गिरे चलो, पड़े चलो, गड़े चलो, बढ़े चलो

♦ अनहद गरजै

यह तीसरा पर्चा हम छाप रहे हैं, जो कल शाम जेएनयू छात्रावासों के मैस में बांटा गया था। यह पर्चा भी अनहद गरजै के नाम से हमें मिला है : मॉडरेटर

रामभक्त जजों ने हमें ‘पीछे’ का रास्ता दिखा दिया है – मंदिर बनते ही गरीबी छू-मंतर हो जाएगी। चोट्टों से निजात मिल जाएगी तो क्या कहने! चलो, नीचे के रास्ते से ऊपर उठो, या पीछे के मार्ग से आगे बढ़ो। गिरो, जल्दी गिरो। आधुनिकता की कथरी में (तर्क के) चीलर भरे हैं। धर्मनिरपेक्षता की खटिया में (नास्तिकता के) खटमल परे हैं। हम 21वीं सदी में नहीं रह सकते। हमें ले चलो। रथ तैयार करो, हम तैयार हैं। सोमनाथ से शुरू करो या कहीं से करो। जल्दी करो। इस बार हम अयोध्‍या के रास्ते नहीं, वाया काशी या मथुरा चलेंगे। ओके। जल्दी ‘उठो’, फौरन ‘गिरो’।

1. अब तक हम समझते थे कि अदालत का फैसला आखिरी होता है, लेकिन अयोध्‍या मामले में हाईकोर्ट ने बरसों के हमारे ऐतबार के सिर पर ‘आस्था’ के जिस संघी डंडे से वार किया है, उसके असरात दूर तक जाएंगे। फैसले ने इस कदर झकझोर दिया है कि हम समझ ही नहीं पा रहे हैं कि अब क्या बोलें? बोलने को बचा क्या? किससे कहें? क्या कहें? एक अदालत ही तो थी जिसका आसरा था। ये जानते थे कि वहां भी संघी विराजमान हैं, लेकिन वे इस हद तक ‘गिर’ जाएंगे – फैसले के हफ्ते भर बाद भी नाकाबिले-यकीन है। बाकी सब जगह तो कांग्रेसी-भाजपाई अंधेरगर्दी है ही।

हम सचमुच नहीं समझ पा रहे हैं कि तर्क, बुद्धि, प्रमाण, विज्ञान, इतिहास और यहां तक कि गवाहियों को भी नकारकर अदालत, केवल कपोल कल्पना की बुनियाद पर कोई फैसला कैसे दे सकती है? यह हिंदू अदालत तो थी नहीं? फिर, इस देश का हिंदू समुदाय यह कहां मानता है कि राम का जन्म बाबरी मस्जिद के बीच वाले गुंबद के ठीक नीचे ही हुआ था। बेशक, बहुतेरे मानते हैं कि राम का जन्म अयोध्‍या में हुआ था लेकिन अभी तो यही तय नहीं हो सका है कि दशरथ की अयोध्‍या यही है या कहीं और थी। ऐसे में संघियों की कपोल कल्पना को अदालत ने हिंदुओं की ‘आस्था’ कैसे समझ लिया?

‘कपोल कल्पना’ इसलिए कि राम के प्रति हिंदुओं की आस्था से संघियों का क्या वास्ता? संघियों के इस प्रचार से भी हिंदुओं का कोई तआल्लुक नहीं है कि ‘बीच वाले गुंबद के ठीक नीचे राम जन्मे कि मस्जिद बनी तो किसी मंदिर या ‘भव्य भवन’ को तोड़कर ही बनी कि ‘खाली जगह’ थी तो भी, वहां कोई मस्जिद क्यों बनायी गयी। ‘मंदिर’ आंदोलन का मकसद पुरोहिती और वर्णवाद को मजबूत करना है, नौकरियों और संस्थानों में द्विजों के वर्चस्व को बरकरार रखना है – इसी ‘लक्ष्य’ के लिए संघियों ने मुसलमानों को हिंदुओं का दुश्मन बताना शुरू किया। जबकि हिंदुओं की वास्तविक समस्याओं और जरूरतों से इनको कोई मतलब नहीं। आज भी नहीं है। कभी नहीं रहा।

सबको पता है कि 1992 तक वहां मस्जिद थी। 1949 तक वहां नमाज पढ़ी जाती थी। हिंदू भी उसी परिसर में पूजा-पाठ करते थे। दोनों समुदायों में कोई कटुता नहीं थी। आखिर हिंदुओं का वोट गोलबंद करने के लिए ही तो 1949 में फैजाबाद से चुरायी गयी मूर्तियां रखी गयीं। सांप्रदायिकता को ‘आस्था’ का दूध पिलाया गया। आप देखिए कि इस मामले में कांग्रेस लगातार ‘दर्शक कलाकार’ की भूमिका में रही। ‘मंदिर’ आंदोलन को मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद और भ्रष्टाचार के आरोप में ’89 में कांग्रेस की पराजय के बाद ही क्यों खड़ा किया गया? कभी सोचिए कि जितने आरक्षण विरोधी हैं, वे सब के सब मंदिर समर्थक क्यों हैं? जाति जनगणना के विरोधी, ‘आपरेशन ग्रीन हंट’ के पैरोकार क्यों हैं? अमरीका, इजराइल और नयी आर्थिक नीतियों के प्रति कांग्रेस और भाजपा की ‘भजन शैली’ में इतनी समानता क्यों है? ब्राह्मणवाद और साम्राज्यवाद की अंतर्वस्तु में इतना मेल क्यों है कि दोनों तरफ मुनाफाखोरी है कि दोनों तरफ अपनी आर्थिक सामाजिक श्रेष्ठता बरकरार रखने के राजनीतिक (धर्मिक) षड्यंत्र हैं कि दोनों तरफ मेहनतकश मनुष्य का उत्पीड़न-शोषण है, क्यों? ब्राह्मणवाद से साम्राज्यवाद की यह कैसी अंडरस्टैंडिंग है?

एक बात और : अगर ‘डकैती डाली हुई खाली जमीनों’ को मुक्त कराया जाएगा, अगर ‘बाहर से’ आये हुओं को भगाया जाएगा, अगर घर में घुसे ‘गुंडों’ को देश से निकाला जाएगा तो यह काम कहां से, कब से शुरू होगा? यह ‘पुण्य भू’ तो आदिवासियों की है, जिन्हें बाहर से आये आर्यों ने जंगल में खदेड़ दिया। क्या सबसे पहले आर्यों को ही यूराल पर्वत के उस पार ले चलकर ‘विसर्जित’ किया जाए? किसी समय तमाम जमीनें खाली ही थीं। काफिले आ-आकर बसे। हर जगह कुछ न कुछ मिलेगा। ब्राह्मणवादियों ने बौद्धों के बेशुमार मठ ध्‍वस्त किये हैं। क्या देश भर में खुदाई शुरू कर देनी चाहिए? मनमोहन सिंह और शीला दीक्षित की देखरेख में सुरेश कलमाडी को ठेका दे दिया जाए तो कैसा रहे? यही नहीं, ’84 के दंगों और गुजरात 2002 का ‘हिसाब’ भी चुकता करना होगा। लाखों बौद्धों के हत्यारे ‘सहिष्णु’ ब्राह्मणवादी पुष्यमित्र शुंग का क्या होगा? केवल धर्म के आधार पर इन प्रश्नों को नहीं समझा जा सकता। ‘आस्था’ की कंठी जपने वाले वास्तविकता का सामना नहीं करना चाहते। इसे समझिए।

सवाल यह है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ‘मंदिर’ के नाम पर खड़े किये गये संघियों के इस राजनीतिक ‘खेल’ में कैसे शामिल हो गयी? सवाल यह नहीं है कि इस फैसले के पीछे कांग्रेस का कितना कुटिल योगदान है या भाजपा-कांग्रेस में (न्यूक्लियर बिल पास हो जाने के बाद) किस तरह की ‘अंडरस्टैंडिग’ है, सवाल यह है कि कांग्रेस इस निर्णय के प्रति अब जिस मुद्रा में ‘दिखने’ की कोशिश कर रही है, उसको कैसे समझा जाए? सवाल यह भी है कि क्या ‘आस्था’ कोई पैदाइशी चीज है? इसका दिल दिमाग से कोई संबंध नहीं होता? ‘आस्था’ को कानून से ऊपर या बुद्धि से अलग मानना वैसा ही है जैसे एक समय शारीरिक श्रम को मानसिक श्रम से अलग बताया गया। जिसकी बुनियाद पर वर्णव्यवस्था का यह शोषण महल खड़ा है? ‘बुद्धिविहीन आस्था’ का स्वर्णकाल तो गुप्तकाल है, जब अवतारवाद का जाल बुना गया। तो क्या 21वीं सदी से निकलकर गुप्तकाल में चला जाए? आधुनिक मनुष्य तो तर्क, बुद्धि और विज्ञान का हामी है। हमारी आस्था ‘समता, स्वतंत्रता और बराबरी’ के प्रति है। हमें पता है कि मंदिर बन जाने पर भी श्रमशील मनुष्य की वास्तविक जीवन स्थितियों में कोई परिवर्तन नहीं होने जा रहा। फिर?

2. साथियो! कांग्रेस ने अयोध्‍या मसले पर नया मेकअप किया है। चांद बेदाग था ही, कातिल मासूमियत के पीछे छिपी सवा सौ वर्षीय बेहयाई नये सिरे से निखरकर ‘झंडूबाम’ हो गयी है। मंगलवार को संचालन समिति की बैठक में तय किया गया कि ‘अयोध्‍या मामले की न्यायिक प्रक्रिया का कांग्रेस सम्मान करती है। फिर भी… अब हमें सुप्रीम कोर्ट के आखिरी फैसले का इंतजार करना होगा… सांप्रदायिक शक्तियां फैसले का तोड़-मरोड़कर पेश कर रही हैं…’ बैठक में तय हुआ कि ‘समझौते के प्रयासों का समर्थन किया जाए लेकिन इसमें कहीं भी खुद शामिल होते न दिखा जाए।’ शाबास! क्या पैंतरेबाजी है। कांग्रेस की ‘चाल’ देखिए। जब सब खुश हैं, कोई ‘देख’ ही नहीं रहा है तो ‘दिखने’ की इतनी चिंता क्यों? दो दिन पहले गृहमंत्री ने कहा, ‘1992 की घटना से फैसले का कोई संबंध नहीं’। अब कांग्रेस कह रही है कि ‘संबंध है’। इतनी जल्दी संबंध ‘स्थापित’ हो गया।

आप जानते हैं कि कांग्रेसी होना, गीली मिट्टी होना है – चाहे जितना लतियाओ। ये परम थेथर हैं। कोई कांग्रेसी है तो समझ लीजिए कि उसके दिमाग के लिफाफे में बेहतरीन नॉन बायो-डिग्रेडेबल कूड़ा भरा है। लीपो। पोतो। ठेलो। और झूठ बोलो। कोई नहीं जानता कि कांग्रेस ही सांप्रदायिकता का गोमुख है, कोई नहीं जानता कि कांग्रेस ही अयोध्‍या विवाद की जड़ है, कोई नहीं मानता कि मूर्ति रखवाने में, ताला खुलवाने में, मस्जिद ढहवाने में और अब न्यायपालिका को सफेद हाथी साबित करवाने में किसका ‘पंजा’ काम कर रहा है? कोई नहीं जानता कि रूह तक संघी हुए बगैर कोई कांग्रेसी नहीं हो सकता। बनाये रखो भाजपा से तालमेल। झोंको पब्लिक की आंख में धूल। ठगो।

साथियो! कांग्रेस ठग-नगरी है। सात जनम के किये धरे को सात हाथ नीचे गाड़ चुकने के बाद ही यहां किसी का मुंडन संस्कार होता है। इसके बाद घिनौनेपन के तालकटोरा में 2010-1885=125 दफा डुबकी लगानी पड़ती है। तब किसी को खांटी कांग्रेसी घोषित किया जाता है। पक्का कांग्रेसी यानी ‘खद्दर पहनकर कुर्सी में धंसा सांप’। ये घर में हाफ-पैंटिये हैं। बाहर निकलते हैं तो ऊपर से पायजामा या धोती धारण कर लेते हैं। जमाने के जितने दंतचियार हैं, वे कांग्रेस के सदस्य नहीं तो समर्थक जरूर होंगे। नरसिंहराव, ऊपर या नीचे जहां कहीं भी होंगे, सुकून से नहीं होंगे। इंदिराजी के हाथ पले विषधर, कोबरा से भी कठिन ‘हंटर’ हैं। राजीव अविकसित रह गये थे। संजय होते तो अब तक आदिवासी भी ‘साफ’ हो चुके होते, जंगल की तो बात ही क्या! लेकिन यह न समझिए कि सरदारजी, आपका होश दुरुस्त रहने देंगे। सुमित्रानंदन लक्ष्मण के बाद ‘ए प्लस’ पाने लायक काम सिर्फ मनमोहन ही कर रहे हैं।

आप जानते हैं कि आगे बढ़ने या ऊपर उठने की तरह, पीछे की ओर भी ‘बढ़ा’ जा सकता है या नीचे की ओर भी ‘उठा’ जा सकता है। पीछे का रास्ता, चूंकि देखा हुआ है इसलिए ‘गिरने’ में सहूलियत रहती है। पतन की पगडंडियां सुहावनी हैं। नीचे की ओर ‘उठना’ सबके बस की बात नहीं। अव्वल क्लास का घटिया आदमी चाहिए। कहना न होगा कि हम लोग पतित होने के लिए तैयार हैं। हमें गुप्तकाल में ले चलो, चाहे वैदिक काल में। कहीं चलो, बस आधुनिक काल से चलो। 21वीं सदी से हटाओ हमें। रामभक्त जजों ने हमें ‘पीछे’ का रास्ता दिखा दिया है – मंदिर बनते ही गरीबी छू-मंतर हो जाएगी। चोट्टों से निजात मिल जाएगी तो क्या कहने! चलो, नीचे के रास्ते से ऊपर उठो, या पीछे के मार्ग से आगे बढ़ो। गिरो, जल्दी गिरो। आधुनिकता की कथरी में (तर्क के) चीलर भरे हैं। धर्मनिरपेक्षता की खटिया में (नास्तिकता के) खटमल परे हैं। हम 21वीं सदी में नहीं रह सकते। हमें ले चलो। रथ तैयार करो, हम तैयार हैं। सोमनाथ से शुरू करो या कहीं से करो। जल्दी करो। इस बार हम अयोध्‍या के रास्ते नहीं, वाया काशी या मथुरा चलेंगे। ओके। जल्दी ‘उठो’, फौरन ‘गिरो’।

हम समझ नहीं पा रहे हैं कि जब हम लोग फर्स्टक्लास खुश हैं तो कुछ लोग क्यों कह रहे हैं कि … गुप्तकाल में चलेंगे, सामंतवाद के खंडहरों में बैठकर, गरीबों की हाय हाय के बीच भजन करेंगे तो कितना अच्छा लगेगा? वहां सब खुश हैं। दलित अपने शोषण से खुश हैं। महिलाएं अपनी कुटम्मस से खुश हैं। आदिवासी सलेबस से ही बाहर हैं। अछूतों की चर्चा ही क्या। वहां न्याय भी खुश है, अन्याय भी खुश। इस समय जो लोग खुश नहीं हैं, कुछ न कुछ बोल रहे हैं, वे कम्युनिस्ट हैं या फिर सेकुलर। ये दोनों अतीत में रहने लायक नहीं हैं। इन्हें यहीं 21वीं सदी में छोड़ चलेंगे। … हहा! चुप रहने का मतलब खुश होना होता है। क्या समझे? कोई चुप है तो समझो, खुश है। पांच हजार साल से सब खुश हैं, इसीलिए चुप हैं। कोई कष्ट ही नहीं हुआ कभी। दुख देखे ही नहीं। आज भी, कम से कम शाम के वक्त आध पेट पा ही ले रहे हैं। बढ़िया गंदा पानी पी रहे हैं। दिनभर दूसरे के खेत में मजदूरी कर रहे हैं। समझिए कि एकदम ग्लैड हैं। फटी लुंगी में ऐश कर रहे हैं। मेहरारू लूगा से ही ब्लाउज का काम चला लेती है। बच्चे मिड डे मील के लालच में स्कूल जाते हैं। खेत नहीं है। कर्जा लदा है। कहने का मतलब यह कि आपकी दया से कोई कमी नहीं है। बस, एक वही भगवान का मंदिर बन जाता तो रही-सही कसर पूरी हो जातीं। हम भी सुकून से ‘गिरते’।

… लेकिन कम्युनिस्टों के रहते अड़चन बनी ही रहेगी। अब भी। आगे भी। इसीलिए कह रहे हैं कि चलो, पीछे चलो। गिरो, नीचे गिरो। अतीत में सवाल-जवाब का झंझट नहीं रहेगा। वहां नो अदालत, नो वर्डिक्ट, नो डिबेट, नो परचा, नो पोस्टर, नो मीडिया, नो अखबार। सब कुछ मंदिर/राजमहल से डील होगा। किसी को कोई ढील नहीं दी जाएगी। आस्था के आधार पर न्याय होगा। सेम ग्राउंड पर अन्याय होगा। शर्मा जी रिटायर हो गये हैं। जो यहां किया, चलकर वहां करेंगे। यहां उनके खिलाफ अनाप-शनाप चल रहा है। फैसला क्या आ गया, मानो गटर का ढक्कन खुल गया। इतनी गंध नहीं फैलानी थी कि अदालत से ऐतबार ही उठ जाए। खैर, उनको ‘पीछे’ ही ले चलना पड़ेगा। वे आधुनिक काल में रहने लायक नहीं हैं। संतों-भक्तों का बसर नहीं है 21वीं सदी में। गुप्तकाल में ‘आंख मूंदकर’ (अ)न्याय करेंगे तो कोई बोलेगा नहीं। वहां पंडों-पुरोहितों परोपजीवियों की मौज रहेगी। गिरहकटों की ताल्लुकेदारी होगी। धूर्तई के मचान पर बैठ तिकड़म का तमाखू ठोंकेगे। …काश! (कम्युनिस्टों को छोड़कर) सब लोग गुप्तकाल में ही चले चलते तो कितना अच्छा होता!

हम फिर कहना चाहते हैं कि चांस बार-बार नहीं मिलता। अभी डिसीजन आया है। मौका है। दुनिया को दिखा दो कि हम वाकई सपेरों की औलाद हैं, जादू का खेल अभी भूले नहीं हैं कि हमारी अक्ल की किताब के कई चैप्टर गायब हैं। हे कांग्रेसियो! हे भाजपाइयो! यानी हे संघी द्विजो! बुलाओ, देसी-विदेशी पूंजीपतियों को। लुटेरों का स्वागत है। हम लोग मंदिर-मस्जिद के ‘खेलगांव’ में फंसे हैं। भजन-कीर्तन करने जा रहे हैं। तुम बेच लो हमारे खेत। गिरवी रख दो हमारी जमीनें। लुटा दो हमारी बहुमूल्य वनस्पतियां, जंगल, खनिज। बनाओ एक्सप्रेव वे और फ्रलाईओवर। कराओ कॉमनवेल्थ। खाओ कमीशन। लो दलाली। बेच खाओ यह देश। गरियाओ हमारे प्रोफेसरों को। हे सत्यानाशी संघियो! तुम्हें न इतिहास का कोई ज्ञान है। न तुम अकैडमिक्स के बारे में कुछ जानते हो। स्त्री को वेश्या के सिवा और कुछ समझने की तमीज तुम्हारे बाप के बाप के बाप को भी नहीं थी, तुम्हें कहां से मिलती। तुम अपना काम करो। पीछे चलो। गिरो। पतन की राह पर बढ़ो। … जयश्रीराम …

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