ज्ञानचक्षु खोलने के लिए अंबानी बंधुओं का धन्‍यवाद

बुद्धत्व बरास्ते रिलायंस ब्रोडबैंड

♦ समर

पिछले दिनों मोहल्‍ला में खामोशी थी, क्‍योंकि कुछ तकनीकी और यात्रा संबंधी मसले हावी थे। समर का लेख इसी बीच आया और अब जाकर हम उसे छाप पा रहे हैं। सुंदर और सलाहियत से लिखा गया मारक व्‍यंग्‍य है। इसे पढ़ते हुए हमें अर्थशास्‍त्र में मुनाफे के इस मंत्र की याद बार बार आ रही थी – वस्‍तु नहीं, वस्‍तु की छवि बेचो। आप भी पढ़ कर बताएं : मॉडरेटर

नुष्य को ज्ञान कहीं भी मिल सकता है। वह भी किसी भी प्रकार के मनुष्य को। धार्मिक/आध्यात्मिक मनुष्यों को देखें, तो महात्मा बुद्ध को ज्ञान वटवृक्ष के नीचे मिला, जबकि हजरत मूसा को पहाड़ पर। विज्ञान में आएं, तो आर्किमिडीज के ज्ञानचक्षु स्नानघर में खुले जबकि न्यूटन को सेब के पेड़ के नीचे सलाहियत हासिल हुई। ये तो हुई बहुत बड़े लोगों की बात और हम ठहरे छोटे, सामान्य किस्म के प्राणी। तो हमें आज हमारे कमरे में ही बुद्धत्व प्राप्ति का सुख मिला।

हुआ यह कि बहुत पैसे देकर खरीदा गया बहुत बड़े बड़े वादे (जैसे कहीं भी कभी भी सुपरफास्ट इंटरनेट कनेक्शन) करने वाले रिलायंस नेटकनेक्ट ने आज हमें बहुत परेशान किया। यूं तो इसमें न कोई नयी बात थी न बड़ी क्यूंकि 3.1 मेगाबाइट प्रति सेकंड की रफ्तार तो इस भले कनेक्शन ने हमें ‘कहीं भी, कभी नहीं’ दी, वादे चाहे जितने किये हों। पर फिर वही कि

” वादे किये हजार ये अहसान कम नहीं
ये और बात है कि फिर वो मुकरते चले गये… “

तो कुछ अपने बड़प्पन में, (बड़े हों या न हों, दावा तो कर ही सकते हैं न) और कुछ रिलायंस के अहसानों तले दबे देश का सामन्य नागरिक होने के नाते (धीरू भाई का सपना हर हाथ में मोबाइल हो वाले अंदाज में, अब अपने लिए सपने तो सब देखते हैं, पर पूरे देश के लिए!!!) हम भी ये छोटी छोटी बातें माफ़ करते गये। पूरे देश में तेज कनेक्शन का तो छोड़‍िए, इलाहाबाद जैसे बड़े शहर में भी नेटवर्क न मिले तो भी हमने बुरा नहीं माना। (ये और बात है कि मान भी लेते तो क्या कर लेते उन भाइयों का, जिनके झगड़े खुद प्रधानमन्त्री बैठ कर सुलझाते हों)।

पर आज जब बहुत जरूरत के वक्त दिल्ली जैसे शहर में भी इस कनेक्शन ने लग के देने का नाम न लिया तो हमें सोचने पर मजबूर होना पड़ा। (इस देश में मध्यवर्गीय लोग वैसे भी सोचते तो मजबूरी में ही हैं, नहीं तो पैदा होने के बाद क्या पढ़ना है, कहां पढ़ना है, 10वीं में विज्ञान पढ़ना है या नहीं, स्नातक विज्ञान विषयों से करना है या कला/साहित्य या समाज विज्ञान में तक सारे फैसले या मजबूरी में करते हैं या भेड़चाल में। हद तो यह कि शादी किससे करनी है जैसा अति-व्यक्तिगत फैसला भी इस देश में ज्यादातर मध्‍यर्गीय लोगों के लिए उनके मां बाप या परिवार के अन्य लोग ही करते हैं तो फिर सोचने जैसा कठिन काम करने की जहमत उठाने की जरूरत ही क्या है?) तो हमने सोचा और बहुत सोचा कि इस उत्तर-आधुनिक पूंजीवादी समय में भी पैसे देने पर उसका मूल्य क्यूं नहीं मिल रहा। आखिर को मुक्त बाजार वाली अर्थव्यवस्था लाने वाले लोगों का तो दावा ही यही था कि बाजार महान है, कार्यकुशल है, सरकारी लालफीताशाही से मुक्त है, संक्षेप में बाजार इस धरा पर ईश्वर का साकार रूप है। तो भाई यही बाजार वादे करके सामान बेचता है फिर वादों के मुताबिक़ सेवाएं क्यूं नहीं देता।

और यही वह सवाल था जिसने मुझ अज्ञानी की दुनिया ज्ञान के प्रकाश से भर दी। बुद्धत्व के उस एक पल में हमें समझ आया कि बाजार सामान, नहीं सपने बेचता है। और सपने खरीदने के बाद उन्हें पूरा करने की जिम्मेदारी जिसका सपना है, उसकी है, न कि जिसने बेचा उसकी। अब किसी तरफ से देखिए, पहली, अगर रिलायंस ने आपको और हमको धीरुभाई का सपना बेचा, तो खरीदने के बाद सपना हमारा हुआ। और अगर अब इस सपने में कोई दिक्कत आयी तो ठीक करने की जिम्मेदारी किसकी हुई? दूसरी तरफ से देखिए तो, अगर सपना धीरुभाई का था तो पूरा भी धीरुभाई करेंगे। अनिल भाई अंबानी तो उस सपने को आप तक पंहुचाने के निमित्त मात्र हैं, सपने में कोई दोष हुआ तो उनका क्या कसूर। (पिता ने कोई हत्या की तो बेटे को फांसी चढ़ाना न्याय थोड़े हुआ?)

अगर आपको यह बात दूर की कौड़ी जैसी लग रही हो तो जरा परमाणु जवाबदेही बिल (न्यूक्लिअर लाइबिलिटीज बिल) पर नजर डालें। भारत सरकार ने पूरी कोशिश की कि अगर कोई परमाणु दुर्घटना हो जाए तो जवाबदेही रिएक्टर बेचने वाली कंपनी की न हो। फिर विरोध हुआ तो सरकार ने कहा कि रिएक्टर बेचने वाली कंपनी की जिम्मेदारी केवल उस हाल में होगी अगर दुर्घटना के पीछे उसका इरादा रहा हो। अब बताइए भला, कौन सी कंपनी मानवीय चेहरे के साथ वैश्वीकरण के इस दौर में जानबूझ कर दुर्घटना करना चाहेगी। अब सोचिए कि अगर भोपाल गैस कांड के बाद भी ऐसी संभावित त्रासदी की जिम्मेदारी अगर रिएक्टर कंपनी की नहीं है तो ‘नेटकनेक्ट’ के काम न करने की जिम्मेदारी रिलायंस की कैसे हुई? आखिर दोनों ही सपना बेच रहे हैं, एक 2020 तक ‘महाशक्ति भारत’ का सपना तो दूसरा धीरुभाई का सपना। सामान तो बस उस सपने का साकार या मूर्त रूप है और निराकार की परंपरा वाले इस देश में साकार की कीमत ही क्या। न याद हो तो लें… ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या।

और इसी विचार ने मेरे मानस पटल पर ज्ञान का तीसरा विस्फोट किया। (हो पहले ही जाना चाहिए था, पर हम ठहरे मंदबुद्धि)। हमने खुद से ही पूछा कि अगर सामान बाजार द्वारा बेचे जाने वाले सपने का सिर्फ मूर्त रूप है तो बाजार क्या है। इसके पीछे भी तो कोई अमूर्त अज्ञात सत्ता होगी। और यह लीजिए… उत्तर हमने (वैसे तो एडम स्मिथ से लेकर तमाम नवउदारवादियों ने कहा था पर श्रेय लेने में क्या जाता है।) पहले ही दे दिया था। बाजार इस उत्तर-आधुनिक समाज में ईश्वर का साकार रूप है। और ईश्वर भले निराकार हो, वह धरा पर आता अवतारों के स्वरूप में ही है। तो फिर 33 करोड़ देवताओं वाले इस समाज के पूंजीपति मनुष्य नहीं वरन अवतारी पुरुष हुए। और उनमे भी सबसे बड़े, आजकल, हुए अंबानी बंधु। अब जरा अंबानी बंधुओं के बारे में सोचें। आखिर उनका बेचा सपना/सामान भी तो उन्‍हीं सा होगा। तो उनका बेचा नेटकनेक्ट हमें बस वैसे ही धोखा दे रहा है जैसे उन्होंने देश को दिये हैं। उनका बनाया नेटकनेक्ट महंगा भी बस उतना ही है, जितनी मंहगी वो देश को देश के ही समुद्र से निकाली गयी गैस बेचते हैं। और उनके बेचे सामान को ठीक करना छोटे मोटे मैकेनिक के बस में कहां… उसके लिए भी देश के प्रधानमंत्री (कार्यालय सहित) चाहिए जैसे बंधुओं के बीच के विवाद को दूर करने के लिए चाहिए थे…

तो बस… दर्द का हद से बढ़ना है दवा बन जाना वाले अंदाज में हमारा दर्द गायब। वैसे भी बुद्धत्व प्राप्त व्यक्ति को दर्द कैसा?

(समर। रिसर्च स्‍कॉलर हैं और वामपंथी रुझान रखते हैं। कुछ इश्क कुछ इनकलाब में दिलचस्‍पी है और इसके बारे में कहते हैं, सिरफिरों का इसके अलावा शौक़ हो ही क्या सकता है! यह भी कि अब हम क्या करें कि इन दोनों में पढ़ना-लिखना जागती आंखों में सपने देखना और नींद में फलसफाना बहसें करना सब शामिल है। उनसे samaranarya@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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