क्‍या माओवादियों के सपने स्त्रियों के दुर्भाग्‍य से पूरे होंगे?

विश्‍वजीत सेन। पटना में रहने वाले चर्चित बांग्ला कवि व साहित्यकार। पटना युनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई। बांग्ला एवं हिंदी में समान रूप से सक्रिय। पहली कविता 1967 में छपी। अब तक 6 कविता संकलन। पिता एके सेन आम जन के डॉक्‍टर के रूप में मशहूर थे और पटना पश्‍िचम से सीपीआई के विधायक भी रहे।

♦ विश्वजीत सेन

शोभा मांडी का आत्मसमर्पण और उनके चौंकानेवाले बयान के बाद हर सही सोच वाले व्यक्ति को विचार करने की जरूरत है। शोभा को महीने में दौ सौ रुपये पगार मिलते थे। इस रकम के एवज में शोभा को जान जोखिम में डालकर माओवादी विध्वंस में हिस्सेदारी करनी पड़ती थी। लोगों को डरा धमकाकर जुलूस में ले जाना पड़ता था। इन सभी कामों के साथ-साथ शोभा का यौन शोषण भी चलता रहता था। इस समस्या के कई आयाम हैं। मसलन (1) शिक्षा के अभाव और विकास की अनुपस्थिति में एक युवती को दौ सौ रुपये माहवारी के एवज में खुद को इस उत्पीड़न के हाथो सौंप देना पड़ता है? (2) जो मानवाधिकार कार्यकर्ता स्त्रियों की स्वतंत्रता की मांग को लेकर सुबह-शाम गला फाड़ रहे हैं, वे सच्चाई से कितने प्रकाश वर्ष दूर खड़े हैं? (3) शोभा विगत सात वर्षों से जंगलमहल-झाड़ग्राम इलाके में इस प्रकार के अत्याचार झेलने को विवश थीं और माओवादी नेतृत्व को कुछ पता ही नहीं था?ऐसा कैसे हो सकता है? सात वर्ष कोई कम समय तो नहीं है?

मुझे पता है कि माओवादी नेतृत्व के पास जवाब तैयार है। निरंतर भूमिगत रहना, ‘क्रांतिकारी गतिविधि’ का खाका तैयार करना, सरकारी प्रचार तंत्र की ‘मिथ्या’ के विरुद्ध जनमत संगठित करना, आदि के बीच उन्हें फुर्सत नहीं मिली। बात सही है। किसे फुर्सत है इतना कुछ देखने की? किसी को नहीं। नतीजतन अभागिन शोभा को आखिरी कदम उठाना पड़ा। लेकिन इससे क्या कहीं कुछ बदलाव आएगा? राजनीतिक पार्टियां, नागरिक समाज, तथा माओवादी नेतृत्व, सभी नाक में तेल और कान में रूई डालकर सोते ही रहेंगे।

शोभा अकेली नहीं है। भारत के विभिन्न प्रांतों में इसी तरह की घटना अतीत में घटी है और शायद आज भी घट रही है। उड़ीसा की एक घटना पर गौर करें, बाटूलि उर्फ सविता उर्फ उषा मुंडा ने 11 फरवरी 2010 को पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया। वह कोई साधारण महिला नहीं थी। नयागढ़ हमले (15 फरवरी, 2008) का नेतृत्व किया था उसने। लेकिन आखिरकार जंगल की जिंदगी और यौन परेशानी से तंग आकर उसने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया। उसने यह भी इल्जाम लगाया कि पार्टी में योगदान देते वक्त उन्हें जो आर्थिक आश्वासन दिये थे, उससे माओवादी नेतृत्व मुकर गया।

बिहार की गीता उर्फ सानी मुर्मु, जमुई बांका इलाके में माओवादी महिला स्क्वाड की नेत्री थीं। उन्होंने उस इलाके में कई ‘आपरेशंस’ का नेतृत्व किया था। माओवादी पार्टी में वह जोनल कमांडर चिराग जी के मार्फत आयी थीं। चिराग जी ने उनसे विवाह का वादा किया था और इसी वादे पर कई वर्षों तक उसके शरीर से खिलवाड़ करते रहे। सोनी की भौजाई अंजु उर्फ मंझली, सोनी के आग्रह पर माओवादी पार्टी में आ गयी। पार्टी में आने के चार-पांच महीनों बाद कांगनी के जंगल में (थाना खड़गपुर, जिला मुंगेर) एक माओवादी प्रशिक्षण कैंप के चलने के दौरान पार्टी कार्यकर्ता बिट्टो ने उनसे बलात्कार किया। अंजु कैंप छोड़कर अपने पति के पास लौट गयीं। इसके बाद सोनी, अंजु के पति विनोद के सहयोग से यह प्रयास करने लगी कि अंजु पार्टी में लौट आये। यह चिराग दास का आदेश था। इस समझने-समझाने के दौरान ही पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

जब पार्टी में ही इस तरह की घटनाएं घट रही हैं, तब सांस्कृतिक मोर्चा क्यों कर पीछे रह जाए? झारखंड की रूबी कुमारी उर्फ संगीता माओवादी ‘सांस्कृतिक कला मंच’ की सदस्य थीं। उन्होंने इल्जाम लगाया कि माओवादी कम्युनिस्ट कार्यकर्ता नियमित रूप से उनसे बलात्कार कर रहे हैं। संगीता ने ‘सांस्कृतिक कला मंच’ से इस्तीफा दे दिया। लातेहार के ग्रामीण उसे इस स्थिति से उबारकर सभ्य जीवन में वापस ले आये।

खोज करने पर ऐसी सैकड़ों घटनाएं मिलेंगी। सारे सवालों के बाद एक सवाल जो सबसे बड़ा सवाल बन कर उभरता है, वह यह है कि श्रमिकों की मुक्ति, किसानों की मुक्ति, दलितों की मुक्ति, आदिवासियों की मुक्ति, बुद्धिजीवियों की, स्त्रियों की मुक्ति और किसकी नहीं मुक्ति पर जो अपनी जान न्योछावर करते हैं, वही माओवादी इस स्थिति को बर्दाश्त कैसे कर रहे हैं? ‘क्रांति’ के नाम पर ऐसे दुराचारों को बर्दाश्त करना क्या उचित है? ‘बर्दाश्त’ करने की इस आदत ने अतीत में विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन को काफी क्षतिग्रस्त किया है। अवश्य ही वे घटनाएं, अलग किस्म की थीं, लेकिन उन घटनाओं के चलते मनुष्‍यता कलंकित हुई थी। वैसे ही उपरोक्त घटनाओं ने भी मनुष्‍यता को ही कलंकित किया है।

मेरा यह लेख पढ़ते हुए जिनके फन डंक मारने को तैयार हो रहे हैं, वे तुरंत ही सवाल दागेंगे – ‘क्यों साहब? संसदीय वामपंथी दलों में ऐसी घटनाएं नहीं घटती क्या?’ मेरा जवाब है – ‘अवश्य घटती हैं, ऐसे कई उदाहरण भरे पड़े हैं। लेकिन वहां अत्याचारित महिलाओं के सामने कई रास्ते खुले हैं। वे ‘पार्टी कंट्रोल कमीशन’ के पास शिकायत दर्ज कर सकती हैं, अदालत की शरण में जा सकती हैं, प्रेस में बयान दे सकती हैं, पार्टी छोड़ सकती हैं। और यहां?जंगल में दमघोंटू माहौल, निरंतर पुलिस द्वारा पीछा किया जाना, पार्टी अनुशासन की धमकी, इनके बीच से अभागिन महिलाएं रास्ता निकालें तो कैसे? किसी को अगर पता हो तो बताएं? मुक्ति का एकमात्र रास्ता पुलिस के हाथों खुद को सौंपना ही है और पुलिस भी हमेशा मानवीय बर्ताव करेगी – इसकी कोई गारंटी नहीं है।

सोच में बदलाव लाये बगैर मुक्ति नहीं मिलेगी। लेकिन जिनके मस्तिष्‍क में नट-भोल्‍ट के सहारे कुछ धारणाएं कस दी गयी हैं, क्या वे इस प्रकार के बदलाव ला सकते हैं, कहना मुश्किल है। कभी-कभी ऐसा भी होता है – नट-भोल्‍ट खोलने के प्रयास में दिमाग ही गोल हो जाता है। तब वामपंथी भी औल-बौल बकने लगते हैं मसलन – ‘अग्रसर पूंजीवाद ही समाजवाद है।’

बुद्ध ने मध्यमार्ग की बात कही थी। यह दुर्भाग्य ही है कि जिस देश में उन्होंने अपने धर्म का प्रचार किया, उसी देश में उनकी बात को दरकिनार कर दिया गया। अतः हम दो ‘अति’ के बीच झूलते रहते हैं। एक बार इस छोर पर, एक बार उस छोर पर। और लहूलुहान होती है मनुष्‍य की आत्मा, जिसे स्वच्छंद बनाने के लिए मुक्तिसेना – पीएलजीए, सेंट्रल मिलिट्री कमीशन, पॉलिट ब्यूरो, सेंट्रल कमिटी आदि के नाम पर कितने सारे आयोजन किये जाते हैं।

[ सौजन्‍य : अनीश अंकुर ]

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