इस नदी के किनारे कोई मेला नहीं लगता…

हम अपनी विरासत, अपने धरोहरों को लेकर बहुत जिज्ञासु समाज नहीं हैं। हम पीछे की तमाम रोशनियों को भूल जाने वाले समाज हैं। हम निराला का घर नहीं जानते, रामवृक्ष बेनीपुरी का गांव नहीं जानते, यहां तक कि प्रेमचंद की लमही भी हमारी सूचना-जिज्ञासा से बाहर का भूगोल है। कुछ लोग होते हैं, जो अपनी संवेदनशील जिद पूरी करते रहते हैं और हमें वक्‍त वक्‍त पर आईना दिखाते रहते हैं। कथाकार और रंग आलोचक हृषीकेश सुलभ ऐसे ही लोगों में से हैं। वे खड़ी बोली के पहले महाकाव्‍य ‘प्रि‍यप्रवास’ के रचयि‍ता अयोध्‍यासिंह उपाध्‍याय हरि‍औध के गांव गये, जहां उनकी स्‍मृतियां मिट रही हैं, मिटायी जा रही हैं : मॉडरेटर


अयोध्‍यासिंह उपाध्‍याय हरि‍औध का जन्‍मस्‍थल। आज़मगढ़ से लगभग सत्रह कि‍लोमीटर दूर, नि‍ज़ामाबाद में उनका ये घर अब खंडहर है।


आज़मगढ़ में उनके नाम पर बनी सांस्‍कृतिक परिषद में अब दैनिक जागरण वालों ने कब्‍जा जमा लिया है। हृषीकेश सुलभ फेसबुक पर लिखते हैं कि यह अवैध कब्‍जा है।

सुलभ जी लिखते हैं : हरि‍औध कला भवन आज़मगढ़ की जनता ने बनवाया था। एक समि‍ति‍ है, जो जिला प्रशासन की देखरेख में इसकी देखरेख करती है। पर इस पर अवैध कब्‍जा हो चुका है। कब्‍जा करनेवालों में अखबारों के दफ्तर भी शामि‍ल हैं। भवन ढह रहा है। पहले यह स्‍थल कंपनी बाग था। यहीं बाबू कुंवर सिंह ने 1857 में युद्ध लड़ा था औ और 15 दि‍नों तक आज़मगढ़ अंग्रेजों से आजाद रहा। कुंवर सिंह की मूर्ति‍ लगी थी, जो गायब हो चुकी है। यह है हमारा कृतघ्‍न और हिंसक समाज और हम उसके लोग।


हरिऔध सांस्‍कृतिक परिषद के खुले रंगमंच की दशा देखिए। सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना की काव्‍य पंक्ति याद आती है : इस नदी के किनारे कोई मेला नहीं लगता।


और हरिऔध के जन्‍मस्‍थल की मिटती हुई रेखाओं पर खड़े हैं हृषीकेश सुलभ। मानो इन रेखाओं को मिटने नहीं देंगे।

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