जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का विरोध करें, वहां न जाएं



♦ प्रकाश के राय

नागरिक समाज’ की पहल के बतौर 2006 में शुरू हुआ जयपुर साहित्य उत्सव पांच वर्षों में डी एस सी लिमिटेड द्वारा प्रायोजित साहित्य उत्सव का रूप ले चुका है. यह ज़रूरी है कि इस उत्सव के सहारे कंपनियों के जन-संपर्क प्रयासों और कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व के दावों पर विचार हो. इस उत्सव को प्रायोजित करने वाली कुछ कंपनियों की पड़ताल से चिंताजनक तस्वीर उभरती है-

—-दिल्ली में हालिया संपन्न भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे राष्ट्रमंडल खेलों की जाँच कर रहे केन्द्रीय सतर्कता आयोग ने पाया है कि डी एस पी लिमिटेड को 23% से अधिक की दर से ठेके आवंटित किये गए थे

—-दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी खनन कंपनी रिओ टिंटो समूह के सम्बन्ध कई फासीवादी और नस्लवादी सरकारों से रहे हैं और उस पर दशकों से दुनिया भर में मानवीय, पर्यावरण और श्रमिक अधिकारों के उलंघन के आरोप हैं

—-दुनिया की सबसे बड़ी ऊर्जा कम्पनी और आय के हिसाब से सबसे बड़ी कम्पनी शेल तेल कम्वानी नाईजीरिया के लेखक और पर्यावरण कार्यकर्त्ता केन सारो वीवा की मौत की ज़िम्मेदार है

इस उत्सव में हिस्सा ले रहे प्रतिनिधियों के लिये क्या यह संभव है कि वे ओगोनी छात्र संघ के जनवरी 4, 2011 की उस मांग को नैतिक समर्थन दें जिसमें छात्र संघ ने संयुक्त राष्ट्र संघ के आदिवासियों के अधिकारों संबंधी घोषणा की 18 वीं वर्षगांठ पर नीदरलैंड की सांसद से चुप्पी तोड़ते हुए शेल तेल कम्पनी को ओगोनी समुदाय के शोषण, उनके पर्यावरण की बर्बादी और नाईजीरियाई डेल्टा में रह रहे निवासियों की ज़िंदगी तबाह करने के लिये जिम्मेवार ठहराने और कम्पनी को नाईजीरिया से बाहर करने की मांग की है?

क्या साहित्य को सत्य की परवाह नहीं होती? या वह उन मौकों की तलाश में रहता है जब विभिन्न ताकतें अपना वर्चस्व बनाये रखने की कोशिश में उसे अपने साथ जोड़ लेती हैं? क्या साहित्य उस झूठ के फेर में होता है जो एक आभासी सच गढ़ता है, लोगों के व्यापक हित के बारे में महज़ अवधारणात्मक उछाल-कूद करता है जबकि दरअसल वह व्यावसायिक मठों की चाकरी भर कर रहा होता है?

अगर इस उत्सव में हिस्सा ले रहे लेखक मानते हैं की एक बेहतर जीवन संभव है और उसे हासिल किया जाना चाहिय, तो उन्हें यह भी समझना होगा कि यथास्थिति को बनाए रखने में उनकी मिलीभगत उनकी मान्यताओं के बिल्कुल उलट है. अनैतिक और पापपूर्ण व्यापारिक समूहों के सहयोग से आयोजित एक साहित्य उत्सव को एक खूबसूरत अवसर के रूप में प्रस्तुत करना क्या सिर्फ़ सम्मोहन कि कोशिश-भर नहीं है?

क्या इस उत्सव और इसके प्रतिभागियों में संवेदनात्मक और बौद्धिक क्षमता है कि वे वर्तमान और आगामी पीढ़ियों पर ‘सम्पूर्ण नियंत्रण’ स्थापित करने वाली विचारधारा को ठीक से समझ सकें?

उत्सव में भागीदार लेखकों को सोचना चाहिए- नाईजीरियाई लेखक और पर्यावरण कार्यकर्त्ता केन सारो वीवा के हत्यारों से उत्सव को प्रायोजित करने का अनैतिक समकक्ष और क्या हो सकता है? पर्यावरण-संरक्षण के लिये सारो वीवा को मरणोपरांत संयुक्त राष्ट्र संघ की सम्मान सूची में शामिल किया गया था. नाईजीरिया सेना द्वारा नियुक्त अदालत, जिसने सारो वीवा को फंसी दी, के सामने उन्होंने अपने आखीरी बयान में कहा था- ‘इस मुक़दमे में शेल कठघरे में है…भले ही कम्पनी ने इसबार अपने को बचा लिया है, लेकिन वह दिन ज़रूर आएगा…ओगोनी समुदाय के ख़िलाफ़ कम्पनी के वीभत्स युद्ध के अपराध के लिये कम्पनी को सज़ा मिलेगी’.

क्या कोका कोला द्वारा प्रायोजित साहित्य उत्सव का नैतिक दायित्व नहीं है कि वह इस तथ्य को समझे कि केरल और राजस्थान के कम्पनी के सयंत्रों ने भू-जल और कुओं को सोख लिया है जिसके कारण वहाँ के निवासियों को बाहर से पानी ढो कर लाना पड़ रहा है? यही स्थिति देशभर में फैले कम्पनी के तकरीबन 52 सयंत्रों के आसपास के क्षेत्रों की है.

क्या नरसंहारों, गृह-युद्धों, युद्ध-अपराधों, आक्रमण, कब्ज़े, तानाशाहों को समर्थन और वित्तीय घोटालों की दोषी सरकारों द्वारा प्रायोजित इस साहित्य उत्सव के पास इस भयावहता को समझने का विवेक है कि क्यों वैश्विक महाशक्ति के दुनिया भर में फैले 702 सैन्य-ठिकानों में 8000 से अधिक सक्रिय और हमले के लिये तैयार परमाणु हथियार हैं? साहित्यिक मानस कैसे ‘बचकाने पागलपन’ के मनःस्थिति को समझ पायेगा जब वह स्वयं इसके प्रभाव में हो?

साहित्य के नोबेल पुरस्कार से नवाज़ा गए हेरॉल्ड पिंटर ने 2005 के अपने स्वीकृति-भाषण में कहा था- ‘लेखक की ज़िंदगी अत्यंत खतरनाक होती है, लगभग नंगी प्रक्रिया. इसके लिये हमें रोने की ज़रुरत नहीं. लेखक यह ख़ुद चुनता है और जीवन भर उसपर कायम रहता है. लेकिन यह भी सच है कि हर तरह की हवाएं आपको निशाना बनायेंगी, कुछ उनमें बर्फीली भी होंगी. यहाँ आप अकेले हैं, अपने हाथों-पैरों के सहारे. आपको कोई आश्रय नहीं, कोई सुरक्षा नहीं -जबतक कि आप झूठ ना बोलें- और तब आप अपनी सुरक्षा ख़ुद बनाते हैं, तब यह कहा जा सकता है कि आप राजनेता बन जाते हैं’. पिंटर ने यह भी कहा था कि ‘हमारे जीवन और समाजों के वास्तविक सत्य को पारिभाषित करना हमारी जिम्मेवारी है. दरअसल ऐसा करना जरूरी है’.

जयपुर साहित्य उत्सव से उम्मीद है कि वह पिंटर की बात पर ध्यान देगा और अपनी कारगुजारियों से तौबा करेगा. हम उत्सव में शामिल लेखकों से अपील करते हैं कि वे मानवता के ख़िलाफ़ जारी कॉर्पोरेट अपराधों और राज्य के दमन की मुखालिफत करें.

जयपुर उत्सव में शामिल लेखकों से हमारी अपील है कि वे श्री लंका के गाले में हो रहे साहित्य उत्सव में शामिल ना हों. वहाँ भी ऐसे कॉर्पोरेट इस उत्सव के पीछे हैं और उसे लंका की सरकार का समर्थन प्राप्त है. यह वही सरकार है जिसने श्री लंकाई तमिलों के जनसंहार की पड़ताल से पत्रकारों को रोका और इस सच्चाई पर पर्दा डालने की कोशिश की.

(प्रकाश कुमार रे। सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता के साथ ही पत्रकारिता और फिल्म निर्माण में सक्रिय। दूरदर्शन, यूएनआई और इंडिया टीवी में काम किया। फिलहाल जेएनयू से फिल्म पर रिसर्च। उनसे pkray11@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

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