हादसा होने ही वाला था, लेकिन हुआ नहीं, टल गया

♦ अविनाश

दोपहर करीब तीन या चार बजे अस्‍सी की सूखी मिट्टी पर धूप जमी थी और बीच गंगा में थोड़ी शूटिंग होनी थी, थोड़ी चंदौली की तरफ रेत से लगी नाव पर। दो नावें एक दूसरे बंध कर चलीं। एक पर डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी, उनकी पत्‍नी मंदिरा, सिनेमैटोग्राफर विजय अरोड़ा और कई सारे असिस्‍टेंट बैठे थे। दूसरे पर काशीनाथ सिंह एंड कंपनी के साथ हम थे। साथ साथ थोड़ी दूर पर एक नाव चल रही थी, जिस पर काशी का अस्‍सी के तीन पात्र मौजूद थे – बारबर बाबा, कैथरीन और मल्‍लाह। डॉ द्विवेदी की नाव पर जिमी जिप कैमरे से साथ चल रही नाव के दृश्‍य शूट हो रहे थे। थोड़ी देर में मणिकर्णिका का बैकग्राउंड आ गया।

मणिकर्णिका घाट। बनारस की मशहूर मुर्दघट्टी। इसके किनारे से तीन चार मीटर की दूरी पर हमारी नावें ठहर गयीं। यही वो वक्‍त था, जिसकी कहानी आज बता रहा हूं। एक साथ दो मसले हुए। डॉ द्विवेदी हमारी नाव के सहारे मणिकर्णिका के और नजदीक जाना चाहते थे, लेकिन हमारी नाव का चालक चिल्‍लाया कि मोटर का पंखा फंस रहा है। मरी हुई गाय अटक गयी है। कुछ रेस्‍क्‍यू किशोर लगे और पता चला कि बोरे में बंद कुत्ता अटक गया। कुत्ता तो निकल गया, बोरा रह गया।

दूसरा ये हुआ कि डॉ द्विवेदी की नाव मणिकर्णिका तरफ तेजी बढ़ी और ठीक उसी वक्‍त एक मृत देह आधे पानी में पड़ी थी। नाव मुर्दे से टकराने ही जा रही थी। सिनेमैटोग्राफर विजय अरोड़ा ने नाव का ब्रेक लगाया और एक मिनट के लगा कि हो क्‍या गया है। अजय जी ने बताया कि पहले भी दूसरी फिल्‍मों की शूटिंग के दौरान ऐसा कुछ हुआ है और यूनिट वाले मार खा चुके हैं। शूटिंग नहीं करने दी गयी है। लेकिन इस बार हादसे से पहले विजय जी की सूझबूझ ने संकट काल लगभग टाल दिया।

लेकिन हमारी नाव के मोटर के पंखे में फंसा बोरा नहीं निकाला जा सका। डायरेक्‍टर और सिनेमैटोग्राफर की नाव अलग कर दी गयी। वे निकल गये और हमारी नाव मणिकर्णिका पर रह गयी। इस नाव पर कुछ असिस्‍टेंट और स्‍पॉट ब्‍वॉय थे। काशीनाथ सिंह एंड कंपनी तो थी ही। आधे घंटे बाद हम दूसरी नाव से गंगा के उस पार लगे, जहां जिमी जिप कैमरा खड़ा हो चुका था।

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