फणीश्‍वर नाथ रेणु के बेटे ने भाजपा से टिकट लिया

भाजपा के आंगन में सेकुलरिज्‍म का पौधा या सेकुलरिज्‍म के दामन पर दाग

♦ अनंत

यह रपटनुमा विश्‍लेषण इस बात पर जोर देता है कि भाजपा अगर किसी सेकुलर पृष्‍ठभूमि वाले व्‍यक्ति को टिकट देती है, तो भाजपा के धतकर्मों को भूलकर उस व्‍यक्ति को वोट देना चाहिए। ऐसे मामलों में विचारधारा का प्रश्‍न खड़ा नहीं करना चाहिए। यानी यह रपट एक तरह से राजनीति की बेसिक समझदारी के साथ एक मजाक है – फिर भी हम इसलिए इसे छाप रहे हैं क्‍योंकि मोहल्‍ला लाइव में छापने के लिए आग्रहपूर्वक भेजा गया है। हमारा मानना है कि वेणु जी को भाजपा से टिकट नहीं लेना चाहिए था और रेणु जी की विश्‍वसनीयता किसी भी पार्टी और विचारधारा से बड़ी है, तो उनके नाम पर राजनीति की नदी में उतरने के लिए उनके वंशजों को भाजपा की नाव पर बैठने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए थी: मॉडरेटर

बिहार में इन दिनों चर्चा-ए-आम है कि भाजपा ने समाजवादी साहित्यकार कथाशिल्‍पी फणीश्वरनाथ रेणु के बड़े बेटे पदमपराग राय वेणु को फारबिसगंज विधान सभा क्षेत्र से उम्मीदवार बना कर अपने आंगन में सांप्रदायिकता की जगह सेकुलरिज्‍म पौधा रोपने की कोशिश की है। समाजवाद की साहित्यिक राजधानी ‘औराही हिंगना (रेणु ग्राम)’ से लेकर संपूर्ण पूर्णिया अंचल तक व बिहार के कोने कोने में चर्चा है कि क्या इस चुनाव में फारबिसगंज की जनता अमरकथा शिल्‍पी फणीश्वरनाथ रेणु का कर्ज उतार पाएगी? यही सवाल समाजवादी विचारधारा के नेता लालू और रामविलास पासवान से भी किया जा रहा है कि क्या ये दोनों नेता रेणु के सम्मान में नतमस्तक होंगे? अर्थात रेणु के बेटे वेणु की जीत का मार्ग प्रशस्त करेंगे।

इस बीच पटना विश्वविद्यालय के छात्रों ने फणीश्वरनाथ रेणु फैन्‍स एसोसिएशन के बैनर तले लालू व पासवान से वेणु के खिलाफ खड़े प्रत्याशी को चुनाव मैदान से हटाने की मांग की है। वेणु के खिलाफ प्रचार नहीं करने की मांग की है। छात्रों का मानना है कि रेणु के बेटे के खिलाफ प्रचार करना रेणु का अपमान करना है। छात्रों ने यह भी सवाल खड़ा किया है कि रेणु की बदौलत सम्मान पाने वाले राजद के पूर्व विधान पार्षद यह पहल क्यों नहीं कर रहे हैं? क्या रेणु के प्रति यही उनकी सच्ची श्रद्धांजलि है।

यहां उल्लेखनीय है कि 1972 के चुनाव में इसी विधानसभा क्षेत्र से चुनावी वैतरणी में रेणु की चुनावी नाव डूब गयी थी। उस चुनाव में रेणु निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में खड़े थे। समाजवादियों ने भी समाजवादी आंदोलन के सशक्त क्रांतिकारी नेता और समाजवादी साहित्य निर्माता को नजरअंदाज कर अपना उम्मीदवार खड़ा किया था। जिस जनता के दर्द और पीड़ा को रेणु ने अपनी पीड़ा समझ कर अपने जीवन को जोखिम में डाला था, उस जनता ने भी उन्हें नकार दिया था। उस चुनाव में राष्‍ट्रकवि दिनकर ने जनता से रेणु के पक्ष में वोट करने की अपील की थी। लेकिन इस चुनाव में साहित्यकारों का समाज खामोश है। हालांकि छात्र संगठन ने अपील जारी कर दिनकर के सपने को साकार करने का प्रयास किया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि इस बार के चुनाव में जनता क्या फैसला सुनाती है? रेणु के तप और त्याग की बदौलत सत्ता-सुख भोगने वाले, खासतौर से लालू और रामविलास रेणु के पुत्र वेणु के प्रति अपना रुख नरम करते हैं या फिर मुख्य प्रतिद्वंदी के रूप में अपनी भूमिका अदा कर भाजपा के आंगन में उग रहे सेकुलरिज्‍म के पौधे को पनपने नहीं देते हैं।

दरअसल इस चुनाव में फारबिसगंज विधानसभा क्षेत्र से भाजपा ने रेणु के बड़े बेटे पदमपराग राय वेणु को अपना प्रत्याशी बनाया है। वहां की आम जनता भाजपा-जदयू गठबंधन द्वारा रेणु परिवार को सम्मानित करने के नजरिये से देख रही है। जानकारों की माने तो नीतीश कुमार की विशेष पहल के कारण ही रेणु के पुत्र वेणु को टिकट दिया गया है। ऐसी बात नहीं है कि बिहार भाजपा के नेताओं को वेणु को टिकट दिये जाने पर आपत्ति थी। दरअसल भाजपा के सामने विकट समस्या थी पूर्व विधायक लक्ष्‍मी नारायण मेहता का टिकट काटना। वैसे श्री मेहता से स्थानीय जनता नाखुश थी वहीं अरुण गोलछा हत्यकांड में मेहता का नाम आने से व्यवसायी वर्ग में भी काफी रोष था। विवाद के डर से भाजपा फूंक-फूंक कर कदम रखना चाह रही थी। अंततः भाजपा के शाहनवाज हुसैन, सुशील कुमार मोदी, नंदकिशोर यादव सहित कई नेताओं ने रेणु के कृतित्व और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से रेणु परिवार के पारिवारिक संबंध को केंद्र में रखकर रेणु के बेटे वेणु को चुनावी मैदान में उतारा है। भाजपा द्वारा वेणु को प्रत्याशी बनाये जाने के बाद पूर्व विधायक लक्ष्‍मी नारायण मेहता ने बयान जारी कर कहा कि जब अमरकथा शिल्‍पी के पुत्र चुनाव लड़ रहे हैं, तो मुझे कुछ नहीं कहना है। मेहता का यह बयान सच्‍चा है या दिमाग में उपज रही राजनीतिक साजिश का हिस्सा, इसका पर्दाफाश तो आने वाले समय में होगा। वैसे कड़वी सच्चाई यह है कि स्थानीय भाजपा नेताओं के कई दिग्गजों का राजनीतिक धरातल अभी से ही खिसकने का भय सता रहा है। इस वजह से भितरघात की संभावना से इनकार नहीं किया सकता है।

इन तमाम सवालों के बीच यह भी बता देना जरूरी है कि लगभग 45 वर्ष पहले रेणु ने अपनी बेटी का नाम वहीदा रखा था। वहीं रेणु ने अपनी सबसे बड़ी पोती और पदमपराग राय वेणु की बेटी का नाम शबाना रखा था। जब वेणु की दूसरी बेटी का जन्म हुआ तो शबाना ने अपने बापू से कहा ‘हम अपन बुनी के नाम जरीना रखई छी’। वेणु अपनी कोमलवय की बेटी के रग में दौर रहे समाजवाद और सेकुलरिजम के खून को देखकर पुलकित हुए थे। इस आधार पर यह कहने में तनिक अतिशयोक्ति नहीं होगी कि रेणु परिवार देश का नंबर वन सेकलुर परिवार है और भाजपा इस परिवार से रिश्ता जोड़कर अपने ऊपर लग रहे आरोपों से उबरना चाहती है। भाजपा अपने सेकुलर चेहरा के बीच जनता प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही है।

वैसे भी 1974 के आंदोलन में जेपी और रेणु का साथ जनसंघ ने भी दिया था। जेपी और रेणु तमाम आंदोलनकारियों के गुरु थे। लालू, नीतीश, रामविलास, सुशील मोदी सहित अनगिनत समाजवादी व जनसंघी विचारधारा के लोग जेपी और रेणु को अपना राजनीतिक गुरु मानते हैं। इतना ही नहीं, लालू और रामविलास पासवान से लेकर वीपी सिंह जैसे अनगिनत समाजवादी जनसंघ की बैशाखी की बदौलत सत्ता का सुख भोग चुके हैं।

जनता को यह भी समझ लेना चाहिए कि कौन पार्टी सेकलुर है और कौन सांप्रदायिक? 1967 में जब महामाया प्रसाद की सरकार ने उर्दू भाषा को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया तो इसका विरोध कांग्रेस, जनसंघ के साथ-साथ बाबा नागार्जुन ने भी किया था। 12 अगस्त 1967 को पटना के गांधी मैदान में कांग्रेस के डा लक्ष्‍मी नारायण सुधांशु, जनसंघ के ठाकुर प्रसाद और बाबा नागार्जुन ने उर्दू विरोधी जनता को संबोधित किया था। सुधांशु जी तो संयमित दिखे थे लेकिन बाबा ने तो यहां तक कह डाला था कि अगर उर्दू का विरोध करना जनसंघी होना है तो मै एक सौ बार जनसंघी होना स्वीकार करूंगा। कहने का आशय यह है कि सेकुलरिज्‍म की बात करने वाला भी सेकुलर नहीं है। इसी प्रकार देश में होने वाले दंगों का सूक्ष्‍म विश्‍लेषण करेंगे तो पाएंगे कि हमाम में सब नंगे हैं। सिर्फ अंतर यह है कि कोई भड़काऊ भाषण देकर अपनी रोटी सेंकता है और कोई संयमित भाषण देकर अंदर ही अंदर काटता है। शायद यही कारण है कि चुनाव आते ही सांप्रदायिकता देशव्यापी मुद्दा बन जाता है। दरअसल यह एक ऐसा मुद्दा है, जिसमें राजनीतिक पार्टियों को भाषण देने के बजाय कुछ नहीं करना होता है। सिर्फ भाषण देना होता है।

दरअसल राजनीतिक लाभ लेने के लिए तमाम राजनीतिक पार्टियां जाति और धर्म के नाम पर समाज को बांटती हैं। सच तो यह है कि सांप्रदायिकता एक सामाजिक मुद्दा है, न कि राजनीतिक। सांप्रदायिकता को चुनावी मुद्दा बनाने वाली पार्टियों को खारिज करना चाहिए। क्योंकि सांप्रदायिकता एक संवेदनशील मसला है और देश के नेता सनसनी पैदा करने के रूप में इसका इस्तेमाल करते हैं। इसका फायदा तमाम राजनीतिक पार्टियां अपने-अपने हिसाब उठाती हैं। जरा गौर कीजिए, आयोध्या मामले पर कोर्ट का फैसला आने के बाद देश के तमाम राजनीतिक दल समाज का अंग बनकर संयमित ढंग से बयान दिया तो देश में अमन चैन बरकरार है। इसलिए भाजपा को केंद्र में रखकर रेणु परिवार की व्याख्या नहीं करनी चाहिए। जब भाजपा ने देश के नंबर वन सेकुलर परिवार को टिकट देकर मिसाल कायम किया है, तो रेणु के नाम पर उनकी विचारधारा से इत्तेफाक रखने वाली पार्टियों और नेताओं को एकजुट होकर रेणु के बेटे वेणु के पक्ष में कोई अहम फैसला लेना चाहिए ताकि भाजपा के आंगन में खिले कमल के फूल के समानांतर सेकुलरिज्‍म का दरख्त पनप सके।

वैसे नीतीश कुमार समाजवाद की स्थापना के लिए पद्मश्री को पापश्री कहकर लौटा देने वाले रेणु के पुत्र वेणु को जिताने का हरसंभव प्रयास करेंगे। वहीं लालू और राम विलास को चाहिए कि वे विपक्षी दल के रूप में नहीं सेकलुर समर्थक बनकर रेणु का कर्ज उतारें। जब समाजवादी नेता दिगविजय सिंह की पत्नी के प्रति तमाम पार्टियां नरम रुख अख्तियार कर रही हैं, तो रेणु परिवार के साथ क्यों नहीं? देश के साहित्यकारों को भी आगे आना चाहिए। साहित्यकारों को लालू और रामविलास पर दबाव बनाना चाहिए कि रेणु के बेटे के खिलाफ खड़ा उम्मीदवार को बैठा ले या स्वयं प्रचार करने नहीं जाए। अगर दिनकर जी जिंदा होते तो अब तक अपना संदेशा भेज दिये होते? यह पहल तो रेणु के साथ 14 वर्ष तक साथ रहने वाले डा रामवचन राय को भी करनी चाहिए। वे अभी राजद में हैं। फिर भी वे भी चुप्प हैं।

Anant Sinhaअनंत बिहार के युवा पत्रकार हैं। इन दिनों न्‍यू मीडिया के कई सारे वेंचर से जुड़े हैं। मैला आंचल के अफसानानिगार रेणु पर एक महत्वकांक्षी शोध में व्यस्त हैं। अनंत ने बिहार के नरसंहार पीड़ित गांवों और वहां के वर्तमान हालात पर कई रपटें लिखी हैं। अनंत से infinitivecreation@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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