पुरस्‍कार पाकर बहुत खुश नहीं हैं उदय प्रकाश!

♦ डॉ शशिकांत

हिंदी के बहुचर्चित कथाकार और कवि उदय प्रकाश को इस वर्ष साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित करेगी। यह पुरस्कार उन्हें उनकी बेहद मार्मिक बहुचर्चित लम्बी कहानी ‘मोहनदास’ के लिए दिया जाएगा। अब चूंकि “मोहनदास” पुरस्कृत की जा चुकी है तो इस बात का खुलासा हो जाना चाहिए कि “मोहनदास” उदय प्रकाश की आत्मकथात्मक कृति है। बहुत कम लोग जानते हैं कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं और विश्व की आधी दर्जन भाषाओं में अनूदित हो चुकी “मोहनदास” कहानी उदय प्रकाश ने तब लिखी थी, जब दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर के पद के लिए उन्होंने इंटरव्यू दिया था और उन्हें वह नौकरी नहीं दी गयी थी।

तब उदय प्रकाश को नौकरी इसलिए नहीं दी गयी थी क्योंकि चयन समिति के एक सदस्य को इस बात पर गहरा एतराज था कि उदय प्रकाश के पास पीएचडी की डिग्री नहीं है। हालांकि तबतक उदय प्रकाश की कहानियों और कविताओं पर देश भर के विश्वविद्यालयों में आधे दर्जन से ज्यादा पीएचडी और एक दर्जन से ज्यादा एमफिल की उपाधियां बांटी जा चुकी थीं। इसके अलावा कई विदेशी विश्वविद्यालयों के सिलेबस में उनकी कहानियां जगह पा चुकी थीं और वहां पढ़ायी जा रही थीं।

वह उदय प्रकाश की जिंदगी का वो दौर था, जब वे कई महीने तक बोन टीबी की बीमारी से ग्रस्त थे, ठीक से फ्रीलांसिंग भी नहीं कर पा रहे थे और आर्थिक असुरक्षा के कारण घर-परिवार को पालने में भी दिक्कत हो रही थी। उदय प्रकाश को उन दिनों उस नौकरी की सख्त दरकार थी और उसके लिए वे डीजर्व भी करते थे, लेकिन संवेदनाओं की मलाई खानेवाले हिंदी के सत्ता प्रतिष्ठान पर काबिज शातिर लोग इतने निर्मम और मोटी खाल के थे कि सबने मिलकर हिंदी के इस बेहद संकोची लेकिन नैतिक और प्रतिभाशाली रचनाकार को दलितों और अछूतों की तरह लगभग देशनिकाला कर दिया था।

हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के संवेदनशील पाठक को यह जानकार आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि अपनी निजी जिंदगी में घटित एक बेहद दर्दनाक और अनितिक हादसे को आधार बनाकर उदय प्रकाश ने एक ऐसा महा-आख्यान (मोहनदास) रच दिया जिसको पढ़ते हुए न जाने कितने पाठक फूट-फूट कर रोये हैं। कभी विचारधारा की गिरोहबंदी करके तो कभी सत्ता के गलियारे में तीन तिकड़म करके विश्वविद्यालयों, अकादमियों और विभिन्न सरकारी संस्थाओं में पहले खुद घुसने और फिर अपने चेलों-चमचों, चापलूसों, भाई-भतीजों, बेटी-दामादों को फिट कराने की जुगत में लगे हिंदी के बहुतेरे भ्रष्ट, अनैतिक और मीडियॉकर लेखकों-अध्यापकों की छाती पर आज उदय प्रकाश को साहित्य अकादेमी पुरस्कार दिये जाने की खबर के बाद सांप लोट रहा है।

उदय प्रकाश आज भी परछाईं बनकर मोहनदास के साथ खड़े हैं ताकि फिर कोई किसी और मोहनदास के साथ ऐसा अत्याचार न कर सके। शायद इसीलिए बड़े रचनाकार हैं उदय प्रकाश और इसीलिए पाठक उन्हें बेहद प्यार करते हैं। वरना पुरस्कृत होने मात्र से लेखक बड़ा नहीं हो जाता।

… तभी तो पुरस्कार पाकर बहुत खुश नहीं हैं उदय प्रकाश!

((यह टिप्‍पणी दीवान पर आज शशिकांत ने डाली है, हमने इसे वहीं से उठाया है…))

(शशिकांत। स्वतंत्र पत्रकारिता। दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज, दयाल सिंह कॉलेज और देशबंधु कॉलेज में चार साल अध्यापन के बाद विवि से निकल कर राष्ट्रीय सहारा में उपसंपादक रहे। विभिन्न संवेदनशील सामाजिक मुद्दों पर करीब तीन सौ लेख प्रकाशित। कई किताबों की समीक्षाएं और रंग समीक्षाएं भी। इनसे shashikanthindi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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