दो चार दिन बनारस : छोटी गैबी में छन्‍नूलाल जी से मिले

♦ अविनाश

वैसे तो बनारस जाने का बहाना चाहिए, लेकिन जब अनुराग कश्‍यप बनारस में फिल्‍म शूट कर रहे हों और पटना का रास्‍ता बनारस से होकर जाता हो – तो वहां जाने के लिए किसी बहाने की जरूरत नहीं। सीधे चल देना चाहिए। हम पटना गये तो जाते में भी बनारस रुके और लौटते में भी। इस बार अस्‍सी पर रुके कुछ घंटे। वहीं अस्‍सी डाकघर के पास एक होटल में भात दाल भुजिया खाये और छन्‍नूलाल जी को फोन किया तो पता चला, वो तो दिल्‍ली में हैं। 21 को लौटेंगे। उस दिन अनुराग की यूनिट इलाहाबाद के बूचड़खाने में जमी थी, इधर हम दिन काट रहे थे। शाम में मनोज भाई बाजपेयी के साथ कमरे में बैठे, अनुराग का फोन आया इस डायलॉग के साथ कि अब तक कितनी बोतल खत्‍म कर चुके।

कसम से, हमने जरा सी भी नहीं पी थी।

हम सबसे मिलमिला कर पटना चले गये, लेकिन यूं ही समय बिता कर लौट आये, क्‍योंकि मिशन छन्‍नूलाल मिश्र अभी बाकी था। शाम चार बजे का वक्‍त मिला, लेकिन उत्‍साह में हम तीन बजे ही पहुंच गये। छोटी गैबी, जहां एक तंग गली में उनका घर है। लेकिन घर पर ताला लटका था और बाहर डाकिया के लिए एक संदेश चिपका हुआ था।

उनके घर तक जाने की कुछ और तस्‍वीरें आप यहां देख सकते हैं…

पड़ोसी ने बताया कि रहते तो यहीं हैं, लेकिन खाना खाने दूसरे घर पर जाते हैं। दूसरा घर एक नया अपार्टमेंट था, जिसके दूसरे माले पर छन्‍नूलाल जी का परिवार रहता है।

हम भागे भागे वहां पहुंचे, तो पता चला कि गुरुजी अभी अभी छोटी गैबी के लिए निकले हैं। हम फिर छोटी गैबी पहुंचे, तो छन्‍नूलाल जी आ गये थे। उन्‍होंने ही दरवाजा खोला। एक इनर और केसरिया लुंगी। गले में मोतियों की माला। बोले, अरे आपलोगों के लिए तो वहां से जल्‍दी आ गये। नहीं तो खाने के बाद आराम करते हैं।

फिर वे इत्‍मीनान से मिले। अपने ऊंचे मकान के ग्राउंड फ्लोर पर सबसे छोटे कमरे में जमीन पर उनका बिस्‍तर है और चारों तरफ तस्‍वीरें ही तस्‍वीरें हैं। बिस्मिल्‍ला खान से लेकर आमिर खान तक के साथ। कुछ आप भी देखिए…

ऐसे मिले, जैसे कोई बेहद अपना मिलता है। ढेरों किस्‍से बताये। पद्मभूषण से मिलने वाली खुशी बतायी। हमने कहा कि आप इन तमाम पुरस्‍कारों से बड़े हैं। उन्‍होंने कहा कि बिना कहे मिला इसलिए खुशी है। अब कलक्‍टर भी सलाम करता है। क्‍योंकि राष्‍ट्रपति ने सम्‍मानित किया है। जब देश का राष्‍ट्रपति ही सम्‍मान दे, तो कलक्‍टर को तो खड़ा होना ही पड़ेगा।

ऐसी निश्‍छल खुशी और बिंदास बनारसी बातों में शाम का अंधेरा नजदीक आने लगा। हालांकि उनके कमरे में दिन-रात का फर्क नहीं पता चलता। रोशनी के लिए कहीं से कोई खिड़की नहीं थी। एक बॉल्‍व से हल्‍की सी रोशनी छन कर आती थी। हमने रियाज के बारे में पूछा, तो उन्‍होंने बताया कि अब 77 साल की उम्र में क्‍या रियाज। फिर उन्‍होंने इस उम्र तक आवाज में खनक बने रहने के कुछ राज बताये, जो नीचे के वीडियो में आप सुन सकेंगे।

खैर, फरवरी में एक पूरा दिन और एक पूरी शाम उन्‍होंने हमारे साथ पटना में रहने का वादा करके हमें विदा किया। और अपने घर के दरवाजे पर हमारे साथ तस्‍वीर भी खिंचवायी। देखिए…

चलती फिरती रिपोर्ट

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