हर दुखी आदमी देवदास नहीं होता!

♦ गौरव सोलंकी

तनु वेड्स मनु पर बात होते होते देवदास पर बात होने लगी। गौरव और मिहिर की फेसबुकिया बातचीत में देवदास का संदर्भ आया, तो हमने श्रुति जैन का एक पुराना लेख उठा कर चिपका दिया, देवदास बनने से धेला भर काम नहीं चलेगा। गौरव ने श्रुति के पोस्‍ट पर ये टिप्‍पणी करनी चा‍ही, लेकिन कुछ तकनीकी वजहों से उनकी टिप्‍पणी मोहल्‍ला लाइव पर सीधे नहीं आ पाती। उन्‍होंने इसे फेसबुक पर चिपकाया। हम वहीं से कट-पेस्‍ट कर रहे हैं : मॉडरेटर

देवदास एक खास मानसिक प्रवृत्ति है। वह किसी दुख में अपने आप पर ही इतना अत्याचार करना है, जैसे आदमी किसी दूसरे से बदला ले रहा हो। हालांकि उसका कभी कोई फायदा नहीं होता। इस तरह अप्रत्यक्ष रूप से वह जिससे बदला लेना चाह रहा होता है, एक सीमा के बाद उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। देवदास का सपना होता है कि वह पारो के दरवाजे पर जाकर मरे और पारो दौड़ती हुई उसकी लाश को देखने आये और गश खाकर गिर पड़े। लेकिन यह सपना भी सपना ही रह जाता है। कुल मिलाकर वह बेकार की ही जिंदगी जीता है। और यह प्रवृत्ति सिर्फ पुरुषों में ही नहीं, औरतों में भी होती है। हां, भारतीय समाज के बंधनों में उसे ऐसे बेपरवाह होकर शराब पीकर दिन रात पड़े रहने की आजादी नहीं होती, इसलिए वह प्रवृत्ति बाहर नहीं दिखती।

देवदास महान नहीं है। वह एक मामूली आदमी है, कमजोर सा आदमी लेकिन वह रोचक चरित्र जरूर है। आप देश भर में किताब और फिल्म रूप में उसके लोकप्रिय होने से ही यह जान सकते हैं। वह अपने आपको, अपनी प्रेमिका को सिर्फ इसलिए कष्ट नहीं दे रहा क्योंकि वह सामंतवादी है और उसका सामना एक औरत से है। इसी तरह का कष्ट वह अपने पिता और अपने पूरे परिवार को भी देता है और बदले में पाता भी है। इसलिए देवदास की आलोचना मुझे स्त्री विमर्श के संबंध में उतनी ठीक नहीं लगती। वह कमजोर आदमी है या यूं कहिए कि उसके पास ऐसा जीवन जीने की सुविधा है, आगे पीछे घूमने फिरने वाले नौकर हैं, इसलिए उसने जीवन जीने का यह तरीका चुना है। अधिकांश लोग अपने जीवन के कुछ दिन ही सही, देवदास बनते हैं।

तनु वेड्स मनु के माधवन को मिहिर ने देवदास क्यों कहा, इसकी कोई साफ वजह मुझे अभी समझ नहीं आ रही। वह एक लड़की से एकतरफा प्रेम करता है, जबकि देवदास के मामले में ऐसा नहीं रहा। रहा भी हो, तब भी माधवन शराब नहीं पीता, अपनी जिम्मेदारियां नहीं भुलाता, लड़की या उसके घरवालों को लगातार परेशान नहीं करता। वह तो बस कुछ दिन में लंदन जाने के लिए तैयार भी है और अपनी नौकरी दुबारा शुरू करने के। इसके बाद वह उस लड़की की उसके प्रेमी से शादी करवाने की कोशिश करता है। ध्यान दीजिए कि इसमें कहीं शहादत भाव वह नहीं जताता, लड़की की सहेली जरूर हल्का सा ऐसा कहती है। वह इसके बदले में कुछ नहीं चाहता, न ही लड़की के चांद से चेहरे पर कोई दाग लगाता है। बस इतना जरूर है कि वह लड़की से प्यार करता रहा है और दिल में चाहता रहा है कि वह उसे मिल जाए। नहीं भी मिलती, तब भी वह शादी के बाद लंदन लौट जाता और देव डी के देव की तरह उसे कोई चंदा मिल जाती तो उससे शादी भी कर लेता। उसने एक बार भी नहीं कहा कि वह अपनी जिंदगी रोक देगा या किसी से शादी नहीं करेगा। बस उन दिनों उसके दिल पर कंगना छायी हुई है, बाकी कुछ नहीं।

मिहिर को यह नायक पसंद नहीं आया हो, यह अलग बात है, लेकिन एक एकतरफा प्रेम करने वाले आदमी की कहानी को देवदास बताकर खारिज कर देना मुझे ठीक नहीं लगता। फिल्म बुरी हो सकती है, लेकिन नायक मुझे देवदास कहीं से नहीं लगता। वह दुखी जरूर है, लेकिन उस दुख को व्यक्त करने का और जीने का उसका ढंग बिल्कुल अलग है। हम हर दुखी आदमी को देवदास कहकर कमजोर तो नहीं बता सकते।

(गौरव सोलंकी। आईआईटी रूड़की से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद पूर्णकालिक लेखक। हिंदी की प‍त्र-‍पत्रिकाओं में कहानियां लिखते हैं और तहलका में सिनेमा पर स्‍तंभ।
रोटी कपड़ा और सिनेमा नाम के ब्‍लॉग पर इनकी लेखनी की विविध छटाएं देखी जा सकती हैं।
उनसे aaawarapan@gmail.com पर संपर्क करें।)

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