दो पछतावों के बीच जनसत्ता में छपे अशोक वाजपेयी

♦ अशोक वाजपेयी

हिंदी समाज में सामाजिक रूप से स्‍वीका‍रोक्तियों की कोई परंपरा नहीं है। गलती होने पर गंगा जल छिड़ककर शुद्ध होने की सहूलियत के बावजूद कुछ लोग स्‍वीकारोक्ति का साहस जुटाते हैं। भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी और कवि अशोक वाजपेयी ने आज जनसत्ता में ऐसी ही दो स्‍वीकारोक्ति की है : मॉडरेटर

क मित्र ने पूछा कि इन दिनों जिस तरह रोजाना किसी घपले या भ्रष्टाचार या कदाचर के मामले में अफसर पकड़े जाते हैं और जिनमें से कई भारतीय प्रशासनिक सेवा के होते हैं, तो ऐसी सेवा में पैंतीस बरस सदस्य होने पर आपको पछतावा नहीं होता। मैं कहता हूं कि सरकारी हिंदी में जिसे भूतलक्षी प्रभाव कहते हैं, वैसे प्रभाव से पछतावा नहीं होता। मैंने अपना सक्रिय जीवन अध्यापक के रूप में शुरू किया था और कुल मिला कर ठीकठाक अध्यापक था। वही बना रहता, तो वह सब कतई न कर पाता जो भारतीय प्रशासनिक सेवा में रह कर, विशेषत: संस्कृति के क्षेत्र में कर पाया। पहले यह भी लगता था कि प्रशासकीय नौकरी और उसकी व्यस्तता शायद लेखन आदि के लिए समय और फुरसत न देगी। पर जल्दी ही समझ में आया कि आपके सच्चे पैशन के आड़े नौकरी तो क्या, कुछ और भी नहीं आ सकता। फिर, उन दिनों भारतीय प्रशासनिक सेवा की छवि ऐसी मलिन नहीं थी और उसमें ईमानदारी और साहसी लोगों का प्रतिशत काफी ऊंचा था। इन दिनों जैसे हर अधिकारी संदिग्ध है या कि देर-सबेर उसके किसी घोटाले में लिप्त होने का संदेह होने लगा है, वैसा उन दिनों नहीं था। इसलिए पछतावा नहीं कि उस सेवा में था। अब जो हालात बन गये हैं, उसमें लगता है कि संविधान की धारा 311 के तहत सिविल सेवकों को जो सुरक्षा मिली हुई है, उसका इस कदर व्यापक दुरुपयोग होता रहा है कि समय आ गया है कि उसे विलोपित करने पर विचार किया जाए।

साहित्यिक जीवन में सबसे बड़ा पछतावा अज्ञेय को लेकर होता है। मेरे एक विध्वंसकारी लेख ने उन्हें इस कदर नाराज कर दिया कि वे लगभग सत्रह बरस नाराज रहे और उन्होंने मेरे सबसे सक्रिय सांस्कृतिक जीवन के साथ बहुत दुखद असहयोग किया। मैं भी अपनी जिद पर अड़ा रहा कि मैंने स्वतंत्रता का पाठ उन्हीं की पाठशाला में सीखा था तो मैं इस मामले में क्यों झुकूं। मेरा स्वाभिमान, जिसे कई मित्र अहंकार भी कहते रहे हैं, आड़े आया। उनकी जन्मशती चल रही है। अपने अंतिम दिनों में वे अपना हठ छोड़ कर भारत भवन के दो आयोजनों में शामिल हुए थे। मुझे पछतावा है कि उससे बहुत पहले मुझे कुछ अधिक सशक्त पहल कर उन्हें मना लेना चाहिए था। मध्यप्रदेश में संस्कृति की एक जबर्दस्त पहल को अज्ञेय का समर्थन यथासमय नहीं मिल सका, यह मुझे उसकी एक बड़ी कमी और कमजोरी लगती है।

एक बड़ा पछतावा अपनी पत्नी रश्मि को लेकर है। वह कथक की अच्छी और सुदीक्षित नर्तकी थी, जिसने बिरजू महाराज से सीखा था। वह उनकी पहली शिष्याओं में से है। ब्याह के बाद हम मध्यप्रदेश की कई छोटी जगहों में पदस्थ रहे, जहां उसके स्तर के अनुरूप संगत कर सकने वाला कोई तबलची मिलना असंभव हुआ। जब भोपाल आया तो सांस्कृतिक प्रोत्साहन की लगभग सारी जिम्मेदारी सरकारी स्तर पर मेरी हो गयी और लगभग सत्रह बरस बनी रही। इसका सबसे अधिक नुकसान रश्मि को उठाना पड़ा, क्योंकि पत्नी होने के नाते उसे प्रोत्साहन देना, हमारी मूल्य-व्यवस्था के अनुसार, अनुचित होता। यह इसके बावजूद कि उस समय उसकी पीढ़ी का कोई कलाकार, उसके स्तर का नर्तक या नर्तकी, मध्यप्रदेश में नहीं था। एक तरह से मेरी सांस्कृतिक सक्रियता के लिए रश्मि को अपने नृत्य की लगभग बलि देनी पड़ गयी। अगर उस समय प्रदेश में गैर-सरकारी संगठन अधिक सक्रिय और स्वायत्त होते, तो कोई रास्ता निकल सकता था। पर, दुर्भाग्य से, वे भी सरकार से अनुदान लेते थे और इसलिए उनका तत्त्वावधान भी गलत होता। यह याद इसलिए आया कि हाल ही में पेरिस के हवाई अड्डे पर अमदाबाद की कथक नर्तकी वैशाली त्रिवेदी से अकस्मात भेंट हो गयी। उनसे कथक की वर्तमान दुर्दशा पर लंबी बातचीत होती रही। उन्होंने रश्मि के नृत्य के बारे में पूछा और बताया कि बरसों पहले उन्होंने उनका मनोहारी नृत्य देखा था, जिसमें बहुत सुघर अंग और लालित्य थे। (जनसत्ता में आज छपा है।)

(अशोक वाजपेयी। आधुनिक हिंदी साहित्य के एक प्रमुख हस्ताक्षर। मुख्य रूप से भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे वाजपेयी अच्छे कवि के रूप में जाने जाते हैं। इन्होंने भोपाल में भारत भवन की स्थापना में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। बहुत से प्राशासनिक पदों पर रहने वाले वाजपेयी महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के उपकुलपति भी रह चुके हैं।)

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