विनायक सेन के लिए धरना, प्रदर्शन और चंद कविताएं

परसों से आज तक बिनायक सेन के लिए लिखी गयी तीन कविताएं मोहल्‍ला लाइव के पास आयी हैं। बिनायक गांधी के अंतिम आदमी के लिए लड़ रहे थे और उन्‍हें इसके लिए आजाद भारत में उम्रकैद मिली। 125 साल पूरे होने पर जो कांग्रेस इतिहास को नये सिरे से खंगाल रही है, हिरावल जनता ही एहसास दिला सकती है कि सन 47 और 2010 में कोई फर्क नहीं है। मुक्ति की लड़ाई अब भी जारी है। हम इस लड़ाई में सरकार और अदालत के खिलाफ हैं : मॉडरेटर

तितलियों का खून

अंशु मालवीय ने यह कविता विनायक सेन की अन्यायपूर्ण सजा के खिलाफ 27 दिसंबर 2010 को इलाहाबाद के सिविल लाइन्स, सुभाष चौराहे पर तमाम सामाजिक संगठनों द्वारा आयोजित ‘असहमति दिवस’ पर सुनायी। अंशु भाई ने यह कविता 27 दिसंबर की सुबह लिखी। इस कविता के माध्यम से उन्होंने पूरे राज्य के चरित्र को बेनकाब किया है : राजीव यादव

वे हमें सबक सिखाना चाहते हैं साथी !
उन्हें पता नहीं कि वो तुलबा हैं हम
जो मक़तब में आये हैं सबक सीखकर,

फ़र्क़ बस ये है
कि अलिफ़ के बजाय बे से शुरू किया था हमने
और सबसे पहले लिखा था बग़ावत।

जब हथियार उठाते हैं हम
उन्हें हमसे डर लगता है
जब हथियार नहीं उठाते हम
उन्हें और डर लगता है हमसे
ख़ालिस आदमी उन्हें नंगे खड़े साल के दरख़्त की तरह डराता है
वे फौरन काटना चाहता है उसे।

हमने मान लिया है कि
असीरे इन्सां बहरसूरत
ज़मीं पर बहने के लिए है
उन्हें ख़ौफ़ इससे है… कि हम
जंगलों में बिखरी सूखी पत्तियों पर पड़े
तितलियों के खून का हिसाब मांगने आये हैं।

हमीं तो देश हैं, बाकी जो हैं सब देशद्रोही हैं

मानवाधिकार कार्यकर्ता और बाल चिकित्सक डॉ बिनायक सेन की रिहाई के लिए 27 दिसंबर 2010 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए धरने-प्रदर्शन से लौटकर यह कविता लिखी : मुकुल सरल

हमारे राज में फूलों में खुशबू !
कुफ्र है ये तो !

हमारे राज में शम्मां है रौशन !
कुफ्र है ये तो !

हमारे राज में कोयल भला ये
कैसे गाती है?
कोई जासूस लगती है, किसे ये भेद बताती है ?

हमारे राज में क्यों तारे चमके ?
चांद क्यों निकला ?
दिलों में रौशनी कैसी !
ये सूरज क्यों भला चमका ?

हमारा राज है तो बस अंधेरा ही रहे कायम
हरेक आंख में आंसू हो
लब पे चुप रहे हरदम

हमारे राज में तारे बुझा दो
सूरज गुल कर दो
हवा के तेवर तीख़े हैं
हवा पे सांकले धर दो

हमारा लफ़्ज़े-आख़िर है
हमारी ही हुकूमत है
हमारे से जुदा हो सच कोई
ये तो बग़ावत है

हमारे राज में ये कौन साज़िश कर रहा देखो
हमारे राज में ये कौन जुंबिश कर रहा देखो

ये कौन लोग हैं जो आज भी मुस्कुराते हैं
ये कौन लोग हैं जो ज़िंदगी के गीत गाते हैं
ये कौन लोग हैं मरते नहीं जो मौत के भी बाद
ये कौन लोग हैं हक़ की सदा करते हैं ज़िंदाबाद

ज़रा तुम ढूंढ कर लाओ हमारे ऐ सिपाहियो
इन्हे जेलों में डालो और खूब यातनाएं दो
अगर फिर भी न माने तो इन्हे फांसी चढ़ा दो तुम
इन्हे ज़िंदा जला दो तुम, समंदर में बहा दो तुम

हमारा राज है आख़िर
किसी का सर उठा क्यों हो
ये इतनी फौज क्यों रखी है
ज़रा तो डर किसी को हो

हमारी लूट पर बोले कोई
ये किसकी जुर्रत है
हमें झूठा कहे कोई
सरासर ये हिमाक़त है

ये कौन जनता के वकील हैं
जनता के डाक्टर
ये कौन सच के कलमकार हैं
दीवाने मास्टर

हमारे से अलग सोचें जो वो सब राजद्रोही हैं
हमीं तो देश हैं, बाकी जो हैं सब देशद्रोही हैं

तुम अकेले नहीं हो विनायक सेन

जनसत्ता वाले राजेंद्र राजन ने विनायक सेन पर एक कविता लिखी है और मुझे भेजी है। मैं आपको भी भेज रहा हूं : प्रभात रंजन
नीचे राजेंद्र राजन जी की कविता है। विनायक सेन की गिरफ्तारी के संदर्भ में। इसे मोहल्लालाइव पर छापिए : अरविंद शेष

जब तुम एक बच्चे को दवा पिला रहे थे
तब वे गुलछर्रे उड़ा रहे थे
जब तुम मरीज की नब्ज टटोल रहे थे
वे तिजोरियां खोल रहे थे
जब तुम गरीब आदमी को ढांढस बंधा रहे थे
वे गरीबों को उजाड़ने की
नयी योजनाएं बना रहे थे
जब तुम जुल्म के खिलाफ आवाज उठा रहे थे
वे संविधान में सेंध लगा रहे थे

वे देशभक्त हैं
क्योंकि वे व्यवस्था के हथियारों से लैस हैं
और तुम देशद्रोही करार दिये गये

जिन्होंने उन्नीस सौ चौरासी किया
और जिन्होंने उसे गुजरात में दोहराया
जिन्होंने भोपाल गैस कांड किया
और जो लाखों टन अनाज
गोदामों में सड़ाते रहे
उनका कुछ नहीं बिगड़ा
और तुम गुनहगार ठहरा दिये गये

लेकिन उदास मत हो
तुम अकेले नहीं हो विनायक सेन
तुम हो हमारे आंग सान सू की
हमारे लिउ श्याओबो
तुम्हारी जय हो।

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