सफ़दर की जनवरी थी और सौ साल के फैज़ अहमद फैज़ थे

पिछले साल गया था और इस साल भी गया। पटना में थे, तो अनीश अंकुर की संगत में हर साल की शुरुआत सफदर की याद में हफ्ते-दस दिनों के नुक्‍कड़ नाट्य समारोह में आते-जाते बीतता था। एक जनवरी को सफदर की याद में सहमत के कार्यक्रम का किस्‍सा सुनते रहे थे, पिछले साल शेष नारायण जी ले गये। इस साल मैंने ही उनसे तलब किया, जब उन्‍होंने दिसंबर के आखिरी हफ्ते में बेंगलुरू से फोन किया। उन्‍होंने कहा, पहली जनवरी को मिलेंगे, वहीं वहीं वहीं।

इस बार सबेरे से तैयार थे और मेट्रो में चढ़ते-उतरते रफी मार्ग पर बिट्ठल भाई पटेल हाउस के कैंपस में पहुंचे, तो शामियाना टंगा था। अंदर से किन्‍हीं के नज्म पढ़ने की आवाज आ रही थी। बाहर लोगबाग टहल रहे थे। किताबें, कैसेट, पोस्‍टर स्‍टॉल पर मौजूद थे। कबाब भुना जा रहा था। जलेबी छानी जा रही थी। सफदर की हत्‍या के दो दशक बाद जिंदगी का मेला मानीखेज अंदाज में लगा हुआ था। 22वें सफदर हाशमी मेमोरियल इवेंट फैज़ के नाम समर्पित था। यह साल फैज़ अहमद फैज़ का जन्‍म शताब्‍दी साल है।

अच्‍छा ये लगा कि जमशेदपुर से आये एक खासे बुजुर्ग साथी ने फैज की नज्‍म पर बहुत खूबसूरत नृत्‍य पेश किया। रेखा राज की आवाज मानो इकबाल बानो की आत्‍मा से निकल रही थी, जब ताज उछाले जाएंगे, जब तख्‍त गिराये जाएंगे – हम देखेंगे। पाकिस्‍तान से आये नौजवान गायक अली सेठी ने फैज को जवां दिलों की धड़कन बताया। मुरली मनोहर प्रसाद सिंह के संपादन में निकला नया पथ का फैज पर निकला अंक लोकार्पित हुआ… और शाम में हमारे समय के निहायत ही समझदार फिल्‍मकार-रंगकर्मी महमूद फारूकी और दानिश हुसैन ने फैज की दास्‍तान सुनायी।

रात की ठंडी हवाएं हड्डी में घुसने को बेताब थीं, लेकिन मेले की भीड़ का आलम था कि खुले आसमान के नीचे भी जगह जगह लोग अपनी अपनी टोलियों में गुफ्तगू कर रहे थे। जाने कब अपने अपने घर लौटे होंगे लोग, हम नौ बजते बजते वहां से निकल आये।

कुछ तस्‍वीरें आपके लिए साथ लेते आये…


बायें से : शेष नारायण सिंह, इब्‍बार रब्‍बी, राजेंद्र शर्मा, अनिल चौधरी और मनमोहन


पुण्‍य प्रसून वाजपेयी


दर्शक दीर्घा


दास्‍तान-ए-फैज सुनाते हुए महमूद फारूकी और दानिश


अरुंधती रॉय


अनुषा रिजवी


दो दीवाने (कैप्‍शन शीर्षक सौजन्‍य: प्रकाश के राय) : एनके शर्मा और सुहैल हाशमी


सीताराम येचुरी और सीमा चिश्‍ती


दास्‍तान-ए-सराय (कैप्‍शन शीर्षक सौजन्‍य: प्रकाश के राय) : रविकांत और महमूद फारूकी

ल इस पूरी शाम का जिक्र मैंने युवा मीडिया क्रिटिक विनीत कुमार से किया था, तो सुबह सुबह उन्‍होंने मोहल्‍ला लाइव सूना देख कर मुझसे पूछा कि कल की कोई रिपोर्ट दे रहे हैं क्‍या। मैं इस तैयारी के साथ गया नहीं था, लेकिन उनकी जिज्ञासा ने मेरा उत्‍साह बढ़ाया कि कुछ चीजें तो हम शेयर कर ही सकते हैं। विनीत ने इस बीच जननाट्य मंच पर एनडीटीवी की एक डॉकुमेंटरी का लिंक खोजा और हमने जुगाड़ से उसका एम्‍बेडेड कोड हासिल किया। आप वह फिल्‍म भी देखें और विनीत का शुक्रिया अदा करें।

चलती फिरती रिपोर्ट : अविनाश

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