बहसतलब में आज भारतीयता पर भिड़ेंगे वक्‍ता-श्रोता

आज बहसतलब का छठा आयोजन है। द ग्रेट इंडियन मिडिल क्‍लास के मशहूर लेखक पवन वर्मा की नयी किताब आयी है – बीकमिंग इंडियन। हिंदी में उसका नाम है, भारतीयता की ओर : संस्‍कृति और अस्मिता की अधूरी क्रांति। इस नयी किताब में उन्‍होंने रीढ़विहीन भारतीयता को सांस्‍कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक संदर्भों में समझने की कोशिश की है और उसे मजबूत करने की छटपटाहट को बार बार जाहिर किया है। भारतीयता को लेकर उनकी समझदारी हालांकि इतनी सपाट नहीं है कि उसे इकबाल की इस लाइन के जरिये बताया जा सके कि हिंदी हैं हम वतन हैं, हिंदोस्‍तां हमारा – लेकिन सांस्‍कृतिक जड़ों से विलग न होने की उनकी गुजारिश कमो‍बेश हिंदी और हिंदू जमीन पर खड़ी नजर आती है। आज बहसतलब में हम इसी मसले पर बात करेंगे। वक्‍ता पांच हैं : कवि अशोक वाजपेयी, दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद, पत्रकार ओम थानवी, लेखक पवन वर्मा और समाजशास्‍त्री राकेश पांडेय। हस्‍तक्षेप करेंगे वैभव सिंह, जिन्‍होंने इस किताब का हिंदी अनुवाद किया है और इस पूरी बहस को मॉडरेट करेंगे इतिहास के प्राध्‍यापक और सीएसडीएस सराय के सीनियर फेलो रविकांत। जगह वही इंडिया हैबिटैट सेंटर का गुलमोहर हॉल है, वक्‍त शाम का है – साढ़े छह बजे। आइए, बहस के साथ गरमागरम पकौड़ी का भी इंतजाम है : मॉडरेटर

नोट : मॉडरेटर कमेंट पर न जाएं, वह एक किताब और एक विचार पर एक व्‍यक्ति की अपनी सतही समझ का फलसफा आपको लग सकता है। लिहाजा किताब की भूमिका ही पढ़ डालें, जो पवन वर्मा ने किताब के उद्देश्‍यों और किताब में रखी गयी व्‍याख्‍याओं के बारे में है। शु्क्रिया।


कुछ दशक पहले तक विश्व साम्राज्यों में बंटा हुआ था, जिसमें सबसे बड़े साम्राज्य ब्रिटेन, फ्रांस, डच, पुर्तगाल व स्पेन के थे। 20वीं शताब्दी के मध्य में इन साम्राज्यों से स्वाधीन देशों का जन्म हुआ। 15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को भारत की स्वतंत्रता ने पूरे महाद्वीप में उपनिवेशवाद की समाप्ति की प्रक्रिया को तेज कर दिया। दुनिया ने उपनिवेशवाद को खत्म होते और समानता पर आधारित राष्ट्रों को जन्म लेते देखा।

राजनीतिक रूप से उपनिवेशवाद के अंत से ही उसके सांस्कृतिक प्रभाव व परिणामों के अंत के संकेत नहीं मिलते हैं। यह लगभग किसी उत्सवी मनोदशा के साथ माना जाता है कि यूनियन जैक के स्थान पर जब तिरंगा लहराने लगा तो पुरानी चीजों को विस्थापित कर इतिहास पूर्णतया व निर्णायक रूप से नये दौर में प्रवेश कर गया। यह राजनीतिक धारणा थी, पर संस्कृति व विचारों के क्षेत्र में इतिहास ऐसे अलग-अलग खानों में विभाजित नहीं होता है। पुरानी चीजें पीछा नहीं छोड़ती हैं और उनकी विरासत पर प्रश्न खड़े करना या उन्हें खत्म करने का काम बाकी रह जाता है। साम्राज्यों के बाद यह अधूरा काम बचा रहता है।

ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि अतीत के साम्राज्य लोगों पर सिर्फ शारीरिक नियंत्रण नहीं कायम करते। उनकी असली शक्ति लोगों के दिमाग के औपनिवेशीकरण में निहित होती है। इसलिए राजनीतिक स्वतंत्रता पर भले ही हम उत्सव मनाते रहें, पर अपेक्षाकृत हाल में स्वतंत्र हुए देशों की संस्कृति व रचनात्मकता पर साम्राज्यों के प्रभाव का विश्लेषण करना भी उतना ही आवश्यक होता है। अध्ययन के क्षेत्र में यह काफी उपेक्षित विषय है। उपनिवेशवाद का अध्ययन करने के लिए इसके राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव को केंद्र में अधिक रखा जाता है, पर इसके सांस्कृतिक व विचारधारात्मक प्रभाव की पड़ताल कम ही की जाती है जो कि लोगों के दिमाग को नियंत्रित करते हैं।

अतीत की विरासत का अविश्वसनीय रूप से गहन प्रभाव पड़ता है। वह विरासत सैकड़ों रूप से मौजूद रहती है; हमारी भाषा, विचारों, व्यवहार, आत्मसम्मान, रचनात्मक अभिव्यक्तियों, राजनीति व रोजाना के संबंधों को प्रभावित करती है। लोग नहीं देख पाते हैं कि किस तरह से औपनिवेशिक अनुभव हमारी संस्कृति को तार-तार कर देते हैं। जो लोग इतिहास में कभी गुलाम नहीं बनाये गये, वे कभी नहीं जान सकते कि उपनिवेशवाद किस तरह से लोगों के दिलो-दिमाग पर असर डालता है। जो लोग इसे पहचानते हैं, वे भी इस बारे में सचेत नहीं रहते हैं – या स्वीकार नहीं करना चाहते – कि किस सीमा तक उन्हें समझौता करने के लिए विवश कर दिया गया है।

अपनी खोयी हुई सांस्कृतिक जमीन को फिर से हासिल करना इसलिए हमारे दौर का सबसे जरूरी लक्ष्य बन चुका है। पर यह काम कठिन है क्योंकि हम एक ओर अतीत के औपनिवेशिक प्रभावों से लड़ना चाह रहे हैं, तो दूसरी ओर भूमंडलीकरण के कारण फिर से नयी तरह का उपनिवेशवाद पैदा हो रहा है। भूमंडलीकरण अपरिवर्तनीय प्रक्रिया है और कई मामलों में इसके लाभ भी हैं। पर कला, संस्कृति तथा पहचान के क्षेत्र में यह कोई तटस्थ प्रक्रिया नहीं है। अतीत के शासकों को फिर से एक नया अवसर मिला है अपनी वर्चस्वशाली संस्कृति हमारे ऊपर लादने के लिए और अपने संदेशों के प्रचार के लिए उनके पास धन-दौलत व तकनीक भी पहले की तरह प्रचुर मात्र में है। कुछ मामलों में तो यह ज्यादा सशक्त साम्राज्य है क्योंकि प्रत्यक्ष राजनीतिक प्रभुत्व न होने के कारण अधिक व्यापक, हस्तक्षेपकारी तथा निर्बाध शक्तियों से लैस है। परिणामस्वरूप जो लोग अपने औपनिवेशिक अतीत के प्रभावों से खुद को मुक्त नहीं कर सके हैं, वे वर्तमान की विषमताओं के शिकार बन सकते हैं। इस दोहरे खतरे में जहां विगत साम्राज्य अपने नये सांस्कृतिक वर्चस्व को पैदा कर रहे हैं, इस वर्चस्व के शिकार लोग खतरे से ही अनभिज्ञ हैं।

यह पुस्तक इसी प्रक्रिया को समझने का प्रयास है और इसे यह विदेशियों के प्रति द्वेष या अंधराष्ट्रवाद के बगैर शांति व तर्क के सहारे समझना चाहती है। इसका मुख्य सरोकार यह बताना है कि भारत जैसी महान प्राचीन सभ्यताएं अपने को दूसरों की नकल, निर्देश या अनुकरण तक सीमित नहीं कर सकती हैं और अपनी तरक्की को मात्र अ‍ार्थिक रूप से परिभाषित नहीं कर सकती हैं। अतीत में हम सभ्यता के क्षेत्र में श्रेष्ठता की कसौटी थे और हमें फिर से वैसा बनने और मौलिक व स्वतंत्र रूप से सोचने का प्रयास करना चाहिए। पर इसके लिए यह समझना होगा कि भाषा, संस्कृति व रचनात्मकता के क्षेत्र में उपनिवेशवाद ने हमें किस सीमा तक प्रभावित किया है। अतीत के इन प्रभावों को समझकर ही हम आज की समावेशीकरण व विषम प्रभावों की प्रक्रिया का सामना कर सकेंगे और पूरी गरिमा के साथ अपनी संस्कृति को फिर से प्राप्त कर सकेंगे। इसके बगैर वैश्विक नेतृत्व करने का दावा ही बेतुका है।

भूमंडलीकरण का सबसे बड़ा झूठ यह भी है कि हम सब हूबहू एक-दूसरे जैसे होते जा रहे हैं। यह सही है कि किसी भी अन्य विगत काल की तुलना में आज देशों व समाजों के बीच आदान-प्रदान काफी बढ़ा है। पर संस्कृतियां अपनी अक्षुण्ण भिन्नता आसानी से नहीं त्यागती हैं और उनकी विविधता का हमें सम्मान करना चाहिए। संस्कृति विशेष काल व परिवेश की उपज होती हैं, वे अहस्तांतरणीय होती हैं और हालांकि वे विकसित होती रहती हैं पर उन्हें किसी वैश्विक नीति के तहत विवेकहीन ढंग से अपने में समाया नहीं जा सकता है। इस तरह की किसी भी संभावना के खिलाफ चौकन्ना रहना अधिक जरूरी है क्योंकि भूमंडलीकरण के मान्य मिथक के विपरीत सांस्कृतिक अंतःसंबंध कभी समान धरातल पर नहीं होते हैं। 21वीं शताब्दी में संस्कृति व पहचान के मुद्दे ही प्रमुख होंगे। जब लोग पूरी दुनिया में अतीत के औपनिवेशिक प्रभावों को समाप्त करने लगेंगे – जैसा कि उम्मीद की जा सकती है – और भूमंडलीकरण में निहित मूक समावेशीकरण की प्रक्रिया पर सवाल करने लगेंगे तो वे वर्तमान विश्व व्यवस्था की कई सरलीकृत धारणाओं को भी चुनौती देंगे। अगर ऐसा न हुआ तो संप्रदायवाद व कट्टरता की ओर रुझान बढ़ सकता है जो दमित भावनाओं की रुग्ण अभिव्यक्ति का माध्यम बनना चाहेंगे।

♦♦♦

संस्कृति व अस्मिता के क्षेत्र में उपनिवेशवाद के असर का विश्लेषण करते हुए मैंने स्वभावतया भारत-ब्रिटेन के अंतर्सबंधों पर ध्यान केंद्रित किया है। पर यह खास संबंध महज यह जानने का उदाहरण है कि दुनिया में सभी गुलाम रहे देशों के लोगों की नियति किस प्रकार की रही है। किताब आत्मकथा की शैली में आरंभ होती है क्योंकि निजी जीवन व इतिहास को ऐतिहासिक प्रक्रियाओं से अलग नहीं किया जा सकता है। बाद के अध्यायों में भाषा, स्थापत्य व कला, औपनिवेशिक विस्मरण, भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं की शक्ति व विकास प्रक्रिया और संस्कृति की वर्तमान दशा की चर्चा की गयी है।

पुरानी औपनिवेशिक शक्तियों को भी उपनिवेशवाद के प्रभाव के साथ जीना सीख लेना चाहिए। उदाहरणस्वरूप ब्रिटेन में ही उसके पूर्व साम्राज्य के अंग रहे लोग बड़े अल्पसंख्यक के रूप में रह रहे हैं। इन आप्रवासियों के लिए अस्मिता के प्रश्न प्रारंभिक महत्व के ही हैं और छठे अध्याय में अस्मिता से जुड़ी दुविधाओं पर चर्चा की गयी है। अंतिम अध्याय में संस्कृति के क्षेत्र में भूमंडलीकरण के प्रभाव, उसमें निहित असमानता के लक्षणों व संस्कृतियों को निगले जाने के खतरों पर चर्चा की गयी है।

(पवन वर्मा। सेंट स्‍टीफेंस कॉलेज, दिल्‍ली से इतिहास की पढ़ाई के बाद दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय से कानून की डिग्री ली। भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी रहे हैं। मॉस्‍को, न्‍यूयॉर्क और लंदन में लंबे समय तक रहने के बाद फिलहाल भूटान में भारत के राजदूत हैं। पेंग्विन ने उनकी दसियों किताबें छापी हैं। द ग्रेट इंडियन मिडिल क्‍लास तो खैर बेस्‍ट सेलर रही।)

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *