कुंठा की इस हिंदी को हवा में भी उड़ने दें, वह चमकेगी

विजय शर्मा

पवन वर्मा ने भारतीयता की जिस बहस को छेड़ी है, उसमें भाषा का सवाल सबसे अहम है। भाषा को लेकर भावुक होना एक अलग बात है – लेकिन अपनी भाषा में एक देश का स्‍पष्‍ट नक्‍शा खींचना अलग बात। विजय शर्मा बता रहे हैं कि हमारी भाषा में कमतरी की हकलाहट सिर्फ इसलिए है क्‍योंकि उसकी रीढ़ बहुत कमजोर है : मॉडरेटर

हिंदी की प्रबुद्ध बिरादरी में एक ही तरह के लोगों की बहुतायत है। लगभग सभी लोग प्रवासी, देहाती पृष्ठभूमि के, छोटे- मोटे नगरों के स्कूल-कालेज में पढ़ाने वाले या फिर बैंक के कर्मचारी सरकारी दफ्तरों के हिंदी अधिकारी किस्म के लोग हैं। हिंदी भाषी बुद्धिजीवी सिर्फ हिंदी साहित्य का विद्यार्थी, र्शोधार्थी, अध्यापक, अफसर ही है? क्या ही अच्छा होता, अगर इसमें अंग्रेजी पढ़ने- पढ़ाने वाले, अर्थनीति, राजनीति शास्‍त्र, मनोविज्ञान, दर्शनशास्त्र के लोग भी शुमार होते। और भी आगे बढ़कर विज्ञान यानी रसायन शास्‍त्र, भौतिकी, जीव विज्ञान, गणित, ज्यामिति के लोगों का भी स्वागत होता। कॉमर्स, मैनजमेंट, मार्केटिंग, इंजीनियरिंग, चिकित्सा के लोग भी हमारे बीच उठते-बैठते, तो मजा आ जाता। लेकिन ले दे कर वही कवि-कहानीकार, पत्रकार, आलोचक किस्म का जीव ही हमें नसीब होता है। हिंदी भाषी क्यों सिर्फ हिंदी साहित्य की जद में बंधा रहे, भिन्न विषयों से आने वाले आइएएस, आइपीएस तथा ज्युडिसरी के लोग भी इसमें होते, तो बातचीत का दायरा और भी फैलता।

कभी-कभी इच्छा होती है कि पता करें कि बजट को हमारे आचार्य कितना समझते है। पार्टीलाइन के अलावा हमारा बौद्धिक इस पर कोई टिप्पणी करने काबिल नहीं, ‘पार्टीगणित’ के अलावा और कोई गणित हमने सीखा ही नहीं। वामपंथी साहित्यकारों-विचारकों का इकनॉमिक्स ज्ञान पास मार्क लायक भी नहीं।

ऎसा नहीं है कि हिंदी साहित्य के छात्र, शोधार्थी, अध्यापक प्रखर और गंभीर चिंतक नहीं हो सकते, लेकिन साहित्य की अपनी सीमा है, और ऎसे में साहित्य समाज का एकांगी और सीमित दर्पण बन कर रह जाता है।

जिंदगी के आईने को तोड़ दो। इसमें अब कुछ भी नजर आता नहीं… विभिन्न क्षेत्रों से ताल्लुक रखने वाले ज्यों दुकानदार, छोटा और बड़ा, उद्योगपति, सामान्य और विशिष्ट, बैंकर (कर्मचारी, लिपिक, अनुवादक, अफसर नहीं), चार्टड एकाउंटेंट, प्रबंधन के गंभीर अध्येता, कानून की बारीकियों का इतिहास – विकास और वर्तमान परिप्रेक्ष्य को समझने वाले लोग, मानवाधिकारों के पैरोकार, लेजिस्लेशन और ज्युरिसप्रुडेंश के अधिकारी विद्वान, अभियंता और चिकित्सक हमारी बिरादरी को समर्थ करें न करें, एकांगी भावविह्वल होने से थोड़ा बचाएंगे। यही बात शिक्षाशास्‍त्री पर (शिक्षकों पर नहीं) भी लागू होती है। इतिहासकारों (इतिहास के अध्यापक नहीं) पर भी सही है। वैसे तो आर्किटेक्चर, अंथ्रोपोलोजी, ज्योतिष, संस्कृत, पर्यावरण, यातायात एक्स्पर्ट, सिटी प्लानर का साथ भी गजब का है। दूसरी भाषा अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पानी, अरबी, जर्मन, उर्दू के जानकार के बगैर हमारा ज्ञान संकुल कितना अधूरा होता है, इस पर गौर करना चाहिए। इनके बगैर हमारी तीखी बातचीत में क्या कुछ छूट जाता है, क्या-क्या हमसे ‘मिस’ हो जाता है, इसका शायद हमें अंदाजा भी नहीं है। भौतिकी और गणित मूल विषय है – इससे दर्शन और लॉजिक का निकट का संबंध है, जो जा कर व्याकरण के माध्यम से भाषा में प्रदर्शित होता है। सभी रूपंकर और प्रदर्शन कलाओं में इसकी ध्वनि खनखनाती है। नाटक, चित्रकला, संगीत, वास्तुकला, सिनेमा, फोटोग्राफी कैसे हमारे चिंतन के सघन अंग हैं, यह शायद हमें पता भी नहीं होता। इनकी विकास यात्रा ने कैसे-कैसे हमारी सोच और जिंदगी को बदला है, यह हतप्रभ कर देने वाला है।

भाषा और केवल भाषा उदघाटित कम करती है, छिपाती ज्यादा है। दूसरे विषयों की अंतरंगता के अभाव में वह भावातिरेक का शिकार होती है, आत्मविह्वल हो कर हम कविता कहानी लिखने-पढ़ने लग जाते हैं। अपने को समदर्शी, संवेदनशील और सेकुलर, आधुनिक मान बैठते हैं। गरीब-पिछड़ा–कमजोर, अक्लियत के प्रति अतिशय लगाव महसूस करते है, उनके लिए कुछ करना भी चाहते है, परंतु यह सदभावना आकांक्षा से अधिक कुछ नहीं बन पाती, सदाशयता बेपंख उड़ान ही नहीं भर पाती।

क्योंकि, जीवन की – खासकर आधुनिक जीवन की, वर्तमान समय की संशलिष्टता और जटिलता – हमें न तो उसका मूल्यांकन करने की क्षमता देती है, न ही उससे निजात की कार्रवाई करने का फन और काबिलियत। ऐसे में केवल संवेदना के हथियार से सारी मनुष्यता और देशकाल को समझने का प्रयास दोषपूर्ण और अधूरा ही रह जाता है। कभी जब हमारे पास ये साधन नहीं थे तब तो खैर मजबूरी थी, लेकिन आज भी उसी पुरानी चक्की में आटा पीसने की जिद हठ से अधिक कुछ नहीं।

यह कोई नूतन का अवगाहन और पुराने को तिलांजलि नहीं है, यह ‘बाइनरी’ सोच ही त्रुटिपुर्ण है। चीजें अक्सर बाइनरी को समेट कर उसके पार जाकर संपूर्णता प्राप्त करती है, अर्थसिद्धि करती है। बाइनरी तो समझने का एक प्रारंभिक औजार और प्रवेशद्वार मात्र है। ऐसी जिद से उसका भी कोई भला नहीं होगा, जिसके लिए हमारा हृदय तड़पता है।

सारे विश्व में इतने महत्वपूर्ण काम, तमाम विषयों में हुए हैं कि साहित्य को पैनापन उनसे उधार लेना पड़ता है। साहित्य लगातार उनकी मदद से खुद को धारदार और प्रभावी करता चलता है। ऐसा मानने में कोई हेठी नहीं है लेकिन अपने यहां साहित्य प्रेमचंद के ग्राम दर्शन, जैनेंद्र के मनोविज्ञान और निर्मल वर्मा की आधुनिक शहरी निस्संगता से जान नहीं छुड़ा पा रहा। ऊपर से स्त्री, दलित, अस्मिता विमर्श भी इसका हमराह हो गया, इसके ऊपर करेले पे नीम चढ़ी भ्रष्ट राजनीति और डफर एलिट का बोलबाला।

सच्चे का मुंह काला और झूठे का बोलबाला… लेकिन इन बातों को प्रभावी बनाने के लिए जिस इंटरडिसिप्लिन निर्ममता और व्यवहारिक कुशलता चाहिए, वो यहा नदारद है। छोटे कस्बों से आये बीए पास बेरोजगार नौजवान की पीड़ा और हताशा समझने की बात है, उनका क्रोधी और विद्रोही होना भी लाजिमी है। बड़े नगरों के महाविद्यालयों का डेरा और पार्टी के लोगों की साथ-संगत उनमें एक प्रकार की प्रखरता–तीव्रता- बैचैनी भी भरती है। अक्‍सरहां ये जोरदार- मुग्धकारी, तेजाब की तरह उफनती कविता भी लिखते हैं।

यह बीए पास (ज्यादातर हिंदी में, क्योंकि बारहवीं के परिणाम ने बाकी सारे रास्ते बंद किये) आत्मकथानक गजलों, कहानी, स्त्रीविमर्श, दलितचेतना के लिए भी सोलह आने सही है। लेकिन विश्व्वविद्यालयों और अखबारी दफ्तरों में युवा ऊर्जा को अधिक सुगठित–नियंत्रित, संयमी- समझदार, विवेकवान और न्यायपूर्ण बनाने का भी मौका होता है।

शक्तिशाली को न्यायशील बनावे और न्यायशील को शक्तिशाली – यही तो मंत्र है। यही तो लोकतंत्र है, सुशासन है, सुराज है, देशप्रेम है… वरना ऐसा क्योँ कर होता है कि धुमिल, दुष्‍यंत, आलोकधन्वा, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल सरीखी अद्भुत पंक्तिया लिखने वाले लोगों के जीवन काल में ही उनकी प्रारंभिक रचनाएं फीकी-फीकी सी लगती हैँ। खुद उन्हें भी, कम से कम प्रभावोत्पादकता के मामले में, नारे की टीप पर लिखी गयी। हमें सुकांत भट्टाचार्य और जीवनानन्द दास के फर्क को गंभीरता से परखना चाहिए। मुक्तिबोध क्योंकर धूमिल, दुष्‍यंत, आलोकधन्‍वा, मंगलेश डबराल और वीरेन डंगवाल से अधिक दीर्घायु हैं, यह भी ध्यान देना चाहिए।

भूख, गरीबी, खून, पसीना, आंसू, मजदूर, शोषण, मुनाफा, स्त्री-दलित, क्रांति, “लाल किले पर लाल निशान” जैसी कविता राजनीति का पद-प्रच्छालन ही कर सकती है। किसी दुस्समय में किसी हारे की सहचर-पाथेय बन सकती है, भ्रष्ट-निरंकुश सत्ता का राज मार्ग पर थोड़े समय के लिए “रास्ता रोको” अभियान बन सकती है, परंतु दीर्घकालिक प्रभाव के लिए पूरी संस्कृति की राह में एक निर्णायक मोड़ बनने के लिए उसे गरमागरम, तेजाबी, मुंहफट, बेखौफ, जवान, दीवानी कविता से अधिक कुछ होना चहिए। बीस बरस पहले शलभ श्री राम सिंह का गीत “नफस-नफस कदम-कदम…” राष्ट्र गीत के बराबर पाये का लगता था। हम लोग उसे यहां वहां गाते भी थे (नूर, कोलख्यान, बातिश, कुशेश्वर को याद होगा)… लेकिन इतने दिनों के अंतराल में हालात थोड़े भी बदले नहीं (जरूर कोई भारी चूक है)। यह गीत आज भी प्रासंगिक है, यह दर्प की बात नहीं है, ऐसी प्रासंगिकता पर केवल शर्म और झेंप होनी चाहिए। किसी ने कहा है कि बुद्ध के पहले भी दुनिया ऐसी ही बेतरतीब थी जैसी बुद्ध के बाद। फिर अपनी क्या हस्ती, तेरी मेरी क्या बिसात…

(विजय शर्मा। कोलकाता में रहते हैं। सेल्फ एंप्‍लॉयड हैं। हिंदी में कहानी लिखते हैं। कथा संग्रह का नाम ‘दूसरी गाड़ी से पहुंच रहा हूं’। अभी-अभी एक उपन्यास भी आया है, अंतिका प्रकाशन से ‘दिमाग में घोंसले’। उनसे vsharma61@rediffmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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