ये तय है कि अब नहीं चलेगी हिंदुत्‍व की दुकान

♦ मार्क टुली

भारतीय इतिहास में 6 दिसंबर, 1992 को हमेशा एक काले अध्याय के तौर पर याद किया जाएगा। इस दिन मैं अयोध्या में ही था। एक ऐसे मकान की छत पर, जहां से बाबरी मस्जिद साफ-साफ दिखाई दे रही थी।

इस दिन भारतीय जनता पार्टी और अन्य सहयोगी संगठनों की तरफ से राम मंदिर का निर्माण कार्य शुरू होना था। इन लोगों ने सरकार और अदालत, दोनों को भरोसा दिलाया था कि वे इस काम को महज सांकेतिक तौर पर ही करेंगे। एक धार्मिक अनुष्ठान जैसा आयोजन होगा और मस्जिद को कोई नुकसान नहीं पहुंचाएंगे।

विवादित स्थल के आसपास करीब डेढ़ लाख लोग जमा हुए थे। ये लोग भारतीय जनता पार्टी और विश्व हिंदू परिषद के नेताओं के भाषण सुन रहे थे। इन नेताओं में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती जैसे लोग शामिल थे।

अचानक हलचल हुई, जब अपने माथे पर भगवा कपड़ा लपेटे एक युवक ने बैरियर को तोड़ दिया। पुलिस वहां खड़ी थी, और वे देखती रही। हालांकि आयोजकों की ओर से ही शांति स्थापित करने के लिए तैयार किये गये कुछ युवा पुलिस को रोकने में भी लग गये थे। उसके बाद पुलिस उनके साथ हो गयी और इनका पहला निशाना बने टेलीविजन पत्रकार। उनके कैमरे तोड़ दिये गये, उनके टेप रिकॉर्डर को कुचल दिया गया।

इससे वहां जमा हुए हजारों लोगों का उत्साह कई गुना बढ़ गया, हालांकि मस्जिद के बाहरी घेरे पर सुरक्षा के लिए पुलिस का घेरा लगा हुआ था। जल्द ही यह घेरा टूट गया। उसके बाद मैंने देखा कि कई युवक परिश्रम करके वहां के पेड़ों पर चढ़ रहे हैं और अंतिम घेरे को फांद कर मस्जिद की ओर दौड़ रहे हैं।

पुलिस अब मस्जिद के बजाय अपना बचाव करने में जुटी थी, क्योंकि भीड़ ने पुलिस वालों पर पत्थर फेंकने शुरू कर दिये थे। इसके बाद मैंने दो युवकों को मस्जिद के सेंट्रल गुंबद पर चढ़ते हुए देखा और उसके बाद उन्होंने चूने और गारे से बने उस गुंबद को हिलाना शुरू कर दिया। कुछ ही मिनटों में उन दोनों युवकों के साथ हजारों लोग जुट गये थे।

अयोध्या में टेलीफोन लाइन काम नहीं कर रही थी, लिहाजा मुझे बीबीसी के लिए अपनी स्टोरी फाइल करने के लिए फैजाबाद जाना पड़ा और उसके बाद मैंने फिर से विवादित जगह पर लौटने की कोशिश की। मैं वहां पहुंच पाता, उससे पहले ही मुझे और मेरे साथ जो अन्य पत्रकार थे, उन्हें धमकियां मिलने लगीं। उसके बाद कुछ कार सेवकों ने हमें एक कमरे में बंद कर दिया।

हम वहां कई घंटे तक कैद रहे। इसके बाद अयोध्या के सबसे प्रसिद्ध मंदिर के मुख्य पुजारी के सहयोग से स्थानीय अधिकारियों ने हमें बाहर निकाला। तब तक बाबरी मस्जिद पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी थी। 16वीं शताब्दी में बनी इस मस्जिद के ध्वस्त होने के बाद पूरे देश में हिंदू-मुस्लिम दंगे शुरू हो गये, जिनमें करीब तीन हजार लोगों की जानें गयीं।

इसके बाद ही मार्च, 1993 में मुंबई में बम धमाके हुए, जिसमें 200 से भी ज्यादा लोग मारे गये और करीब एक हजार लोग घायल हुए थे। फिर गोधरा कांड हुआ, जिसमें साबरमती एक्सप्रेस में पहले आग लगायी गयी, जिसमें अयोध्या से लौट रहे करीब 50 हिंदू मारे गये और उसके बाद भड़की हिंसा में भी 3,000 लोग मार दिये गये। इनमें अधिकांश मुस्लिम लोग थे।

ज्यादातर हिंदू मानते हैं कि विवादित ढांचा भगवान राम की जन्मभूमि है। दूसरी ओर मुसलमानों का मानना है कि यह उनकी जमीन है, क्योंकि यहां 1528 से बाबरी मस्जिद है। देश में बीते 20 वर्षों के दौरान धार्मिक कट्टरता बढ़ी है। हिंदुत्व राष्ट्रवाद के साथ-साथ इस्लामिक कट्टरता भी बढ़ी है। यही वजह है कि देश में सांप्रदायिक सदभाव बिगड़ने की आशंका लगातार बढ़ रही है।

यह मामूली आशंका नहीं है। अगर किन्हीं वजहों से सदभाव बिगड़ा, तो इस देश को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। हालांकि पिछले कुछ वर्षों के दौरान यह तस्वीर भी साफ हुई है कि उग्र हिंदुत्व की राजनीति आगे नहीं बढ़ने वाली है। इस विचारधारा के जरिये भारतीय जनता पार्टी अब सत्ता में वापसी नहीं कर सकती। अगर पार्टी सरकार में लौटती भी है, तो उसे इस विचारधारा को छोड़ना होगा।

इन सबके बीच, एक अहम बात और देखने को मिली। तमाम आशंकाओं के बावजूद विवादित रामजन्म भूमि पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के दौरान देश में कोई तनाव पैदा नहीं हुआ। यह बड़े बदलाव का सूचक है। कुछ लोग कहते हैं कि यह नया भारत है, जो सांप्रदायिक हिंसा से मुक्त होना चाहता है। यहां के लोगों में धार्मिक कट्टरता कम हो रही है, लेकिन ऐसा अभी पूरे भरोसे से नहीं कहा जा सकता, हां यह सही है कि भारत लगातार बदलाव के दौर से गुजर रहा है।

एक समय था, जब देश में दूरदर्शन पर रामायण का प्रसारण हो रहा था। लोगों का कहना था कि इससे सांप्रदायिक सदभाव का माहौल बिगड़ रहा है। तब मैंने कहा था कि यह बेहद लज्जा की बात होगी कि देश के सबसे महान काव्य का प्रसारण नहीं किया जाए। तब मुझे भी हिंदुत्ववादी कहा गया, लेकिन इन दिनों आप टेलीविजन देखिए, आपको पता चलेगा कि कई चैनलों पर ऐसे कार्यक्रम दिखाये जा रहे हैं, जो हिंदुत्व के बारे में बताते हैं। यह एक बहुत बड़ा बदलाव आया है, कि लोग अपनी-अपनी धार्मिकता के साथ परिपक्व हो रहे हैं।

वैसे भी मैं अयोध्या विवाद को धर्म से जोड़कर नहीं देखता, क्योंकि यह पूरा विवाद ही राजनीति से प्रेरित था, लेकिन अब भारतीय जनता पार्टी को भी इसका एहसास हो चुका है कि महज हिंदुत्व विचारधारा से उनकी राजनीति की दुकान नहीं चल पाएगी।

इलाहबाद हाईकोर्ट के फैसले पर लोगों की प्रतिक्रिया बेहद शांत जरूर रही, लेकिन उसने भी एक नयी बहस छेड़ दी है। आस्था के आधार पर कानून और न्यायपालिका अपना काम नहीं कर सकती। लिहाजा मेरा मानना है कि अदालत को यह साफ करना चाहिए कि विवादित भूमि पर कानूनन अधिकार किसका है। उस पर मंदिर बने या मस्जिद, यह फैसला अदालत को सरकार पर छोड़ देना चाहिए।

आस्था के आधार पर कानूनी फैसले से आने वाले दिनों में कई अड़चनें पैदा हो सकती हैं, कई विवादित ढांचों पर लोग इसी तरह के फैसले चाहेंगे। मुझे भरोसा है कि सुप्रीम कोर्ट इन सभी पहलुओं पर विचार करके ही अपना फैसला देगा। (हिंदी हिंदुस्‍तान के संपादकीय पन्‍ने पर आज मार्क टुली से बातचीत के आधार पर उनका यह मंतव्‍य छापा गया है।)

(मार्क टुली। वरिष्‍ठ पत्रकार। बाबरी विध्वंस के दिन अयोध्या में बीबीसी संवाददाता के तौर पर मौजूद थे। कोलकाता में पैदा हुए और 1964 से लेकर 1994 तक बीबीसी से जुड़े रहे। भोपाल गैस त्रासदी, ऑपरेशन ब्‍लू स्‍टार, राजीव गांधी की हत्‍या और बाबरी विध्‍वंस के समय उनकी रिपोर्टिंग एक मिसाल है। भारत सरकार ने उन्‍हें पद्मश्री भी दिया और पद्मभूषण भी। वीकिपीडिया पर उनका लिंक : en.wikipedia.org)

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