भगवा आतंकवाद की आड़ी-तिरछी रेखाओं को समझिए

आखेटक आस्थाओं का आर्तनाद

♦ समर

खेटक आर्तनाद नहीं करते। आर्तनाद तो बस शिकार के हिस्से में आता है। पर फिर, कुछ बड़े आखेटक हुए। पूर्वी उत्तरप्रदेश (और हिंदी पट्टी के कुछ अन्य क्षेत्रों में भी) में मशहूर कहावत जबरा मारे पर रोवे न दे अंदाज वाले। रोये तो और मारेंगे की खांटी लोकतांत्रिक धमकी के सहारे वे बेचारे शिकार के हिस्से से रोना भी छीन लेते थे।

पर फिर उनसे भी बड़े आखेटक पैदा हुए। ये आखेटक शिकार करने के बाद खुद ही आर्तनाद करने लगते थे। अरण्यरोदन की परंपरा के बहुत आगे वाला आर्तनाद। ये गांव गांव, शहर शहर घूम कर विलाप करते थे। ये बताते थे कि कैसे इनके साथ अत्याचार हुआ है। अत्याचार भी कोई ऐसा वैसा नहीं, वरन अव्वल दर्जे का। कि कैसे पांच हजार साल से स्थापित इनकी प्रभुता के खिलाफ आवाजें खड़ी होने लगीं हैं और जब ये आखेटक बेचारे इन आवाजों को गुजरात और उडीसा जैसे प्रयोगों से दबाते हैं, तो इनके खिलाफ मुकदमे होने लगते हैं। घोर कलयुग!!

ये आखेटक कोई सामान्य आखेटक नहीं थे। इनके हाथ में धर्म की ध्वजा थी। राम इनके दिल में नहीं बल्कि मुंह में होते थे (और हिंदीपट्टी की सामुदायिक स्मृति के मुताबिक जिसके मुंह में राम हो उसके बगल में छूरी होने की संभावना काफी बढ़ जाती है)। इन आखेटकों की एक और खासियत थी। इनका आर्तनाद अक्सर हमले के बहुत पहले ही शुरू हो जाता था। ये कुछ करने के बरसों पहले से चिल्लाने लगते थे। ये जनता का दुःख जानने के पहले ही उसके कारणों की तलाश में (वास्तविकता में ईजाद करने में) लग जाते थे और सफलतापूर्वक ढूंढ भी लेते थे। अब इसमें इनकी क्या गलती कि इनकी समझदारी में दुःख कोई भी हो ‘अन्यों’ यानी की दूसरों की ही वजह से होता था।

हद तो यह थी कि बार्बरिक जातीय भेदभाव से लेकर सती प्रथा तक समस्या कोई भी हो, इनका विश्लेषण बस एक ही कारण तक पंहुचता था। बुराई जो भी हो दूसरों की वजह से है। अब क्या हुआ कि पति की मृत्यु के बाद पत्नी को उसी की चिता पर जिंदा जला देने वाली ‘महान’ और ‘शास्त्रसम्मत’ सतीप्रथा की शुरुआत होने तक तो ‘अन्य’ पैदा भी नहीं हुए थे। क्या हुआ कि गलती से किसी दलित के कानों में वेदवाक्य पड़ जाने की सजा कानों में पिघला शीशा डालना निर्धारित करने वाली ‘स्मृतियों’ के समय तक दुनिया में कोई और धर्मग्रंथ लिखा ही नहीं गया था। क्या हुआ कि ‘ब्राह्मण’ रावण का वध करने के बाद प्रायश्चित करने पर मजबूर होने वाले इनके मर्यादा पुरुषोत्तम को शंबूकवध करने पर कोई प्रायश्चित करने की जरूरत नहीं पड़ी। (वैसे शातिर तो ये इतने थे कि उस ज़माने में कोई ‘अन्य’ मिलते तो शंबूकवध की जिम्मेदारी उन पर डालते इन्हें कतई देर न लगती… पर बेचारे!)

इन आखेटकों की एक और खूबी थी, शब्दों से खेलना। ये कभी ‘अन्य’ को उसके नाम से संबोधित नहीं करते थे। उनके लिए ये हमेशा नये शब्द गढ़ते थे, जैसे कि यवन या म्लेच्छ। और इन शब्दों को गढ़ते हुए ये ख्याल रखते थे कि इन शब्दों में एक खास किस्म की नफरत हो। वैसी नफरत नहीं जो साफ साफ दिखे बल्कि वैसी जो धीरे धीरे रगों में उतर जाए, खून में घुल जाने वाले जहर की तरह। ये शब्द गढ़ लेने के बाद ये उनका इतना इस्तेमाल करते थे कि ये शब्द अकेले इंसानों की रगों में उतरने के बाद धीरे धीरे समाज के खून में घुल जाएं।

कमाल की बात ये थी कि ये आखेटक इन शब्दों का इस्तेमाल हमेशा आर्तनाद करते हुए करते थे। जैसे कि ये कि इन म्लेच्छों के आने के पहले इस देश में कोई पर्दा प्रथा नहीं थी, और पर्दा तो इनसे ‘हमारी स्त्रियों’ की सुरक्षा के लिए अस्तित्व में आया है। आर्तनाद करने के तुरंत बाद ये आखेटक अतीतजीवी वीरबालक मुद्रा में परकाया प्रवेश कर जाते थे कि हमारे समाज में तो स्त्रियां कितनी स्वतंत्र थीं। कि इनके पास तो गार्गी, मैत्रेयी, अपाला और लोपामुद्रा जैसी महान महिलाएं थीं और यहां तक कि गार्गी ने तो शास्त्रार्थ में याज्ञवल्क्य को पराजित भी किया था। पर ऐसी महान परंपरा वाले आखेटकों से यह पूछते ही कि, उसके बाद क्या हुआ भगवन, आर्तनादी चुप्पी के सिवा कुछ नहीं मिलता।

यह अतीतजीवी कभी नहीं बता सकते कि पराजय के बाद याज्ञंवल्क्य ने कहा कि ‘हे दुष्ट स्त्री अब इसके बाद एक शब्द भी बोला तो तुम्हारा सर खंड खंड (हिंदी में टुकड़े टुकड़े) हो जाएगा!’ और बस, उत्तर वैदिक काल से लेकर दो हजार वर्षों तक स्त्रियों का जिक्र मर्यादा पुरुषोत्तम के लिए लिखे गये रामचरित मानस में वर्णित ‘ढोल गंवार शूद्र पशु नारी/ ये सब ताड़न के अधिकारी’ परंपरा में ही हुआ। पर फिर, इसका भी दोष दूसरों यानी कि ‘अन्य’ के ही सिर माथे।

खैर, आखेटक आस्था के ये महान आर्तनादी अलंबरदार फिर से काम पर लग गये हैं। कि भाई आतंकवाद को भगवा आतंकवाद क्यूं कहा जा रहा है? कि आतंकवाद को धर्म से जोड़ना गलत है और यह इनके महान हिंदू धर्म को बदनाम करने कि साजिश है और वगैरह वगैरह। अब इसका क्या कि इन्‍होंने सारी जिंदगी इस्लामिक आतंकवाद शब्दयुग्म का ही प्रयोग किया और खूब धड़ल्ले से किया? इसका क्या कि ऐसे भी कई आतंकवादी कृत्य जो इनके किये थे (जैसे मालेगांव और कोटा), उसके लिए इनके आर्तनाद की ही वजह से कुछ निर्दोष ‘अन्यों’ को सजा भी मिल चुकी।

तो बस आजकल ये आर्तनादी आखेटक घूम घूम कर विलाप कर रहे हैं। एक दिन तो इनको ‘भगवा आतंकवाद’ के नाम पर इनके धर्म को बदनाम करने की ‘सरकारी साजिश’ के खिलाफ इन्‍होंने राष्ट्रव्यापी धरना दे डाला। अब इसका क्या करें कि उस दिन के सामूहिक विलाप में ‘सुदर्शनियां’ खोजों का सुर मिल जाने पर जो भाव उत्पन्न हुआ, वह अदभुत रूप से जुगुप्साजनक था। फिर इस जुगुप्सा में बेचारगी का भाव मिलते हुए दिखा, जब सारे बांध तोड़ बहता हुआ इनका दर्द जुबान पर आया कि आज इनकी पांच हजार साल की प्रभुता के खिलाफ जो लोग खड़े हुए हैं, वह अन्य नहीं वरन वही लोग हैं, जिनको इन आर्तनादियों ने पांच हजार साल से बलपूर्वक पददलित कर रखा था। जैसे कि यह चाहते थे कि इनके धर्म द्वारा घृणित करार दिये गये लोग इनका दिया तमगा सारी जिंदगी स्वीकार कर रखें।

बस इसीलिए इस बार इन आखेटकों का आर्तनादी अरण्यरोदन इनके बेईमान सच की ईमानदार अभिव्यक्ति के रूप में दिख रहा है कि इनकी ‘सामाजिक समरसता’ का ‘सामाजिक क्रांति’ की ताकतें कैसे विसर्जन कर रही हैं।

(समर। रिसर्च स्‍कॉलर हैं और वामपंथी रुझान रखते हैं। कुछ इश्क कुछ इनकलाब में दिलचस्‍पी है और इसके बारे में कहते हैं, सिरफिरों का इसके अलावा शौक़ हो ही क्या सकता है! यह भी कि अब हम क्या करें कि इन दोनों में पढ़ना-लिखना जागती आंखों में सपने देखना और नींद में फलसफाना बहसें करना सब शामिल है। उनसे samaranarya@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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