सन्नाटे को चीर कर बार बार बोलता रहा भोजपुरी सिनेमा

♦ मनोज भावुक

भोजपुरी सिनेमा अब 50 साल का प्रौढ़ होने वाला है, लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर भी इसमें प्रौढ़ावस्था वाली गंभीरता नहीं दिख रही है। जैसे-जैसे इसकी उम्र बढ़ी है, लड़कपन बढ़ता गया है। ये इसका ऐसा लड़कपन है, जिसे समय और इतिहास कभी माफ नहीं कर सकेंगे और अब तो इस पर ये कहावत भी चरितार्थ हो रही है कि जिस डाल पर बैठे हैं, उसी को काट रहे हैं। मैं भोजपुरी सिनेमा पर पिछले डेढ़ दशक से लिख रहा हूं। अब तक करीब 50-60 भोजपुरी फिल्मों को कई-कई बार देखने के बाद, फिर से कुछ लिखने का विचार मन में आया है। हाल ही में 26 दिसंबर 2010 को एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के ऑफिसर्स क्लब में भोजपुरी सिनेमा के 50 साल के सफर के बारे में, मैंने भोजपुरी सिनेमा के इस दौर के सुपर स्टार मनोज तिवारी से विस्तार से बातचीत की, जिसका प्रसारण कई बार हमार टीवी पर किया गया। इस बातचीत में मैंने पाया कि मनोज जी भी भोजपुरी सिनेमा के वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नहीं हैं।

आज से एक दशक पहले 2002 में मैंने “भोजपुरी सिनेमा के लिए चुनौती : संभावना और भविष्य’’ विषय पर हिंदी सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन, भोजपुरी सिनेमा के सुपर स्टार सुजीत कुमार, राकेश पांडेय, कुणाल सिंह, रवि किशन, वरिष्ठ निर्माता मोहन जी प्रसाद, अशोक चंद जैन, संजय राय, विनय सिन्हा, किरणकांत वर्मा, मुक्ति नारायण पाठक और फिल्म समीक्षक आलोक रंजन समेत लगभग तीन दर्जन फिल्मी हस्तियों के साथ साक्षात्कार किये थे, जिसे भोजपुरी-हिंदी की कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित किया गया। मेरे उस शोध पत्र का नाम था, भोजपुरी सिनेमा की विकास-यात्रा। इस शोध-पत्र में मैंने भोजपुरी में बनने वाले सीरियल और टेलीफिल्म पर भी बात की थी। अब वर्ष 2011 आ गया है। आइए भोजपुरी सिनेमा के इस सफरनामा पर एक बार फिर विचार किया जाए कि आज हम कहां पहुचे हैं… और आज से 50 साल पहले कहां थे।

फिल्मी दुनिया में भोजपुरी का प्रवेश

फिल्मी दुनिया में भोजपुरी के प्रवेश की कहानी बड़ी रोचक है। मुंबई के फिल्म संसार में भोजपुरी का प्रवेश भोजपुरी गीतों के माध्यम से हुआ और इसका श्रेय अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मलेन के भूतपूर्व अध्यक्ष मोती बीए को जाता है। सन 1948 में एक फिल्म बनी नदिया के पार, जिसके निर्देशक थे किशोर साहू। ये फिल्म मछुआरों और मल्लाहों की जिंदगी पर आधारित थी, जिसके संवाद अवधी में थे और इसके 8 गीत भोजपुरी में थे। इसमें से अधिकांश गीत दिलीप कुमार और कामिनी कौशल पर फिल्माये गये थे। इन गीतों को मोती बीए ने लिखे थे। आलम ये था कि इन गीतों को जिसने भी सुना है, इनकी तारीफ किये बिना नहीं रह सका है। इन गीतों को सुनकर लोगों के मुंह से अनायास ही हाउ स्वीट, हाउ स्वीट निकलता था। फिर क्या था, लोगों को भोजपुरी गीतों का चस्का लग गया और इसके साथ ही हिंदी फिल्मों में भोजपुरी गीत रखे जाने का रिवाज चल गया। जरा कल्पना कर के देखिए – बंगाली, पंजाबी, गुजराती और मराठी माहौल में भोजपुरी का ये शानदार प्रवेश कितना सुखदायी रहा होगा। भोजपुरिया स्वाद लोगों को अच्छा लगा तो हिंदी सिनेमा में इसका इस्तेमाल चखना के रूप में होने लगा। लेकिन लोगों को हिंदी फिल्मों में भोजपुरी के गीत या भोजपुरिया टोन या इसका मिजाज तो अच्छा लगा, मगर पूरी की पूरी फिल्म भोजपुरी में बनाने के लिए कोई भी तैयार न था।

पहली फिल्म गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो

अभी तक आपने देखा कि 1948 में जब फिल्मकारों को ये पता चल गया कि भोजपुरी में जादू है और इसकी मिठास लोगों को ललचा रही है… ये उस घी की तरह है, जो जिस किसी भी भोजन में डाल दिया जाए, उसे स्वादिष्ट बना देता है। नतीजा ये हुआ कि हिंदी फिल्मकार भोजपुरी का इस्तेमाल सिर्फ छौंक लगाने के लिए करने लगे। कोई भी एक संपूर्ण भोजपुरी फिल्म बनाने के लिए तैयार नहीं था। लंबे इंतजार के बाद आखिरकार वो शुभ घड़ी भी आयी, जब भोजपुरी फिल्म के लिए अनिश्चित काल तक बंद पड़ा निर्माण द्वार हमेशा-हमेशा के लिए खुल गया। इस बारे में पत्रकार आलोक रंजन ने भोजपुरी चलचित्र संघ की स्मारिका में लिखा है कि “16 फरवरी 1961 भोजपुरी सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक तिथि थी। आज के दिन पटना के शहीद स्मारक में भोजपुरी की पहली फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ का मुहूर्त समारोह संपन्न हुआ था और उसकी अगली सुबह इस फिल्म की शूटिंग शुरू की गयी। आज सोच सकते हैं कि हिंदी फिल्म के क्षितिज पर एक नया शक्ति का उदय कितना क्रांतिकारी कदम रहा होगा। वो भी ऐसे समय में जब किसी से भोजपुरी फिल्म बनाने के बारे में बात करना भी बेवकूफ बनने की तरह था। लेकिन हर युग में ऐसे बेवकूफ और सनकी होते हैं, जो युग निर्माण करते हैं। ऐसे ही एक सनकी थे नाजिर हुसैन, जिनको आज भोजपुरी सिनेमा का भीष्म पितामह कहा जाता है। नाजिर साहब भोजपुरी फिल्म बनाने के लिए बेचैन थे। भोजपुरी फिल्म बनाने की प्रेरणा उनको देशरत्न डा राजेंद्र प्रसाद से मिली। राजेंदर बाबू के सामने जब नाजिर साहब ने अपने मन की बात रखी, तो राजेंद्र बाबू ने कहा था कि आपकी बात तो बहुत अच्छी है लेकिन इसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए। और उतनी हिम्मत अगर आप में हो तो फिल्म जरूर बनाइए। इतनी हिम्मत नाजिर साहब के पास थी। उन्होंने एक स्क्रिप्ट लिखी, जिसका नाम रखा, गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो और फिर वक्त की रफ्तार के साथ निर्माता ढूंढने की उनकी कोशिश अनवरत जारी रही। ये अंधेरे से उजाले की ओर एक ऐसा सफर था, जिसकी सुबह कब, कहां और कैसे होगी, ये किसी को भी नहीं पता था। चारों तरफ बस एक दर्दीला सन्नाटा पसरा था। इसी मुश्किल सफर में नाजिर साहब के हमसफर बने – निर्माता के रूप में विश्वनाथ शाहाबादी, निर्देशक के रूप में कुंदन कुमार, हीरो के रूप में असीम कुमार और हिरोइन के रूप में कुमकुम। ये काफिला जब आगे बढ़ा, तो इसमें रामायण तिवारी, पदमा खन्ना, पटेल और भगवान सिन्हा जैसी शख्सियत भी शामिल हो गये। गीत का जिम्मा शैलेंद्र ने उठाया तो संगीत के जिम्मेदारी ली चित्रगुप्त जी ने। फिर क्या था, फिल्म गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो बनी और 1962 में रीलीज हुई। नतीजा ये कि गांव तो गांव, शहर के लोग भी खाना-पीना भूल गये। जो वितरक इस फिल्म को लेने से ना-नुकुर कर रहे थे, अब दांतो तले अंगुली काटने लगे थे। लोग जहां-तहां बतियाने लगे थे – गंगा नहाओ, विश्वनाथ जी के दर्शन करो और तब घर जाओ। इस फिल्म की खासियत थी, दर्शक से इसकी आत्मीयता, दहेज, बेमेल विवाह, नशाबाजी, सामंती संस्कार और अंधविश्वास से निकली समस्या, जो भोजपुरिया लोगों को अपनी जिंदगी की समस्या लग रही थी। गीतकार शैलेंद्र और संगीतकार चित्रगुप्त ने गीतों को इतना मोहक बनाया कि गीत गली-गली बजने लगे।

पहली फिल्म गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो

पहली भोजपुरी फिल्म गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो के गीत पूर्वोत्तर भारत के गांव-गांव में गूंजने लगे। पांच लाख की पूंजी से बनी ‘गंगा मइया…’ ने लगभग 75 लाख रुपये का व्‍यवसाय किया। इसे देखकर कुछ व्यवसायी लोग भोजपुरी फिल्म को सोने के अंडे देने वाली मुर्गी समझने लगे। नतीजा ये निकला कि भोजपुरी फिल्म निर्माण का जो पहला दौर 1961 से शुरू हुआ, वो 1967 तक ही चला। इस दौर में दर्जनों फिल्में बनीं, लेकिन लागी नाही छूटे राम और बिदेसिया को छोड़ कर कोई भी फिल्म अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पायी। इन दोनों फिल्मों के गीत कमाल के थे।

दस साल (1967-1977) की चुप्पी

1967 के बाद दस साल तक भोजपुरी फिल्म निर्माण का सिलसिला ठप रहा। 1977 में बिदेसिया के निर्माता बच्चू भाई साह ने इस चुप्पी को तोड़ने का जोखिम उठाया। उन्‍होंने सुजीत कुमार और मिस इंडिया प्रेमा नारायण को लेकर पहली रंगीन भोजपुरी फिल्म दंगल का निर्माण किया। नदीम-श्रवण के मधुर संगीत से सजी दंगल व्यवसाय के दंगल में भी बाजी मार ले गयी।

भोजपुरी फिल्म की इस धमाकेदार शुरुआत के बावजूद दस साल 1967 से 1977 तक भोजपुरी फिल्मों का निर्माण लगभग बंद रहा। भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री की ये हालत भोजपुरिया संस्कार और संस्कृति की भोथरी छूरी से हत्‍या करने वाले फिल्मकारों के चलते हुई। 1967 से 1977 के अंतराल में जगमोहन मट्टू ने एक फिल्म मितवा भी बनायी, जो कि 1970 में उत्तर प्रदेश और 1972 में बिहार में प्रदर्शित की गयी। इस तरह से ये फिल्म पहले और दूसरे दौर के बीच की एक कड़ी थी।

भोजपुरी फिल्म (1977 से 1982)

1977 में प्रदर्शित दंगल की कामयाबी ने एक बार फिर नाजिर हुसैन को उत्प्रेरित कर दिया। उन्‍होंने राकेश पांडेय और पद्मा खन्ना को शीर्ष भूमिका में लेकर बलम परदेसिया का निर्माण किया। अनजान और चित्रगुप्त के खनखनाते गीत-संगीत से सुसज्जित बलम परदेसिया रजत जयंती मनाने में सफल हुई। तब इस सफलता से अनुप्राणित होकर भोजपुरी फिल्म के तिलस्मी आकाश में निर्माता अशोक चंद जैन का धमाकेदार अवतरण हुआ और उनकी फिल्म धरती मइया और गंगा किनारे मोरा गांव ने हीरक जयंती मनायी। भोजपुरी फिल्म निर्माण का ये दूसरा दौर 1977 से 1982 तक चला। 1983 में 11 फिल्मे बनीं, जिनमें मोहन जी प्रसाद की हमार भौजी, 1984 में नौ फिल्‍में बनीं, जिसमें राज कटारिया के भैया दूज, 1985 में 6 फिल्में बनीं, जिनमें लाल जी गुप्त की नैहर के चुनरी और मुक्ति नारायण पाठक की पिया के गांव, इसके अलावा 1986 में 19 फिल्में बनीं, जिनमें रानी श्री की दूल्हा गंगा पार के हिट रही, जिन्‍होंने भोजपुरी फिल्म व्यवसाय को खूब आगे बढ़ाया।

भोजपुरी सिनेमा का नया युग

1982 से 2002 तक हालात ये हो गये कि कब फिल्म बनी और कब पर्दे से उतर गयी, इसका पता ही नहीं चलता था। ये समय भोजपुरी सिनेमा के लिए सबसे बुरा रहा। 2003 में मनोज तिवारी की ससुरा बड़ा पैसावाला के सुपर-डुपर हिट होने के बाद भोजपुरी सिनेमा का कायाकल्प हो गया। 2003 के बाद के समय को भोजपुरी सिनेमा का नया युग या वर्तमान दौर कहा जाता है। आइए, अब इस दौर के बारे में बात की जाए। 2003 में मनोज तिवारी और रानी चटर्जी अभिनीत फिल्म ससुरा बड़ा पैसावाला सुपर-डुपर हिट हुई। इसी समय मोहन जी प्रसाद ने रवि किशन को लेकर सैयां हमार और सैयां से कर द मिलनवा हे राम, दो फिल्में बनायी। दोनों फिल्मों ने अच्छा बिजनेस किया लेकिन मोहन जी प्रसाद की ही अगली फिल्म पंडित जी बताईं ना वियाह कब होई, सुपर-डुपर हिट हुई। फिर तो भोजपुरी सिनेमा की किस्मत ही जाग गयी। अमिताभ बच्चन, अजय देवगन, जूही चावला, मिथुन चक्रवर्ती जैसे हिंदी के नामी कलाकार भोजपुरी फिल्‍मों में काम करने लगे। भोजपुरी फिल्मों का बजट बढ़ गया और इसकी शूटिंग लंदन, मॉरिशस और सिंगापुर में होने लगी। इस दौरान हिंदी के कई बड़े निर्माता-निर्देशक सुभाष घई, सायरा बानो और राजश्री प्रोडक्शन जैसे ग्रुप भोजपुरी फिल्‍में बनाने के लिए अग्रसर हुए। रवि किशन और मनोज तिवारी के अलावा भोजपुरी सिनेमा के आकाश पर कई नये हीरो चमके। दिनेश लाल यादव निरहुआ, पवन सिंह, पंकज केसरी, विनय आनंद, कृष्णा अभिषेक और नयी हिरोइनों रानी चटर्जी, नगमा, भाग्यश्री, दिव्या देसाई, पाखी हेगड़े, रिंकू घोष, मोनालिसा, श्वेता तिवारी जैसे कलाकारों की दस्तक से भोजपुरी सिनेमा ने रफ्तार पकड़ लिया। इसी समय में कल्पना जैसी गायिका भी उभर कर आयी। साल 2009 भोजपुरी मनोरंजन जगत के लिए काफी चर्चा में रहा। एक लंबे इंतजार के बाद हमार टीवी व महुआ समेत भोजपुरी के कई चैनल आये। भोजपुरी फिल्म की ट्रेड मैगजीन भोजपुरी सिटी, भोजपुरी संसार समेत कई फिल्मी पत्रिका शुरू हुई। वहीं साल की सबसे बड़ी क्षति रही ससुरा बड़ा पैसवाला के निर्माता सुधाकर पांडेय की आकस्मिक मौत।

भोजपुरी सिनेमा 2010

अब बात कर ली जाए भोजपुरी सिनेमा के साल 2010 की। 2010 भोजपुरी सिनेमा के लिए न तो बहुत अच्छा रहा, न ही बहुत खराब। इस साल की सबसे बड़ी उपलब्धि रही, मनोज तिवारी की फिल्म भोजपुरिया डॉन को अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में मिला आमंत्रण। साथ ही भोजपुरी के दो स्टार मनोज तिवारी और श्वेता तिवारी का बिग बॉस सीजन 4 में जाना। 2010 में निर्माता प्रवेश सिप्पी जैसे फिल्मकार भी भोजपुरी सिनेमा जगत में आ गये। उनकी फिल्म मृत्‍युंजय पहली बार पूरे देश में एक साथ प्रदर्शित की गयी। इस फिल्म की नायिका रिंकू घोष ने फिल्म विदाई से भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में जो मुकाम बनाया, वो आज भी बरकरार है। मनोज तिवारी ने भोजपुरिया डॉन से वर्ष 2010 में दो साल बाद वापसी की, जिसका फायदा इस फिल्म के साथ-साथ मनोज तिवारी को भी मिला। नयी हिरोइन में इस साल गुंजन पंत ने अपनी फिल्म मार देब गोली, केहू ना बोली से टाप थ्री में जगह बनायी। भोजपुरी के एक और सुपर स्टार विनय आनंद ने ननिहाल जैसी फिल्म के जरिये अपनी स्थिति मजबूत की। अनारा गुप्ता और संजय पांडेय ने भी कई हिट फिल्में दीं। पवन सिंह और मोनालिसा की एक और कुरुक्षेत्र चर्चा में रही। अगर फिल्म वितरण के हिसाब से देखा जाए, तो इस साल अच्‍छी कमाई करने वाली फिल्म में देवरा बड़ा सतावेला, दाग, दामिनी, सात सहेलियां के नाम लिये जा सकते हैं। इन सब फिल्मों ने दो करोड़ से तीन करोड़ तक का व्यवसाय किया। साथ ही भइया के साली ओढ़निया वाली, सैयां के साथ मड़ैया में, लहरिया लूट ए राजाजी, जरा देब दुनिया तोहरा प्यार में, आज के करण-अर्जुन और रणभूमि ने भी अच्‍छी कमाई की। लेकिन हमार माटी में दम बा, धर्मात्मा, बलिदान, तू ही मोर बालमा फिल्म से उसके निर्माता को निराशा ही हाथ लगी। इसके बाद दिल, साथी रे, चंदू की चमेली ,तेजाब, किशना कइलस कमाल ने भी निराश किया।

हिट-सुपर हिट की दृष्टि से देखा जाए, तो निरहुआ नंबर वन पर रहा। दाग, सात सहेलियां, आज के करण-अर्जुन, शिवा निरहुआ की इस साल की सफल फिल्‍में है। इस बीच पवन सिंह जहां थे, वहां से आगे जरूर बढ़े हैं। देवरा बड़ा सतावेला, सैयां के साथ मड़ैया में और भइया के साली ओढ़निया वाली से पवन का मार्केट बढ़ा है। रवि किशन की फिल्मों की बात की जाए, तो देवरा बड़ा सतावेला, लहरिया लूट ए राजाजी आ जरा देब दुनिया तोहरा प्यार में ने ठीक-ठाक बिजनेस किया। अभिनेत्रियों की बात की जाए तो इस साल पाखी हेगड़े और मोनालिसा के लिए काफी अच्छा रहा। वर्ष 2010 में कुल 25 फिल्‍में ही पूरे भारत में रीलीज हो पायीं, लेकिन निर्माता रमाकांत प्रसाद, राजकुमार पांडेय, दिलीप जायसवाल और अभय सिन्हा ने व्यावसायिकता के साथ-साथ प्रयोगवादी फिल्म भी बनाये। वर्ष 2010 जहां भोजपुरी सिनेमा के लिए सुखद रहा, वहीं टू पीस बिकनी वाली जैसी कई फिल्‍में पानी मांगने के लिए भी तरस गयीं। इससे ये बात तो साफ है कि भोजपुरी सिनेमा के दर्शक अब जागरूक हो रहे हैं और भोजपुरी की अस्मिता के साथ खिलवाड़ उनको बर्दाश्‍त नहीं है। आने वाले साल इस साल से सबक जरूर लेंगे और बेहतरीन फिल्‍में बनेंगी, ऐसी उम्‍मीद की जा सकती है।

निष्कर्ष

भोजपुरी सिनेमा में भाषा की बहुत गड़बड़ी है। एक ही घर में चार भाई चार तरह की भोजपुरी बोल रहे हैं, जो कि बिल्कुल ही अव्यवहारिक है। मां के लिए बेटा हो का प्रयोग करता है, तो भाभी के लिए रे का। भोजपुरी में संबंध और संबोधन का निर्वाह होता है, जो कि फिल्मों में नहीं किया जा रहा है। गीतों में अश्लीलता और भोंडापन भरता जा रहा है। संगीत ज्यादातर घिसे-पीटे और कॉपी-पेस्‍ट टाइप के हैं। कई ऐसे गीतों को दर्शकों पर थोपा जाता है, जिसका फिल्म की कहानी से कोई लेना-देना नहीं होता। इन्‍हें देख के लगता है कि किसी साफ कपड़े में कोई पैबंद चिपका दिया गया है। भोजपुरी है कुछ भी चल जाएगा का फार्मूला अभी भी चल रहा है। भेड़-चाल अभी भी जारी है। अधिकांश फिल्‍में पूर्वाग्रह से आज भी ग्रसित है। अभी भी फिल्मों में ठाकुर साहब रेप करते हैं और लाला जी मुंशीगिरी करते दिख रहे हैं। भोजपुरी सिनेमा के लोगों को इस बात का ज्ञान कब होगा कि हमलोग दूसरी सहस्राब्दी के दूसरे दशक की शुरुआत कर चुके हैं। समय के साथ चलना पड़ेगा। भोजपुरी सिनेमा के शुरुआती दौर में गीतकार शैलेंद्र, मजरूह सुल्तानपुरी, अनजान … बीच के दौर में लक्ष्‍मण शाहाबादी ने जो गीत लिखे, वो आज भी गुनगुनाये जाते हैं। उन लोगों ने मनोरंजन के साथ ही सामाजिक सरोकारों का भी निर्वाह किया। समाज के प्रति जवाबदेह रहे। लेकिन अब ये सब खत्म होता दिख रहा है। मॉमेडी और रोमांस के नाम पर हिरोइन की ढ़ोंढी दिखाने में आज के ज्यादातर फिल्मकारों को परम सुख की प्राप्ति होती है। भोजपुरी क्षेत्र की राज्य सरकारें भी भोजपुरी फिल्मों को लेकर उदासीन रवैया अपनाये हुए हैं। जिन सिनमाघरों में भोजपुरी फिल्में दिखायी जाती हैं, उनकी तकनीकी व्यवस्था कैसी हैं, एकोस्टिक यानी ध्वनि तंत्र काम करता है कि नहीं … आवाज साफ सुनाई देती है या नहीं … लोग गाने को कान से नहीं, आंख से सुनते हैं – आखिर ऐसा क्यों? इससे सरकार को कोई मतलब नहीं है।

भोजपुरी फिल्म के उत्थान के लिए सरकारी सहयोग बहुत जरूरी है। साथ ही सरकार को एक ऐसी समिति का निर्माण करना होगा, जो कि भोजपुरी सिनेमा पर नजर रखे, अश्लीलता की परिभाषा और सीमा तय करे। अश्लील फिल्म बनाने वालों का खुल के विरोध करें और जो अच्‍छी फिल्म बना रहे हैं, उन्‍हें सम्मानित करें। इसके अलावा वो फिल्म को व्यापक स्तर पर और विश्व स्तर पर प्रचार-प्रसार करें। फिल्म में भाषा की गड़बड़ी रोकेने के लिए भाषाविद रखे जाएं। जो भी भोजपुरी फिल्मों में काम कर रहे हैं या करना चाहते हैं, वो भोजपुरी भाषा और उसकी टोन सीखें। विश्व स्तर पर भोजपुरी की पहचान भोजपुरी फिल्मों से ही मिली है। अब भोजपुरी सिनेमा भोजपुरी समाज की और भोजपुरिया लोगों की जो तस्वीर पेश करेगी, उसी रूप में और उसी नजर से दुनिया हमलोगों को देखेगी। भोजपुरी अलबम इंडस्ट्री ने भोजपुरी का मतलब ही वल्गर बना दिया है। आने वाली फिल्‍में भोजपुरी की गौरवशाली और वास्तविक तस्वीर पेश करेगी, यही उम्मीद है और यही कामना है।

(मनोज भावुक। भोजपुरी के फिल्म-समीक्षक और कवि। भोजपुरी चैनल हमार टीवी से जुड़े हैं। इनसे manojsinghbhawuk@yahoo.co.uk पर संपर्क किया जा सकता है।)

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