अंग्रेज बनने की कोशिश में अपनी पहचान भूल रहे हैं भारतीय

बहसतलब छह में भारत और भारतीयता पर तीखी बहस

♦ अविनाश

हसतलब छह में हालांकि श्रोताओं की उतनी गज-गज नहीं थी, जो आमतौर पर हुआ करती है। लोग कम आये थे, लेकिन जो आये थे वे भारतीयता को लेकर ढेर सारी बेचैनियों पर बात करने के लिए आये थे। हमें यह लगा कि वक्‍त कम है और बातें बेहिसाब। रविकांत, जो कि इतिहासकार हैं, इतिहास के प्राध्‍यापक हैं और सीएसडीएस के सीनियर फेलो हैं, हालांकि मॉडरेटर थे और उनके पास भारत और भारतीयता के संदर्भ में सवालों की लंबी फेहरिस्‍त थी, अपनी बात रखने के लिए उनके पास समय कम पड़ गया। वैभव सिंह जो हस्‍तक्षेप कर रहे थे और कह रहे थे कि बंकिम जिस आधुनिकता के सवाल से परेशान थे, ठीक वही परेशानी पवन वर्मा की है – क्‍योंकि बंकिम आधुनिकता तो चाहते थे लेकिन यह भी समझते थे कि जो आधुनिकता यूरोप के लिए सहज थी ठीक वही आधुनिकता भारत के लिए कांटों भरी थी – और अब पवन कुमार वर्मा भूमंडलीकरण तो चाहते हैं लेकिन भूमंडलीकरण के साथ जुड़ा संस्‍कृति का झोल-झक्‍कड़ नहीं चाहते… पर वैभव से भी माइक ले लेनी पड़ी क्‍योंकि इंडिया हैबिटैट सेंटर का समय-प्रबंध बड़ा टाइट होता है।

सबसे पहले बोले पत्रकार ओम थानवी और कहा कि इतिहास के बहुत सारे मुद्दे ऐतिहासिक नहीं होते, वे जिंदगी का हिस्‍सा होते हैं। उन्‍होंने भारतीयता के संदर्भ में कहा कि हमारी हिंदी में हमारा जोधपुर मौजूद है। हिंदी की एकरूपता में हमें भारतीयता को नहीं खोजना चाहिए और जबान में अगर अलग अलग भौगोलिक जमीन की छौंक रहेगी, तभी वैविध्‍य से भरे भारत की भारतीयता को हम आगे लेकर जा सकते हैं। उन्‍होंने यह भी कहा कि संस्‍कृति क्‍या ग्‍लोबलाइजेशन का ही सवाल है – ये 90 के बाद उभरा सवाल है या इसकी दिक्‍कतें कहीं और भी पहले से मौजूद है। उन्‍होंने बहसतलब के माहौल से गुजारिश की कि भारतीयता के संदर्भ मे संस्‍कृति के छिद्रों को इतिहास के हर कोने-अंतरे से ढूढकर उस पर बात करें।

ओम थानवी ने पवन वर्मा की किताब की मूल चिंता के बारे में बताया कि किताब कहती है कि हम अब उपनिवेश नहीं रह गये, लेकिन औपनिवेशिक छाया से मुक्‍त नहीं हो पाये हैं। और दरअसल इसलिए भारतीयता की बात हो रही है। उन्‍होंने संघ परिवार की भारतीयता और पवन वर्मा की भारतीयता को अलग करके देखने की सलाह दी और कहा कि संघ की भारतीयता में मुसलमानों के प्रति दुराव है, जबकि पवन वर्मा की भारतीयता में वे तमाम संस्‍कृतियां, तहजीब, कला और संगीत शामिल है – जिनका भारत को बनाने में योगदान रहा है।

ओम थानवी के बाद आये दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने कहा कि हम भारतीयता पर बात करते हुए अक्‍सर सवर्ण संस्‍कृतियों के मुखापेक्षी हो जाते हैं। उन्‍होंने कहा कि जिस मैकाले का आधुनिक भारत के निर्माण में सबसे बड़ा हाथ है, भारतीयता के संदर्भ में उसी मैकाले को खलनायक की तरह चित्रित किया जाता है। उन्‍होंने कहा कि लॉड क्‍लाइव जब भारत आया, तो सफेद घोड़े पर सवार होकर और एक हाथ में बंदूक और एक हाथ में कोड़ा लेकर। उसने हिंदुस्‍तानियों पर जम कर कोड़े बरसाये और ब्रिटेन के लिए बड़ा एंपायर जीता। दूसरी तरफ लॉर्ड मैकाले था, जो सिर्फ दो तीन कलम लेकर आया था और जिसने भारत को आईपीसी और सीआरपीसी की धारा दी। उसने कहा कि ब्राह्मणों के लिए अलग कानून और शूद्रों के लिए अलग कानून नहीं हो सकता। कानून की छतरी के नीचे सब एक है। उसने हिंदुस्‍तानियों को मारा पीटा नहीं। सिविल सर्विस में हिंदुस्‍तानियों को भरती करने की वकालत की।

चंद्रभान प्रसाद ने कहा कि लेकिन… अगर लॉर्ड क्‍लाइव और लॉर्ड मैकाले की तस्‍वीरों को आमने-सामने रखा जाए तो ज्‍यादातर हिंदुस्‍तानी लॉर्ड मैकाले की तस्‍वीर पर कालिख पोतेंगे। देश के सारे विश्‍वविद्यालय मैकाले पर एक सुर में बोलेते-बरसते हैं। चंद्रभान प्रसाद ने संदेह किया कि कहीं ऐसा नहीं है कि ब्राह्मणों और शूद्रों को एक फ्रेम में जड़ देने के लिए और जाति व्‍यवस्‍था पर चोट करने के लिए यह सोची-समझी साजिश हो कि मैकाले को ठिकाने लगाया जाए।

कवि अशोक वाजपेयी ने कहा कि पहले ऐसे लोग थे, जिनके लिए सहज ढंग से भारतीय होना संभव था। धीरे-धीरे ऐसा माहौल बना, जिसमें इकहरी भारतीयता की बात शुरू हुई। जिसमें दूसरे धर्मों और संस्‍कृतियों के लिए जगह नहीं थी। उस भारतीयता में एक शुद्ध भारत को प्रचारित-प्रसारित करने की बात की जाती है जबकि शुद्धता का कोई प्रमाण नहीं है। उन्‍होंने कहा कि कुमार सुरेश सिंह के नेतृत्‍व में हुए एक शोध के बाद पता चला कि भारत में चार हजार छह सौ से अधिक समुदाय हैं। इनमें से कोई भी समुदाय जातीय शुद्धता का दावा नहीं कर सकता। उन्‍होंने कहा कि भारत जातीय अशुद्धता का असमाप्‍य उत्‍सव है।

उन्‍होंने कहा कि भूमंडीकरण (भूमंडलीकरण) की सबसे सख्‍त आलोचना आज साहित्‍य में हो रही है – इस वैश्विक परिघटना के पक्ष में लिखने की कोई हिम्‍मत नहीं कर रहा है – सुधीश पचौरी जैसे इक्‍के-दुक्‍के लोगों को छोड़ कर और वैसे भी सुधीश पचौरी जैसों की बातों को गंभीरता से क्‍या लेना। उन्‍होंने कहा कि भाषाएं कहीं न कहीं प्रतिरोध का अपना काम करती रहती हैं। उन्‍होंने असम साहित्‍य सभा के वार्षिक समारोह का एक उदाहरण दिया कि असम में हर व्‍यक्ति के लिए जीवन में एक बार उस वार्षिकोत्‍सव में जाना जरूरी होता है और ऐसा नहीं होने पर लगता है कि जैसे कोई संस्‍कार अधूरा रह गया। अशोक वाजपेयी ने कहा कि ऐसी चीजें अगर तमाम भारतीय भाषाओं में हो जाए तो संस्‍कृति की सूरत बदल सकती है।

चूंकि सारी बहस पवन कुमार वर्मा की नयी किताब के संदर्भ में हो रही थी और उन पर काफी सवाल बरस रहे थे – लिहाजा जब वे बोलने के लिए आये, तो उन्‍होंने कहा कि संस्‍कृति के क्षेत्र में उपनिवेशवाद के जो परिणाम हैं, उसे हम कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं। हम “उनकी” तरह बोल-बतिया कर समझ लेते हैं कि हम उनकी तरह हो गये – जबकि उन्‍हें मालूम है कि आप क्‍या हैं। जो चीजें हमको नहीं दिखती, वो बाहर वाले बखूबी देखते हैं। उन्‍होंने वैलेंटाइन डे का उदाहरण दिया कि एक बार वे एक गिफ्ट शॉप में गये, जहां कुछ नौजवान वैलेंटाइन कार्ड ले रहे थे। उन्‍होंने उन नौजवानों से हीर-रांझा, लौला-मजनूं, कृष्‍ण रास और कामसूत्र के बारे में पूछा, उन्‍हें इसका कुछ पता नहीं था। पवन वर्मा ने कहा कि प्रेम की परंपरा हमारे यहां भी रही है लेकिन हम वैलेंटाइन में अपनी भारतीयता को स्‍थापित कर रहे हैं।

पवन वर्मा ने कहा कि संपन्‍न राष्‍ट्र होने के बावजूद हम नहीं जानते कि हम क्‍या हैं। यह कितना तकलीफदेह है कि हमारे देश की एयरलाइंस में हमारी भाषा का एक भी अखबार नहीं मिलता। हमारे ही देश में दो अलग अलग दुनिया है, जो हमें नहीं दिखता लेकिन औरों को दिखता है। उन्‍होंने कहा कि हम संस्‍कृति पर विमर्श के जरिये ही अपनी भारतीयता को फिर खोज सकते हैं। यह भी कि विविधता का तर्क एक औपनिवेश‍िक तर्क है।

बहसतलब में सवाल करने वालों, अपनी बात रखने वालों की लंबी कतार थी। वरिष्‍ठ टीवी पत्रकार राहुल देव ने कहा कि इस पर चिंता करनी चाहिए कि क्‍योंकि हमारे देश में अंग्रेजी की ग्रंथि के चलते नौजवान छात्रों को खुदकुशी करनी पड़ती है। एक छात्र ने हस्‍तक्षेप किया कि हम अंग्रेजी को इतनी तिरछी नजर से क्‍यों देख रहे हैं और हम क्‍यों नहीं मान लेते कि अंग्रेजी अब एक भारतीय भाषा है। रोमियो-जूलियट हमारे अपने कथा-पात्र हैं। मीडिया विश्‍लेषक विनीत कुमार ने कहा कि हम संस्‍कृति के सवालों को नॉस्‍टैल्जिया की जमीन पर क्‍यों हल करना चाहते हैं और टीवी पत्रकार कुमार राकेश ने कहा कि ये बहस सही है, लेकिन भारतीय के संदर्भ में हमें किसी ठोस जगह पर पहुंचना बहुत जरूरी है। पत्रकार समरेंद्र ने कहा कि भारतीयता एक बड़ा सवाल है और हम इसे खारिज नहीं कर सकते।

शुरू में इस आयोजन के बारे में तफसीलात से अपनी बात रखी, पेंग्विन हिंदी के एडिटर निरुपम ने। उनसे भी पहले बहसतलब की पृष्‍ठभूमि के बारे में अविनाश ने बताया और आखिर में धन्‍यवाद ज्ञापन किया यात्रा बुक्‍स की शिवानी खरे ने।

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *