काशी स्टेशन पर उस एक शॉट के लिए ढेर सारी बेचैनी थी!

♦ अविनाश

नारस की सड़कें उतनी भी छोटी नहीं हैं, जितनी छोटी बता कर क्रॉसवर्ड के एक वैन ड्राइवर ने हमें बनारस की सड़कों पर लगने वाले जाम का सबब बताया। केयॉस की दूसरी तमाम वजहें फिर कभी बताएंगे – अभी तो यही बता दें कि भेलूपुरा से काशी स्टेशन जाते वक्‍त जब अजय ब्रह्मात्‍मज को लगा कि उनकी फ्लाइट छूट भी सकती है – तो उन्‍होंने हमें गाड़ी से उतार दिया और वापस लौट गये। ड्राइवर भी डरा रहा था कि काशी स्टेशन रह तो गया है ढाई तीन किलोमीटर ही, लेकिन वक्‍त उतना लगेगा, जितना 20-25 किलोमीटर जाने में लगता है। फिर तो वहीं प्रणाम-पाती हुई, विदा-विदाई हुए और अजय ब्रह्मात्‍मज और हमारी राहें जुदा हो गयीं।

काशी जंक्‍शन पर मोहल्‍ला अस्‍सी का एक दृश्‍य शूट होना था। ऑटो वाले ने जब हमें काशी पहुंचाया, उस वक्‍त वैनिटी वैन्‍स, एक ट्रक, कुछ कैमरा, जिमी जिप पहुंच चुका था। डॉ सीपीडी के सारे असिस्‍टेंट पहुंच चुके थे। एक मदारी वाला अपने दो मासूम बच्‍चों के साथ करतब दिखा रहा था। लोग उसकी चारों तरफ जमा थे। किसी ने बताया कि अटेंशन शिफ्ट करने के लिए यह बढिया इंतजाम है। लेकिन यह शिगूफा गलत साबित हुआ, जब रविकशन की इंट्री इस पूरे फ्रेम में हुई। लोग उनके पीछे भागे। यह थोड़ी देर का ड्रामा था, जब तक कि वह अपने वैनिटी वैन में चले नहीं गये।

प्रोडक्‍शन टीम की दबंग महिला, जिनका नाम सुमन है, प्‍लेटफॉर्म खाली करवाने के लिए सेक्‍युरिटी गार्ड्स पर चिल्‍ला रही थीं। हालांकि डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी की टीम में चीख-चिल्‍लाहट बिल्‍कुल ही देखने को नहीं मिलती। वह बहुत शांति से काम लेते हैं। एक टेक दस बार लेने के बावजूद उनकी झुंझलाहट सामने नहीं आती और इसका असर पूरी टीम पर रहता है। बहरहाल, उस वक्‍त काशी स्टेशन पर तीन तरह की भीड़ थी। एक मोहल्‍ला अस्‍सी की चुनी हुई भीड़, जो दृश्‍य में आनी थी, दूसरी स्‍वाभाविक यात्रियों की भीड़ और तीसरी शूटिंग देखने वालों की भीड़। पहली भीड़ का तो काम ही था, दूसरी भीड़ से भी ज्‍यादा परेशानी नहीं थी, क्‍योंकि उन्‍हें दूसरे प्‍लेटफॉर्म पर शिफ्ट किया जा रहा था – लेकिन तीसरी तरह की भीड़ ने पूरी यूनिट की नाक में दम कर रखा था।

डॉक्‍टर साहब दो-ढाई बजे आ गये थे। एक एक स्‍पॉट देख कर कैमरा सेट कर दिया गया था। फिल्‍म में इस्‍तेमाल किये जा रहे विदेशी सैलानियों की टोली वेटिंग रूम में जमा थी। गाना बजाना कर रही थी। उन्‍हें देखने आयी महिलाओं में से एक महिला की गोद से उठा कर एक बच्‍चे को एक विदेशी महिला दुलार रही थी। तीन बजे किराये की ट्रेन मुगलसराय से आनी थी, लेकिन आयी चार बजे के आसपास। तब तक तमाशाई भीड़ को फ्रेम से बाहर कर दिया गया था, लेकिन छिटक कर एकाध आ जाते थे।

काशी स्टेशन पर ट्रेन की इंट्री का एक लांग शॉट लेना था और धीरे-धीरे ट्रेन की सूंढ़ को क्‍लोजअप में आना था। इस एक दृश्‍य को मैजिक लाइट में बेहतरीन तरीके से शूट करने के लिए सिनेमैटोग्राफर विजय अरोड़ा बदहवास थे। डॉक्‍टर साहब कॉडलेस माइक के सहारे भीड़ को डायरेक्‍ट कर रहे थे और उनकी पत्‍नी मंदिरा बेचैनी से इस एक पल के पूरा होने की प्रतीक्षा कर रही थीं। जिमी जिप कैमरे से पहले फ्रेम में काशी का साइन बोर्ड लिया गया, दूसरे फ्रेम में दूर से आती ट्रेन, जो नजदीक आते आते जैसे कैमरे के चेहरे से टकराने वाली हो। और ये सीन जैसे ही ओके हुआ – सबके चेहरे पर संतोष की स्मित रेखाएं नजर आने लगीं।

सबने सबको देखा और अगले सीन की तैयारी में जुट गये। हमारे साथ समर अनार्य थे। उन्‍होंने कहा कि अब कभी किसी खराब से खराब फिल्‍म को एकबारगी रिजेक्‍ट नहीं करेंगे। अगर चंद सेकंड के एक शॉट के लिए इतनी मेहनत करनी पड़ती है, तो उसके आउटपुट की स्‍वाभाविक प्रतिक्रिया में “बकवास” कहना सरासर जुर्म होगा।

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