पाठकों का समंदर है और नोबेल-तुर्क ओरहान पामुक हैं

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में जुटे हैं शब्‍दों के दिग्‍गज



♦ अविनाश

स वक्‍त मेरे सामने कुछ लोग खड़े हैं, जिनकी टांगों के पीछे घास पर बैठा मैं ओमपुरी की आवाज सुन रहा हूं। वे नंदिता पुरी की किताब दो शब्‍द के कुछ अंश पढ़ रहे हैं। मैं उन्‍हें देख नहीं पा रहा हूं, लेकिन कल से इतनी बार उन्‍हें देखा-सुना है कि भीड़ के पार से आ रही उनकी आवाजों में उन्‍हें देखने की कोशिश कर रहा हूं।

जब‍ किरण देसाई और जय अर्जुन सिंह मंच पर थे, तब हमें अविजित घोष डिग्‍गी पैलेस में बरामदे से सटे छोटे-छोटे पौधों के लिए बनायी गयी लाल ईंटो की क्‍यारी के पास ले आये। हम वहीं बैठे, क्‍योंकि कहीं और बैठने की जगह नहीं थी।

शनिवार की सुबह जब हिंदी को लेकर निरुपम अपने समय के चार शलाका शख्‍सीयतों प्रसून जोशी, मृणाल पांडे, सुधीश पचौरी और रवीश कुमार से बात कर रहे थे, तो श्रोताओं के बीच बैठे राजस्‍थान के मुख्‍यमंत्री सुने जा रहे थे। इसके बाद जो भीड़ हुई, तो एक लॉन से दूसरे लॉन और एक हॉल से दूसरे हॉल तक जाने के लिए अच्‍छा-खासा संघर्ष पैदा हो गया।

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में सत्रों की भी भीड़ है। चुनने का संकट सामने आ रहा है। आप भोजपुरी पर अमितावा और अविजित को सुनना चाहते हैं, लेकिन नयी बनती हिंदी के बारे में प्रसून और रवीश और सुधीश जी और मृणाल जी को सुनना भी नहीं छोड़ सकते। आप विनोद कुमार शुक्‍ल को सुनना चाहते हैं तो कहीं आपसे रस्किन बॉन्‍ड छूट रहे होते हैं। खैर, छूटते-छूटते भी इतने सारे सत्र हाथ में आ जाते हैं कि आपको अंदर से खाली होने का एहसास नहीं होता।

फेस्टिवल से जब कल घर लौटे, तो आधी रात को कृष्‍ण कल्पित का मैसेज था,

आज हम जयपुर में ओरहान पामुक को सुनने नहीं गये
प्राचीन धुरंधर धर्जटी राधेश्‍याम क्रोंच से मिलने गये
हम यानी असद जैदी, देवी प्रसाद मिश्र और मैं!
वह धूप से घिरा हुआ आत्‍मीय घर
माया भाभी के हाथ की बनी मसाला चाय
और उस पुराने शेर की आवाज पामुक से अधिक मार्मिक थी, पार्थ!

हिंदी की दुनिया भी अजीब है। जिन राधेश्‍याम से ये लोग परसों और तरसों भी मिल सकते थे, उन राधेश्‍याम से वे उसी दिन उसी वक्‍त मिलने गये, जब जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में पामुक को बोलना था। पामुक हमारे समय के एक सजग साहित्यिक चितेरे हैं, जो अपने गांव को ग्‍लोबल आत्‍मविश्‍वास के साथ उकेरते रहते हैं। उनका भारत आना उतना सहज नहीं है, जितना सहज राधेश्‍याम जी का भारत और जयपुर में होना। शनिवार की शाम पामुक ने कहा कि साहित्‍य मानवता की अभिव्‍यक्ति है – लेकिन हमें समझना होगा कि मानवता और राष्‍ट्रवादी मानवता दो अलग अलग चीजें हैं।

वे जब बोल रहे रहे थे, तो नाइजीरिया में मुक्तिसंघर्ष की नौजवान लेखिका चिमामंदा न्‍गोजी अदीवी, अरब में स्‍त्री-स्‍वतंत्रता की प्रतिनिधि आवाज लैला अबुलैला उन्‍हें बड़े गौर से सुन रही थीं और उनसे बात करते हुए राना दासगुप्‍ता के पसीने छूट रहे थे।

हर दिन फेस्टिवल की बातें इतनी लंबी हैं कि बहुत कुछ लिखा-कहा जा सकता है। मोहल्‍ला लाइव इत्‍मीनान से सारा किस्‍सा पेश करेगा। फिलहाल कुछ तस्‍वीरें पेश-ए-खिदमत है…


ऐसी हिंदी, कैसी हिंदी : मंच पर प्रसून जोशी, मृणाल पांडे, सुधीश पचौरी और रवीश कुमार


आउट ऑफ वेस्‍ट : मंच पर किरण देसाई, ओरहान पामुक और लैला अबुलैला


कुछ शहर, कुछ पेड़, कुछ नज्‍मों का खयाल : गुलजार और पवन कुमार वर्मा


और ऐसे ऐसे पल : चंद्रभान प्रसाद, अविजित घोष, रवीश कुमार और अमितावा कुमार

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