उम्मीद है कि मंगल गीत की तरह लगेंगी वो गालियां

♦ शेष नारायण सिंह

प्रोफेसर काशीनाथ सिंह हिंदी के बेहतरीन लेखक हैं। जरूरत से ज्यादा ईमानदार हैं और लेखन में अपने गांव जीयनपुर की माटी की खुशबू के पुट देने से बाज नहीं आते। हिंदी साहित्य के बहुत बड़े भाई के सबसे छोटे भाई हैं। उनके भइया का नाम दुनिया भर में इज्जत से लिया जाता है। और स्कूल से लेकर आज तक हमेशा अपने भइया से उनकी तुलना होती रही है। उनके भइया को उनकी कोई भी कहानी पसंद नहीं आयी। अपना मोर्चा जैसा कालजयी उपन्यास भी नहीं। यह अलग बात है कि उस उपन्यास का नाम दुनिया भर में है। कई विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है, ‘साठ और सत्तर के दशक की छात्र राजनीति पर लिखा गया वह सबसे अच्छा उपन्यास है। काशीनाथ सिंह फरमाते हैं कि शायद ही उनकी कोई ऐसी कहानी हो, जो भइया को पसंद हो लेकिन ऐसा संस्मरण और कथा-रिपोर्ताज भी शायद ही हो, जो उन्हें नापसंद हो। शायद इसीलिए काशीनाथ सिंह जैसा समर्थ लेखक कहानी से संस्मरण और फिर संस्मरण से कथा रिपोर्ताज की तरफ गया। उनके भइया भी कोई लल्लू पंजू नहीं, हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष डॉ नामवर सिंह हैं।

नामवर सिंह ने काशी में आठ आने रोज पर भी जिंदगी बसर की है और इतना ही खर्च करके हिंदी साहित्य को बहुत बड़ा योगदान दिया है। काशीनाथ सिंह ने बताया है कि उनके भइया ने जिंदगी में बहुत कम समझौते किये हैं। हम यह भी जानते हैं कि उनके भइया की आदर्शवादी जिद के कारण परिवार को और काशीनाथ सिंह को बहुत कुछ झेलना पड़ा। काशीनाथ सिंह के लिए तो सबसे बड़ी मुसीबत यही थी कि जाने-अनजाने वे जीवन भर नामवर सिंह के बरक्स नापे जाते रहे। जो लोग नामवर सिंह को जानते हैं, उन्हें मालूम है कि किसी भी सभा-सोसाइटी में नामवर सिंह का जिक्र आ जाने के बाद बाकी कार्यवाही उनके इर्दगिर्द ही घूमती रहती है। मैं यह बात 1976 से देख रहा हूं।

नामवर सिंह का विरोध करने पर मैंने कुछ लोगों को पिटते भी देखा है। इमरजेंसी के तुरंत बाद 35 फिरोजशाह रोड, नयी दिल्ली में एक सम्मलेन हुआ था। उस वक्त की एक बड़ी पत्रिका के संपादक का एक चेला मय लाव-लश्कर मुंबई से दिल्ली पंहुचा था। बहुत कुछ पैसा-कौड़ी बटोर रखा था उसने और नामवर सिंह के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर रहा था। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने उस धतेंगड़ की विधिवत पिटाई कर दी थी। पीटने वालों में वे लोग भी थे, जो आज के बहुत बड़े कवि और लेखक हैं। उस पहलवान को दो-चार ठूंसा मैंने भी लगाया था। बाद में जब मैंने भाई लोगों से पूछा कि जेएनयू की परंपरा तो बहस की है, इस बेचारे को शारीरिक कष्ट क्यों दिया जा रहा है, तो आज के एक बड़े कवि ने बताया कि भैंस के आगे बीन बजाने की स्वतंत्रता तो सब को है लेकिन उसको समझा सकना हमेशा से असंभव रहा है। इसलिए अगर पशुनुमा साहित्यकार को कुछ समझाना हो तो यही विधि समीचीन मानी गयी है।

मुराद यह है कि काशीनाथ सिंह इस तरह के नामवर इंसान के छोटे भाई हैं। आज भी जब नामवर सिंह उनको “काशीनाथ जी” कहते हैं, तो आम तौर पर काशी कहे जाने वाले बाबू साहेब असहज हो जाते हैं। आम तौर पर लेखकों को कुछ भी लिखते समय आलोचक की दहशत नहीं होती लेकिन काशीनाथ सिंह को तो कुछ लिखना शुरू करने से पहले से ही देश के सबसे बड़े आलोचक का आतंक रहता है। एक तो बाघ, दूसरे बंदूक बांधे। लेकिन इन्हीं हालात में डॉ काशीनाथ सिंह ने हिंदी को बेहतरीन साहित्य दिया है। ‘घोआस’ जैसा नाटक, ‘आलोचना भी रचना है’ जैसी समीक्षा, ‘अपना मोर्चा’ और ‘काशी का अस्सी’ जैसा उपन्यास डॉ काशीनाथ सिंह ने इन्हीं परिस्थितियों में लिखा है। ‘अपना मोर्चा’ विश्व साहित्य में अपना मुकाम बना चुका है और अब पता चला है कि उनके उपन्यास “काशी का अस्सी” को आधार बनाकर एक फिल्म बन रही है।

इस फिल्म का निर्माण हिंदी सिनेमा के चाणक्य, डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी कर रहे हैं। अपने नामी धारावाहिक “चाणक्य” की वजह से दुनिया भर में पहचाने जाने वाले डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने जब अमृता प्रीतम की कहानी के आधार पर फिल्म ‘पिंजर’ बनायी थी तो भारत के बंटवारे के दौरान पंजाब में दर्द का जो तांडव हुआ था, वह सिनेमा के परदे पर जिंदा हो उठा था। छत्तोआनी और रत्तोवाल नाम के गावों के हवाले से जो भी दुनिया ने देखा था, उससे लोग सिहर उठे थे। जिन लोगों ने भारत-पाकिस्तान के विभाजन को नहीं देखा, उनकी समझ में कुछ बात आयी थी और जिन्होंने देखा था, उनका दर्द फिर से ताजा हो गया था। मैंने वो फिल्म अपनी पत्नी के साथ सिनेमा हाल में जाकर देखी थी। मेरी पत्नी फिल्म की वस्तुपरक सच्चाई से सिहर उठी थीं। बाद में मैंने कई ऐसी बुजुर्ग महिलाओं के साथ भी फिल्म “पिंजर” देखी, जो 1947 में 15 से 25 साल के बीच की उम्र की रही होंगी। उन लोगों के भी आंसू रोके नहीं रुक रहे थे। फिल्म बहुत ही रीयल थी। लेकिन उसे व्यापारिक सफलता नहीं मिली।
“पिंजर” का बाक्स आफिस पर धूम न मचा पाना मेरे लिए एक पहेली थी। मैंने बार-बार फिल्म के माध्यम को समझने वालों से इसके बारे में पूछा। किसी के पास कोई जवाब नहीं था। अब जाकर बात समझ में आयी, जब मैंने यह सवाल डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी से ही पूछ दिया। उनका कहना है शायद अवसाद को बहुत देर तक झेल पाना इंसानी प्रकृति में नहीं है। दूसरी बात यह कि फिल्म के विजुअल कला पक्ष को बहुत ही ऑथेंटिक बनाने के चक्कर में पूरी फिल्म में धूसर रंग ही हावी रहा। तीसरी बात, जो उन्होंने बतायी, वह यह कि फिल्म लंबी हो गयी। तीन घंटे तक दर्द के बीच रहना बहुत कठिन काम है।

मुझे लगता है कि डॉ साहब की बात से मैं पूरी तरह सहमत हूं। ऐतिहासिक फिल्म बनाना ही बहुत रिस्की सौदा है और उसमें दर्द को ईमानदारी से प्रस्तुत करके तो शायद आग से खेलने जैसा है, लेकिन अपने चाणक्य जी ने वह खेल कर दिखाया कि उनकी आर्थिक स्थिति तो शायद इस फिल्म के बाद खासी पतली हो गयी। लेकिन उन्होंने हिंदी सिनेमा को एक ऐसी फिल्म दे दी, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए संदर्भ का काम करेगी।

इस बीच पता चला है कि डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने काशीनाथ सिंह के उपन्यास “काशी का अस्सी” के आधार पर फिल्म बनाने का मंसूबा बना लिया है। पिछली गलतियों से बचना तो इंसान का स्वभाव है। कहानी के पात्रों के साथ ईमानदारी के लिए विख्यात डॉ द्विवेदी से उम्मीद की जानी चाहिए कि बनारस की जिंदगी की बारीक समझ पर आधारित काशीनाथ सिंह के उपन्यास के डॉ गया सिंह, उपाध्याय जी, केदार, उप्धाइन वगैरह पूरी दुनिया के सामने नजर आएंगे। हालांकि इस कथानक में भी दर्द की बहुत सारी गठरियां हैं लेकिन बनारसी मस्ती भी है। अवसाद को “पिंजर” का स्थायी भाव बना कर हाथ जला चुके चाणक्य से उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बार वे मस्ती को ही कहानी का स्थायी भाव बनाएंगे। दर्द की छौंक ही रहेगी।

व्यापारिक सफलता की बात तो हम नहीं कर सकते, क्योंकि वह विधा अपनी समझ में नहीं आती लेकिन चाणक्य और पिंजर के हर फ्रेम को देखने के बाद यह भरोसे के साथ कहा जा सकता है कि हिंदी के एक बेहतरीन उपन्यास पर आधारित एक बहुत अच्छी फिल्म बाजार में आने वाली है। इस उपन्यास में बनारसी गालियां भी हैं लेकिन मुझे भरोसा है कि यह गालियां फिल्म में वैसी ही लगेंगी, जैसी शादी-ब्याह के अवसर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश में गाये जाने वाले मंगल गीत।

shesh narayan singh(शेष नारायण सिंह। मूलतः इतिहास के विद्यार्थी। पत्रकार। प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया। 1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की। महात्‍मा गांधी पर काम किया। अब स्‍वतंत्र रूप से लिखने-पढ़ने के काम में लगे हैं। उनसे sheshji@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

शेष नारायण सिंह से जुड़ी अन्‍य पोस्‍टें यहां देखें : www.mohallalive.com/tag/shesh-narayan-singh/

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *