विंध्‍यवासिनी देवी, लोकरस की धार की असल सूत्रधार

♦ निराला

ज के कुछेक, विशेषकर भोजपुरी लोकगीत गायक-गायिकाओं से समय-समय पर बात-मुलाकात होती है। अधिकतर जो इस क्षेत्र में नये-नवेले आये हैं, वे बेतरतीब आग्रहों के साथ बताते हैं कि बस, फलां अलबम आ जाए तो छा जाएंगे। जो इस क्षेत्र में खुर्राट हो चुके हैं उनका भी अमूमन जवाब होता है – फलां अलबम आ रहा है न…! गाना गा भर लेना, अलबमों की संख्या अधिक से अधिक बढ़ा लेना, अधिक से अधिक कार्यक्रमों को अपने पाले में कर लेना – यही पड़ाव और प्रस्थान बिंदु की तरह हो गया है। ऐसे में विंध्यवासिनी से हुई इकलौती मुलाकात बार-बार याद आती है। अब के समय में उनके व्यक्तित्व, कृतित्व को याद करना कल्पनालोक में विचरने-सा लगता है।

18 फरवरी 2006 का वह दिन याद आता है। उस रोज दुपहरिया का समय था। पटना के कंकड़बाग मोहल्ले के वकील साहब की हवेली में उनसे मिलने पहुंचा था। नहीं मालूम था कि यह मुलाकात इकलौती और आखिरी मुलाकात साबित होगी। तब उम्र के 86वें साल में बिहार की स्वर कोकिला विंध्यवासिनी कई बीमारियों की जकड़न में थीं। न ठीक से बैठने की स्थिति थी, न बोलने-बतियाने की ताकत। लेकिन बच्चों जैसी उमंग, उत्साह लिये सामने आयीं। गरजे-बरसे रे बदरवा, हरि मधुबनवा छाया रे…, हमसे राजा बिदेसी जन बोल…, हम साड़ी ना पहिनब बिदेसी हो पिया देसी मंगा द… जैसे कई गीतों को सुनाने लगीं। तन एकदम साथ नहीं दे रहा था, गले को बार-बार पानी से तर करतीं लेकिन मन और मिजाज ऐसा कि मना करने पर भी रूक नहीं रही थीं। एक के बाद एक गीत सुनाती गयीं।

दरअसल, लोक संगीत की लोक देवी विंध्यवासिनी ऐसी ही थीं। अपने रोम-रोम में लोकसंगीत को जिंदगी की आखिरी बेला तक रचाये-बसाये रहीं। जिन दिनों कैसेट, सीडी, रिकॉर्ड का चलन नहीं था, उस दौर में रेडियो के सहारे विंध्यवासिनी बिहार की लोकजुबान और दिलों पर राज करती थीं। वह सिर्फ गा भर नहीं रही थी, उसी दौरान लोक रामायण की रचना भी कर रही थीं, ऋतुरंग जैसे गीतिका काव्य भी रच रही थीं। पटना में विंध्य कला केंद्र के माध्यम से कई-कई विंध्यवासिनी को तैयार कर रही थीं।

5 मार्च 1920 को मुजफ्फरपुर में जन्मी थीं विंध्यवासिनी। आजादी से पहले का समय था। तब की परिस्थितियों के अनुसार इतना आसान नहीं था कि वह गीत-गवनई की दुनिया में आएं। सामाजिक और पारिवारिक बंदिशें उन्हें इस बात की इजाजत नहीं देती थीं। लेकिन संयोग देखिए कि बचपन से ही संगीत के सपनों के साथ जीनेवाली विंध्यवासिनी के लिए शादी के बाद उनके पति सहदेवेश्वर चंद्र वर्मा ही प्रथम गुरू, मेंटर और मार्गदर्शक की भूमिका में रहे। उन्‍होंने ही बिहार में लोकक्रांति के लिए विंध्‍यवासिनी देवी के जरिये संभावनाओं के द्वार खोलें। स्व वर्मा खुद पारसी थियेटरों के जाने-माने निर्देशक हुआ करते थे। विंध्यवासिनी को संगीत नाटक अकादमी सम्मान, पद्मश्री सम्मान, बिहार रत्न सम्मान, देवी अहिल्या बाई सम्मान, भिखारी ठाकुर सम्मान आदि मिले।

विंध्यवासिनी कहती थीं कि इन सबसे कभी किसी कलाकार का आकलन नहीं होगा। न ही सीडी-रिकार्ड आदि से, जिसकी उम्र बहुत कम होती है। जो परंपरा को बचाये-बनाये रखने और बढ़ाने के लिए काम करेगा, दुनिया उसे ही याद करेगी। विंध्यवासिनी उसी के लिए आखिरी समय तक काम करती रहीं। वह भी एक किसी एक भाषा, बोली को पकड़ कर नहीं बल्कि जितने अधिकार से वे मैथिली गीतों को गाती-रचती थीं, वही अधिकार उन्हें भोजपुरी में भी प्राप्त था। डिजिटल डोक्यूमेंटेशन के पॉपूलर फॉर्मेट में जाएं तो विंध्यवासिनी ने दो मैथिली फिल्मों – भैया और कन्यादान में गीत गाये, छठी मईया की महिमा हिंदी अलबम तैयार किये तथा डाक्टर बाबू में पार्श्व गायन-लेखन किया।

इस कोकिला की कूक अब भी बिहार के लोकमानस में गहराई से रची-बसी है। आजादी के पहले से लेकर उसके बाद के कालखंड में विंध्यवासिनी ने ही पहली बार महिला कलाकारों के लिए एक लीक तैयार की थी, जिस पर चलकर आज महिला लोकसंगीत कलाकारों की बड़ी फौज सामने दिखती है, भले ही भटकाव ज्यादा है, मौलिकता नगण्य…

nirala(निराला। युवा और प्रखर पत्रकार। झारखंड और बिहार के गांवों-कस्‍बों में घूम घूम कर रिपोर्टिंग की। भोजपुरी साइट बिदेसिया के मॉडरेटर। एक समय झारखंड से निकलने वाली पत्रिका माइंड के विशेष संवाददाता। प्रभात खबर से लंबे समय के जुड़ाव के बाद फिलहाल तहलका के झारखंड-बिहार संवाददाता। उनसे niralabidesia@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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