तक की इजाजत नहीं है, जो सैकड़ों बरसों से नियोजित घृणा के शिकार रहे हैं, क्या इन गैर-द्विजों की ‘आस्था’ को इस निर्णय में कोई जगह मिल सकती है? आदिवासियों का क्या होगा, जिनमें से अधिसंख्‍ गैर-हिंदू ही हैं? बौद्धों, जैनियों और सिखों के लिए इस फैसले का क्या अर्थ है? निम्न मध्‍यवर्ग की पिछड़ी जातियों का एक बड़ा तबका है जो आज भी राम को कण कण व्यापी भगवान समझता है। (लंका से लौटकर राम ने वाल्मीकि से पूछा, ‘अस जिय जानि कहिय सोई ठाऊं / सिय सौमित्र सहित जहं जाऊं’ तो आदिकवि ने जवाब दिया – ‘पूछेहु मोंहि कि रहउं कहं, मैं पूछत सकुचाउं / जहं न होहु तहं देहु कहि, तुम्हहि बतावऊं ठाऊं’)।

मजदूर वर्ग के आम आस्तिक व्यक्ति के भगवान सोते जागते उठते बैठते-हमेशा उसके संग हैं। ‘चींटी की पायल’ को भी सुन लेने वाले किसी कबीर, दस्तकार या श्रमिक के लिए मंदिर, पाखंड और अंधविश्वास का अड्डा है जहां कुछ परोपजीवी निठल्ले पुनर्जन्म और वर्णवाद की गोटी बिछाकर ईश्वर के नाम पर सदियों से अÕयाशी ‘खेल’ रहे हैं। राजा और प्रजा-दोनों तरफ का ‘कंट्रोल रूम’ मंदिर/मठ ही है। र्धम की समानान्तर सत्ता के ढाई हजार साल पुराने ऐतिहासिक मायाजाल से आप वावि़फफ हैं। जो लोग मंदिरों-मठों में चल रही ठगी को बूझते हैं मगर फिर भी किसी राम के भरोसे गरीबी से मुक्ति चाहते हैं – अदालत के फैसले में क्या उन सच्चे लोगों की आस्था को कोई स्थान मिल सकता है? गौरतलब है कि पाखंडी पुरोहितों के हथकंडों से पीड़ित तुलसीदास भी अपने ‘देव’ के कपार पर कौओं को बीट नहीं करने देना चाहते – ‘तुलसी देवल देव को लागे लाख करोरि/ काक अभागे हगि भर्यो, महिमा भई कि थोरि’।

जो लोग समझते हैं कि राम की पूजा आदिकाल से हो रही है, वे ध्‍यान दें : समूचे वैदिक वांग्मय में एक देवता के रूप में राम का कहीं कोई स्पष्ट नामोल्लेख नहीं है। उपनिषदों में विदेहराज जनक की पर्याप्त चर्चा है, पर दशरथ या राम के उल्लेख नहीं मिलता। पाणिनि और पतंजलि ने महाभारत के अनेक पात्रों के उदाहरण दिये हैं, पर इन वैयाकरणों ने राम का कहीं कोई उल्लेख नहीं किया। गुप्तकाल से पहले का राम का कोई मंदिर या मूर्तिशिल्प नहीं मिलता। तमिल के ‘संघम् साहित्य’ में राम नाम वाले किसी व्यक्ति का उल्लेख नहीं है। वहां बलराम और कृष्ण की पूजा होती थी, राम की नहीं। सातवीं-आठवीं सदी तक की बात है, दक्षिण भारत में रामकथा का बहुत ज़्यादा प्रचार नहीं हुआ था। पल्लव अभिलेखों में राम का कोई उल्लेख नहीं है। यही नहीं, आरंभिक चोल अभिलेखों में भी ऐसे केवल चार नाम ही मिलते हैं। (देखें, गुणाकर मुले, इतिहास संस्कृति और सांप्रदायिकता)

कहना पड़ेगा कि ‘हिंदुओं’ के नाम पर हाईकोर्ट ने संघियों यानी ‘कांग्रेसी भाजपाई द्विजों’ के पक्ष में यह फैसला दिया है! भाजपा जब हिंदुओं की बात करती है तो उसका मतलब ‘द्विज हिंदू’ ही होता है। (द्विज यानी जिसका दो बार संस्कार हो – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य। शूद्र का संस्कार प्रतिबंधति है। अछूतों, आदिवासियों की बात ही क्या।) सत्ता में कोई भी हो, इतिहास के किसी भी कालखंड में देख लीजिए, द्विज जातियों ने अपना सामाजिक आर्थिक वर्चस्व बरकरार रखने के लिए कैसे कैसे धतकरम किये हैं। अपने चारों ओर निगाह दौड़ाकर देख लीजिए – इन द्विजों में कितने लोग मजदूर, किसान, कारीगर या दस्तकार हैं यानी अपनी मेहनत की कमाई खाते हैं अर्थात दूसरों का हिस्सा हड़पकर अपनी तिजोरी नहीं भरते। मर्यादा, इज्जत, आबरू या शुचिता के नाम पर स्त्रियों के सदियों लंबे शोषण के उत्तरदायी यही लोग हैं। बौद्ध आंदोलन को इन्हीं लोगों ने भंड किया। अंग्रेजों की सत्ता को पायेदार बनाने में इन्हीं देशद्रोहियों का योगदान सबसे ज़्यादा है। जब लड़ना था, तब चापलूसी में जुटे थे; अब बुक्का फाड़ते हैं कि ‘अपमान’ का बदला लेंगे। किसके अपमान का बदला लोगे? 1857 का संग्राम हिंदुओं-मुसलमानों ने मिलकर लड़ा, जिसमें मुसलमानों ने कम नुकसान नहीं सहा। संदिग्ध भी हुए। पीछे मध्‍यकाल के ‘अंधकार’ में देख लीजिए – रहीम और रसखान, तुलसी के समय के हैं। तमाम हिंदू मिथकों पर जैसी रचनाएं इन दोनों कवियों ने की हैं, किस हिंदू कवि से तुलना की जा सकती है? जायसी, दाऊद, मंझन, कुतुबन, नूर मुहम्मद – ये सब अवधी के कवि हैं। सबकी लिपि फारसी है, भाषा अवधी। अवधी क्यों अपना लिये? वे तो ‘बाहर से’ आये थे। ‘गुलाम’ हिंदुओं की जबान क्यों बोलने लगे? तथाकथित अपमान और बर्बरियत का, औसत उत्तर भारतीय आदमी के सामान्य बोध पर कैसा प्रभाव था-उसकी कोई झलक नहीं मिलती है इन कवियों के यहां? तुलसीदास ने ‘बर्बर’ मुसलमानों के खिलाफ कुछ नहीं लिखा। कबीर ने इन्हीं पाखंडी द्विजों को फजीहत किया है। हिंदुओं-मुसलमानों की आस्था के वाचक हैं कबीर।

साथियो! इस मध्‍यकालीन ‘अपमान’ के सृजन में निश्चय ही अंग्रेज इतिहासकारों की भूमिका है, लेकिन 19वी सदी की आखिरी तिहाई में हिंदी-उर्दू का विवाद खड़ा करने में दोनों समुदाय के एलीट आगे-आगे थे। दोनों तरफ की द्विज जातियों के मुट्ठीभर लोगों ने अपने अपने स्वार्थ को हिंदू-मुसलमान का मामला बना डाला। सांप्रदायिकता का जन्म यहीं हुआ। पूरी कौम के वास्तविक सामाजिक धर्मिक सुधार के प्रति इन सफेदपोश ‘कीटाणुओं’ की कभी कोई रुचि नहीं रही। विवाद बढ़ा, कटुता बढ़ी, दंगे हुए, लोग मरे। इन दंगों में अभिजात्य तबके के कितने लोग मरे – जरा पता लगाइए। इसी ‘मंदिर’ विवाद में जो लोग मरे, वे कौन लोग हैं – यही देख लीजिए। मजहब के नाम पर मरने वाले बहुसंख्यक हिंदू-मुसलमानों ने अपने आर्थिक सामाजिक अधिकार का सवाल जब-जब उठाया, तब-तब द्विज जातियों के इन संघी ‘सरदारों’ की क्या भूमिका रही? ओबीसी को आरक्षण मिलने से कौन लोग परेशान हैं? एससी-एसटी का आरक्षण ’37 से लागू है, कभी सीटें नहीं भरतीं, कौन जिम्मेदार है? आजाद भारत के तमाम उद्यमों, विभागों और संस्थानों में किन लोगों का कब्जा है? 2008 के बाद दो साल में ही अरबपतियों की तादाद दोगुनी हो गयी है, कैसे? पिछले 60 साल में भ्रष्टाचार को संस्था का रूप देकर इस देश को खोखला करने वाले कौन लोग हैं? सामाजिक न्याय की प्रक्रिया तेज होने से किनकी दुश्वारी बढ़ रही है? नयी आर्थिक नीति और उदारीकरण के असल लाभार्थी कौन लोग हैं? शिक्षण संस्थाओं को किसने नष्ट किया?

इन सवालों का जवाब प्रेमचंद ने दिया है – ‘अगर हममें इतनी शक्ति होती तो हम अपना सारा जीवन हिंदू जाति को पुरोहितों, पुजारियों, पंडों और र्धमोपजीवी कीटाणुओं से मुक्त कराने में अर्पण कर देते। हिंदू जाति का सबसे घृणित कोढ़, सबसे लज्जाजनक कलंक यही टकेपंथी दल हैं जो एक विशाल जोंक की भांति उसका खून चूस रहा है और हमारी राष्ट्रीयता के मार्ग में सबसे बड़ी बाध है।’ (क्या हम वास्तव में राष्ट्रवादी हैं, विविध प्रसंग 2)। ये टकेपंथी कांग्रेसी-भाजपाई आज मुसलमानों को दुश्मन बताकर अमरीका के आगे नतमस्तक हैं। इसके पहले अंग्रेजों के सम्मुख दंडवत थे। यही इनकी ‘देशभक्ति’ है। देश की अस्मिता और संपदा को गिरवी रखने में इन्हें कोई शर्म संकोच नहीं। अदालत समर्थित संघी ‘आस्था’ की समाज विरोधी असलियत को पहचानिए। इन्हें ‘ठीक’ किये बगैर समाज ठीक नहीं हो सकता।

आखिरी बात: जमीन का एक तिहाई पा चुके ‘रामलला विराजमान’ पर कई संगीन आरोप हैं। दो बेहद गंभीर हैं – 1. शंबूक वध 2. सीता निर्वासन। क्या कोर्ट स्वतःसंज्ञान लेगा? क्या मुकदमा दर्ज होगा?

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