यह सजा न्‍याय की भावना का गला घोंटने वाली है!

♦ अनिल

सत्ता की हर काली करतूत पर एक पोस्ट लिख देना भी अब गलत लगने लगा है। यह एहसास लगातार बना रहता है कि आखिर किससे अपनी बात कही जाए? जैसे कुछ भी करना असंभव हो गया हो। ठीक इसी तरह का मामला बिनायक सेन और उनके आजीवन कारावास की सजा का है। इस पूरे मामले पर गौर करेंगे, तो पाएंगे कि कुछ और ही वजह है, जो बिनायक को यह सजा सुनायी गयी है। छत्तीसगढ़ के नये मालिकों और राजाओं के सीने पर कहीं न कहीं बिनायक सेन और उन जैसे लोग चुभ रहे हैं और उन्हें रास्ते से हटाने के तरीके इजाद किये जा रहें हैं। फिर भी यह पोस्ट इसलिए ताकि कुछ तथ्य आपके जेहन में लगातार बसे रहे और जब भी आप गुलाम मीडिया के जरिये कार्पोरेट्स के आग उगलते शुभचिंतकों को सुनें तो आप उनकी ‘नेकनीयती’ भांप सकें : चंदन पांडे

जेल काटने वालों के लिए कुछ सलाह

(( नाजिम हिकमत ने यह कविता बिनायक सेन जैसे लोगों के लिए ही लिखी थी: अनुवादक ))

अगर फांसी पर लटकाने की बजाय
आपको डाल दिया जाता है जेल में
सिर्फ इसलिए कि आपने
अपनी दुनिया, अपने वतन और अपने लोगों की खातिर
नहीं छोड़ा है उम्मीद का दामन,
अगर काटना पड़े आपको दस या पंद्रह साल की कैद
उस वक्त के अलावा जो बचा है अभी काटने को,
आप नहीं कहेंगे कि

इससे तो बेहतर था झूल जाना फांसी के फंदे से
किसी परचम की तरह

आप धरेंगे अपने पांव जमीन पर और जिंदा रहेंगे।

ठीक है कोई लुत्फ नहीं होगा इसमें
लेकिन अजीम फर्ज होगा यह आपका
एक दिन और रहना जिंदा
अपने दुश्मन को मुंह चिढाते हुए।

हो सकता है आपका एक हिस्सा
अकेला रहे भीतर, जैसे कुंए के तल पर
पड़ी हो आवाज कोई।

लेकिन दूसरा हिस्सा आपका
इतना तल्लीन होगा दुनिया की हलचलों में
कि जब बाहर चालीस दिनों की दूरी पर
एक पत्ती हिलेगी जरा सा
आप सिहर उठेंगे वहां भीतर।

भीतर इंतजार करना खतों का,
गाना दर्द भरे नगमें,
या फिर जागना सारी-सारी रात ताकते हुए छत को
भला लेकिन खतरनाक होता है।

देखो अपना चेहरा हजामत दर हजामत,
भूल जाओ अपनी उम्र,
खबरदार रहो जुओं और बसंत की रातों से,
और रोटी के आखिरी टुकड़े को भी खाने का
हमेशा रखो ख्याल –

और हां ठहाके लगाना मत भूल जाना।

क्या पता तुमसे प्रेम न रह जाए उस औरत को
जिससे तुम करते हो बेतरह प्यार।

ऐसा न कहो कि यह कोई खास बात नहीं :
जेल काट रहे किसी शख्स की खातिर
यह एक हरी डाल के टूटने जैसा है।
गुलाबों और बगीचों के बारे में सोचना भी बुरा है भीतर।
बेहतर है समंदर और पहाड़ों के बारे में सोचना।
बिना सुस्ताये पढ़ना और लिखना,
और मैं तो बुनाई और आईने बनाने
की सलाह भी दूंगा।

मेरा मतलब है कि ऐसा नहीं
कि आप दस या पंद्रह साल या इससे भी ज्यादा
जेल नहीं काट सकते –

काट सकते हैं आप,
जब तक अपनी चमक खो नहीं देता वह हीरा
जो आपके सीने की बायीं तरफ धड़कता है।

अनुवाद : मनोज पटेल

नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और जाने-माने बाल चिकित्सक डॉक्टर बिनायक सेन को देशद्रोह और साजिश के आरोप में उम्रकैद का फैसला सुनाया गया है। उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के अनुसार, ’यह फैसला भारत की निचली अदालतों में लोगों के भरोसे को कमतर करेगा।’ एमनेस्टी इंटरनेशनल ने वक्तव्य जारी करते हुए कहा है कि डॉ बिनायक सेन के मुकदमे की सुनवाई के दौरान स्वच्छ न्याय के अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों का पालन नहीं किया गया है और इससे तनावग्रस्त इलाकों में स्थितियों के और बदतर होने के आसार हैं।

निर्णय की तारीख के कुछेक दिनों पहले अभियोजन पक्ष के वकील अदालत में कार्ल मार्क्स के ग्रंथ पूंजी (दास कैपिटल) की प्रति लेकर आये। उस वकील ने अपनी मूर्खता की हद यह बता कर की कि यह दुनिया की सबसे खतरनाक किताब है और माओवादी इससे भी ज्यादा खतरनाक होते हैं। इस आधार पर वे माओवादी खतरे को इंगित करते हुए डॉ बिनायक पर राजद्रोह और साजिश रचने का दोषी ठहरा रहे थे। हद तो तब हुई, जब डॉ बिनायक की पत्नी प्रो इलीना सेन द्वारा दिल्ली स्थित इंडियन सोशल इंस्टिट्यूट को लिखे एक पत्र को अभियोजन पक्ष ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ जोड़ दिया और उन्हें अंतर्राष्ट्रीय आतंकी नेटवर्क का हिस्सा बताने में जुटा रहा। ये सच्चाइयां भारतीय लोकतंत्र के संकट को और गहरा करती हैं। जहां एक ओर तो घोटालेबाज राजनेताओं, आर्थिक अपराधियों, बिचौलियों और व्यवस्थाजन्य नरसंहार के आयोजकों को खुलेआम खेलने की अनंत छूट मिल जाती है तो दूसरी ओर मूलभूत जरूरतों से वंचित विशाल तबके के लिए अपने जीवन और करियर का सर्वश्रेष्ठ लगा देने वाले वाले डॉ बिनायक सेन जैसे लोगों को आजीवन कारावास की सजा मुकर्रर कर दी जाती है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह निर्णय सरकार की जन-विरोधी नीतियों की आलोचना का मुंह बंद करने और अन्य लोगों को कड़ा सबक सिखाने की राजनीतिक मंशा से प्रेरित है।

इस फैसले के खिलाफ लोगों में काफी रोष देखने को मिल रहा है। नागरिक अधिकार, मानवाधिकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए अगर यह झटका देने वाला फैसला है तो न्याय व्यवस्था के लिए एक चुनौती भी है कि शोषण और भ्रष्टाचार के कूड़े-ढेर तले दबे भारत के असंख्य लोगों के बीच यह भरोसा कैसे कायम रखा जाए कि न्याय के इन ’मंदिरों’ में न्याय सुलभ हो पाएगा? जब शिक्षित, शहरी और नौकरीपेशे वर्ग के लिए समुचित न्याय पाना दिनों दिन एक टेढ़ी खीर साबित हो रहा है तो उन लाखों करोड़ों गरीब, ग्रामीणों की कैसी स्थिति होगी, जिन्हें छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और आंध्रप्रदेश के गांवों से किसी तरह के कायदे कानून के पालन के बगैर ही गिरफ्तार किया जाता है? डॉ बिनायक सेन का मुकदमा समूची न्याय प्रक्रिया की एक बानगी मात्र है। मई, 2007 में गिरफ्तार करने के बाद उन्हें निराधार जेल में बंद रखा गया। लोग जानते हैं कि यह कदम छत्तीसगढ़ सरकार की इस बदनीयती से संचालित था कि वह पुलिस और अपराधियों के गिरोह सलवा जुडुम के आलोचकों की जबान खामोश करना चाहती थी, जिसके लिए डॉ बिनायक को कैद करना अहम हो गया था। डॉ सेन उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप से दो साल बाद जमानत पर रिहा हुए थे।

रायपुर में शुक्रवार के दिन जिस वक्त डॉ बिनायक सेन को सजा सुनाई जा रही थी, वहीं उसी वक्त एक प्रकाशक असित सेनगुप्ता को भी राजद्रोह और साजिश के आरोप में ग्‍यारह साल के कारावास की सजा सुनायी गयी है। इस सजा के क्या मानक हैं, इसकी चर्चा जनमाध्यमों में कम हुई है। अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है, जो कानून ही अवैध हों, जो कानून संवैधानिक मान्यताओं के सरासर उल्लंघन की बुनियाद पर टिके हों, उन्हें आधार बनाकर दिये गये फैसले कितने न्यायसंगत होंगे! दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र सच्चर का यह आक्रोश गौरतलब है कि ’यह धोखाधड़ी है।’ डॉ बिनायक सेन को न्याय के किसी सिद्धांत के आधार पर राजद्रोह और साजिश का दोषी नहीं ठहराया गया है। बल्कि अपराध को एक ढीली ढाली, दलदलीय परिभाषा में ढाल दिया गया और फिर न्याय को पदच्युत करके ऐसा किया गया है। ऐसे कठोर निर्णय के औचित्य पर न्यायाधीश ने जैसा संबंध जोड़ने की कोशिश की है, वह हैरत में डालने वाला है। क्योंकि डॉ बिनायक सेन पर लगे आरोपों के लिए यह वक्तव्य किसी प्रमाणिक साक्ष्य का काम नहीं कर सकता।

न्यायाधीश बीपी वर्मा ने एक टिप्पणी में कहा है कि “आतंकवादी और माओवादी जिस तरह से राज्य और केंद्रीय अर्ध-सैनिक बलों और निर्दोष आदिवासियों को मार रहे हैं तथा देश और समुदाय में जिस तरह डर, आतंक और अव्यवस्था फैला रहे हैं, उससे अदालत अभियुक्तों के प्रति सहृदय नही हो सकती और कानून के अंतर्गत न्यूनतम सजा नहीं दे सकती।” गौरतलब है कि न्यायाधीश महोदय की इस टिप्पणी का डॉ बिनायक सेन के मुकदमे से कोई लेना देना नहीं है। न्याय का सिद्धांत और शासन इसकी इजाजत नहीं देता कि घटना कहीं घटे तो उसका अभियुक्त किसी और को कहीं भी बना दिया जाए।

प्रशांत भूषण कहते हैं, “उच्चतम न्यायालय ने साफ किया है कि राजद्रोह का दोष तभी लगाया जा सकता है, जब अभियोजन पक्ष यह साबित करे कि अभियुक्त हिंसा भड़काने या सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ने की कोशिश में था। यह स्पष्ट है कि यह मामला इस मानक पर खरा नहीं उतरता।” इतना ही नहीं, अदालत में पुलिस द्वारा पेश किये गये गवाहों में से कई पहले ही अपने बयान से मुकर गये हैं और बचाव पक्ष ने जब उनके विवरणों की जांच पड़ताल की, तो उसकी भी असलियत सामने आ ही गयी। जैसे पुलिस का कहना था कि उसने डॉ बिनायक सेन के काम की तारीफ वाली भाकपा (माओवादी) की एक चिट्ठी बरामद की थी। लेकिन बचाव पक्ष ने स्पष्ट किया कि डॉ सेन को झूठमूठ फंसाने के लिए खुद पुलिस ने यह चिट्ठी बाद में जोड़ी है क्योंकि जब्त किये गये हर सामान की तरह इस चिट्ठी की बरामदगी में न तो डॉ सेन के हस्ताक्षर हैं और न ही प्रत्यक्षदर्शियों के।

डॉ बिनायक सेन पर भाकपा (माओवादी) की मदद करने का आरोप पुलिस ने कथित नक्सली नेता अस्सी बर्षीय नारायण सान्याल से जेल में तीस से भी ज्यादा बार मिलने के आधार पर लगाया है। बचाव पक्ष ने इस आरोप को यह कहते हुए चुनौती दी कि जेल रजिस्टर में इन मुलाकातों का स्पष्ट उल्लेख है। डॉ बिनायक सेन ने पीयूसीएल के उपाध्यक्ष रहते हुए जेल मे बंद आरोपी से स्वास्थ्य कारणों से भेंट की थी जो कि जेल अधीक्षक की उपस्थिति में होती थी और सारी बातचीत हिंदी में होती थी ताकि वहां बैठे दो अन्य निरीक्षक यह समझ सकें कि क्या बात हो रही है।

उपरोक्त तथ्यों को नजरअंदाज कर दी गयी उम्रकैद की यह सजा न्याय की भावना को हीनतम बनाती है। इसके समर्थन में दी गयी जिन कमजोर और बौनी दलीलों के आधार पर अदालत ने यह फैसला सुनाया है, वे न्याय-व्यवस्था से उम्मीद लगाये लोगों को निराशा की खाई में धकेलती हैं।

(लेखक हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में मीडिया के शोधार्थी हैं।)

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