क्‍या आपकी भी गांड फट कर हाथ में आ जाती है?

♦ सुनील दीपक

सच्चाई दिखाने के नाम पर अचानक लगता है कि हिंदी फिल्मों में गालियों की बाढ़ आ रही है।

भारतीय लोकजीवन और लोकगीतों में प्रेम और सेक्स की बातों को स्पष्ट कहने की क्षमता बहुत पहले से थी। गांवों में हुए कुछ विवाहों में औरतों को गालियां में और फिर दूल्हे तथा उसके मित्रों के साथ होने वाले हंसीमजाक में, शर्म की जगह नहीं होती थी। लेकिन साहित्य में इस तरह की बात नहीं होती थी। पिछले दशकों में पहले भारत में अंग्रेजी में लिखने वालों के लेखन में, और अब कुछ सालों में हिंदी में लिखने वालों के लेखन में सच्चाई के नाम पर वह शब्द जगह पाने लगे हैं, जिन्हें पहले आप सड़क पर या मित्रों में ही सुनते थे।

यह आलेख इसी बदलते वातावरण के बारे में है। चूंकि बात गालियों की हो रही है, इसलिए इस आलेख में कुछ अभद्र शब्दों का प्रयोग भी किया गया है, जिनसे अगर आप को बुरा लगे तो मैं उसके लिए क्षमा मांगता हूं। अगर आपको अभद्र भाषा बुरी लगती है, तो आप इस आलेख को आगे न ही पढ़ें तो बेहतर है।

लेखक

“नो वन किल्लड जेसिका” (No one killed Jessica) फिल्म के शुरू में जब टीवी पत्रकार मीरा हवाई जहाज में साथ बैठे कुछ बेवकूफी की बात करने वाले सज्जन को चुप कराने के लिए जोर से कहती है, “वहां होते तो गांड फट कर हाथ में आ जाती”, तो उन सज्जन के साथ साथ, जहाज में आगे पीछे बैठे लोगों के मुंह खुले के खुले रह जाते हैं।

ऐसा तो नहीं है कि उन सज्जन ने या जहाज में बैठे अन्य लोगों ने “गांड” शब्द पहले नहीं सुना होगा, तो फिर शरीर के आम अंग की बात करने वाले इस शब्द के प्रयोग पर इतना अचरज क्यों?

अंग्रेजी उपन्यासों या फिल्मों में तो इस तरह के शब्द पिछले पचास साठ वर्षों में आम उपयोग किये जाते हैं। हिंदी फिल्मों या साहित्य में कुछ समय पहले तक इनका प्रयोग शायद केवल फुटपाथ पर बिकने वाली किताबों में ही मिल सकता था। 1970 के आसपास, दिल्ली के कुछ युवा साहित्यकारों ने मिल कर एक पतली सी पत्रिका निकाली थी, जिसमें सेक्स के विषय पर कविता, कहानियां थीं और शायद उसके पीछे, हिंदी साहित्य में इन विषयों पर बनी चुप्पी से विद्रोह करना था। क्या नाम था उस पत्रिका का, यह याद नहीं, बस उसका पीले रंग का कागज याद है। मेरे विचार में उसमें सब लेखक पुरुष थे, और हालांकि सेक्स क्रिया के वर्णन उस समय के हिसाब से काफी स्पष्ट थे, पर फिर भी उसमें लिंग, यौनी जैसे शब्दों तक ही बात रुक गयी थी, सड़क पर बोले जाने वाले आम शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया था।

भारत में अंग्रेजी लिखने-बोलने वाले वर्ग ने पिछले बीस पच्चीस सालों में सेक्स से जुड़ी बातों और शब्दों की चुप्पी को बहुत समय से तोड़ दिया था। पुरुष लेखक ही नहीं, शोभा डे जैसी लेखिकाओं ने भी एक बार लक्ष्मणरेखा को पार किया तो इनकी बाढ़ सी आ गयी। फिल्मों में अंग्रेजी की गालियां कभी कभार सुनाई देने लगीं। यानी फक (fuck), एसहोल (asshole), कंट (cunt) और प्रिक (prick) जैसे शब्द कहना अश्लीलता या अभद्रता नहीं थी, यह तो जीवन की सच्चाइयों को स्पष्ट भाषा में कहने का साहस था। पर यह साहस यह भी कहता था कि यह शब्द अंग्रेजी में ही कहे जा सकते हैं, हिंदी में इन्हें कहना तब भी अभद्रता ही लगती थी। कुछ समय पहले सुकेतु मेहता की मैक्सिमम सिटी (Maximum city) में बंबई में आये देश के विभिन्न भागों से आये लोगों की तरह तरह से गालियां देने पर पूरा अध्याय था।


Bandit Queen, Shekhar Kapoor, 1994

1994 की शेखर कपूर की फिल्म बैंडिट क्वीन (Bandit Queen) में पहली बार मां बहन की गालियां थीं, जिनसे फिल्म देखने वाले लोग कुछ हैरान से रह गये थे। गालियां ही नहीं, बलात्कार और यौनता, दोनो विषयों पर फिल्म में वह बातें कहने का साहस था, जिनको इतना स्पष्ट पहले कभी नहीं कहा गया था।

अगर बैंडीट क्वीन में बात चंबल के गांवों की थी तो देव बेनेगल की 1999 की फिल्म, “स्‍प्‍ल‍िट वाइड ओपन” (Split wide open) का विषय था, बंबई में पानी की कमी के साथ झोपड़पट्टी के रहने वालों का जीवन, उन्हें पानी बेच कर पैसा कमाने वालों का गिरोह। कहानी के दो हिस्से थे, पानी बेचने वाले गिरोह के एक युवक की एक नाबालिग लड़की की तलाश जिसे वह अपनी बहन मानता था और टीवी पर जीवन के उन पहलुओं पर जीवंत कहानियां सुनाना, जो पहले पर्दे के पीछे छुपी रहती थीं। शहर की गालियों की भाषा, नाबालिग बच्चियों से सेक्स की भाषा, और फिल्म का संदेश कि पुरुष और औरत के बीच केवल बेचने-खरीदने का धंधा होता है – चाहे वह विवाह के नाम से हो या रंडीबाजी से, कठोर और मन को धक्का देने वाले लगे थे।

“बैंडिट क्वीन” या “स्प्लिट वाइड ओपन” में हिंदी फिल्मों की रूमानी तवायफ नहीं थी, जो “साधना” और “राम तेरी गंगा मैली” से हो कर “चमेली” तक आती थी। मेरे विचार में सिनेमा, साहित्य का काम मनोरंजन करना है, तो उतना ही आवश्यक, जीवन के सत्य को दिखाना भी है, और यह सच है कि यौनिक हिंसा भी हमारे जीवन का हिस्सा है।

इन फिल्मों को कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले थे, लेकिन उस समय इसकी भाषा पर आम अखबारों या पत्रिकाओं में कुछ खास बहस हुई हो, यह मुझे याद नहीं, शायद इसलिए कि “बैंडिट क्वीन” और “स्प्लिट वाइड ओपन” को अंग्रेजी फिल्में या फिर आर्ट फिल्में समझा गया था और हिंदी सिनेमा देखने वालों को इनके बारे में अधिक मालूम नहीं था।

खैर “अभद्र शब्द” पिछले दस सालों में हिंदी साहित्य और फिल्मों में जगह पाने लगे हैं। “हंस” जैसी साहित्यिक पत्रिका में कभी कभार, कहानी में गालियां दिख जाती हैं। यह सच भी है कि आप की कहानी में दलित युवक को गुंडे मार रहे हों, मार कर उस पर मूत रहे हों, तो उस समय उसे “हरामी, कुत्ते, मैं तुम्हारी बहन और मां की इज्जत लूट लूंगा” नहीं कहेंगे, मां बहन की गालियां ही देंगे, तो लेखक क्यों अपनी कहानी को सच्चे शब्दों में नहीं कहे?

पिछले दिनों जयपुर में हुए साहित्य फेस्टिवल में अंग्रेजी में लिखने वाले भारतीय मूल के लेखक जीत थायिल (Jeet Thayil) ने अपनी नयी अंगरेजी की किताब के कुछ अंश पढ़े। आप चाहें तो इसे वीडियो में देख सकते हैं।

D4DH 06-(90) from Dreamcast.in on Vimeo.

इस अंश में वह हिंदी के दो शब्दों, “चूत” और “चूतिया”, का प्रयोग इतनी बार करते हैं कि गिनती करना कठिन है। उनका यह उपन्यास बंबई में अफीमचियों और नशेबाजों के बारे में है। पर अगर वह संभ्रांत सभा में पढ़े लिखे लोगों के सामने बैठ कर अपने उपन्यास के इस हिस्से को पढ़ते हैं, तो क्यों? मेरे विचार में इसका ध्येय यह भी है कि समाज में इन शब्दों के पीछे छुपे विषयों पर दिखावे और झूठ का पर्दा पड़ा है, और यह लेखक का विद्रोह है कि वह इस दिखावे और झूठ में साझीदारी नहीं करना चाहता।

पर एक अन्य वजह भी हो सकती है, अचानक इन गालियों की बाढ़ की। चाहे ऊपर से कितना बनें और कितना कहें कि यह अभद्र है, यह नहीं होना चाहिए, पर इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि सेक्स बिकता है। शोभा डे जैसे लेखकों के लेखन में कितनी कला है और कितना बिकने वाला सेक्स, इसकी बहस से क्या फायदा?

♦♦♦

हिंदी फिल्मों में गालियों के आने से भाषा अनुवाद के प्रश्न भी खड़े हो रहे हैं। कुछ माह पहले मैं फिल्म निर्देशक ओनीर की नयी फिल्म, “आई एम” (I am) के सबटाईटल का इतालवी अनुवाद कर रहा था। फिल्म में एक हिस्सा है, जिसमें एक पुलिसवाला एक समलैंगिक युगल को पकड़ कर उन्हें बहुत गालियां देता है। इसका इतालवी अनुवाद करते समय मैं यह सोच रहा था कि मां-बहन की गालियों जैसे शब्दों का किस तरह अनुवाद करना चाहिए? शाब्दिक अनुवाद करुं या उन शब्दों का प्रयोग करूं जो इस तरह के मौके पर इतालवी लोग बोलते हैं?

हिंदी फिल्मों के अंग्रेजी के सबटाइटल में अक्सर मां-बहन की गालियों का शाब्दिक अनुवाद किया जाता है, पर मुझे लगता है कि वह गलत है, क्योंकि भारत में भी अंग्रेजी में गाली देने वाले, अंग्रेज तरीके की गालियां ही देते हैं, जो हमने अमरीकी फिल्मों और किताबों से सीखी हैं, वह हिंदी गालियों के अंग्रेजी अनुवाद नहीं हैं।

अभी हिंदी समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में इतना साहस नहीं कि वह इस तरह के शब्दों का प्रयोग कर सकें, पर इसके लिए उन्हें अपने आप को सेंसर करना पड़ेगा। इधर बर्लिन फिल्म फेस्टिवल शुरू हुआ। इस वर्ष फेस्टिवल में एक कलकत्ता के फिल्मकार की फिल्म भी है, जिसका नाम है “गांडू”।

फेस्टिवल की निर्देशिका ने एक साक्षात्कार में कहा है कि भारत से आने वाली फिल्मों में यह उनकी नजर में सबसे साहसी और विचारोत्तेजक फिल्म है। अगर इस फिल्म को पुरस्कार मिलेगा तो हिंदी के समाचार पत्र और पत्रिकाएं और टीवी चैनल इस समाचार को किन शब्दों में देंगे? फिल्म के नाम पर बीप करेंगे? फिल्म के विषय और कहानी को कैसे बताएंगे? और वह फिल्म का भारत में सिनेमा हाल पर दिखायी जाएंगी, उसके विज्ञापन अखबारों में छपेंगे तो लोग क्या कहेंगे?

♦♦♦

तो आप का क्या विचार है गालियों के इस खुलेपन के बारे में? क्या यह अच्छी बात है? शब्द तो वही पुराने हैं पर साहित्य में, फिल्मों में उन्हें इस तरह दिखाना क्या सही है?

एक तरफ से मुझे लगता है कि यौनता हमारे जीवन का अभिन्न अंग है, लेकिन सब पर्दों के पीछे छुपा हुआ है। यौनता से जुड़ी किसी बात पर खुल कर बात करना कठिन है। इसलिए मुझे लगता है कि अगर इन शब्दों से यौनता के विषय पर बात करना सरल हो जायेगा, यह विषय पर्दे से बाहर आ जाएगा, तो यह अच्छी बात ही है। यह शब्द हमारे जीवन का अंग हैं, गुस्से में गाली देना या वैसे ही आदत से गाली देना, दोनो जीवन का हिस्सा ही हैं और जीवन के यथार्थ को साहित्य, कला और फिल्म में दिखाना आवश्यक है।

दूसरी ओर यह भी लगता है कि जीवन में इतनी हिंसा है, यह शब्द, यह गालियां भी उसी हिंसा का हिस्सा बन जायेंगी, इनसे साहित्य या फिल्म में यथार्थ नहीं आएगा, बल्कि यथार्थ उसी हिंसा में दब जाएगा।

शायद यह सब बहस इसीलिए है कि अभी हिंदी साहित्य और फिल्मों में इन शब्दों के सामने आने का नयापन है। साठ सालों से अंग्रेजी या इतालवी या अन्य भाषाओं के साहित्य और फिल्मों से यह नहीं हुआ कि बिना इन शब्दों के साहित्य और फिल्म बनना बंद हो गया हो, हर लेखक, निर्देशक अपनी संवेदना और विषय के स्वरूप ही चुनता है कि किन शब्दों में, किस पढ़ने वाले या देखने वाले के लिए अपनी रचना रचे।

( जो न कह सके से उधार )

Sunil Deepak(सुनील दीपक। पेशे से चिकित्‍सक। इटली में रहते हैं। संवेदनशील यात्री, लेखक। इंटरनेट पर हिंदी के शुरुआती योगदानकर्ताओं में एक रहे हैं। कल्‍पना नाम की एक वेबसाइट चलाते हैं। मनोविज्ञान, फोटोग्राफी और यात्रा उनका प्रिय विषय है। उनसे sunil.deepak@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *